| क्रम संख्या | अध्याय / अनुभाग | विवरण |
| 1. | प्राक्कथन (Foreword) | पुस्तक की भूमिका और लेखन का उद्देश्य |
| 2. | व्यक्तित्व का उद्भव | ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश |
| 3. | काव्य यात्रा का आरंभ | पहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ |
| 4. | भाव-कलश: एक परिचय | मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता |
| 5. | प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषण | चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा |
| 6. | शैली और शिल्प विधान | भाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग |
| 7. | संवेदना और सरोकार | रचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण |
| 8. | साहित्यिक योगदान | हिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार |
| 9. | सम्मान एवं उपलब्धियाँ | कवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर |
| 10. | उपसंहार | काव्य यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि |
| 11. | परिशिष्ट (Appendix) | कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश |
## *प्राक्कथन (Foreword)*
### *लेखन का उद्देश्य*
2 व्यक्तित्व का उद्भव: ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश
[3] काव्य यात्रा का आरंभ
अध्याय 4
भाव-कलश: एक परिचय — मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता**
अध्याय 5: प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषण – चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा
अध्याय 6 शैली और शिल्प-विधान — भाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग
*अध्याय 7 : संवेदना और सरोकार — रचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण*
*अध्याय 8 — साहित्यिक योगदान: हिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार*
*अध्याय 9 — सम्मान एवं उपलब्धियाँ: कवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर*
*अध्याय 10 — उपसंहार: काव्य-यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि*
| 11. | परिशिष्ट (Appendix) | कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश |
जीवन की धूप-छांव
"माटी की महक"
गीत: वक्त की नदी
प्रकृति का निमंत्रण
मानवता का दीप
चप्पल
गीत: जीवन की थाती
❤️ दिल: अनमोल अहसास
गीत: धड़कनों का इकरार
मेरा दिल
एक रास्ता
सपनों की दुनिया
ज़िन्दगी के सफर में,
शीर्षक: प्रगति का पाथेय
गीत: भोर का अमृत (ब्रह्म मुहूर्त)
गीत: "गीत ही तो जीवन है"
गीत: नया साल, नया संकल्प
गीत: मैं रुकूँगा नहीं (जीत का जुनून)
गीत: उन्नति की नई डगर
गीत का शीर्षक: तुम्हारी पसंद
शीर्षक: मिलन का उत्सव
सुबह की चाय और 'ठंडी' चेतावनी
पत्नी और ऋतु परिवर्तन
गीत: समर्पण की लौ
भजन: मेरे साँवरे सरकार
चाचा की 'व्हाइट हाउस' वाली चाय
गीत: शिखर की ओर
गीत: सनातन का गौरव गान
गीत: रिश्तों की डोर
गीत: जीत की राह
क्रिकेट और जिंदगी: डटे रहो पिच पर!
गीत: राही और राह
गीत: गौरव की भाषा हिन्दी
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष)
गीत: श्रम की मशाल
गीत: गौरव की भाषा हिन्दी
गीत: "मंजिल की ओर चल"
फूलों की मुस्कान
मिजाज-ए-इश्क
🌸 आया बसन्त, मचा हुड़दंग! 🌸
गीत: आया पर्व संक्रांति का
गीत: बहारों की मंज़िल
शीर्षक: प्रेम ही मेरी बंदगी
गीत: बहारों की नई सरगम
गीत: "जीवन की डोर और उम्मीदों की पतंग"
शीर्षक: राह तू अपनी बनाए जा
शीर्षक: सृष्टि का पैगाम
गीत: अनमोल है ये सांसें
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना
बड़ी मुश्किल से मिलता है, ये जीवन का सुहाना।
न कल की फिक्र में खोना, न बीते कल में रोना
जो पल है हाथ में तेरे, उसी में मुस्कुराना।
कभी जो धूप तड़पाए, तो साया बनके ढल जाना
किसी के बहते अश्कों में, खुशी बनके निकल जाना।
न धन-दौलत से आँका कर, तू अपनी खुशकिस्मती को
सुकून मिलता है अपनों में, यही सच मान लेना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
बुराई को मिटाने का, बस एक ही मूलमंत्र है
जहाँ नफरत का घेरा हो, वहाँ तू प्यार बोना।
न छोटा कोई, न बड़ा कोई, खुदा की इस कचहरी में
हृदय में सबके बसता है, वो पावन दिव्य कोना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
मिले जो राह में पत्थर, तो उनसे घर बना लेना
हो मुश्किल सामने कितनी, न अपना सिर झुकाना।
जियो ऐसे कि दुनिया में, तुम्हारी याद रह जाए
महकते फूल की सूरत, चमन सारा सजाना।
ये अनमोल है जीवन, इसे जीना सिखा दो तुम
जहाँ भी पैर रक्खो तुम, गुलशन खिला दो तुम।
गीत: बहारों की नई सरगम
शीर्षक: कहाँ गए वो दिन?
गीत: हम तुम
गीत का शीर्षक: धड़कनों की दास्ताँ
गीत: "जीवन का आधार है जल"
शीर्षक: उत्तम भाग्य बनायेंगे
गीत: भारत भारती
गीत: इस नाम को क्या नाम दूं?
कलम की मशाल: विदाई संदेश
गीत: नई उमंग का आगाज़
कृतज्ञता: एक संबल के लिए
ललित मोहन शुक्ला ( कवि गीतकार, लेखक व सेवा निवृत शिक्षक)
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: "प्रणाम और परिणाम"
जो झुकना सीख लेते हैं, वही तो खास होते हैं,
झुके जो शीश चरणों में, प्रभु के पास होते हैं।
एक छोटा सा 'प्रणाम' ही, बदलता भाग्य की रेखा,
सुंदर 'परिणाम' फिर हमने, यहाँ फलते हुए देखा।
हृदय में भक्ति भाव हो, लबों पर मीठी वाणी हो,
मिटा दे द्वेष को मन से, सरल सी ये कहानी हो।
बड़ों का मान करने से, सदा आशीष मिलते हैं,
जहाँ बोओ विनय के बीज, वहीं खुशियों के फलते हैं।
विनम्रता की ये वर्षा, करे जीवन को फिर पावन,
प्रणाम की ही शक्ति से, महक उठता है ये आँगन।
अहं को त्याग कर देखो, समर्पण में ही सिद्धि है,
मिले जो शांत मन सबको, यही तो सच्ची वृद्धि है।
किया जो कर्म निष्काम, फल की चिंता छोड़ कर,
मिले सुखद परिणाम फिर, प्रभु से नाता जोड़ कर।
चलो हम वंदना कर लें, जगत के उस विधाता की,
प्रणाम से ही जुड़ती है, कड़ी जीवन की साता की।
प्रणाम है वो सीढ़ी जो, शिखर तक हमको ले जाए,
मिले परिणाम वो सुखद, जो जग में मान दिलवाए।
सदा झुक कर मिलो सबसे, यही जीवन का गहना है,
प्रणाम और परिणाम में ही, सफल जीवन का बहना है।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: ऊँची उड़ान
नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,
लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है।
ठहर न तू, ऐ मुसाफ़िर, अभी राहें बाकी हैं,
सूरज सा चमकने की तेरी अपनी बारी है।
पर्वत जितने ऊँचे हों, कदम नहीं रुक पाएँगे,
काँटों वाली राहों पर भी, हम मुस्कुराएँगे।
ये जो काले बादल हैं, बस इक पल का साया हैं,
जिसने खुद को जीत लिया, उसने सब कुछ पाया है।
नील गगन की गहराई, तुझको आज बुलाती है,
तेरी हिम्मत ही तेरी, असली यहाँ थाती है।
पंखों में भर हौसला, तू भर ले एक परवाज़,
तेरे हाथों में छुपा है, आने वाला कल आज।
थक कर गिरना हार नहीं, गिर कर न उठना हार है,
कोशिश करने वालों की तो, सदा ही जय-जयकार है।
नील गगन गवाह बनेगा, तेरी विजय की गाथा का,
तू ही तो है भाग्य विधाता, अपनी किस्मत विधाता का।
आसमान छोटा पड़ेगा, जब तू पर फैलाएगा,
मिटा के हर इक मुश्किल को, तू मंज़िल पाएगा।
नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,
लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है...
अपनी एक कहानी है।
सुरक्षा का पहिया: यातायात नियम
चलो सड़क पर संभल के भाई,
नियमों में है सबकी भलाई।
जल्दबाजी को दूर भगाओ,
जीवन को अनमोल बनाओ।
लाल बत्ती कहती है— "थम जा",
जल्दबाजी में तू न रम जा।
पीली कहती— "हो तैयार",
बढ़ने का अब करो विचार।
हरी बत्ती जब जल जाए,
मंजिल की राह सुगम बनाए।
दुपहिया पर हेल्मेट धारो,
अपनों का तुम प्यार विचारो।
कार में सीट बेल्ट जरूरी,
दुर्घटना से रखो दूरी।
बाएं चलना सदा सुहाना,
नियमों का तुम मान बढ़ाना।
पैदल हैं तो जेब्रा क्रॉसिंग,
सड़क पार की यही है राहें।
नशा न करना वाहन चलाते,
हँसते-खेलते घर को जाते।
यातायात के नियम अपनाओ,
देश को सुरक्षित देश बनाओ।
ललित मोहन शुक्ला ( कवि व लेखक)
गीत: "जागो रे! धरा बुलाती है"
ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,
साँसें हो रही हैं कम, अब तो कर लो थोड़ा प्यार।
पेड़ लगाएँ, प्यास बुझाएँ, ये ही अपना धर्म है,
पर्यावरण को बचाना ही, सबसे बड़ा कर्म है।
जागो रे! अब जागो रे, ये धरा हमें बुलाती है।
हरी-भरी ये चादर इसकी, हमने खुद ही फाड़ी है,
धुआँ उगलती चिमनियाँ और बढ़ती भीड़-भाड़ी है।
नदियाँ कल-कल बहना छोड़ अब, मैली होती जाती हैं,
सूखी धरती, प्यासे पंछी, अपनी व्यथा सुनाते हैं।
एक बीज तुम बो दो ऐसा, जो शीतल छाया दे जाए,
आने वाली पीढ़ी को भी, सुंदर जग दिखला जाए।
प्लास्टिक का ये जाल हटाओ, थैला कपड़े का लाओ,
बूंद-बूंद है अमृत जैसी, पानी व्यर्थ न बहाओ।
पर्वत, जंगल, जीव-परिंदे, सब इस घर के हिस्से हैं,
इनसे ही तो जुड़ते आए, बचपन वाले किस्से हैं।
चलो हाथ से हाथ मिलाएँ, सुंदर स्वर्ग बनाना है,
गूँजे फिर से कोयल की कूक, ये संकल्प उठाना है।
ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,
पर्यावरण को मिल कर हम, दें खुशियों का उपहार।
जागो रे! अब जागो रे..
गीत: शिखर तक जाना तुम
पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम
जग में नाम कमाना तुम।
हिम्मत कभी न हारना तुम,
चाँद से आगे जाना तुम।
सपनों में विश्वास जगाओ,
आलस को तुम दूर भगाओ।
काँटों वाली राहों पर भी,
फूलों सा मुस्काना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
कलम तुम्हारी शस्त्र बनेगी,
मेहनत ही बस मंत्र रहेगी।
अंधियारे को चीर के सूरज,
बनकर के ढल जाना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
लिखनी है इतिहास की बातें,
जाग के काटें कितनी रातें।
भारत माँ के गौरव को अब,
नभ के पार ले जाना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम
जग में नाम कमाना तुम।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: मेरी जीवन संगिनी
मेरे घर की रौनक तुम, मेरे दिल की धड़कन हो,
धूप में ठंडी छाँव तुम, महकता हुआ आँगन हो।
सपनों को जिसने सच किया, वो मधुर रागिनी हो तुम,
मेरे हर जन्म की साथी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
कभी राहें मुश्किल हुईं, कभी आए गहरे अँधेरे,
तुमने थामी जो उँगली मेरी, तो हुए रोशन सवेरे।
उतार-चढ़ाव जीवन के, हँसकर तुमने झेले हैं,
तुम्हारे दम से ही सजे, खुशियों के सब मेले हैं।
दर्द में जो मरहम बन जाए, वो सुकून भरी लोरी हो तुम,
मेरी अधूरी कहानी की, सबसे सुंदर डोरी हो तुम।
कभी छोटी बातों पे रूठना, कभी कजरारी आँखों का पानी,
फिर एक मुस्कान से कर देना, खत्म सब खींचातानी।
वो तुम्हारा धीरे से मनाना, वो प्यार भरी मनुहारें,
जैसे पतझड़ के बाद लौट आएं, फिर से वही बहारें।
मेरे मौन को जो पढ़ ले, वो अनकही कहानी हो तुम,
मेरी रूह की इबादत, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
दीवाली के दीयों की लौ, होली के चटख रंग हो,
हर तीज-त्योहार अधूरा, अगर तुम न मेरे संग हो।
कभी कंगन की खनक बनकर, कभी पायल की झंकार,
तुमसे ही घर तीर्थ बना, तुमसे ही है संसार।
मेरे सूनेपन की महफिल, मेरी ज़िंदगानी हो तुम,
मेरे माथे की बिंदी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
तुमसे ही सुबह मेरी, तुमसे ही मेरी शाम है,
मेरे होठों पे सजे जो, वो तुम्हारा ही तो नाम है।
सात जन्मों का वादा नहीं, हर पल का साथ चाहिए,
बस तुम्हारे हाथों में, मेरा ये हाथ चाहिए।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: प्रकृति की पाठशाला
पशु-पक्षी ये बोल न पाएं, पर बहुत कुछ हैं सिखलाते,
जीवन जीने की सुंदर कला, ये चुपके से समझाते।
इंसान अगर जो गौर करे, तो इनसे पा सकता है ज्ञान,
प्रकृति की इस पाठशाला में, छुपा हुआ है समाधान।
नन्ही चींटी को देखो तुम, गिरती है पर रुकती नहीं,
मेहनत और अनुशासन से, वह कभी हार भी मानती नहीं।
हाथी से सीखो तुम धीरज, और अपनी शक्ति का मान,
शांत रहो पर जब जरूरत हो, दिखाओ अपना स्वाभिमान।
कोयल कहती मीठा बोलो, वाणी में तुम शहद भरो,
कड़वाहट को तजकर जग में, सबसे बस तुम प्रेम करो।
हंस सिखाता नीर-क्षीर विवेक, बुराई छोड़ अच्छाई चुनना,
दुनिया के इस शोर-शराबे में, मन की साफ़ आवाज़ सुनना।
कुत्ते से सीखो वफादारी, स्वामी-भक्ति और सच्चा प्यार,
रिश्तों में जो जान फूँक दे, ऐसा सुंदर ये व्यवहार।
शेर सिखाता निर्भय होकर, अपने पथ पर बढ़ते जाना,
भीड़ का हिस्सा कभी न बनना, अपना रुतबा खुद बनाना।
बगुला सा एकाग्र ध्यान हो, लक्ष्य पे अपनी दृष्टि रहे,
कबूतर सा शांति दूत बनो, मन में कभी न बैर रहे।
पक्षी सिखाते नीड़ बनाना, तिनके-तिनके को जोड़ के,
मेहनत से ही स्वर्ग बनेगा, आलस सारा छोड़ के।
आओ हम सब आज ये सीखें, पशु-पक्षियों के ये संस्कार,
प्रेम, दया और सेवा भाव से, महक उठेगा ये संसार।
ललित मोहन शुक्ला कवि
गीत: "जागरूकता की ज्योति"
जीवन के इस उपवन में, तुम बनके माली आना,
सफलता के हर शिखर पर, अपना ध्वज लहराना।
हृदय में दीप जलाओ ऐसा, जो कभी न बुझ पाए,
जागरूकता की लौ से ही, सारा जग मिल जाए।
भीतर क्या है घट रहा, पहले उसे पहचानो,
अपनी शक्ति, अपनी दुर्बलता को तुम जानो।
मन के भटकाव पर जब तुम, पहरा अपना रखोगे,
तभी लक्ष्य की राह पर, तुम अडिग कदम बढ़ाओगे।
जागरूकता ही शस्त्र है, जो मोह को काट देती है,
सफलता की हर सीढ़ी को, यह सरल बना देती है।
अवसर कब है द्वार खड़ा, यह वही देख पाता है,
जिसकी आँखों में सजगता का, सूरज खिल जाता है।
वक़्त की नब्ज पहचान कर, जो सही कदम उठाता है,
कामयाबी का हर मुकाम, बस उसी के पास आता है।
जहाँ अंधेरा भ्रम का हो, वहाँ यह रौशनी लाती है,
जागरूकता ही कर्म को, श्रेष्ठ मार्ग दिखाती है।
शब्दों के पीछे छुपे हुए, भावों को तुम पढ़ना सीखो,
रिश्तों की नाज़ुक डोर को, होश से बुनना सीखो।
सजग रहोगे तुम अगर, तो कभी न ठोकर खाओगे,
अपनों के संग प्रेम की, तुम नई जोत जलाओगे।
सिर्फ खुद का हित नहीं, जो सबका मंगल सोचेगा,
जागरूकता का वो राही, शिखर सफलता का छुएगा।
तो उठो मुसाफिर, आलस छोड़ो, चेतना को विस्तार दो,
जीवन के हर एक क्षेत्र को, तुम नया आधार दो।
जागरूकता ही सफलता की, सबसे मीठी तान है,
यही मनुष्य की शक्ति है, यही उसकी पहचान है।
गीत: ये जुबां भी क्या चीज़ है
कभी शहद सी मीठी, कभी ज़हर का प्याला है
इस छोटी सी जुबां ने, क्या खेल रचा डाला है
कभी बिन बोले कह जाए, सदियों के अफसाने
कभी बोल के भी ये, दिल का हाल न जाने।
जब लफ़्ज़ ठहर जाते हैं, तो नज़रें बोलती हैं
खामोशियाँ भी दिल की, परतें खोलती हैं
एक 'जुबां' वो है, जो शोर में खो जाती है
एक 'जुबां' वो है, जो चुप रहकर सब कह जाती है।
किसी की जुबां ही, उसकी सबसे बड़ी जागीर है
किसी की जुबां बस, रेत पर खींची लकीर है
कहने को तो मुकर जाते हैं, लोग अपनी बातों से
पर कुछ लोग बंधे होते हैं, 'जुबां' के धागों से।
तलवार का घाव तो, वक़्त के साथ भर जाता है
जुबां का तीर मगर, रूह के पार उतर जाता है
वही जुबां जो ज़ख्म दे, वही दुआ भी बनती है
किसी गिरते हुए के लिए, ये सहारा भी बनती है।
संभाल के रख इसे, ये तेरा अक्स दिखाती है
तेरी परवरिश क्या है, ये दुनिया को बताती है
हो जुबां पर ज़िक्र उसका, और दिल में सादगी रहे
बस यही दुआ है कि, इंसानों में इंसानियत रहे।
गीत: "सपनों की उड़ान: प्रबंधन से स्वतंत्रता"
कल की चिंता छोड़ दे तू, आज को अपना यार बना,
पैसों के इस खेल में, खुद को तू होशियार बना।
सिर्फ कमाना काफी नहीं, सहेजने की रीत सीख,
वित्तीय प्रबंधन के हाथों में, अपनी जीत लिख।
हाथों में होगी चाबी, खुशियों का द्वार खुलेगा,
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
लक्ष्य बना तू ऊँचा सा, मंज़िल को पहचान ले,
कहाँ खड़ा है तू आज, अपनी हकीकत जान ले।
एक योजना की नींव रख, कागज़ पर हर ख्वाब सजा,
बिना नक्शे की यात्रा में, है सिर्फ भटकाव की सज़ा।
नियोजन ही वो बीज है, जिससे फल महान मिलेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
पाई-पाई का हिसाब रख, फिजूलखर्ची पर लगाम हो,
तेरी मेहनत की कमाई का, सही जगह पर काम हो।
पहले खुद को भुगतान कर, बचत को अपनी ढाल बना,
मुसीबत के तूफानों में, बचत को ही अपनी ढाल बना।
अनुशासन की इस आग में, सोना तेरा निखरेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
सिर्फ तिजोरी में रखा धन, वक्त के साथ घट जाएगा,
समझदारी से जो बोएगा, वो सौ गुना फल पाएगा।
शेयर हो या सोना, या हो ज़मीन की माया,
चक्रवृद्धि (Compounding) के जादू ने, सबको अमीर बनाया।
पैसे से अब काम करा, तेरा कल सँवरने लगेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
बीमा की एक छतरी रख, अनहोनी से तू डरना मत,
कर्ज़ के गहरे दलदल में, भूल कर भी उतरना मत।
सुरक्षित जब होगा वर्तमान, तभी भविष्य मुस्कायेगा,
जोखिम को जो जीत ले, वही विजेता कहलायेगा।
धैर्य और विश्वास से, तेरा भाग्य संवरने लगेगा...
अब न किसी की गुलामी है, न पैसों की मंदी है,
वित्तीय प्रबंधन ही सच में, आज़ादी की संधि है!
आज़ादी की संधि है!
मैत्री का महाकाव्य
संसार के सब नातों में, इक रिश्ता सबसे प्यारा है,
न रक्त का ये बंधन है, पर प्राणों का सहारा है।
जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं, बस मौन ही काफी होता है,
मित्र वही जो पतझड़ में भी, यादों के बीज बोता है।
इतिहास गवाह है इस बल का, जब कृष्ण ने पैर पखारे थे,
सुदामा की उस पोटली में, ब्रह्मांड के सुख सारे थे।
दुर्योधन के अट्टहास में, कर्ण ने साथ निभाया था,
और राम ने विभीषण को, लंका का ताज पहनाया था।
बचपन, जवानी और बुढ़ापा
बचपन की वह कश्ती थी, और काग़ज़ का वह किनारा था,
जब टॉफी के उस आधे टुकड़े में, अधिकार हमारा था।
फिर युवा हुए तो साथ चले, सपनों की ऊँची राहों पर,
दुख-सुख के सारे बोझ धरे, इक दूजे की ही बाहों पर।
अब लाठी लेकर चलते हैं, पर हँसी वही है पुरानी सी,
बुढ़ापे की उस धूप में, दोस्ती शीतल पानी सी।
माँ में जो सखी मिल जाए, तो घर जन्नत बन जाता है,
भाई जब मित्र बन खड़ा रहे, हर संकट टल ही जाता है।
कहते हैं प्रेम बड़ा पावन, पर आधार तो इसका मैत्री है,
बिन दोस्ती के हर आशिकी, बस एक अधूरी उपमा है।
सावधान! गलत संगति
पर ध्यान रहे इस धागे का, जो कच्चा भी हो सकता है,
कुसंग की काली छाया में, इंसान भी खो सकता है।
जो दुर्गुण को बढ़ावा दे, वो मित्र नहीं वो शत्रु है,
जो सन्मार्ग से भटका दे, वो जीवन का कुचक्र है।
आनंद यही है जीवन का, कि कोई हाथ थामे बैठा है,
तुम्हारी हर इक नादानी, वो मन में थामे बैठा है।
मित्रता ही वह मरहम है, जो हर घाव को भरती है,
ये वो अजर अमर धारा, जो मरुस्थल को हरा करती है।
शीर्षक: ओ मेरे दिलबर
ओ मेरे दिलबर, ओ मेरे हमदम
तुझसे जुड़ी है, खुशियाँ और गम।
सांसों की लय में, तेरा ही नाम है
तू ही सुबह है, तू ही मेरी शाम है।
ओ मेरे दिलबर...
तेरी आँखों में झलकता, चाहत का दरिया
जीने का तू ही, बना है जरिया।
खामोश लब हैं, पर दिल बोलता है
सिर्फ तेरे आगे, ये राज खोलता है।
सपनों की वादी में, तू ही सवेरा
मुझमें बसा है, अब अक्स तेरा।
ओ मेरे दिलबर...
दुनिया की भीड़ में, तन्हा खड़े थे
राहों में तेरी, हम रुक से गए थे।
तूने जो छुआ, तो महक उठे हम
फूलों की तरह, चहक उठे हम।
हाथों में तेरा, हाथ रहे बस
उम्र भर का, ये साथ रहे बस।
ओ मेरे दिलबर...
चाँद और तारे, गवाह रहेंगे
हम सिर्फ तेरे, होकर जिएंगे।
ओ मेरे दिलबर, ओ मेरे हमदम
तुझसे जुड़ी है, खुशियाँ और गम।
गीत: मुस्कान का बहाना
थोड़ा सा खुद के लिए भी जीना सीख ले,
सपनों के रंग हवाओं में पीना सीख ले।
दुनिया तो चलती रहेगी अपनी ही चाल से,
तू अपनी खुशी का धागा बुनना सीख ले।
खुश रहने का कोई बहाना ढूँढ ले,
दिल में छुपा एक नया तराना ढूँढ ले।
भोर की पहली किरण को चेहरे पर सने दो,
छोटा सा ही सही, मन में कोई ख्वाब पलने दो।
फूलों की महक और परिंदों की वो चहक,
इन्हीं छोटी बातों में खुद को ढलने दो।
बीते कल की कड़वाहट को तू भूल जा,
आज की इस ताजी हवा में झूल जा।
आईने में देख खुद को, एक प्यारी सी मुस्कान दे,
अपनी छोटी जीत को भी, तू थोड़ा सम्मान दे।
दूसरों की उम्मीदों का बोझ उतार दे,
अपनी रूह को भी थोड़ा इत्मीनान दे।
तू अनमोल है, ये बात खुद को बता दे,
ग़मों की पुरानी किताब को तू जला दे।
हँसने के लिए किसी महफ़िल की तलाश क्यों?
हर धड़कन में छिपी है खुशियों की प्यास क्यों?
वक़्त की रेत को मुट्ठी में कैद मत कर,
आज ही जी ले, कल की फिर आस क्यों?
खुश रहने का कोई बहाना ढूँढ ले,
दिल में छुपा एक नया तराना ढूँढ ले।
॥ वीणा वादिनी की वंदना ॥
हे श्वेत वस्त्रधारिणी, माँ शारदे नमन तुम्हें,
अज्ञान का मिटा अंधेरा, ज्ञान की किरण दें।
हंस पर विराजी माँ, वीणा हाथ में सजे,
तेरे सुरों की गूँज से, सारा ये जग बजे।
मस्तक पे सोहे चंद्र, मुख पर अनूप आभा,
सत्य की तुम मूरत हो, निर्मल तुम्हारी शोभा।
जड़ता को मेरी काट दो, बुद्धि का दान दो,
भटके हुए इस मन को, माँ सही पहचान दो।
विद्या का दीप जला के, जग को आलोकित करो,
भर दो मधुर स्वर कंठ में, अमृत सा रस भरो।
कलम चले जब हाथ में, तेरी ही शक्ति हो,
हृदय में बस अटूट माँ, तेरी ही भक्ति हो।
हे वीणा वादिनी, माँ दया की खान हो,
तुम ही हो आदि-शक्ति, तुम ही महान हो।
करो स्वीकार ये वंदन, माँ भारती नमन तुम्हें,
अज्ञान का मिटा अंधेरा, ज्ञान की किरण दें।
शीर्षक: आज हंगामा हो जाए!
नजरें मिलें तो बात बन जाए,
खामोश धड़कन भी गुनगुनाए।
रोको न खुद को, तोड़ दो रस्में,
आज दिलों में आग लग जाए।
हो... न कोई शिकवा, न कोई बहाना,
हमें तो बस है महफ़िल को जगाना।
छोड़ो ये दुनिया, छोड़ो शर्माना,
आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!
शोर हो ऐसा कि आसमां भी झुक जाए,
वक़्त की रफ़्तार ज़रा थम सी जाए।
पाँव थिरकें ऐसे कि ज़मीन डगमगाए,
जो सोया है भीतर, वो तूफ़ान जाग जाए।
न फिक्र कल की, न बीते का रोना,
आज की रात है बस जादू संजोना।
महफ़िल में अपनी खुशियों को पाना,
आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!
जाम छलकने दो, बातों को बहने दो,
दिल में जो दबी है, उस हसरत को रहने दो।
हवाओं में घुला है आज अजब सा नशा,
हर चेहरे पे बिखरी है इक नयी सी अदा।
चुपचाप रहकर भी क्या है कमाना?
हँसते हुए ही है सबको दीवाना बनाना।
भूल के सारी दुनिया का फ़साना,
आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!
झूमे ज़माना, और झूमे ये रात,
याद रहे हमेशा ये मुलाक़ात।
शोर हो इतना कि गूंजे ये तराना,
आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!
जी भर के बस हंगामा हो जाए!
शीर्षक: बेखुदी की राहें
न होश है अपना, न दुनिया की खबर है,
मल्हार सी बहती ये कैसी लहर है।
न मंजिल की चाहत, न रस्तों का गम है,
तेरी बेखुदी में ही खुशियाँ तमाम हैं।
कभी शाम ढलती है यादों के साये,
कभी धूप बनके तू मन में समाए।
जुबाँ खामोश है पर दिल बोलता है,
तेरा नाम रग-रग में रस घोलता है।
ये आलम सुहाना, ये मंज़र नया है,
मस्ती का प्याला न जाने कहाँ है।
न होश है अपना...
दुनिया की बंदिश से आज़ाद हूँ मैं,
खुद ही में खोया, खुद ही शाद हूँ मैं।
न काँटों का डर है, न फूलों की हसरत,
मिली रूह को है अनोखी ये राहत।
जहाँ 'मैं' मिटा, वहाँ 'तू' ही तू है,
यही बस मेरी आखिरी आरज़ू है।
हवाओं में जैसे कोई राग घुला हो,
खुला आसमान जैसे बाहें फैला हो।
कदम डगमगाते नहीं अब किसी से,
जुड़ा है ये रिश्ता किसी अजनबी से।
बेखुदी का सफर, बेखुदी की डगर है,
अब तो बस इसी में सुहाना बसर है।
न होश है अपना, न दुनिया की खबर है,
मल्हार सी बहती ये कैसी लहर है...
शीर्षक: "तुमसे ही मुकम्मल मैं"
धड़कनें बढ़ी हैं, सांसें थमी हैं,
कहना है जो वो होठों पे जमी है।
ज़माने की भीड़ में बस तुमको चुना है,
मैंने अपनी आँखों में बस तुमको बुना है।
मेरे दिल की सूनी सी राहों में,
एक रोशनी बनकर तुम आए हो।
खुशबू बनकर मेरी साँसों में,
तुम रूह तक मेरी समाए हो।
तुम्हारी हँसी जैसे गिरता हुआ झरना,
तुम्हारी बातों में है सुकून का ठहरना।
कभी धूप में छाँव, कभी सर्द में गर्माहट,
मेरे सूने आँगन में तुम खुशियों की आहट।
ये हाथ पकड़ कर बस इतना बता दो,
मेरी अधूरी सी दुनिया को पूरा बना दो।
तुम्हें चाहने की कोई सीमा नहीं है,
बिन तुम्हारे ये जिंदगी, जिंदगी ही नहीं है।
आसमान के तारों में तुमको ही ढूँढूं,
नींदों के ख्वाबों में तुमको ही चूँमूँ।
इश्क का दरिया है, संग डूब जाना है,
मंजिल तुम ही हो, तुम ही ठिकाना है।
वादा है मेरा ये उम्र भर का साथ होगा,
हर अंधेरी रात में तुम्हारा ही हाथ होगा।
कहने को तो लफ्ज़ बहुत कम हैं पास मेरे,
पर मेरा हर कतरा, बस दीवाना है तेरे।
धड़कनें बढ़ी हैं, सांसें थमी हैं,
कहना है जो वो होठों पे जमी है।
हाँ, मुझे तुमसे मोहब्बत है...
बस तुमसे ही मोहब्बत है।
गीत: ओ री पवन, तू मनभावन
ओ री पवन, तू मनभावन, खुशियों का संदेशा लाती,
कभी हौले से, कभी शोर से, जीवन में सुर भर जाती।
अनंत तेरे रूप निराले, अनंत तेरी माया,
जिसने भी तेरा स्पर्श पाया, उसने ही सुख पाया।
जब तू शीतल 'समीर' बनकर, उपवन में मुस्काती है,
कलियों के कानों में जाकर, मीठा गीत सुनाती है।
मंद-मंद तू चले 'बयार', जैसे रेशम की डोरी,
थके हुए इस तन-मन से, तू दुख लेती है चोरी।
कभी 'अनिल' की गति पाकर तू, नभ में ऊंची उड़ती है,
पर्वत की ऊंची चोटियों से, अठखेली कर मुड़ती है।
जब तू बने 'मारुत' बलकारी, शक्ति का अहसास करे,
वृक्षों को बाहों में भरकर, झूम-झूम विश्वास भरे।
पूरब से जब 'पुरवाई' आए, सावन संग में लाती है,
प्यासी इस धरती के ऊपर, अमृत-बूंद गिराती है।
'पछुआ' के चंचल झोंकों में, एक गजब की मस्ती है,
तेरे संग ये दुनिया सारी, हर पल खिलती-हंसती है।
ना कोई बंधन, ना कोई सीमा, तू तो सदा स्वतंत्र है,
तेरा बहना ही इस जग का, सबसे पावन मंत्र है।
ओ री पवन, तू मनभावन, खुशियों का संदेशा लाती...
गीत: ऐ जी, धीरे चलना!
बाबूजी धीरे चलना, राहों में ज़रा संभलना
बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना...
हाथ में मोबाइल है, चेहरे पे स्माइल है
दुनिया ये सारी बस, रील और स्टाइल है
लाइक के चक्कर में, होश न तुम खोना
सब कुछ है नकली यहाँ, बाद में न रोना
ज़रा बचके निकलना, बातों में न पिघलना
बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना...
मेट्रो की भीड़ है, सपनों की दौड़ है
हर कोई आगे है, कैसी ये होड़ है?
फुर्सत की दो घड़ियाँ, ढूँढे से न मिलेंगी
चाहत की कलियाँ भी, मुश्किल से खिलेंगी
दिल थाम के चलना, वक्त से न जलना
बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना...
ऊँची इमारतें, गहरा अंधेरा है
बाहर उजाला पर, मन में बसेरा है
सच्चे जो साथी हैं, उनको ही पहचानो
मतलब की महफ़िल को, महफ़िल न तुम मानो
हँसते हुए चलना, खुद से न फिसलना
बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना...
गीत: जय भारती, जय गणतंत्र
हिमगिरि से सागर तक गूँजे, एक ही सुर और तान
विविध रंग की माला अपनी, एक हमारा मान।
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, सब मिलकर हाथ बढ़ाएँ
गणतंत्र दिवस के पर्व पर, आओ सबको शीश नवाएँ!
नमस्ते कहता उत्तर प्रदेश, राम-राम हरियाणा का
खम्मा घणी राजस्थान कहे, मान बढ़ाना वीरों का।
सत श्री अकाल पंजाब से आए, जोश भरा हर सीने में
देश प्रेम का स्वाद अलग है, जीने और मरने में।
उठो भारती के वीर सपूतों, नया इतिहास बनाना है
संविधान की मर्यादा को, जग में ऊँचा उठाना है!
केम छो कहता गुजरात है, नमस्कार महाराष्ट्र का
जोहार कहे झारखंड अपना, गर्व है इसके काष्ठ का।
नमोस्कार बंगाल से गूँजे, ओड़िशा भी मुस्काए
पूर्वोत्तर की पावन धरती, नमस्ते सबको सुनाए।
भाषाएँ हैं अलग-अलग, पर एक ही अपनी बोली है
अमन-चैन के रंगों से, हम खेलें ऐसी होली है!
वणक्कम कहता तमिलनाडु, नमस्कारम केरल की पुकार
नमस्कारा कर्नाटक बोले, तेलगु का भी यही सार।
पुलकित है कन्याकुमारी, कश्मीर हमारा मस्तक है
गणतंत्र की सत्तर सालों वाली, ये नई दस्तक है।
लोकतंत्र की ज्योति जलाए, अंधियारा सब दूर करें
तिरंगे की आन की खातिर, खुद को हम न्योछावर करें!
बाबूजी धीरे नहीं, अब तो गर्व से कदम बढ़ाना है
भारत की इस पावन मिट्टी का, कर्ज हमें चुकाना है।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
जय हिन्द, जय भारत!
गीत: तिरंगा चाँद पर लहराया
वो रात अंधेरी भारी थी, जब सन्नाटा छा गया था,
मंज़िल के बिल्कुल पास खड़ा, दिल थोड़ा सा घबराया था।
विक्रम के पाँव डगमगाए, संपर्क कहीं पर टूट गया,
लगा कि बरसों का सपना, हाथों से बस छूट गया।
मगर हौसला टूटा नहीं, वो तो बस एक तैयारी थी,
हार को जीत में बदलने की, अब भारत की बारी थी!
गलतियों को हमने शस्त्र बनाया, कमियों को पहचाना था,
सॉफ़्टवेयर को धार दी हमने, वेग को खुद ही थामना था।
जहाँ गिरे थे कल हम आके, वहीं खड़ा होना सीखा,
असफलता की राख से ही, हमने नया सूर्य देखा।
इतिहास गवाह है दुनिया में, हम गिरकर ही संभलते हैं,
हम भारत के वो बेटे हैं, जो तूफ़ानों में पलते हैं!
23 अगस्त की वो शाम सुनहरी, सारा देश दुआओं में था,
सांसें थमी थीं सबकी, पर विश्वास सबकी निगाहों में था।
धूल उड़ी और कदम पड़े, फिर शान से प्रज्ञान निकला,
पूरी दुनिया देखती रही, जब भारत का भाग्य चमका।
शिव-शक्ति बिंदु पर जाकर, अपना मान बढ़ाया है,
पहली बार किसी ने जग में, दक्षिण ध्रुव को पाया है!
ये जीत नहीं बस इसरो की, ये सवा सौ करोड़ का सपना है,
बता दिया इस दुनिया को, अब ये आसमान भी अपना है।
मेहनत और लगन मिले तो, हर बाधा झुक जाती है,
सच्ची हिम्मत हार के बाद ही, असली जीत दिलाती है।
नभ में गूंजा जय हो भारत, अंबर सारा हर्षाया,
देखो भारत का गौरव, अब चाँद तलक लहराया!
तिरंगा चाँद पर लहराया! तिरंगा चाँद पर लहराया!
तिरंगा साक्षी है (एक संकल्प गीत)
उठो हिंद के वीर सपूतों, नया सवेरा आया है,
संविधान की पावन छाया, गौरव का पल लाया है।
गणतंत्र हमारा मान है, जन-गण-मन की शान है,
बढे कदम अब रुकें नहीं, यह भारत का अभियान है।
खेतों की हरियाली से, विज्ञान के ऊँचे अंबर तक,
प्रगति का रथ बढ़ता जाए, सागर से लेकर पर्वत तक।
हाथों में हो हुनर नया, और आँखों में नव स्वप्न पलें,
सूरज की स्वर्णिम किरणों सा, देश निरंतर आगे बढ़े।
मिटा के सारे भेदभाव को, प्रेम का दीप जलाना है,
भाषा, जाति, पंथ से ऊपर, 'भारतीय' बन जाना है।
सद्भाव की बहती धारा हो, भाईचारे का मेल रहे,
अनेकता में एकता का, पावन अनुपम खेल रहे।
त्याग और बलिदानों से जो, हमने गौरव पाया है,
रंग-रूप और वेश अलग पर, एक ही तिरंगा छाया है।
चलो साथ मिल कसम ये खाएं, माँ का मान बढ़ाएंगे,
विश्व पटल पर भारत को हम, जगमगाता पाएंगे।
जय भारत, जय गणतंत्र!
गूँजे नभ में यही मंत्र!
उत्तरोत्तर प्रगति हो अपनी,
सजग रहे हर एक तंत्र!
मेरी ओर से आपको शुभकामनाएँ!
गीत: नई राहों का मुसाफिर
अंजान राहें हैं, तो क्या हुआ?
मंजिल का पता अब तक मिला नहीं, तो क्या हुआ?
पैरों में छाले हैं, या रास्तों में धूल,
तू चल पड़ा है, यही सबसे बड़ा फूल।
उठ खड़ा हो ऐ मुसाफिर, अब तुझे रुकना नहीं,
दुनिया झुकेगी तेरे आगे, बस तुझे झुकना नहीं।
ये जो घनी झाड़ियाँ हैं, ये जो गहरा कोहरा है,
तेरे भीतर का सूरज, इनसे कहीं ज्यादा सुनहरा है।
नक्शों की लकीरें अक्सर धोखा दे जाती हैं,
पर जो खुद रास्ता बनाते हैं, वही इतिहास रचते हैं।
डर को बना ले सीढ़ी, और मुश्किलों को ढाल,
तेरी हिम्मत ही लिखेगी, आने वाला कल का हाल।
कोई साथ न दे तेरा, तो अकेला ही तू काफी है,
खुद की तलाश में निकला, तू खुद का ही साथी है।
हर मोड़ पर एक सबक है, हर पत्थर एक कहानी,
बहते रहना ही तो है, सच्चे जीवन की निशानी।
अंजान डगर ही अक्सर, खूबसूरत मोड़ लाती है,
जो हार नहीं मानता, किस्मत उसे ही अपनाती है।
अंजान राहें, नया है सफर,
तू फौलाद का सीना ले, मत कर कोई फिकर।
तू चल, तू बढ़, तू उड़ता जा,
खुद अपनी किस्मत, तू खुद गड़ता जा!
गीत: संकल्प की गूँज
जो मन में ठाने, जो दिल में जगा दे,
वह राहों के पत्थर को रस्ता बना दे।
ज़माने की बातों में न खोना कभी तू,
जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!
हाँ, वह कर के दिखा दे!
हवाओं का रुख मोड़ना तेरे बस में,
लिखी है फ़तह तेरी, हर एक नस में।
न सूरज से डर तू, न रातों से सहम तू,
कि सोई हुई अपनी हिम्मत जगा दे।
जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!
पसीने की बूंदों से किस्मत लिखेगा,
तपेगा अगर, तो ही कुंदन दिखेगा।
उड़ानें तेरी आसमाँ चूम लेंगी,
परों को ज़रा तू हवा तो लगा दे।
जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!
माना कि मुश्किल है लम्हा अभी,
पर तू अकेला नहीं है कभी।
तेरे इरादे ही तेरी दुआ हैं,
खुद को ज़रा तू ये याद दिला दे!
जो मन में ठाने, जो दिल में जगा दे,
वह राहों के पत्थर को रस्ता बना दे।
ज़माने की बातों में न खोना कभी तू,
जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!
हाँ, वह कर के दिखा दे!
गीत: नीली जर्सी का कमाल
नभ में गूँजे भारत का नाम, नीली जर्सी का है ये काम,
मैदान पे जब उतरे शेर, विरोधियों के छूटे पसीने तमाम।
बधाई हो तुमको ओ जाँबाज़ों, तुमने फिर से इतिहास रचा,
टी-20 के इस रण में, तिरंगे का ही शोर मचा!
बल्ले से जब आग उगलती, गेंद हवा से बातें करती,
अभिषेक की वो जादुई पारी, हर दिल में उमंग है भरती।
छक्कों का वो नया रिकॉर्ड, जैसे सावन की बौछार है,
युवा जोश और गगनचुंबी हिट्स, ये नए भारत की हुंकार है!
वाह रे अभिषेक! तेरी बल्लेबाजी ने सबका दिल जीत लिया,
छक्कों की उस बारिश ने, जीत का मार्ग प्रशस्त किया।
गेंदबाजों की सटीक यॉर्कर, और फील्डिंग का वो तराना,
दुनिया देख रही है अब, भारतीय क्रिकेट का नया जमाना।
जीत की इस गौरव गाथा पर, सारा देश झूमता है,
हर भारतीय आज गर्व से, आसमान को चूमता है।
बधाई स्वीकार करो वीरों, अब विश्व कप की बारी है,
विजय पताका फहराने की, पूरी अब तैयारी है।
शुभकामनाएं संग हैं सबके, फिर विश्व विजेता बन के आना,
पूरी दुनिया को एक बार फिर, अपना लोहा मनवाना!
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
केसरिया, श्वेत और हरा, प्यारा यह श्रृंगार है,
तीन रंगों में रचा बसा, बस मेरा ही संसार है।
लहराता है जब नभ में यह, भारत की शान बढ़ाता है,
कण-कण में यह जोश और, भक्ति का दीप जलाता है।
ऊपर केसरिया रंग कहे, तुम वीरों की संतान बनो,
त्याग, तपस्या और शक्ति का, जग में एक प्रमाण बनो।
बीच में श्वेत चमकता है, जो शांति की चादर है,
सत्य और अहिंसा ही, इस भारत का सादर है।
नीचे बिछा हरा रंग, खुशहाली का पैगाम है,
खेतों की हरियाली में, मेरा पावन हिंदुस्तान है।
यह रंग हमें बतलाता है, धरती से तुम जुड़कर रहना,
समृद्धि की इस धारा को, अविरल हरदम बहने देना।
बीच हृदय में नील चक्र, यह गति का ही प्रतीक है,
बढ़ते जाना जीवन पथ पर, यह इसकी पहली सीख है।
चौबीस तीलियाँ कहती हैं, समय न रुकने पाएगा,
जो कर्मठ होकर चलेगा, वो ही मंजिल पाएगा।
यह झंडा नहीं सिर्फ कपड़ा, यह सवा अरब की आशा है,
एक सूत्र में हमें पिरोती, इसकी यही परिभाषा है।
मजहब अलग हों, भाषाएँ हों, पर हम सब एक कहानी हैं,
इस तिरंगे की छाँव में, हम सब सिर्फ हिंदुस्तानी हैं।
शीश झुकाकर नमन करें हम, इस पावन पहचान को,
सदा अमर और ऊँचा रखें, भारत माँ की आन को।
जय हिंद! जय भारत!
गाना: खाली जेब, नखरे नवाब के
बचत की बातें करना, अब तो है बस एक सपना,
खाली पड़ा है बटुआ मेरा, कोई नहीं है अपना!
बॉस ने दी जो सैलरी, वो तो 'ऊँट के मुँह में जीरा' है,
पर बीवी को लगता कि उसका शौहर कोहिनूर का हीरा है!
अरे... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,
जी रहे हैं हम तो बनकर 'महंगाई के पुतुलिया'!
आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,
किस्तें भरते-भरते देखो, निकल गया है हुलिया!
महीने की पहली को, हम शहंशाह बन जाते हैं,
जो दिखता है अमेज़न पर, झट से ऑर्डर दबाते हैं!
कार्ड स्वाइप करते वक्त, दिल धक-धक डोले है,
जब मैसेज आता 'डेबिटेड', तब खून मेरा खौले है!
पनीर की सोची थी, अब तो आलू पर आ गए,
स्विगी और ज़ोमैटो मिलकर, मेरा बजट खा गए!
हाँ... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,
डिस्काउंट के चक्कर में, कट गया है चुलिया!
शर्मा जी से लिया उधार, वर्मा जी को देना है,
इस टोपी को उस सर पर, बस यही तो गेम खेलना है!
दोस्त मांगते पार्टी, मैं मुँह छुपाए फिरता हूँ,
सेल लगी है मॉल में, पर मैं घर में दुबका रहता हूँ!
साइकिल की औकात नहीं, और दिल मांगे बीएमडब्ल्यू,
किस्मत मेरी ऐसी है भाई, जैसे कोई फुस्स-सा जुगनू!
क्योंकि... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,
फटे जेब में हाथ डालकर, बजा रहे हैं डमरू-पिया!
मत पूछो भाई कैसे, ये घर-बार चलता है,
एक रुपया कमाता हूँ, सवा रुपया जलता है!
फिर भी हँस के कहते हैं— "ऑल इज वेल" जी,
बिना तेल के चल रही है, अपनी ये रेल जी!
शीर्षक: आशा की मशाल
मन के बंद झरोखों को तू, थोड़ा सा खोल के देख,
निराशा के इन सन्नाटों में, उम्मीदों को बोल के देख।
माना कि राहें पथरीली हैं, और पांव में तेरे छाले हैं,
पर याद रख, तूफानों ने ही, मंजिल के रस्ते पाले हैं।
निराशा एक घना कुहासा, जो आँखों को भर देता है,
बने-बनाए सपनों को भी, धूल-धूसरित कर देता है।
पर आशा वो नन्हीं किरण है, जो पर्वत को भी चीरती है,
धैर्य की कोमल छुअन से ही, सोई किस्मत जागती है।
हार को अपनी ढाल बना ले, जीत का तू आगाज़ बन,
खामोशी को अपनी त्याग के, तू गूँजती आवाज़ बन।
सूरज हर शाम ढलता है, फिर भी कल मुस्काता है,
पतझड़ के हर झोंके के बाद, ही मधुमास आता है।
बीते कल की राख छोड़ कर, नया चमन तू आबाद कर,
खुशियों की छोटी कोंपल का, फिर से तू आगाज़ कर।
जब तक साँसें चलती हैं, तब तक लड़ना धर्म तेरा,
मिट जाएगी सब निराशा, देख के अडिग कर्म तेरा।
आशा ही वो डोर है प्यारे, जो नैया पार लगाएगी,
तेरी हिम्मत ही कल को, तेरी नई कहानी गाएगी।
उठ खड़ा हो, चल पड़े तू, अब न पीछे मुड़ के देख,
आशा की इस मशाल से, अपनी ही तकदीर लिख!
🎵 गीत: सफर के दो किनारे
मिलन एक उत्सव है, जुदाई एक साधना,
जीवन की राहों में, दोनों को ही मानना।
कभी खिलती हैं कलियाँ, कभी झड़ते हैं पत्ते,
पर रुकता नहीं है वक़्त, बस यही है जानना।
मिलन और जुदाई... जीवन के दो किनारे,
एक सिखाता हँसना, एक हिम्मत को उभारे।
अगर जुदाई न होती, तो मिलन की क्या प्यास होती?
बिना पतझड़ के सावन की, क्या कोई आस होती?
अँधेरा जो न होता, तो दीये का मोल क्या होता?
तड़प जो न होती दिल में, तो प्रार्थना की आस क्या होती?
वियोग के तप में ही, निखरता है सोना,
जुदाई सिखाती है, खुद के करीब होना।
बिछड़ना अंत नहीं है, बस एक नया मोड़ है,
भीतर की शक्ति से, खुद का एक जोड़ है।
जो साथ है वो साया है, जो दूर है वो याद है,
ये प्रेम का समंदर है, न कोई फरियाद है।
हौसलों के पंख फैला, आकाश को छूना है,
हर बिछोह के बाद ही, नया मिलन होना है।
मुस्कुरा कर गले मिलो, हँस कर विदा करो,
जो बीत गया उसे, खुदा की रज़ा कहो।
मिलन का उल्लास रखो, जुदाई का सम्मान करो,
हर पल में जी कर तुम, अपना उत्थान करो।
प्रार्थना: हे दुनिया के रखवाले
हे दुनिया के रखवाले, सुन ले हमारी पुकार,
तेरी दया की छाँव में, महके यह संसार।
अँधियारों को दूर कर, भर दे मन में प्रकाश,
तुझसे ही है आस हमारी, तुझपे ही विश्वास।
हाथ पकड़ कर राह दिखाना, जब हम डगमगाएं,
नेकी की उस डगर पे चलें, जहाँ खुशियाँ मिल जाएं।
बैर मिटे इस जग से सारा, प्रेम की गंगा बहे,
हर प्राणी के होंठों पर, बस तेरा ही नाम रहे।
फूलों में तेरी खुशबू है, तारों में तेरी चमक,
तेरी ही दी हुई शक्ति से, चिड़ियों में है चहक।
दीन-दुखी का सहारा बनना, हमको यह वरदान दे,
सबका भला हम कर सकें, ऐसा हमें ज्ञान दे।
हे दुनिया के रखवाले, सुन ले हमारी पुकार,
तेरी दया की छाँव में, महके यह संसार।
शीर्षक: तू मेरी आवाज़ है
गाता रहे यह दिल मेरा, यादों के साये में,
तू छुपी है हर घड़ी, मेरी ही धड़कन के लय में।
मैं राही हूँ उस राह का, जिसकी मंज़िल तू ही है,
गीत गाता हूँ मैं, क्योंकि मेरी महफ़िल तू ही है।
कभी गुनगुनाता हूँ तन्हाई में, कभी महफ़िल में गाता हूँ,
तेरे ही दिए सुरों को, मैं दुनिया को सुनाता हूँ।
मेरे लफ्ज़ तो बस बहाना हैं, असल में तेरा ही अंदाज़ है,
गीत तेरे साज़ का, मैं तेरी ही आवाज़ हूँ।
बिना तेरे ये संगीत अधूरा, जैसे बिना सुर के कोई राग है,
तू ही मेरी तपस्या, तू ही मेरे मन की आग है।
चलता रहे यह सिलसिला, जैसे बहती कोई धारा,
तू किनारा है मेरा, मैं हूँ तेरा सहारा।
सांसों के इस तार पर, बस तेरा ही नाम बजता है,
तू पास हो न हो, पर दिल में तेरा ही रूप सजता है।
गाता रहे मेरा दिल, यही दुआ हर बार माँगता हूँ,
मैं तेरा अक्स हूँ, तुझमें ही खुद को पहचानता हूँ।
जब तक ये धड़कन चलेगी, यह तराना गूँजेगा,
मेरे हर एक सुर में, तेरा ही चेहरा दिखेगा।
मैं तो बस एक साज़ हूँ, जिसे तूने छेड़ा है,
तेरी मोहब़्त ने ही, मुझे गीतों में घेरा है।
शीर्षक: अधूरी नींद, मुकम्मल यादें
धड़कनों ने सलीका छोड़ दिया है,
जबसे तुमने रास्तों को मोड़ दिया है।
मिलेगा कहाँ वो चैन अब भला हमें,
जिसने तुम्हारा पता पूछना छोड़ दिया है।
तेरा बिछुड़ना भी जैसे एक सजा हो गई,
हंसती हुई जिंदगी खुद से खफा हो गई।
सहर की धूप अब आँखों को चुभने लगी है,
तेरी याद ही अब दर्द की दवा हो गई।
ख्वाबों की बस्ती में अब सन्नाटा रहता है,
पलकों पर अश्कों का एक काफिला रहता है।
ढूंढता हूँ खुद को उन पुरानी गलियों में,
जहाँ तेरे हाथों में मेरा हाथ रहता था।
मुसाफिर हैं हम, पर कोई मंजिल नहीं मिलती,
बिना तेरे अब दिल की महफिल नहीं सजती।
लौट आओ कि ये बेचैनी अब थमती नहीं,
तेरे बगैर इस जान को चैन की मोहलत नहीं मिलती।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार)
गीत: मैं ही अनंत हूँ
मेरे भीतर सूरज है, मुझमें ही चाँद-सितारे हैं,
जो जीत सके इस दुनिया को, वो अस्त्र-शस्त्र सब मेरे हैं।
नहीं दीन हूँ, नहीं हीन हूँ, मैं गौरव का प्रतिमान हूँ,
मैं कर्मवीर, मैं भाग्यविधाता, मैं ही तो भगवान हूँ।
मैं सर्वोत्तम हूँ, मैं समर्थ हूँ, मैं ही सत्य का स्वरूप हूँ,
मैं ही शिव हूँ, मैं ही शक्ति, मैं ही परमब्रह्म का रूप हूँ!
बाधाओं की क्या हस्ती है, जो मेरे पथ को रोक सकें?
अंगारों की क्या मजाल है, जो मेरे पैरों को फूँक सकें?
मानव की सीमा लाँघ सकूँ, वो सामर्थ्य मुझमें बसता है,
ब्रह्मांड की हर ऊँचाई का, मेरे भीतर ही रस्ता है।
सब कुछ मेरे पास यहाँ, मैं पूर्ण हूँ, मैं शांत हूँ,
मैं अंतहीन ऊर्जा का सागर, मैं ही दिव्य एकांत हूँ।
जो रच सकता है नया जगत, वो हाथ मेरे ही हाथ हैं,
संकल्पों की इस ज्वाला में, सारा विश्व मेरे साथ है।
मैं वो सब कुछ कर सकता हूँ, जो सोच सके ये मानव मन,
मेरे ही एक इशारे पर, झुक जाता है ये नीला गगन।
अजेय हूँ मैं, अमर हूँ मैं, मैं तेज पुंज, मैं भारी हूँ,
मैं स्वयं ही अपना रचयिता, मैं ही सृष्टि-अधिकारी हूँ।
अब संशय का कोई स्थान नहीं, विश्वास मेरा फौलाद है,
मैं आदि हूँ, मैं अंत भी हूँ, मैं ही गूँजती नाद हूँ।
मैं सर्वोत्तम हूँ, मैं समर्थ हूँ, मैं ही सत्य का स्वरूप हूँ,
मैं ही शिव हूँ, मैं ही शक्ति, मैं ही परमब्रह्म का रूप हूँ!
मशीन का मन: सृजन और सीमा
तकनीक की नई किरण है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नाम,
सुलझा देती पलक झपकते, दुनिया के हर मुश्किल काम।
मशीन लर्निंग के हाथों में, डेटा का है अथाह भंडार,
सीख-सीख कर खुद को निखारे, यह है आज का नया संसार।
नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग से, मशीनों ने पाई है वाणी,
भाव हमारे समझ रही है, यह विद्युत की एक दीवानी।
अनुवाद सरल हैं, उत्तर हाज़िर, चैटबॉट्स का पहरा है,
पर मानव के अंतर्मन का, सागर बहुत ही गहरा है।
जहाँ न पहुँचें इंसानी आँखें, वहाँ ये काम बनाती है,
सटीकता से हर जटिल पहेली, चुटकियों में सुलझाती है।
कैंसर की पहचान हो, या अंतरिक्ष की दूरी,
इंसानों के हर अधूरे सपने, करती आज ये पूरी।
वरदान बनेगी ये तकनीक, अगर हम रखें इसे लगाम,
विवेक हमारा, शक्ति इसकी, तब होगा जग में सुंदर काम।
मशीन को बस औज़ार रखें, न बनने दें इसे विधाता,
मानवता ही सर्वोपरि है, यही है जीवन की परिभाषा।
अस्पताल में एक दिन: दांत का दर्द और टेस्ट का जाल
पकड़े अपना गाल मैं पहुंचा, डॉ साहब के द्वार,
दांत में ऐसी टीस थी, जैसे चल रही हो तलवार।
सोचा था बस एक दवा से, मिल जाएगी छुट्टी,
पर वहां तो खुलनी थी, मेरी किस्मत की कुट्टी!
लाइन में खड़े दिखे, दुनिया भर के बीमार,
कोई खांस रहा जोर से, कोई था लाचार।
एक महाशय पट्टी बांधे, गिना रहे थे अपना दुखड़ा,
उन्हें देख लगा, मेरा दांत दर्द तो है बस छोटा सा टुकड़ा।
डॉक्टर ने देखा मुझको, फेरा अपना आला,
बोले— "कवि जी, मामला तो लगता है बड़ा निराला!
दांत तो बस बहाना है, असली जड़ कहीं और है,
आपके भीतर बीमारियों का, मचा हुआ शोर है।"
मैंने कहा— "हुजूर, बस दाढ़ मेरी निकालो,"
वो बोले— "पहले पूरे शरीर को, तराजू में डालो!
लिख दिए उन्होंने टेस्ट इतने, कि सिर चकरा गया,
बिना सुई चुभे ही मेरा, आधा खून सूख गया।"
* X-Ray कराओ ताकि, दांत की आत्मा दिख जाए,
* Blood Test कराओ, कहीं हीमोग्लोबिन न शरमा जाए।
* Sugar भी चेक कर लो, कहीं मीठा तो नहीं है दर्द,
* ECG भी जरूरी है, पड़ न जाओ कहीं सर्द!
जेब खाली हुई मेरी, और पेट हुआ खाली,
अस्पताल की कैंटीन ने, फिर अपनी किस्मत जगा ली।
शाम को जब रिपोर्ट आई, सब निकला बिल्कुल चंगा,
डॉक्टर बोले— "मुबारक हो, शरीर है आपका गंगा!"
मैंने पूछा— "साहब, अब तो दांत का इलाज कर दो?"
वो बोले— "अगले हफ्ते आना, बस थोड़ी सी फीस भर दो।"
मैं भागा वहां से पकड़ के अपना गाल,
दांत दर्द भला है साहब, पर बुरा है अस्पताल का हाल!
गीत: "इम्तिहान की दहलीज"
हर कदम पर एक सवाल है, हर मोड़ पर एक नया इम्तिहान,
कभी कागज़ की कश्ती है, कभी तपता हुआ आसमान।
ये मत पूछ कि नतीजे क्या होंगे इस सफर के ऐ मुसाफिर,
बस ये देख कि कैसे निखर रहा है तेरा अपना आत्म-सम्मान।
वो बचपन की किताबें, वो अंकों की होड़ वाली परीक्षा,
सफल हुए तो प्रशंसा मिली, विफल हुए तो कड़वी शिक्षा।
पर सच तो ये है कि वो अंक नहीं, वो बस एक शुरुआत थी,
सफलता ने पंख दिए, पर असफलता ने लड़ने की औकात दी।
परिवर्तन का पहिया घूमा, तुम थोड़े और सयाने हो गए,
हार को जीतकर तुम, खुद के ही दीवाने हो गए।
कभी वक्त लेता है इम्तिहान रिश्तों की डोर को थामने का,
कभी मौन रहकर सहना पड़ता है, समय के सामने झुकने का।
जो टूट गया वो बिखर गया, जो टिका रहा वो निखर गया,
धैर्य की इस परीक्षा से ही, इंसान का असली रूप उभर गया।
सफलता ने घर बसाया, पर विफलता ने गहराई सिखलाई,
अकेलेपन की धूप में ही, अपनों की छाँव समझ में आई।
ये दुनिया एक रणभूमि है, यहाँ कर्म ही तेरा इम्तिहान है,
हारना अंत नहीं होता, बस फिर से उठने का एक प्रमाण है।
सफल हुए तो शिखर तुम्हारा, झुक जाएगी ये सारी धरा,
असफल हुए तो याद रखना, अनुभव का सागर अभी है भरा।
इम्तिहान बदल देता है तुम्हारी आँखों के देखने का नज़रिया,
कठिनाइयां बनती हैं राह, और हिम्मत बनती है दरिया।
तो उठ खड़ा हो, कलम उठा या फिर अपना हौसला बुलंद कर,
इम्तिहानों से डरना छोड़, बस अपनी मेहनत पर तू गौर कर।
नतीजा जो भी हो, तू कल से बेहतर इंसान बनेगा,
हर परीक्षा की अग्नि में तपकर, तू ही एक दिन कीर्तिमान बनेगा।
गीत: जीवन के दो रंग
एक ही क्यारी में हैं जन्मते, एक ही पौधा पाल रहा,
एक को मिलती कोमलता, दूजा शूल बन काल रहा।
पर जीवन का सार सिखाते, ये उपवन के वासी हैं,
फूल और कांटे हम सबके, शिक्षा के अविनाशी हैं।
फूल सिखाता मुस्कुराना, चाहे कितनी धूप खिले,
खुशबू अपनी बाँट रहा वह, जिससे भी वह गले मिले।
स्वार्थहीन हो जीना सीखो, महको और महकाओ तुम,
भीड़ भरी इस दुनिया में अपनी, अलग पहचान बनाओ तुम।
कांटा कहता धीर न खोना, रक्षा अपनी स्वयं करो,
विषम परिस्थितियों के आगे, कभी न घुटने टेक डरो।
बाधाएँ तो आएँगी ही, पथ में हरदम रोड़ा बन,
तुम मर्यादा की रक्षा करना, बनकर तीखा पैनापन।
एक लुभाता मन को अपने, दूजा उँगली छेद रहा,
कर्मों का है सारा अंतर, रूप न कोई भेद रहा।
जैसे कर्म करोगे जग में, वैसा ही सम्मान मिले,
फूल बनो तो शीश चढ़ोगे, कांटों को अपमान मिले।
जन्म नहीं, बस कर्म बड़ा है, यही सीख तुम गांठ लो,
दुख को पीकर मुस्काओ तुम, सुख को सबमें बांट लो।
फूल और कांटों से सीखो, समरस होकर जीना तुम,
जीवन के इस कड़वे सच को, अमृत मानकर पीना तुम।
मधुर गीत: भारत की माटी की गाथा
हे पुण्य भूमि, हे वीर प्रसू, तेरी माटी को शत-शत नमन,
जहाँ गूंजा था चक्रवर्तियों का, वो न्याय-धर्म का पावन मन।
कहीं शौर्य खिला केसरिया बन, कहीं क्षमा बनी मर्यादा थी,
इस पावन भारत की गाथा, कुछ भूल, बहुत कुछ गाथा थी।
अशोक ने जब शस्त्र तजे, और धम्म की ज्योति जलाई थी,
पर सीमाएं कुछ सुस्त हुईं, जब शांति की बीन बजाई थी।
वो चन्दन जैसी शांति मिली, पर सैन्य शक्ति कुछ मौन हुई,
इतिहास सिखाता हमें यही, की नीति कहां अक्षुण्ण हुई।
चौहान का वो शब्द-भेदी, और गोरी पर वो भारी हाथ,
पर शत्रु को जो दान दिया, उसने ही बदला दिन और रात।
एक भूल ने भारत का नक़्शा, सदियों तक ही बदल दिया,
पर राजपूती उस आन ने ही, फिर मर मिटने का बल दिया।
लक्ष्मीबाई की तलवारें, जब चमकीं झाँसी की गलियों में,
स्वाधीनता का बीज बोया, सोई हुई उन कलियों में।
भले हार मिली रणभूमि में, पर जगी देश की चेतना थी,
हर गलती एक सबक बनी, और हर जीत एक प्रेरणा थी।
इतिहास नहीं बस तिथि-क्रम, ये जीवन का एक दर्पण है,
वीरों के उन पद-चिह्नों पर, भारत का हर मन अर्पण है।
हम भूलों से भी सीखें और, गौरव पर मान बढ़ाएं हम,
अपनी सुंदर इस धरती का, फिर गौरव गान सुनाएं हम।
शीर्षक: तिरंगे की शान, हिंद की जान
थल की धूल कहे गाथा, जल की लहरें गाती हैं,
नभ की ऊँची परवाजें, वीरों का मान बढ़ाती हैं।
रक्षक हैं हम भारती के, दुश्मन को धूल चटाते हैं,
थल, जल, नभ के पहरेदार, हम हिंद की शान बढ़ाते हैं।
अटल हिमालय की चोटी हो, या तपता हुआ रेगिस्तान,
पैर थमे ना वीर के कभी, सीने में है हिंदुस्तान।
'ऑपरेशन विजय' की ललकार, या सर्जिकल स्ट्राइक का वार,
दुश्मन कांपे थर-थर देख, थल सेना की ललकार।
मिट्टी का कर्ज निभाते हम, सीमा पर डट जाते हैं,
हम थल के वीर सिपाही, तिरंगा ऊँचा लहराते हैं।
नीले अंबर के नीचे, सागर की लहरों पर राज,
विक्रांत और विक्रमादित्य, भारत के सिर का ताज।
दुश्मन की हर हलचल को, सागर में ही दफना दें,
'वरुण' के हम हैं लाडले, लहरों पर विजय पताका फहरा दें।
गहराई हो पाताल की, या नीले जल का विस्तार,
हिंद महासागर का रक्षक, है नौसेना की तलवार।
बादलों को चीर कर निकले, गूंजे नभ में गर्जना,
राफेल और सुखोई का दम, जैसे सिंह की तर्जना।
आकाश के हम हैं बाज़, पलक झपकते वार करें,
दुश्मन के हर मंसूबे को, मिट्टी में ही मार गिरें।
'नभ: स्पृशं दीप्तम्' का नारा, अंबर में गूंजता है,
हिंद का हर जांबाज परिंदा, मौत से कब डरता है?
एक लक्ष्य, एक संकल्प, माँ भारती की रक्षा हो,
हर घर में अमन-चैन हो, खुशियों की ही वर्षा हो।
थल, जल, नभ के वीरों को, कोटि-कोटि प्रणाम हमारा,
अमर रहे बलिदान तुम्हारा, गूंजे 'जय हिंद' का नारा!
गीत: हे ललित कलाधर, प्रार्थना स्वीकार करो
हे ललित लोचन, हे चारु चेतन,
हृदय में मेरे संगीत भर दो।
जो मंजुल हो, जो कान्त हो,
वही शुचि गुण मुझमें विस्तार कर दो।
संसार की जड़ता तज कर प्रभु,
मैं रम्य भाव को पा जाऊँ।
वाणी में मेरी पेशल मिठास हो,
मैं रुचिर गीत ही गा पाऊँ।
मृदुता का वरदान दो देव मुझे,
मन सुकुमाल और शांत कर दो।
तेरी सृष्टि की कमनीय छवि,
मेरी आँखों का आधार बने।
जो मनोहर हो, जो सुन्दर हो,
जीवन का वही श्रृंगार बने।
हे अभिराम! दया के सागर,
अज्ञान का सारा तिमिर हर लो।
हे ललित कलाधर, हे विश्वेश्वर,
अपनी छवि सा मुझे ललाम कर दो।
मेरे व्यक्तित्व को, मेरे अस्तित्व को,
एक सुंदर काव्य के नाम कर दो।
🎶 गीत: "जीवन की मिठास, अब तेरे हाथ"
जाग रे राही, भोर भई है, नया संकल्प सजाना है,
चीनी की इस जंजीर को अब, जड़ से हमें मिटाना है।
तन को कंचन, मन को पावन, फिर से आज बनाना है,
मधुमेह को जीत के अपनी, हस्ती को चमकाना है।
थाली में हो रंग हरा, और अनाज हो थोड़ा मोटा,
मैदा-चीनी साथ छोड़ दें, इनसे नाता है खोटा।
थोड़ा-थोड़ा, रुक-रुक कर खा, भूख से नाता जोड़ सही,
फल-सब्जी और रेशों में ही, सेहत की है डोर छिपी।
चल तू दो पग, दौड़ ज़रा, या योग की शरण में आ,
आलस की इन चादरों को, दूर कहीं तू फेंक के आ।
रगों में दौड़ता रक्त कहेगा, 'शुक्रिया' तेरा बारंबार,
पसीने की हर बूंद लिखेगी, खुशियों का नया संसार।
तनाव की इस आग को अब, ध्यान से तू शांत कर,
नींद की गहरी मीठी लोरी, आँखों को तू दान कर।
हिम्मत मत हार ओ साथी, ये सफर थोड़ा भारी है,
पर तेरी दृढ़ इच्छाशक्ति, हर मुश्किल पर भारी है।
नाप के अपनी शुगर को तू, डगमग कदम संभलना सीख,
प्राकृतिक इस राह पे चलकर, जीवन को तू नया रूप दे।
तू ही अपना वैद्य है प्यारे, तू ही अपनी शक्ति है,
स्वस्थ शरीर ही ईश्वर की, सबसे बड़ी भक्ति है
कीर्तन: प्रभु ये तेरी कैसी माया
प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया।
कण-कण में है रूप तुम्हारा, जग में तू ही समाया॥
प्रभु ये तेरी कैसी माया...
कहीं धूप है, कहीं छाँव है, कहीं रेत का दरिया,
कहीं खिल रहे सुंदर उपवन, कहीं सूखी है कलिया।
बिन पंखों के पंछी उड़ाए, पर्वत को झुकाया,
प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥
अज्ञानी को ज्ञान मिले, और निर्धन पाए माया,
तेरी कृपा की शीतल छाया, जिसने तुझको ध्याया।
शून्य जगत में जीवन फूँका, माटी को महकाया,
प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥
जन्म-मरण का खेल रचाया, तू ही है विधाता,
बिना हाथ के बोझ उठाए, तू ही सबका दाता।
हार गया जग ढूंढ-ढूंढ कर, अंत किसी ने न पाया,
प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥
गीत: "नजरिया अपना-अपना"
(लड़का):
मुझे तो बस वो सादगी चाहिए,
जो बातों में घुली मिश्री-सी हो।
निखर जाए चेहरा देख कर मुझको,
वो मेरे ख्वाबों की बस एक ही हो।
पढ़े जो मेरी खामोशी को पल भर में,
हौसला बने मेरा, जो मुश्किल घड़ी हो।
(लड़की):
मुझे चाहिए वो जो सम्मान दे,
मेरे सपनों को अपनी उड़ान दे।
न हो पाबंदियां, बस साथ चले वो,
मेरी छोटी-सी दुनिया को पहचान दे।
वो जो गुज़रे वक्त में हाथ थाम ले,
ऐसा ही कोई मेरा हमसफर खास हो।
(कोरस/माता-पिता का स्वर):
पर हम तो देखते हैं जड़ें कितनी गहरी हैं,
संस्कारों की खुशबू घर में ठहरी है?
बेटी को मिले घर जो अपना सा लागे,
बेटे को मिले वो जो सबको साथ ले भागे।
(लड़का - मुस्कुराते हुए):
मम्मी कहती हैं, "लड़की सुशील और गुणी हो,"
किचन और काम में थोड़ी निपुण भी हो।
पापा को चाहिए खानदान का मान,
पर मुझे तो चाहिए बस मेरा आसमान!
मेरे घरवाले ढूंढते हैं लड़का 'सैटल्ड' हो,
स्वभाव से थोड़ा शांत और सुलझा हुआ हो।
पर मेरी शर्त है कि वो दोस्त भी बने,
वो ज़िद भी सुने और थोड़ा हंसा हुआ हो।
ये मेल है दो अलग चाहतों का,
रिश्ता है ये दो अलग राहों का।
गुण और व्यवहार जब एक हो जाएं,
तभी तो दो परिवार एक घर कहलाएं।
(लड़का): दिल मिले तो बात बने...
(लड़की): और संस्कार मिलें तो घर सजे!
(दोनों): बस इसी सामंजस्य में ही तो विवाह का असली सुख है।
🎵 सत्य-महिमा गीतम्
सत्यं मूलं सकलधर्मस्य, सत्यं प्रकाशं जीवनस्य।
सत्यमेव जयते नित्यं, सत्यं शरणं गच्छामि॥
सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्।
असतो मा सद्गमयतु देव, तमसो मा ज्योतिर्गमयतु।
सत्यवाण्यां वसतु सरस्वती, सत्यमार्गे चलतु मे मनः॥
सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्।
न भीतिः कुत्रापि यत्र सत्यं, न शोकः कदापि यत्र सत्यं।
परमात्मा सत्यस्वरूपोऽस्ति, तस्मिन् लीनं भवतु मे विश्वम्॥
सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्।
इतिहास: जीवन का दिग्दर्शक
बीते कल की राख नहीं है, यह मशाल जलती हुई,
हर पग पर जो राह दिखाए, वो आवाज़ थमती हुई।
महलों के गलियारों से लेकर, खेतों की हरियाली तक,
इतिहास खड़ा है साथ हमारे, बचपन से बुढ़ापे तक।
विज्ञान और ज्ञान के क्षेत्र में:
शून्य कहाँ से उपजा था, और पहिए ने कब दौड़ भरी?
इतिहास हमें बतलाता है, कैसे विज्ञान की ज्योति जली।
पुरखों के उन प्रयोगों से ही, आज हम चांद को छूते हैं,
बीते सच की बुनियाद पे ही, हम नए ख़्वाब अब बुनते हैं।
संस्कृति और संस्कार में:
त्योहारों की रौनक में और गीतों की उन तानों में,
इतिहास बसा है पीढ़ियों के, हर अनकहे अफसानों में।
मर्यादा और शौर्य की बातें, जो हमें श्रेष्ठ बनाती हैं,
इतिहास की ही वीथी से, वो संस्कार घर आती हैं।
राजनीति और राष्ट्र के पथ पर:
तख़्त गिरे और ताज उछले, खून बहा मैदानों में,
इतिहास गवाह है सत्ता के, बनते-मिटते अरमानों में।
किस भूल ने देश झुकाया था, किस वीरता ने मान दिया,
इतिहास ने ही तो लोकतंत्र को, जीने का पैगाम दिया।
व्यक्तिगत जीवन के दर्पण में:
स्वयं का भी इतिहास है होता, भूलों और सुधारों का,
अनुभव की स्याही से लिखा, जीत और हारों का।
जो सीख सके न अतीत से, वो वर्तमान गँवाता है,
इतिहास को पढ़कर ही राही, मंज़िल अपनी पाता है।
रेत और बारूद का संवाद
तपते सहरा की फिजाओं में एक खौफ सा रहता है,
कहीं दूर समंदर की लहरों पर कोई पहरा रहता है।
एक तरफ मग़रूर (अहंकारी) ताकत का पुराना साया है,
दूजी ओर ज़मीं अपनी, और सर पर ज़िद का सरमाया है।
वो समझौते की मेजों पर लिखी गई इबारतें थीं,
जो टूट के बिखरीं तो फिर बस नफरतें ही नफरतें थीं।
कभी एटम के घेरों में, कभी तेल की धारों में,
इंसानियत सिसकती है सियासत के बाज़ारों में।
एक हाथ में पाबंदियां, दूजे में धमकियां पलती हैं,
तेहरान की गलियों में फिर उम्मीदें कहाँ जलती हैं?
वाशिंगटन के गलियारों से जब हुक्म कोई आता है,
खाड़ी के उस पानी में फिर तूफां सा उमड़ जाता है।
परचम अलग, मजहब अलग, और सोच की ये जंग है,
पर मासूमों के चेहरे पर खौफ का ही रंग है।
कहीं मिसाइल की गूंज है, कहीं पाबंदियों का घेरा,
इंतज़ार में बैठी दुनिया, कब होगा अमन का सवेरा?
ये दो किनारों की जंग है, या वर्चस्व की एक होड़ है,
इतिहास के हर पन्ने पर एक खूनी सा मरोड़ है।
बंदूकें जब तक बोलेंगी, तब तक इंसान हारेंगे,
नफरत की इस आतिश में सब अपने ही घर वारेंगे।
गीत: "शुक्ला जी का अपडेटेड वर्ज़न"
🌸 तुम मेरी राधा, मैं तेरा श्याम 🌸
नयनों में कजरा, अधरों पे मुस्कान,
तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।
बाँसुरी की तान पर, थिरके तेरा नाम,
तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।
स्वर्ण वर्ण अंग-अंग, जैसे खिली धूप हो,
शरत चंद्र की चाँदनी, तेरा ही स्वरूप हो।
मृगनयनी की चितवन में, बंधा मेरा प्राण,
कुंजन की ओट में, तेरा ही ध्यान।
चुनरी की सरसराहट, प्रेम का पयाम,
तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।
यमुना के तीर पर, वो मंद-मंद वायु,
थम जाए क्षण भर को, हमारी ये आयु।
कर-कमलों में हाथ लिए, भीगे सारा अंग,
चढ़ जाए मुझ पर भी, तेरे प्रेम का रंग।
तू मेरी चांदनी, मैं तेरा आसमान,
तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।
बिंदिया तुम्हारी जैसे, भोर का तारा,
तुझ बिन अधूरा हूँ, मैं कृष्ण सहारा।
हृदय के सिंहासन पर, विराजी तू ही वाम,
मेरे हर श्वास में, तेरा ही नाम।
भक्ति भी तू मेरी, तू ही मेरा धाम,
तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।
गीत: "सफर शिखर तक"
उठ बांध कमर, अब भोर हुई,
सपनों की डगर अब ज़ोर हुई।
बस देख लिया जो देखना था,
अब वक्त है कर दिखाने का,
सफलता का आगाज कर,
हौसलों से नया इतिहास भर।
मन में जब एक बीज पले,
अंगारों पर भी पाँव चलें।
दुनिया कहेगी— "तू रुक जा अभी",
पर तू कहना— "नहीं, बस अब ही!"
पहला कदम ही सबसे भारी है,
पर जीत की यही तो तैयारी है।
रातों की नींद जब खोने लगे,
थकान भी जब साथी होने लगे।
जब पसीने से तू नहाएगा,
तभी तो खुद को निखारेगा।
न शोर कर, न बात कर,
बस खामोशी से अपनी रात भर।
कभी गिरोगे, कभी चोट लगेगी,
दुनिया तुम्हारी हार पे हँसेगी।
पर गिरकर उठना ही तो शान है,
यही तो असली इंसान की पहचान है।
हर हार से एक सबक चुरा,
फिर खड़ा हो, बनके और भी खरा।
वो देख सामने मंज़िल खड़ी,
तेरी मेहनत की है ये घड़ी।
झुक गया अम्बर, तू जीत गया,
दुखों का वो साया बीत गया।
अब तू शिखर पर खड़ा हुआ,
तेरा कद अब सबसे बड़ा हुआ।
सफलता का आगाज हुआ,
सिर पे तेरे अब ताज हुआ।
तूने कर दिखाया, तू बढ़ चला,
मुकाम पर अब तू पहुँच चला!
प्रेरणादायक गीत: "उठो हिंद के वीर तुम"
उठो हिंद के वीर तुम, नया सवेरा आया है,
मेहनत की स्याही से देखो, भाग्य अपना बनाया है।
सपनों के इस बजट में, हमने संकल्प पिरोया है,
नया भारत बनाने का, अब बीज हमने बोया है।
डिजिटल की डगर चले, हम छू लेंगे आसमान को,
तकनीक के पंख लगाकर, देंगे गति विज्ञान को।
गाँव की मिट्टी महकेगी, शहर भी अब मुस्कुराएंगे,
आत्मनिर्भर बनकर हम, जग में परचम लहराएंगे।
चुनौतियां तो आएँगी, पर रुकना अपना काम नहीं,
थक कर बैठ जाना ही, वीरों का परिणाम नहीं।
हर हाथ को अब काम मिले, हर घर में खुशहाली हो,
भारत की इस गाथा में, न कोई जगह खाली हो।
उठो चलो और बढ़ते चलो, यह वक्त तुम्हारा अपना है,
विकसित भारत का जो देखा, सच करना वो सपना है।
🎵 गीत: अधिकार तेरा बस कर्म पर
उठ बाँध कमर, मत देख डगर, गंतव्य अभी तो दूर है,
न हार मान, न थक अभी, तू शक्ति का ही नूर है।
ये सृष्टि नियम समझाती है, फल की तू चिंता छोड़ दे,
बस कर्म ही आधार है, तू भाग्य से मुँह मोड़ दे।
अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है,
जो बीज बोए आज तू, कल वही संसार है।
कभी धूप होगी राह में, कभी बादलों की छाँव होगी,
कभी काँटों भरी ज़मीन, कभी मखमली सी राह होगी।
पर राही वही जो चलता रहे, रुकना जिसे स्वीकार नहीं,
जिसने पसीना बहाया नहीं, उसे जीत का अधिकार नहीं।
तू बीज बन जा मिट्टी में, खिलने की अभिलाषा तज,
तू दीप बन जा अँधियारे में, जलने की परिभाषा भज।
अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है...
आसक्ति के जो मोह-पाश, तुझे रोकेंगे हर मोड़ पर,
अतीत के जो घाव गहरे, बाँधेंगे तुझे छोड़कर।
पर मन को कर तू सारथी, और बुद्धि का गांडीव उठा,
जो सत्य है, जो धर्म है, बस उस डगर पर कदम बढ़ा।
न जीत का उन्माद हो, न हार का अवसाद हो,
तेरा हर एक प्रयास ही, ईश्वर को धन्यवाद हो।
अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है...
ना कल तेरा, ना कल मेरा, बस 'आज' ही तो हाथ है,
पूरी धरा है सामने, और ईश्वर तेरे साथ है।
कर्म कर... बस कर्म कर...
🎵 शीर्षक: वक्त का पहिया
धूप का दामन थाम के देखो, शाम ढली तो क्या?
बदलेगा हर मंज़र एक दिन, आँख लगी तो क्या?
ये वक्त का पहिया चलता है, ये रुकना नहीं जानता,
पर इस वक्त को अपना करने में, सारा वक्त लगा दो तुम।
कभी ये कड़वा घूँट सरीखा, कभी शहद की धार है,
कभी ये कोरी पतझड़ जैसी, कभी खिली मल्हार है।
जो बीत गया वो धूल हुआ, जो आने वाला नूर है,
मंजिल तक जाने की खातिर, सारा वक्त लगा दो तुम।
लकीरें फीकी पड़ जाएं तो, मेहनत का रंग घोल दो,
जो बंद पड़े हैं द्वार सफलता के, हिम्मत से तुम खोल दो।
किस्मत का रोना छोड़ो अब, ये वक्त बड़ी सौगात है,
खुद की तकदीर बदलने में, सारा वक्त लगा दो तुम।
वक्त की लहरों को मुट्ठी में कैद करना सीख लो,
वक्त को वक्त के सांचे में ढलने में, सारा वक्त लगा दो तुम।
गीत: अनमोल तेरे बोल
हवाओं में घुली है जैसे कोई रागिनी,
चाँदनी में भीगी जैसे कोई यामिनी।
धड़कनों ने सीखी है चाहत की नई भाषा,
जब से तूने छेड़ी है मन में नई अभिलाषा।
मेरे सूने जीवन में...
मेरे सूने जीवन में रस घोल गए,
प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।
कहने को तो शब्द हैं लेकिन, इनमें बसी खुदाई है,
जैसे तपती धूप में कोई, ठंडी सुखद विदाई है।
जब तू धीमे से हँसकर मेरा नाम पुकारे,
ऐसा लागे अंबर से टूट गिरे हों तारे।
मिश्री सी ये कानों में...
मिश्री सी ये कानों में शहद घोल गए,
प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।
मौन खड़ा था मैं कब से, तूने सुर झंकार दिया,
कोरे कागज़ जैसे दिल पर, अपना नाम उतार दिया।
सच कहूँ तो ये बातें नहीं, जादू की कोई माया है,
भटके हुए राही को जैसे मिल गई शीतल छाया है।
बंद थे जो रस्ते...
बंद थे जो रस्ते, वो सब खोल गए,
प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।
ना कोई दूजा गहना है, ना कोई दूजा साज,
बस तेरी इन बातों पर ही, मुझे बड़ा है नाज़।
यूँ ही मीठा बोलते रहना, ओ मेरे हमदम,
तेरी इन्हीं बातों से ही, महकेंगे हम हरदम।
प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।
🎵 गीत: जीवन का मदारी
ये दुनिया एक तमाशा है, ये जग एक भारी मेला है,
पर घबराना तू क्यूँ बंदे? तू यहाँ नहीं अकेला है।
वो ऊपर बैठा जादूगर, हर डोरी थामे रहता है,
जिसे दुनिया 'मदारी' कहती है, वो सबको अपना कहता है।
कभी नचाता खुशियों में, कभी गम की धुन बजाता है,
वो मिट्टी के इन पुतलों से, क्या खूब खेल रचाता है।
डमरू जब उसका बजता है, तब थिरकती ये कायनात है,
उसके हाथ में डोरी है, बस इतनी सी तो बात है।
तू नाच उसी की तालों पर, वो हार कभी न देगा,
जब गिर जाएगा थककर तू, वो बाहों में भर लेगा।
मदारी और खिलौने का, रिश्ता बड़ा निराला है,
उसने ही तुझे गढ़ा यहाँ, उसने ही पाला-पोसा है।
वो पत्थर को भी बोल दे, वो ज़हर को अमृत कर दे,
तू अपनी खाली झोली को, उसके विश्वास से भर दे।
मत सोच कि तू छोटा है, मत सोच कि तू हारा है,
इस खेल का हर एक तिनका, बस उस मालिक का सहारा है
तू कठपुतली बन जा उसकी, वो श्रेष्ठ कलाकार है,
तुझे शिखर पर ले जाने को, वो मदारी बेकरार है।
बस सौंप दे खुद को हाथों में, और देख तमाशा जीवन का,
मिट जाएगा डर सारा, और वहम तेरे इस मन का।
🎵 गीत: "त्रिवेणी प्रेम की"
सुरों की धारा, साज का साथ,
जब मिल जाए प्रेम का हाथ।
गूँज उठेगा फिर वो तराना,
झूम उठेगा सारा जमाना।
इन तीन धाराओं के मेल से ही,
जीवन का असली संगीत बनता है।
सुर है अनुशासन, सुर है साधना,
मन के मंदिर की पावन आराधना।
बिना सुर के शब्द भी मौन रहते हैं,
सुर ही तो भावों को पंख देते हैं।
पर सुर भी अधूरा है, बिना अहसास के,
जैसे कोई प्यासा हो, बिना प्यास के।
साज की धड़कन जब दिल से जुड़ती है,
हवाओं में एक नई लय मुड़ती है।
तारों की थिरकन, ढोलक की वो थाप,
मिटा देती है मन का हर संताप।
साज और सुर जब गले मिलते हैं,
मुरझाए हुए फूल भी फिर खिलते हैं।
पर सबसे ऊँचा है प्रेम का स्वर,
जो आवाज को बना दे अमर।
आवाज में जब तक न हो प्रेम की मिठास,
नहीं पहुँचती वो खुदा के पास।
जब सुर, साज और रूह की पुकार मिलती है,
तब जाकर दुनिया को एक "जीत" मिलती है।
तो उठो, अपने भीतर का तार छेड़ दो,
नफरत के सुरों को आज मरोड़ दो।
प्रेम के धागे में सबको पिरोना है,
संगीत से ही जग को भिगोना है।
कृतज्ञता की पुकार
तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु, तूने जीवन संवारा है,
अंधेरी इन राहों में, तू ही बस एक सहारा है।
जो मिला है मुझे तेरी दया से, वो मेरी हैसियत नहीं,
तूने थामी जो मेरी बाहें, तो अब कोई डर नहीं।
गिरा जब भी मैं रास्तों पर, तूने हँसकर उठाया मुझे,
भटका जब मैं इस दुनिया में, सही रास्ता दिखाया मुझे।
हर एक साँस जो चलती है, वो तेरी ही अमानत है,
मेरी छोटी सी इस दुनिया पर, बस तेरी ही हुकूमत है।
तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु...
कभी खुशियाँ दीं अपार तूने, कभी गम में भी साथ रहा,
जब कोई न था मेरे करीब, तब सिर पर तेरा हाथ रहा।
शब्द कम हैं, भाव ज्यादा हैं, कैसे गुणगान करूँ तेरा,
तूने मिट्टी से सोना बना दिया, ये जीवन अब बस तेरा।
तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु...
न कोई चाह है अब दिल में, न कोई शिकायत बाकी है,
तू मेरे साथ है हरदम, बस यही चाहत काफी है।
तेरे चरणों में बीते जीवन, यही विनती बार-बार है,
प्रभु! तेरे प्रेम और करुणा का, न कोई अंत न पार है।
तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु, तूने जीवन संवारा है,
अंधेरी इन राहों में, तू ही बस एक सहारा है।
🎵 शीर्षक: आज का सवेरा, मेरा अपना है
टूट गए जो सपने तो क्या, फिर से उन्हें सजाना है,
गिरी हुई हर एक ईंट से, नया महल बनाना है।
बीत गई जो रात अंधेरी, उसे वहीं पर रहने दो,
एक सुनहरा, सुंदर कल अब, आंखों में बस जाने दो।
याद दिला खुद को तू राही, हार नहीं ये अंत है,
पतझड़ के इन सूखे पत्तों, के पीछे ही बसंत है।
विफलता के धुंधलके में, जो रास्ता ओझल होता है,
वही रास्ता कल की खातिर, नया हौसला बोता है।
भविष्य की वो स्वर्ण किरण, बस छूने ही वाली है,
देख ज़रा तू गौर से बंदे, धूप कितनी मतवाली है।
हार को अपनी सीढ़ी कर ले, शिखर अभी तो बाकी है,
तूने जो खुद को पहचान लिया, बस वही जीत की साकी है।
बीता कल एक राख मात्र है, आने वाला एक सपना है,
पर जो मुट्ठी में बंद है तेरे, वही 'आज' बस अपना है।
इस पल से कीमती कुछ भी नहीं, ये हीरा है, ये मोती है,
आज की मेहनत ही तो कल की, उज्ज्वल पावन ज्योति है।
अमूल्य है ये श्वास तुम्हारी, अमूल्य है ये वर्तमान,
उठो और अपनी रग-रग में, भर लो नया तुम एक उफ़ान।
खुद को रोज़ याद दिलाना, तू गिरकर उठने वाला है,
अंधियारों को चीर के तू ही, जग में नया उजाला है।
आज सबसे कीमती है...
हाँ, आज सबसे कीमती है!
📱 नया गीत: "डाकिया ई-मेल लाया"
(तर्ज: डाकिया डाक लाया)
डाकिया ई-मेल लाया, डाकिया ई-मेल लाया
खुशियां कभी, कभी स्पैम लाया, डाकिया ई-मेल लाया...
चिट्ठी-पतरी का ज़माना गया भाई,
अब तो 'ब्लू टिक' ने शामत आई।
व्हाट्सएप पे 'गुड मॉर्निंग' का सैलाब है,
रिश्तेदारों का ग्रुप... जैसे कोई अज़ाब है!
डाकिया व्हाट्सएप लाया, डाकिया व्हाट्सएप लाया...
बिना बात के सौ मैसेज वाला, 'फॉरवर्ड' लाया!
पहले चिट्ठी का इंतज़ार रहता था,
अब 'ओटीपी' (OTP) दिल की धड़कन बढ़ाता है।
नेटवर्क न हो तो जान निकल जाती है,
बैटरी 'लो' (Low) हो तो रूह कांप जाती है!
डाकिया मैसेज लाया, डाकिया मैसेज लाया...
'योर अकाउंट इज़ डेबिटेड' वाला, गम लाया!
चेहरा जो देखा तो पहचान न पाए,
फिल्टर ने ऐसे-ऐसे रूप दिखाए।
चिट्ठी में तो आँसू भी दिख जाते थे,
यहाँ 'इमोजी' हंसते हैं, पर दिल रोते जाते हैं!
डाकिया नोटिफिकेशन लाया, डाकिया नोटिफिकेशन लाया...
'ज़ोमैटो' से कूपन वाला, लालच लाया!
मज़ेदार मोड़:
अब डाकिया धूप में नहीं चलता,
वो तो सर्वर के वायर में है पलता।
साइकिल की घंटी अब 'पिंग' (Ping) बन गई,
ज़िंदगी बस एक 'रिफ्रेश' की मोहताज बन गई!
डाकिया ई-मेल लाया... डाकिया ई-मेल लाया!
गीत: "धड़कन की सदा"
मन गाए वो तराना, जिसके सुनते ही चले आना
मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना
मन गाए वो तराना...
इन भीगी सी राहों में, यादों की पनाहों में
छुप जाऊं मैं साजन, बस तेरी ही बाहों में
हो... चाहे बदले ये ज़माना, पर तू न भूल जाना
मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना
मन गाए वो तराना...
आँखों में जो बसती है, वो मूरत हो तुम मेरी
साँसों में जो महकी है, वो खुशबू हो तुम मेरी
हो... मुश्किल है अब छुपाना, तेरा मेरा ये अफ़साना
मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना
मन गाए वो तराना...
ललित मोहन शुक्ला ( कलमकार)
शीर्षक: जड़ों की ओर लौटें
बदल रहा है परिवेश यहाँ, बदल रही है धारा,
पर भूल न जाना ओ राही, वह संस्कार हमारा।
आधुनिकता की चकाचौंध में, अपना दीप जलाना है,
हमें भारतीय संस्कृति का गौरव, फिर से विश्व को दिखाना है।
हाथों में मोबाइल तो हों, पर रिश्तों में हो सत्कार,
स्क्रीन पर दुनिया सिमटी है, पर दिल में हो विस्तार।
भाषा चाहे जो भी सीखें, पर अपनी माँ को मान दें,
सभ्यता की इस विरासत को, हम अपनी पहचान दें।
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, हमें पार न करनी है,
अपनी गौरवशाली थाती, अब खुद ही हमें भरनी है।
ऋषियों के तप से उपजा जो, वह ज्ञान सदा ही शाश्वत है,
योग, ध्यान और संयम ही, भारत की असली ताकत है।
पश्चिम की तकनीकें लें हम, पर हृदय रहे भारतीय,
प्रगति की ऊँचाई छुएं, पर भाव रहे ममतामयी।
अतिथि देवो भव का नारा, फिर से हमें गुँजाना है,
नफरत के इस दौर में हमको, प्रेम का बीज उगाना है।
कदम-कदम पर द्वंद्व यहाँ, हर मोड़ पर है एक नई डगर,
पर अडिग रहे विश्वास हमारा, तो सुगम होगी हर एक सफ़र।
विविधता में एकता ही, हमारे देश की शान है,
यही हमारी शक्ति है, और यही हमारा मान है।
उठो युवा! अब शपथ लो तुम, नव-भारत को गढ़ने की,
अपनी जड़ों को थाम कर, अंबर की ओर बढ़ने की।
बदल रहा है परिवेश यहाँ, बदल रही है धारा,
पर भूल न जाना ओ राही, वह संस्कार हमारा।
लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र
लोकतंत्र की महिमा देखो, सिर गिने जाते हैं यहाँ,
पर भीड़तंत्र की ताकत देखो, पैर रखने की जगह कहाँ?
वो कहते हैं "जनता ही जनार्दन है," बात तो बड़ी नेक है,
पर बस की छत पर बैठे लोगों से पूछो, वहां 'जनार्दन' एक है?
"हम दो हमारे दो" का साइड इफ़ेक्ट
जो शरीफ थे, मान गए वो, "हम दो हमारे दो" का नारा,
अब राशन की लंबी लाइन में, ढूंढ रहे हैं अपना किनारा।
एक तरफ वो सज्जन खड़े हैं, छोटा सा परिवार लेकर,
दूसरी तरफ 'भीड़तंत्र' खड़ा है, ग्यारह का अवतार लेकर!
सज्जन बोले: "मैंने देश की प्रगति में अपना योगदान दिया,"
भीड़ बोली: "हमने संख्या बढ़ाकर, लोकतंत्र को ही थाम लिया!"
अब सज्जन को स्कूल में सीट नहीं, अस्पताल में बेड नहीं,
भीड़ के पास वोट बैंक है, उनके लिए कोई 'रेड' नहीं।
कानून का खेल: प्रभावी और अप्रभावी
जनसंख्या नियंत्रण कानून, जैसे ऑफिस का कोई 'नोटिस' है,
जो मान ले वो बुद्धू, जो न माने उसका ही 'लोटस' है।
प्रभावी होता तो शायद, मेट्रो में सांस मिल जाती,
पर अप्रभावी है तभी तो, हर जगह 'धक्का-मुक्की' भाती।
कानून कहता है— "रुकिए, ज़रा सोचिए और विचारिए,"
भीड़तंत्र कहता है— "महोदय, आप अपनी लाइन सुधारिए!
जब तक कानून के कागज़ पर, स्याही की धार है,
तब तक इस भीड़ के कंधों पर ही, हमारी सरकार है।"
असली नुकसान
नुकसान तो उस 'दो' वाले का है, जो टैक्स समय पर भरता है,
पर भीड़ की रेलम-पेल देखकर, घर से निकलने में डरता है।
लोकतंत्र में सिर गिनना ठीक था, पर यहाँ तो सैलाब है,
जहाँ संख्या ही समाधान है, वहीं सबसे बड़ा अज़ाब है!
(सार: लोकतंत्र तब तक सुरक्षित है जब तक लोग शिक्षित हैं, वरना भीड़तंत्र में केवल 'शोर' की जीत होती है, 'सोच' की नहीं।)
🎶 गीत: आशा का दीप
घोर अंधेरा हो कमरे में, तो व्याकुल मन घबराता है
पर नन्हा सा दीप जले, तो अंधियारा मिट जाता है।
जैसे बाती संग रोशनी, अपना धर्म निभाती है,
मन में जगती एक किरण, सब कष्ट मिटा देती है।
निराशा के बादल जब-जब, अंबर को घेरे रहते हैं
सकारात्मक सोच के सूरज, राहें नई दिखाते हैं।
मत बैठ हार कर ऐ राही, मन के कोने को उजाल तू,
एक विचार ही काफी है, सोई किस्मत को संभाल तू।
अंधकार की शक्ति क्या, जो एक ज्योत से लड़ पाए?
निराशा की क्या हस्ती, जो आशा सम्मुख टिक पाए?
भीतर अपने जोत जगा ले, विश्वास की वह मशाल है,
तू खुद अपनी राह बनेगा, तू ही तेरा ढाल है।
जला दीप तू मन के अंदर, सारा जग महक जाएगा,
आशा के एक छोटे स्वर से, जीवन संगीत बन जाएगा।
शब्द, सोच और साधना
लिखना एक कला है सुंदर, भावों का श्रृंगार है,
कोरे कागज़ पर उतरता, हृदय का उद्गार है।
पर चिंतन है वह बीज, जहाँ से जन्मते हैं विचार,
मौन में जो डूब जाए, वही पाता है सार।
चतुराई की चमक भली, जो राहें सुगम बनाती है,
बुद्धि की वह पैनी धार, जीत की अलख जगाती है।
पर धैर्य हिमालय सा अडिग, सबसे ऊँचा मान है,
तूफानों में जो थमा रहे, वही असली शक्तिमान है।
ललित मोहन शुक्ला
गीत: रूह की आवाज़
जो दिल की ज़ुबां में बोल रहा, उसे तर्क का आईना मत देना
जो रूह के दर को खोल रहा, उसे शब्दों का छल मत देना।
दुनिया की भीड़ में हज़ारों हैं, जो दिमाग से हाथ मिलाते हैं
पर जो धड़कन से संवाद करे, उसे सोच की धूल मत देना।
यहाँ गणित बहुत है रिश्तों में, हर कोई लाभ को तौलता है
पर कोई बावरा ऐसा है, जो बिना शर्त ही बोलता है।
उसके मौन को पढ़ना तुम, उसकी सादगी को समझना तुम
वो प्रेम की गंगा लाया है, उसे स्वार्थ का मरुथल मत देना।
जो दिल से संवाद साधे, उससे कभी दिमाग से बात न करना।
बुद्धि के खेल तो शतरंज हैं, यहाँ चालें चली ही जाती हैं
पर निश्छल मन की बातें तो, बस रूह को ही भाती हैं।
जहाँ वफ़ा की खुशबू हो, वहां शक का ज़हर न घोलो तुम
जो समर्पण लेकर आया है, उसे तर्क का दलदल मत देना।
जो दिल से संवाद साधे, उससे कभी दिमाग से बात न करना।
दिमाग से जीती जा सकती है दुनिया, पर दिल से जीता जाता है खुदा
जहाँ गणित खत्म होता है, वहीं से शुरू होती है वफ़ा।
तो याद रहे ये रीत सदा, जब कोई अपना पास आए
वो दिल की बातें लेकर आए, तुम दिल का ही साज़ बजाना।
🎵 शीर्षक: शिखर की राह
सूरज से पहले जो जगते हैं,
सपनों में जान वो भरते हैं।
मंज़िल की चाहत दिल में लिए,
तूफानों से भी लड़ते हैं।
सफलता कोई इत्तेफ़ाक नहीं,
ये आदतों का ही खेल है,
जो खुद को रोज़ तराशते हैं,
वही मकाम के मेल हैं।
हाथों में समय की डोर थाम,
वो व्यर्थ न करते कोई काम।
अनुशासन की उस भट्टी में,
तपकर ही पाते ऊँचा नाम।
हम कैसे अपनाएं?
छोड़ो कल की बातों को तुम,
आज का एक प्लान बनाओ,
छोटे-छोटे लक्ष्यों से ही,
बड़े ख्वाब को सच कर जाओ।
गिरते हैं पर हार नहीं मानते,
वो गिरकर उठना जानते।
हर ठोकर को एक सबक मान,
वो अपनी ताकत पहचानते।
हम कैसे अपनाएं?
डर को अपना दोस्त बना लो,
सीखने की प्यास जगाओ,
रुकना नहीं है रस्ते में,
बस चलते चले तुम जाओ।
शांत चित्त और ऊँची सोच,
सीख रहे हैं वो कुछ न कुछ रोज़।
खुद पर काबू, मन पर जीत,
यही है उनकी असली खोज।
हम कैसे अपनाएं?
थोड़ा ध्यान और थोड़ा मौन,
भीतर की आवाज़ सुनो,
सफलता की इस दुनिया में,
अपनी ही एक राह चुनो।
बदलो आदतें, बदलेगा जीवन,
चमकेगा तेरा भी कल का गगन।
मेहनत की स्याही से लिख दे,
गीत: 'मैं ही हूँ सबसे बेहतर'
मंज़िल की राहों में तू क्यों घबराता है?
दुनिया की बातों से क्यों डगमगाता है?
गर जीत का ताज पहनना है तुझे,
तो पहले ख़ुद को 'विजेता' बुलाना होगा।
हो दुनिया में तू कहीं भी खड़ा,
पर मन में तुझे सबसे बड़ा होना होगा।
संदेह के बादल जब तुझको घेरें,
जब अंधेरे तुझे अपना रास्ता न दें,
तब आँखों में वो चमक पालनी होगी,
हार को भी अपनी धमक दिखानी होगी।
शायद आज तू शिखर पर खड़ा नहीं,
पर दिखाने में कोई हर्ज तो पड़ा नहीं।
दिखा ऐसा कि तू ही सिकंदर है,
क्योंकि असली जंग तो तेरे अंदर है।
तू मान ले, तू जान ले, तू ही सबसे बेस्ट है,
ये ज़िंदगी बस एक छोटा सा टेस्ट है।
गर नहीं है यकीं ज़माने को तुझ पर, तो क्या?
तेरा खुद पर भरोसा ही तेरा असली रेस्ट है!
दिखा दे दुनिया को, कि तू ही बेस्ट है!
चैंपियन वही जो गिरकर संभल जाए,
जो खुद की नज़र में कभी न हार पाए।
दुनिया को दिखे तेरा फौलादी चेहरा,
चाहे दिल में डर का हो पहरा गहरा।
जब तू खुद को श्रेष्ठ मान लेगा,
वक्त भी तेरा लोहा मान लेगा।
तो उठ, संभल और शान से चल,
बदल जाएगा तेरा आज और कल।
तू है बेस्ट, बस ये याद रखना,
जीत की राह पर आबाद रहना।
🎵 गीत: जीवन की राह
बिना दिशा के बहती नैया, सागर की लहरों का मेल,
बिना लक्ष्य के ये जीवन है, बस इक अनचाहा खेल।
जिधर ले जाए लहरें तुझको, उधर ही बहता जाएगा,
बिना योजना के राही तू, राहों में खो जाएगा।
न इसमें कोई सृजन छिपा है, न ही कोई अर्थ यहाँ,
निरर्थक ही कट जाती साँसें, भटकता रहता मन कहाँ?
सच्ची खुशियाँ रूठ न जाएं, इस अनजानी धूल में,
संतुष्टि का फूल न खिलता, बिना लक्ष्य के शूल में।
जाग मुसाफिर देख सामने, अपनी मंजिल तय तो कर,
साहस के तू पंख लगा ले, उड़ तू अपनी राहों पर।
सार्थक होगा जीवन तेरा, जब तू खुद पतवार थामेगा,
जब लक्ष्य खड़ा हो आँखों में, तभी जमाना मानेगा।
अपना सूरज खुद बन राही, अपना अंबर खुद सजा,
लक्ष्य बनाकर जीने में ही, जीवन का है असली मजा।
रिश्तों का उत्सव, न कि कर्ज का बोझ
शादी है दो मन का मेल, दो कुनबों की नई कहानी,
इसे तमाशा मत बनाओ, समझो अपनी ज़िम्मेदारी।
सात फेरों की मर्यादा को, सादगी का हार पहनाओ,
दिखावे की इस अंधी दौड़ में, खुद को मत उलझाओ।
वह फूलों की सजावट भारी, वह लाखों का पकवान,
गर बाप का कर्ज बढ़ा दे, तो कैसा वह सम्मान?
सिर्फ एक दिन की चमक-धमक, और बरसों की उधारी,
क्या यही है नए जीवन की, सुंदर और शुभ तैयारी?
महंगे लहंगे, भारी गहने, बस कुछ पल की बात है,
असली गहना तो वह है, जो ताउम्र तुम्हारे साथ है।
रिश्ता जुड़ता है नीयत से, न कि बैंक बैलेंस देख कर,
खुशियाँ घर में आती हैं, आपसी प्रेम और चैन पाकर।
उठो युवाओं! नई सोच की, एक मशाल तुम थामो,
फिजूलखर्ची के शोर को, सादगी से तुम लगाम दो।
बचाओ वह धन उस कल के लिए, जो तुम्हें साथ बिताना है,
दुनिया को नहीं, बस एक-दूजे को खुश कर दिखाना है।
दो परिवारों का मिलन हो, मन में उल्लास गहरा हो,
दहेज और तामझाम से मुक्त, शादी का हर पहरा हो।
सादगी में ही सुंदरता है, सादगी में ही सार है,
सच्चा विवाह वही है, जहाँ बस निस्वार्थ प्यार है।
🎵 शीर्षक: विश्वास का सूरज
अंधियारी रातों से अब तू, डरना छोड़ दे राही,
मन के दीप जला ले खुद ही, कर ले अपनी गवाही।
विश्वास की लाली जब तेरे, अंतर्मन में छाएगी,
जीवन की यह काली रैन, पल भर में कट जाएगी।
ईश्वर का अंश है तुझमें, तू क्यों खुद को छोटा माने?
पूरी दुनिया महक उठेगी, तेरे ही नेक इरादे से।
बहुत कम हैं वो विरले जो, जग हित का स्वप्न सजाते हैं,
अपने भीतर के विश्वास को, कण-कण में फैलाते हैं।
बाधाएं तो आएंगी ही, पर्वत सा अडिग तू खड़ा रह,
लक्ष्य तेरा धुंधला न हो, अपनी जिद पर अड़ा रह।
सफलता का वो सूरज, बस चमकने ही वाला है,
तेरे सब्र की तपिश से ही, होने वाला उजाला है।
इतिहास उठाकर देख जरा, जो मुमकिन एक ने कर डाला,
वो सामर्थ्य है तुझमें भी, तू क्यों बैठा मतवाला?
जो काम किया इंसान ने, वो तू भी कर सकता है,
तू अपनी हिम्मत के बल पर, सागर भी भर सकता है।
बस विश्वास जगा ले...
खुद को पहचान ले...
विश्वास की लाली से ही, जीवन की रात कटेगी,
सफलता की नई सुबह, अब तुझसे ही बटेगी!
गीत: प्रगति का नया सवेरा
उठो युवा! अब आँखें खोलो, नूतन विहान आया है,
हाथों में तकनीक लिए, हमने संकल्प सजाया है।
कलम वही है, सोच नई है, कौशल का आधार लिए,
हम बढ़ चलें हैं भारत को, शिक्षा का उपहार दिए।
कोडिंग और डेटा की भाषा, अब हम सब पहचानेंगे,
एल्गोरिदम के तालों में, हम अपनी कुंजियाँ डालेंगे।
AI और रोबोटिक्स से, मुश्किल राह सजाएँगे,
डिजिटल इस दुनिया में, हम अपनी धाक जमाएँगे।
बदला है युग, बदली है पद्धति, हम भी कदम मिलाएँगे,
नवाचार की इस लहर में, हम आगे बढ़ते जाएँगे।
रटंत विद्या पीछे छूटी, अब कौशल का सम्मान है,
राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती— 'हुनर ही असली ज्ञान है'।
सिर्फ डिग्री की दौड़ नहीं, अब शोध (Research) का भी मान है,
बहुमुखी प्रतिभा ही अब, भारत की पहचान है।
किताबों के पन्नों से बाहर, अब दुनिया को हम देखेंगे,
प्रायोगिक इस शिक्षा से, हम अपनी किस्मत लिखेंगे।
प्राचीन हमारी संस्कृति है, पर आधुनिक विचार हमारे,
विश्व-गुरु के सिंहासन पर, फिर चमकेंगे सितारे।
आत्मनिर्भर भारत का सपना, आँखों में अब पल रहा,
विद्यार्थी का हर एक संकल्प, प्रगति की ओर चल रहा।
हम रुकेंगे नहीं, हम थकेंगे नहीं, यह शपथ आज हम लेते हैं,
नए युग की नई टेक्नोलॉजी को, अपना कौशल देते हैं।
गीत: अनजाना चेहरा
राहों में चलते-चलते, एक अजनबी मिल गया
खामोश था ये दिल मेरा, न जाने क्यूँ खिल गया
वो चेहरा है या नूर का कोई ढलता हुआ साया
खुदा ने बड़ी फुर्सत में, उसे है बनाया।
न नाम जानते हैं हम, न मंज़िल का पता है
मगर उस सादगी में, कुछ तो नशा है
जुल्फें जैसे बादलों की कोई गहरी घटा
उसे देख कर लगा, जैसे रुकी हो हवा।
वो अजनबी सा चेहरा, अब जान बन गया
मेरी अधूरी दास्तां का, वो उनवान बन गया।
उसकी आँखों की गहराई में, कायनात सारी है
वो सादगी भी देखो, कितनी हम पे भारी है
मुस्कुराए वो ज़रा सा, तो चाँद शर्मा जाए
उसकी खूबसूरती के आगे, हर रंग फीका पड़ जाए।
अजनबी होकर भी, वो रूह में समाने लगा
ये दिल अब बस उसी के, तराने गाने लगा।
शीर्षक: शिक्षा का असली सार
डिग्रियां तो बस कागज के टुकड़े हैं दीवारों पर,
अगर तुम में तमीज नहीं, अपनों और बेचारों पर।
मस्तिष्क में ज्ञान का अंबार भरा हो चाहे कितना,
सब व्यर्थ है, गर झुकना न आए संस्कारों पर।
पढ़ने का क्या लाभ, अगर वाणी में कड़वाहट हो?
लिखने का क्या मोल, अगर आचरण में सजावट हो?
विद्या वह है जो विनय दे, जो मानवता को जगाए,
न कि वह, जो अहंकार की नई राह दिखाए।
पुस्तकों के हर पन्ने को तुम भले ही रट लो,
गणित, विज्ञान और भूगोल को मुट्ठी में कर लो।
पर यदि पड़ोसी का दर्द तुम्हें महसूस न हो,
तो समझो कि तुम अभी 'अनपढ़' ही रह गए हो।
सद्व्यवहार वह दीया है, जो अंधेरों को मिटाता है,
पढ़ा-लिखा वही, जो सबके काम आता है।
शिक्षण की सार्थकता बस इसी बात में है—
कि इंसान, इंसानियत का धर्म निभाता है।
ज्ञान की ज्योति: आत्म-साधना
मन के कोरे कागज़ पर, इक दीप प्रेम का जलाओ तुम,
आत्म-साधना के पथ पर, बस एक कदम बढ़ाओ तुम।
नहीं कठिन यह राह कोई, न कोई पर्वत लाँघना है,
बस हर दिन थोड़े नेक विचारों को, मन के भीतर आँकना है।
जब प्रेरणा की किरणें अंतर में वास करेंगी,
तब आत्मा की ऊँचाइयाँ, खुद तुझसे बात करेंगी।
क्योंकि शक्ति का असली स्रोत, शस्त्रों में नहीं समाया है,
इस नश्वर जग में ज्ञान ही, बस एक अमर सी माया है।
इन्हीं विचारों की कोख से, अनूठे स्वप्न जनम लेते हैं,
जो जीवन के मरुस्थल को, फिर से हरियाली देते हैं।
बहुमुखी बनेगा व्यक्तित्व तेरा, जब सोच में होगा विस्तार,
सकारात्मकता की लहरों से, महकेगा तेरा संसार।
भर ले खुद को उन भावों से, जो नई दिशा दिखलाते हों,
अंधियारों को चीर के जो, सूरज तक ले जाते हों।
ललित मोहन शुक्ला ( कवि)
गीत: एक ही नूर के सितारे
विविध रंग की कलियाँ हैं पर, गुलशन तो एक ही है,
राहें चाहे कितनी हों, मंज़िल तो एक ही है।
इंसानियत का पाठ पढ़ाए, हर मज़हब की वाणी,
सबके भीतर बहती देखो, एक ही अमृत वाणी।
कहीं गूँजती शंख ध्वनि है, कहीं अज़ान की तान,
ईश्वर अल्लाह नाम अलग हैं, एक ही है भगवान।
मंदिर की उस मूरत में भी, वही नूर है झलका,
मस्ज़िद की उस पावन सफ में, अक्स उसी का छलका।
गुरुवाणी का त्याग और 'सेवा' का पावन जज़्बा,
ईसा मसीह की करुणा कहती, प्रेम ही सबसे सच्चा।
गुरुद्वारे की लंगर सेवा, चर्च की वो प्रार्थना,
सबका मकसद एक ही है—दुखिया की आराधना।
बुद्ध की शांति, महावीर की अहिंसा मन में धारें,
परम सत्य की खोज में हम सब, अपनी नफ़रत वारें।
रहीम, कबीर और नानक ने भी, एक ही बात कही थी,
मानव की जो सेवा कर ले, सबसे बड़ी वही थी।
सर्व धर्म समभाव की माला, भारत की है शान,
मज़हब जोड़ें, दिल न तोड़ें, यही हमारा मान।
एक ही मिट्टी, एक ही पानी, एक ही हम सबका सार,
आओ मिलकर बाँटें जग में, बस खुशियाँ और प्यार।
शिखर की राह: अटूट प्रयास
बनी-बनाई लीक तजकर, जो नया मार्ग बनाता है,
वही थकावट के मरुथल में, शीतल निर्झर पाता है।
काम वही जो प्राण फूँक दे, जड़ता की दीवारों में,
सृजन वही जो चमक छोड़ दे, वक़्त के गलियारों में।
नवाचार का दीप जलाकर, अंधियारे को मात दो,
परिवर्तन की इस आँधी में, तुम प्रगति का साथ दो।
क्या है? क्यों है? कैसे होगा?—प्रश्न हृदय में पलने दो,
शोध की पावन अग्नि में, तुम संशयों को जलने दो।
अनुसंधान की दृष्टि मिले तो, कंकड़ भी हीरा होता है,
मथता है जो ज्ञान-सिंधु को, अमृत बस वही पाता है।
रुके न जो, थके न जो, सीखने की वह प्यास बनो,
बीते कल से बेहतर होने का, तुम एक अटूट विश्वास बनो।
शिक्षा केवल पाठशाला नहीं, यह सतत एक साधना है,
हर अनुभव से नया सीखना, जीवन की आराधना है।
तुम छात्र रहो उम्र भर, तो हर दिन एक सवेरा है,
सीखना छोड़ा जिस दिन तुमने, समझो वहीं अंधेरा है।
उठो कि तुमको गढ़ना है, एक नया ही प्रतिमान यहाँ,
मेहनत और नित शोध से, छूना है आसमान यहाँ।
कर्म ही तेरी पूजा हो, और ज्ञान ही तेरा मर्म रहे,
नवाचार की इस यात्रा में, सफल तुम्हारा धर्म रहे।
सावधान! 'डंडा' उत्सव जारी है
सुनो ओ मजनू, सुनो ओ रांझा, थोड़ा होश में आओ,
लाल गुलाब थामने से पहले, अपना बीमा कराओ।
ये पेरिस की गलियां नहीं, ये अपना देसी ठाठ है,
यहाँ हर झाड़ी के पीछे, बजरंगियों का ठाठ है!
लाल शर्ट को त्याग कर, तुम भगवा चोला धारो,
हाथ में डंडा रखो बड़ा, और 'जय-जयकार' पुकारो।
अगर दिख जाओ पार्क में, तो प्रेमी मत कहलाना,
"सर्वेक्षण करने आया हूँ"—ये कहकर बच निकलना।
पकड़े जाओ जो हाथ पकड़े, तो घबराना बिल्कुल नहीं,
कह देना "बहन है मेरी, गिर रही थी ये यहीं!"
राखी की एक डोली, जेब में अपनी तुम रखना,
कुटाई होने वाली हो, तो "भैया" कह के बचना।
मॉल-सिनेमा रिस्की हैं, वहां 'गार्ड' की पैनी नजर है,
पार्क के बेंच पर बैठना, समझो मौत का सफर है।
सबसे सुरक्षित जगह वही, जहाँ 'माता का जगराता' हो,
भजन गाते हुए मिलो, तो कौन तुम्हें पीट पाता हो?
टेडी-वियर मत लेना भाई, दूर से ही वो दिखता है,
कद्दू लेकर जाओ घर, वो तो सब्जी में बिकता है।
चॉकलेट के उस डब्बे पर, 'पतंजलि' का स्टीकर लगाओ,
शुद्ध देसी प्यार का, तुम चूर्ण सबको खिलाओ।
प्रेम करो तो छुप-छुप कर, या घर में रजाई ओढ़ो,
वरना बाहर जो निकले, तो अपनी हड्डियां जोड़ो।
वैलेंटाइन तो आएगा, और फिर चला भी जाएगा,
पर पिछवाड़े का वो नीला दाग, हफ़्तों तुम्हें सताएगा!
शीर्षक: मुसाफिर का हौसला
धूप है अगर तो छांव भी आएगी,
रात गहरी है तो सुबह भी मुस्कुराएगी।
जीवन और मृत्यु तो बस दो किनारे हैं,
लहर जो उठी है, वो फिर किनारे लग जाएगी।
ओ मुसाफिर, तू हौसला न हार,
मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।
मिट्टी का ये चोला है, मिट्टी में मिल जाना है,
पर जाने से पहले तुझे, अपना दीप जलाना है।
सांसों की गिनती पर तेरा अधिकार नहीं,
पर कर्मों की गूंज का कोई अंत पार नहीं।
कायर डरते हैं अंत से, तू शूरवीर बन जा,
हर पल को जी ऐसे, कि तू तस्वीर बन जा।
ओ मुसाफिर, तू डर का कर संहार,
मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।
पतझड़ में जो गिरते पत्ते, वो दुख नहीं मनाते,
नए बसंत की आहट में, वो चुपचाप खो जाते।
मृत्यु कोई शत्रु नहीं, ये तो बस एक द्वार है,
पुराना वस्त्र तजकर, मिलता नया श्रृंगार है।
जब तक है ये धड़कन, तू जीत का गीत गा,
मुश्किलों की छाती पर, अपनी छाप छोड़ जा।
ओ मुसाफिर, तू मत मान अपनी हार,
मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।
ना कोई यहाँ आया सदा के लिए,
ना कोई रुकेगा यहाँ वफ़ा के लिए।
बस यादें रह जाती हैं खुशबू की तरह,
तू जी ले ये लम्हा, इक खुदा के लिए।
"समय का पारखी"
समय की रेत मुट्ठी से, फिसल जाए तो क्या होगा?
जो अवसर हाथ से निकला, निकल जाए तो क्या होगा?
न कोई मंत्र चलता है, न कोई तंत्र चलता है,
समय की चाल के आगे, न कोई यंत्र चलता है।
वही है श्रेष्ठ ज्ञानी जो, समय की नब्ज़ पढ़ लेवे,
धनुष पर बाण रख कर जो, सही क्षण लक्ष्य गढ़ लेवे।
विजेता वही जिसने व्यर्थ, एक पल भी न खोया है,
उसी ने फसल काटी है, जिसने समय पर बोया है।
सीखने की कलाओं में, यही है कला सर्वोत्तम,
समय को जान ले जो भी, वही बनता है 'पुरुषोत्तम'।
शिखर की पुकार
नभ को छूना ही बस केवल, पुरुषार्थ नहीं कहलाता है,
धरा-धूल से उठने वाला, ही असली वीर कहाता है।
सफलता की उन ऊँचाइयों पर, जो कभी न फिसला हो,
वो क्या जाने उस हिम्मत को, जो गिरकर संभलकर आता है।
हमारी महानता इसमें नहीं, कि हम कभी न गिरें,
अपितु इसमें है कि हर बार, गिरकर फिर से उठ पड़ें।
अँधेरा घना हो पथ पर अगर, और पाँव लड़खड़ा जाए,
थक कर चूर हों राहें, जब मन भी घबरा जाए,
विजेता वो नहीं जो सदा, फूलों की राह पर चलता रहा,
अतुलनीय है वो जो काँटों से, लड़कर फिर मुसकाए।
चोट जितनी गहरी होगी, संकल्प उतना दृढ़ होगा,
टूटे हुए हर सपने से ही, नया सवेरा सिद्ध होगा।
गिरना तो बस एक विराम है, अंत नहीं है जीवन का,
मिट्टी से ही जन्म हुआ, तो धूल से कैसा डरना?
उठो कि तुम्हारी रगों में, लहू नहीं एक आग है,
हार कर रुक जाना ही, बस असली एक दाग है।
जितनी बार भी गिरो तुम, उतनी बार नए हो जाओ,
क्योंकि राख से उठने वाला ही, जग का असली भाग है।
ललित मोहन शुक्ला ( कवि, लेखक व ब्लॉगर)
गीत: लकीरों से आगे
हथेली की इन उलझी सी लकीरों में क्या ढूंढता है?
किस्मत के बंद पन्नों में तू अपना कल क्या पूछता है?
ये रेखाएं तो बस हाथ का एक नक्शा मात्र हैं,
मंजिल उन्हें मिलती है, जिनका हौसला ही शस्त्र है।
कहते हैं लोग कि भाग्य में जो लिखा है, वही होगा,
पर बिना बोए बीज के, क्या कोई खेत कभी हरा होगा?
कर्म की छेनी उठा, और खुद अपनी मूरत गढ़,
बैठ मत किनारे पर, तू लहरों के सीने पर चढ़।
मिटा दे वो लकीरें जो तुझे पीछे खींचती हैं,
मेहनत की बूंदें ही सूखी मिट्टी को सींचती हैं।
सूरज की किस्मत में भी ढलना लिखा होता है,
पर फिर से उगने के लिए उसे जलना होता है।
सफलता कोई इत्तेफाक नहीं, एक लंबा सफर है,
हार कर न रुकना, बस यही जीत का हुनर है।
हाथ की रेखाएं थक कर शायद मिट भी जाएं,
पर कर्म के पदचिह्न इतिहास में अमर हो जाएं।
मुट्ठी को भींच, बाजुओं में जोर भर,
लकीरों का मोह छोड़, तू कर्म पर गौर कर।
भाग्य भी घुटने टेकेगा तेरे जुनून के आगे,
जब तू थामेगा अपनी तकदीर के धागे।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
मॉल का मायाजाल और महंगाई का कमाल
चमक-दमक का दरिया है, नाम इसका 'मॉल' है,
अंदर घुसते ही लगता, जैसे कोई तिलिस्मी हॉल है।
एसी की ठंडी हवा में, महंगाई मुस्कुराती है,
मध्यम वर्ग की जेब को, धीरे से सहलाती है।
एक के साथ एक फ्री का, बोर्ड वहां टंगा है,
सस्ता जो दिख रहा है, असल में वही महंगा है।
सब्जियां भी वहां देखो, 'मेकअप' करके बैठी हैं,
एसी में रहकर आलू भी, थोड़ी अकड़ में रहती हैं।
ढाई सौ का पॉपकॉर्न खाकर, पेट कहता—"धोखा है",
पर स्टेटस सिंबल बचाने का, यही सुनहरा मौका है।
थैले में सामान कम, और बिल लंबा आता है,
मॉल से बाहर निकलते ही, बंदा सर खुजलाता है।
क्रेडिट कार्ड की ताकत पर, हम सीना तान चलते हैं,
अगले महीने किश्तों की, आग में हम जलते हैं।
बीवी खुश है ब्रांड देख, बच्चे खुश हैं गेम में,
मध्यम वर्ग की इज्जत अटकी, बस एक 'शोरूम' के फ्रेम में।
सादगी: सहज पर कठिन साधना
सहज दिखना, सरल होना, बड़ी तपस्या है,
भीड़ में खुद को न खोना, बड़ी तपस्या है।
कहने को तो सादगी जीवन की कुंजी है,
पर इसे ही ओढ़ पाना, बड़ी तपस्या है।
दिखावों के इस जंगल में, हर कोई शोर करता है,
कि जो जितना तड़क-भड़क, वही उतना उभरता है।
तमाम आडंबरों को तज के, मौन को अपनाना,
अहंकार की परतों को, धीरे-धीरे ढहाना।
बिना आभूषणों के भी, मन को चमकाना,
सत्य की राह पर खुद को, अडिग रख पाना।
महल बनाना तो फिर भी, शायद आसान होता है,
सादगी की कुटिया में, चैन का अरमान होता है।
जटिलता है मन के भीतर, ईर्ष्या और लोभ में,
फंसे हैं सब यहाँ, बस 'अधिक' के ही क्षोभ में।
त्याग कर सब बाहरी, जो भीतर को संवार ले,
वही असल में जीवन की, हर बाजी को मार ले।
सरल होना सरल नहीं, यह तो आग का दरिया है,
खुद से खुद को मिलाने का, यही बस एक जरिया है।
गीत: खुशियों का कारवां
धम-धम बाजे ढोल सुहाने, महक रही है शाम,
खुशियों की इस महफ़िल में अब, लो ईश्वर का नाम।
बैंड बजा है, शोर मचा है, झूम रहा संसार,
जीवन के हर एक पल में अब, भर लो बस तुम प्यार!
हो... बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग,
जी लो हर पल ऐसे जैसे, उड़ती पतंग के संग!
बीत गया जो कल था मुश्किल, उसे भुलाकर देखो,
आने वाले सुनहरे पल की, राह सजाकर देखो।
रिश्तों की ये शहनाई अब, मधुर राग सुनाती है,
हर धड़कन में एक नई सी, आस जगाकर जाती है।
चमक उठी है राहें सारी, बिखरा है सिंदूरी रंग,
बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग!
कोई न छोटा, कोई न बड़ा, सब नाचें एक ताल पे,
हंसी के गुलाल मल लो तुम, आज अपने गाल पे।
छोटी-छोटी खुशियां ही तो, असली पूंजी होती हैं,
मुस्कुराहटें चेहरे पर ही, सबसे सुंदर सोती हैं।
झूम के गाओ, धूम मचाओ, छोड़ो सारी जंग,
बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग!
नाचो... गाओ... खुशियां मनाओ!
क्योंकि ये पल फिर न आएगा,
ये शोर ही तो सन्नाटों को, जीना सिखाएगा!
बैंड, बाजा और जीवन... सदा रहे ये संग!
वाणी: हृदय का दर्पण
वाणी में वो शक्ति है, जो पत्थर को पिघला दे,
मुरझाए हुए चेहरों पर, मुस्कान नई खिला दे।
यह वो अनमोल रत्न है, जो बिन दाम बिकता है,
शख्सियत का असली चेहरा, शब्दों में ही दिखता है।
मीठी वाणी अगर हो, तो जग अपना बन जाता है,
कड़वाहट के काँटों में भी, फूल खिल जाता है।
कोयल की उस कूक जैसी, जो कानों में अमृत घोले,
इंसान वही महान यहाँ, जो तौल-नाप कर बोले।
बिना धार की तलवार है यह, घाव गहरा कर देती है,
कभी बुझते हुए दीपों में, विश्वास नया भर देती है।
शब्दों के बाण संभल कर छोड़ो, ये लौट कर नहीं आते,
कहे हुए अपशब्द अक्सर, उम्र भर का दर्द दे जाते।
सत्य की शक्ति हो जिसमें, और प्रेम का भाव भरा हो,
वही वाणी सार्थक है, जिसमें सबका हित हरा हो।
तोड़ने के बजाय, जो दिलों को जोड़ना सीखे,
सच्चा मानव वही, जिसकी बातों में मिश्री घुली दिखे।
स्वयं का अर्पण: समाज सेवा की राह
हाथ थामें गिरते हुओं का, यही तो सच्ची सेवा है,
बिन स्वार्थ के कर्म करें, यही फल का मेवा है।
तन से कर लो मदद किसी की, रस्ता पार करा देना,
बीमारों की सेवा करके, उनके चेहरे को चमका देना।
गंदगी हटाकर राहों से, तुम सुंदर देश बना सकते हो,
बूढ़े माता-पिता के संग, कुछ पल तुम बिता सकते हो।
पास है जो ज्ञान तुम्हारे, उसको बाँटो अज्ञानों में,
शिक्षा की एक जोत जला दो, निर्धन के भी प्राणों में।
एक कलम और एक किताब, तकदीरें बदल सकती है,
समाज के अंधेरों को, ये मशाल ही छल सकती है।
भूखे को तुम भोजन दे दो, प्यासे को तुम पानी,
जरूरत से जो ज्यादा है, वो दान करो है दानी।
रक्त दान महादान है, जीवन किसी का बचाएगा,
तेरा दिया हुआ इक तिनका, किसी का घर बसाएगा।
"छोटा सा ही सही, पर एक प्रयास जरूरी है,
मानवता को बचाने के लिए, समाज सेवा जरूरी है।"
गीत: जीवन की डोर
धड़कनों ने सुनी है धड़कनों की सदा,
तू मिला तो मुकम्मल हुई हर दुआ।
धूप हो या ढले शाम की परछाइयाँ,
अब तेरे दम से रोशन है तन्हाइयाँ।
जीवन की डोर से बाँध लिया है तुझे,
कि अब हर मौसम में जीना है संग तेरे।
कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम,
पर जो भी मिले, बाँट लेंगे हम और तुम।
कभी जो पलकें भीग जाएँ तुम्हारी,
उनमें उतर आएगी उदासी हमारी।
हँसी की लहर बनके मैं आऊँगा,
तेरे लबों पे महक बन के छा जाऊँगा।
रिश्ता ये गहरा है, बातों से भी ज्यादा,
साथ निभाने का है रूह का वादा।
कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम...
जहाँ राहें मुड़ेंगी, वहाँ हाथ थामना,
वक्त की साजिशों से कभी न हारना।
मिले जो अंधेरे, तो दीया बन जलेंगे,
काँच के रास्तों पे भी संभल कर चलेंगे।
डोर ये अटूट है, साँसों की कसम,
मिट जाएंगे फासले, रह जाएगी वफ़ा हरदम।
कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम...
हाथों में हाथ है, दिल में तेरा नाम,
तुझसे शुरू है मेरी सुबह, तुझपे ही शाम।
जीवन की डोर... बस तेरे ही नाम।
गीत: "वादा रहा"
धड़कनों की इस ज़मीं पर, ख्वाब हम बोते रहे
खुद से वादा था न रोएंगे, मगर रोते रहे।
पर मिले जो तुम तो जैसे, मिल गई अपनी डगर
अब न खुद से, अब न तुमसे, हम जुदा होंगे मगर।
हाँ... वादा रहा, ये वादा रहा
संग चलेंगे हर सफर, ये वादा रहा।
आइने में देख खुद को, मुस्कुराना है मुझे
बिखरे हुए उन कांच के, टुकड़ों को सजाना है मुझे।
धूप हो या छाँव हो, हारूँगा न मैं ये कसम
हार कर भी जीत की, राहों को पाना है मुझे।
खुद की खुशियों का अब मैं, खुद ही सहारा बनूँगा
डूबती कश्ती का अपनी, खुद किनारा बनूँगा।
मेरी आँखों में तुम्हारा, अक्स ठहरा रहे सदा
जैसे सावन के महीने, कोई गहरा मेघ हो।
तुम जो आए तो महक उठी, मेरी वीरान सी गली
जैसे पतझड़ के बाद, कोई खिलती हुई कली।
तेरी ख़ुशी में अब मेरी, ज़िंदगी का रंग है
तुम जहाँ भी हो, ये मेरा दिल तुम्हारे संग है
वक्त की इन लहरों पर, नाम हम लिखेंगे अपना
पूरा होगा अब हमारा, हर अधूरा सा सपना।
खुद से वादा है कि खुद को, और न तड़पाएंगे
और तुमसे वादा है कि, लौट कर फिर आएंगे।
हाँ... वादा रहा, ये वादा रहा
अटूट प्रेम का ये असर, ये वादा रहा।
नामीबिया का 'सूर्या' नमस्कार
भारत की टोली उतरी थी, जैसे करने आई हो पिकनिक,
नामीबिया के माथे पर थी, हार की गहरी शिकन इक।
सिक्का उछला, किस्मत चमकी, भारत ने चुनी बल्लेबाजी,
नामीबिया के गेंदबाजों की होने वाली थी अब ऐसी-तैसी।
छक्कों की बरसात, बेचारे नामीबियाई जज्बात
ओपनर आए ऐसे, जैसे चौके-छक्कों की भूख लगी हो,
नामीबियाई फील्डरों को लगा, जैसे पैरों में झोंक लगी हो।
कोई गेंद गई स्टैंड्स में, कोई पहुँची पार्क के बाहर,
बेचारा गेंदबाज सोच रहा— "क्या मैं ही मिला था यार?"
सूर्य ने चमकाया बल्ला, जैसे दोपहर की धूप कड़क,
गेंदबाज ढूंढ रहे थे मैदान में छिपने की सड़क।
इधर बल्ला घुमा, उधर नामीबिया का दिल धड़का,
स्कोरबोर्ड ऐसे भागा, जैसे कोई रॉकेट तड़का।
नामीबिया की पारी: 'आया राम, गया राम'
जब बारी आई नामीबिया की, तो दिखा असली तमाशा,
बल्लेबाजों के चेहरों पर थी, 'जल्द पवेलियन लौटने' की आशा।
बुमराह की यॉर्कर ने उड़ाईं उनकी गिल्लियाँ,
जैसे किसी भूखे शेर के सामने नाच रही हों बिल्लियाँ।
वरुण ने ऐसी फिरकी डाली, बल्लेबाज हो गया कन्फ्यूज,
नामीबिया का सारा जोश, मिनटों में हो गया फ्यूज।
मैच था या मज़ाक? यह समझ न पाया कोई,
नामीबिया की उम्मीदें, बाउंड्री लाइन पर जाकर सोईं।
जीत का जश्न
जीत तो पक्की थी ही, बस रस्म की थी देरी,
नामीबिया ने हाथ मिलाया, बोली— "किस्मत थी अंधेरी।"
भारत पहुँच गया अगले दौर में, लेकर बड़ी शान,
नामीबिया वाले बोले— "शुक्र है, बच गई हमारी जान!"
गीत: "अमिट यादें, अटूट साहस"
चला गया जो दीप जलाकर, यादों की झिलमिल छांव में,
नमन उन्हें है बारम्बार, बसे जो ईश्वर के गांव में।
माना विरह की रात बड़ी है, नयनों में आंसू भारी हैं,
पर उनकी सीख और उनके आदर्श, अब तुम्हारी जिम्मेदारी हैं।
जीवन का यह सत्य कठिन है, जो आया है वो जाएगा,
पर उनके व्यक्तित्व का दर्पण, हर पल साथ निभाएगा।
उनका हंसना, उनका कहना, जैसे कोई मीठी तान,
पहुंच गए उस लोक में वे, जहाँ मिलता सबको विश्राम।
पुष्प चढ़ाकर विदा करें हम, मन में गौरव भाव लिए,
धन्य हुआ यह आँगन सारा, जितने पल वे संग जिए।
मत टूटो तुम, देख रहे हैं, वे अंबर की ऊँचाई से,
हिम्मत मांग रहे हैं तुमसे, अपनी ही परछाई से।
तुम ही उनकी शक्ति रहे हो, तुम ही उनका स्वाभिमान,
तुम्हें संभलते देख मिलेगी, उनकी आत्मा को मुस्कान।
पर्वत सा साहस रखना तुम, वक्त ये भी ढल जाएगा,
उनका आशीष साये बनकर, हर मुश्किल में बचाएगा।
जाते-जाते सिखा गए वे, कैसे जग में जीना है,
अमृत यादें छोड़ गए वे, विष अब हमको पीना है।
शांति मिले उस पुण्य आत्मा को, प्रभु चरणों में स्थान मिले,
धैर्य और विश्वास रहे संग, परिवार को वह वरदान मिले।
महा-संग्राम: बल्ला, गेंद और ब्लड प्रेशर
फरवरी की पंद्रह तारीख, दिल धक-धक डोलेगा,
मैदान में जब इंडिया-पाक का 'कोहिनूर' बोलेगा।
खिलाड़ियों के मन में चल रही ऐसी 'खिचड़ी' भाई,
जैसे बिना तैयारी के बोर्ड की परीक्षा है आई!
भारतीय धुरंधर सोच रहे— "भैया, बस जीरो पे न छूटना,"
वरना घर जाते ही होगा सोशल मीडिया पे कूटना।
पाकिस्तानी गेंदबाज दुआ मांग रहे— "बस नो-बॉल न हो जाए,"
कहीं मैच हारने के बाद, टीवी फिर से न टूट जाए!
एक तरफ 'शॉट सिलेक्शन' की चलती गहरी माथापच्ची,
दूजी तरफ 'फील्डिंग' में छूटती गेंदें जैसे हों कच्ची।
बैट्समैन सोचता— "छक्का मारूँ या सिंगल पे भागूँ?"
बॉलर सोचे— "यार्कर डालूँ या डर के मारे जागूँ?"
इधर भारत में भक्तों ने, 'हवन' का धुआँ फैलाया है,
ऑफिस से 'सिक लीव' लेकर, खुद को सोफे पर बिठाया है।
उधर पाकिस्तान में भी उम्मीदों का 'चंदा' मामा जागा है,
पर बैकअप में सबका, पुराना वाला 'जज्बाती' धागा है।
जीते तो "जय हो!", हारे तो "पिच में ही खराबी थी,"
हर फैन के पास हार की, एक रेडीमेड चाबी थी।
मैच चाहे टी-20 हो या फिर गली का खेल,
इंडिया-पाक के मैच में तो, बस प्यार-तकरार की रेल!
गीत: सत्य ही शिव है
ओम् नमः शिवाय, ओम् नमः शिवाय,
सत्य की शक्ति, शिव की काया, सुंदर जग की माया।
सत्यम शिवम सुंदरम, गूंजे ये मंत्र महान,
कण-कण में शंकर बसे, कण-कण में भगवान।
जटा में गंगा, भाल पे चंदा, गले मुंड की माला,
नीलकंठ ने जग हित में, पी लिया विष का प्याला।
वैरागी वो, अवढरदानी, श्मशान जिनका वास,
भस्म रमी है अंग पे उनके, फिर भी ज्योति प्रकाश।
शिवरूप निराला, जग का उजाला, करते सब का कल्याण,
सत्यम शिवम सुंदरम, गूंजे ये मंत्र महान।
शक्ति संग जब शिव मिलते हैं, सृष्टि जीवन पाती,
अर्धनारीश्वर रूप धरे वो, जग की प्रीति जगाती।
श्रद्धा से जो अर्पण कर दे, तीन दल का बेल पत्र,
कट जाते हैं जन्म-जनम के, मोह-माया के सत्र।
अशोक सुंदरी, कार्तिकेय, गणपत, शिव का है परिवार,
सत्यम शिवम सुंदरम, गूंजे ये मंत्र महान।
आई महाशिवरात्रि पावन, जागो भक्त सुजान,
अंधकार से ज्योति की ओर, बढ़ो तज कर अभिमान।
शिव ही सत्य, शिव ही शाश्वत, शिव ही सुंदर भाव,
भवसागर से पार करा दे, शिव की भक्ति की नाव।
अगम, अगोचर, अनादि, अनंत, शंकर अंतर्यामी,
सत्यम शिवम सुंदरम, गूंजे ये मंत्र महान।
जो सत्य है, वही कल्याणकारी (शिव) है,
और जो कल्याणकारी है, वही सबसे सुंदर है।
सत्यम... शिवम... सुंदरम...
त्याग और प्रेम की अमर कहानी
रोम देश की कथा पुरानी, एक राजा था अभिमानी,
नाम था उसका क्लॉडियस, जिसकी क्रूरता थी सबने जानी।
कहा उसने— "सैनिक मेरे, शादी कभी न रचाएंगे,
बिना प्रेम और मोह के बंधन, युद्ध भूमि में जाएंगे।"
पर उसी नगर में रहते थे, पादरी वेलेंटाइन पावन,
जिनके दिल में बसता था, प्रेम का निर्मल सा सावन।
राजा का आदेश ठुकराकर, गुप्त विवाह करवाते थे,
बिछड़े हुए प्रेमियों को वे, एक डोर में लाते थे।
जब सम्राट को खबर हुई, तो चढ़ा क्रोध का पारा था,
कारागार में डाल दिया, जो सत्य का प्यारा था।
जेल की उन दीवारों में, एक नया सवेरा आया,
जेलर की अंधी बेटी ने, वहाँ प्रेम का दर्पण पाया।
श्रद्धा और दुआओं से उसकी, आँखों में रोशनी आई,
मृत्यु पूर्व वेलेंटाइन ने, एक पाती वहाँ लिखवाई।
लिखा— "तुम्हारा वेलेंटाइन", अंतिम विदा का पैगाम दिया,
प्यार की खातिर सूली चढ़कर, अपना सब कुछ नाम किया।
वही तारीख चौदह फरवरी, आज तलक हम गाते हैं,
त्याग और विश्वास के दीप, हर दिल में जलाते हैं।
यह पर्व नहीं बस तोहफों का, न केवल इकरार का,
वेलेंटाइन डे साक्षी है, निस्वार्थ और सच्चे प्यार का।
🎵 गीत: प्रेम ही आधार है
नफरत की इस भीड़ में, शीतल छाँव है प्रेम,
भटके हुए राही का, पावन गाँव है प्रेम।
सृष्टि के कण-कण में जो, संगीत सजाता है,
मुरझाए हुए गुलशन को, फिर से हँसाता है।
शस्त्र नहीं कर पाते जो, वो काम प्रेम करता है,
पत्थर जैसे दिल में भी, संवेदना भरता है।
ये ढाल है उस वक्त की, जब तूफाँ घेर लेते हैं,
अंधेरे भी दिए की लौ के आगे, हार मान लेते हैं।
प्रेम ही वो शक्ति है, जो पर्वत को झुका दे,
असंभव को भी पल भर में, संभव कर दिखा दे।
काँटों भरी राहों में, ये फूल बिछाता है,
सूखे हुए सावन में, ये मेघ ले आता है।
सुरक्षित है वही जीवन, जहाँ अनुराग का पहरा,
रिश्तों की गहराई में, है प्रेम रंग गहरा।
बिन प्रेम के ये जग सारा, सूना एक मरुथल है,
प्रेम के संग ही जीवन, सुंदर और निर्मल है।
छोड़ दो सब बैर-भाव, अब प्रीत की रीत निभाओ,
टूटे हुए हर मन में, तुम विश्वास जगाओ।
यही धर्म है सबसे बड़ा, यही सत्य की वाणी,
प्रेम से ही अमर हुई, जग की हर इक कहानी।
तो उठो और बाँटो इसे, ये कम नहीं होता,
प्रेम बोने वाला कभी, अकेला नहीं सोता।
प्रेम ही आधार है, प्रेम ही है किनारा,
प्रेम से ही महकेगा, ये सुंदर जग सारा।
अपेक्षा: जन-गण-मन की पुकार
वो नेता नहीं, बस एक नाम चाहिए,
जो देश के काम आए, वो इंसान चाहिए।
कुर्सी के मोह से ऊपर जिसका ईमान हो,
जिसकी रगों में भारत का स्वाभिमान हो।
हमें ऊंचे भाषणों की अब प्यास नहीं है,
झूठे वादों पर अब हमें विश्वास नहीं है।
हमे तो वो चाहिए, जो दर्द को पहचान ले,
भीड़ में खामोश खड़ी, उस गर्द को पहचान ले।
कैसा हो हमारा नायक? * वाणी में संयम, कर्मों में धार हो, हर गरीब की थाली का, वो आधार हो।
* नफरत की दीवारों को, जो ढहा सके, अनेकता में एकता की, जो अलख जगा सके।
* युवाओं के सपनों को, जो पंख दे सके, भ्रष्टाचार की जड़ों पर, जो डंक दे सके।
वो ऊंच-नीच के भेदों से, बिल्कुल परे हो,
जिसका हृदय बस राष्ट्र-प्रेम से ही भरे हो।
जो सीमाओं पर सजग, और अपनों में सरल हो,
जो पी जाए समाज का, सारा हलाहल-विष हो।
अपेक्षा बस इतनी, कि वो सड़कों की धूल समझे,
देश की हर बेटी को, वो खिलता हुआ फूल समझे।
जब उठे हाथ उसके, तो बस न्याय की खातिर,
सच्चा नेता वही, जो जिए बस लोक की खातिर।
फरवरी की गर्मी और खिलाड़ियों की 'नर्मी'
फरवरी की इस शाम में, पारा थोड़ा चढ़ गया,
पड़ोसी का पुराना जख्म, फिर से थोड़ा बढ़ गया।
ईशान किशन ने जब बल्ला भांजा, नसीम शाह घबराए,
ऐसा लगा कि वर्ल्ड कप में, वो सिर्फ टहलने आए।
खिलाड़ियों का जलवा (या हलवा?)
सूर्या खड़े थे क्रीज़ पर, जैसे अंगद का हो पैर,
पाकिस्तानी फील्डरों की, आज तो नहीं थी खैर।
बाबर मियां ने कैच छोड़ा, फिर आसमान को देखा,
शायद ढूंढ रहे थे उसमें, अपनी किस्मत की रेखा!
रिज़वान जी की कीपिंग थी, या कोई 'डांस स्टेप' नया,
हर गेंद पर वो कूदे ऐसे, जैसे पीछे पड़ा हो गया।
बुमराह ने जब यॉर्कर डाली, गिल्लियां गई थीं टूट,
पड़ोसी बल्लेबाज बोले— "भाई, ये तो है सरासर लूट!"
ईशान ने जब छक्का मारा, स्वैग था उनका भारी,
पाकिस्तानी फैंस बोले— "ये है कुदरत की मार करारी।"
शाहीन की वो तेज़ गेंदें, आज फुलटॉस बन रही थीं,
भारतीय बल्लेबाजों की तो, लॉटरी ही निकल रही थी।
टीवी के शोरूम वाले, फिर से खुशियां मनाएंगे,
क्योंकि सरहद पार आज, फिर से 'पटाखे' (टीवी) फूट जाएंगे।
मैच खत्म हुआ तो बोले— "पिच में थोड़ी खराबी थी,"
पर सच तो ये है कि जीत की, इंडिया के पास ही चाबी थी।
ईशान का 'किशन' अवतार: टी20 वर्ल्ड कप 2026
मैदान में गूंजा जब ईशान का नाम,
पाकिस्तानी गेंदबाजों का तमाम हुआ काम।
क्रीज पर खड़ा था वो छोटा सा शेर,
अफरीदी और नसीम को कर दिया ढेर!
अर्धशतक मारा जैसे बिजली गिरी,
पड़ोसियों की सारी अकड़ भी गिरी।
गेंद जा रही थी सीधा सीमा पार,
बाबर बोले— "भाई, ये क्या है अत्याचार?"
* पहली गेंद: छक्का गया चांद के पार,
* दूसरी गेंद: रिजवान बोले, "यार, अब की बार!"
* तीसरी गेंद: ईशान ने फिर बल्ला घुमाया,
* चौथी गेंद: हारिस रऊफ को नानी याद आया!
पचासा जड़ा सबसे तेज, रचा इतिहास,
पाकिस्तानियों के चेहरे पर बस छाई थी यास (उदासी)।
मैन ऑफ द मैच की जब मिली ट्रॉफी,
बोले किशन— "अभी तो ये शुरुआत है, इतनी नहीं काफी!"
मजा चखाया ऐसा कि दुनिया है दंग,
उड़ गए पाकिस्तान के जीत के पतंग।
ईशान के बल्ले ने मचाई ऐसी खलबली,
कराची से लाहौर तक मच गई खलबली!
शील और संस्कार
आचरण ही दर्पण है, जो कुल का मान बताता है,
पुरखों के संस्कारों को, व्यवहार सामने लाता है।
जैसा कर्म और पद्धति, वैसा ही वंश का नाम,
चरित्र ही परिभाषित करता, कैसा है कुल-धाम।
वाणी में जो मिठास है, वो माटी की पहचान,
भाषा ही बतलाती है, क्या है तेरा देश महान।
शब्दों के चयन से खुलती, संस्कृति की सब परतें,
बोल ही दे जाते हैं, तेरे वतन की सब शर्तें।
आदर और सत्कार जो, द्वारे पर दिख जाता है,
वही हृदय की गहराई, और उदारता बताता है।
कितना विशाल है मन तेरा, ये सम्मान ही कहेगा,
अतिथि के सत्कार में ही, तेरा बड़प्पन बहेगा।
गीत: माधुर्य की मूरत
सुन्दर, शीतल, चंचल, कोमल, सुरों की देवी तू सजनी,
सुंदरता की हर प्रतिमा से भी है तू सुंदर सजनी।
सुरमई तेरी आँखों में, सपनों का डेरा रहता है,
जैसे कोई ठहरा झरना, चुपके से कुछ कहता है।
तेरी पायल की छम-छम में, संगीत की पावन धारा है,
तूने जब-जब ली अंगड़ाई, अम्बर से टूटा तारा है।
फूलों की कोमल पंखुड़ी सा, तेरा ये पावन रूप खिला,
जैसे तपती इस दुनिया को, शीतल कोई छाँव मिला।
सादगी तेरी ऐसी जैसे, भोर की पहली किरण बनी,
सुन्दरता की हर प्रतिमा से भी है तू सुंदर सजनी।
चंचल तेरी ये चितवन, मन में एक हलचल लाती है,
कोमल तेरी छुअन जैसे, सोई कलियाँ जगाती है।
सुरों की तू ही सरगम है, लय की तू ही परिभाषा,
तुझसे ही पूरी होती है, मेरे मन की हर अभिलाषा।
चाँदनी भी फीकी लागे, जब तू बनके आए चाँदनी,
सुन्दरता की हर प्रतिमा से भी है तू सुंदर सजनी।
गीत: ओ मेरे हमजोली
ओ मेरे हमजोली, ओ मेरे मीत
तूने ही सिखाई मुझे चाहत की रीत
राहों में धूप हो या यादों की छाँव
संग तेरे सुखद लगे हर एक गाँव
ओ मेरे हमजोली, ओ मेरे मीत...
काँच के खिलौनों सी है ये ज़िंदगानी
तूने इसमें भर दी है राजा-रानी की कहानी
जब भी गिरी पलकें, तूने ख़्वाब बुन दिए
मेरी खामोशियों को तूने शब्द चुन दिए
खुल के जो मुस्कुराई मेरी हँसी की टोली
रंगों से भर गई मेरी खाली ये झोली
ओ मेरे हमजोली, ओ मेरे मीत...
दुनिया की भीड़ में न खोना कभी हाथ
कल हो न हो, पर रहे तेरा साथ
तुझसे ही शुरू मेरी सुबह की अज़ान
तू ही मेरे आसमान की ऊँची उड़ान
तू है तो मुकम्मल है मेरी हर बात
तू ही है चाँदनी और तू ही शीतल रात
ओ मेरे हमजोली, ओ मेरे मीत...
धड़कन ये कहती है, सुन मेरे यार
सबसे अनोखा है अपना ये प्यार
ओ मेरे हमजोली, ओ मेरे मीत..
द्वीप का दलाल और फाइलों का भूचाल'
एक था जेफ्री, जेब में जिसके नोटों का भंडार था,
पर असली धंधा तो भाई, 'फाइलों' का व्यापार था।
खरीद लिया एक टापू उसने, समंदर के बीचों-बीच,
जहाँ पहुँचते ही बड़े-बड़ों की, नीयत हो जाती थी नीच।
वो द्वीप नहीं था साहब, वो तो 'पाप की पाठशाला' थी,
बाहर से सफेद संगमरमर, अंदर से काली ज्वाला थी।
वहाँ उड़ता था 'लोलिता एक्सप्रेस', भरकर वीआईपी मेहमान,
उतरते ही जिनके गिर जाते थे, नैतिकता और ईमान।
कोई कहता मैं राष्ट्रपति हूँ, कोई कहता मैं हूँ प्रिंस,
पर एप्सटीन के कैमरे में, सब दिखते थे 'गंदे विंस'।
कोई खोज रहा था फॉर्मूला, कोई बचा रहा था देश,
पर द्वीप पर जाकर बदल गया, सबका चोला और भेष।
अब फाइलों का पिटारा खुला, तो मची है भारी चीख,
जो कल तक भाषण देते थे, आज मांग रहे हैं भीख।
लोकतंत्र के खंभे देखो, थर-थर आज कांप रहे,
अपनी ही गंदी फाइलों को, डस्टबिन में डाल रहे।
वो मर गया जेल में चुपके से, राज साथ ले गया भारी,
पर पीछे छोड़ गया पन्नों में, अपनी पूरी रिश्तेदारी।
कोई कहता 'साजिश' है ये, कोई कहता 'फंसाया' है,
सच तो ये है—एप्सटीन ने सबका, नंगा सच दिखाया है।
गीत: धारेश्वर भोज की गाथा
कलम थामी तो शास्त्र रचे, तलवार उठी तो शत्रु थमे,
मालवा की माटी का वो चंदन, जिसके आगे नतमस्तक हुए गगन।
धारानगरी का वो अनुपम राया, जिसने विद्या का मंदिर बनाया,
वो राजा भोज कहाता है, जिसका यश जग गाता है।
कलचुरी के गांगेय को जीता, चालुक्यों का मान मर्दन किया,
गजनी के तुर्कों को खदेड़, भारत का गौरव रक्षण किया।
उत्तर से दक्षिण तक जिसकी, विजय पताका लहराई थी,
रणभूमि में काल बनकर, उसने अपनी धाक जमाई थी।
समरांगण सूत्रधार लिखा, वास्तु का मर्म सिखाया,
सरस्वती कंठाभरण रचकर, व्याकरण का मान बढ़ाया।
आयुर्वेद, गणित और काव्य, अस्सी ग्रंथों की की रचना,
कलम और तलवार का ऐसा, संगम फिर न कहीं बचना।
भोजपुर का विशाल शिवालय, और भोपाल की सुंदर झील,
विद्यार्थियों के लिए भोजशाला, जहाँ ज्ञान की बहती नील।
विद्वानों का वो आश्रयदाता, कवियों का वो मान था,
भोज केवल राजा नहीं, भारत का स्वाभिमान था।
सफलता के पांच सूत्र
कार्य सिद्ध तभी होते हैं, जब मन में हो विचार,
पाँच तत्व ये साथ रखें, तो बेड़ा होगा पार।
प्रथम देखिये धन की शक्ति, कोष आपका कितना है,
खर्च वही जो सध जाए, और बोझ न पड़ता जितना है।
द्वितीय टटोलें साधन अपने, क्या उपकरण हैं पास,
बिन हथियार के युद्ध क्षेत्र में, होता केवल ह्रास।
तृतीय परखिये समय की गति को, क्या अनुकूल है काल?
समय देख जो बीज बोए, वही काटता फसल विशाल।
चतुर्थ देखिये अपने कर्म, और निज क्षमता का भान,
क्या सामर्थ्य है हाथ में अपने, क्या कहता अंतर्ज्ञान?
पंचम सोचें स्थान के बारे, कहाँ खड़े हैं आप,
भूमि देख जो कदम बढ़ाए, उसे न मिलता ताप।
धन, साधन, अनुकूल समय, फिर कर्म और स्थान,
इन पाँचों को तौल कर, जो करता प्रस्थान।
बाधाएँ झुक जाती हैं, मस्तक चूमती जीत,
सफलता उसकी दासी बनती, यही सृष्टि की रीत।
शीर्षक: नई उड़ान की ओर
बचपन की उन गलियों को अब, पीछे हम छोड़ आए हैं,
मासूमियत के खिलौनों से, अब मुँह हम मोड़ आए हैं।
प्रौढ़ता की उस कच्ची समझ को, आज विदा हम देते हैं,
यौवन की इस नई दहलीज पर, कदम हम रखते हैं।
स्वागत है तेरा ओ नव-जीवन, बाहें खोल खड़े हैं हम,
सुनहरे कल के सपनों में, अब जान फूँकने चले हैं हम।
वो कागज़ की कश्ती डूबी, वो धूल भरे अब खेल नहीं,
हौसलों की उड़ान बड़ी है, यादों का अब मेल नहीं।
जो सिखाया बीती रातों ने, उसे दिल में बसाया है,
आज खुद को पहचान कर हमने, नया सवेरा पाया है।
थक कर बैठना काम नहीं, अब रुकी हुई वो चाल नहीं,
यौवन की अग्नि जागी है, अब मन में कोई सवाल नहीं।
नभ को छूना लक्ष्य हमारा, तारों पर हो अपना घर,
हिम्मत की पतवार हाथ में, तूफानों का कैसा डर?
मिटा देंगे वो लकीरें सब, जो मंजिल को रोकेंगी,
लिखेंगे अपनी खुद की किस्मत, जो दुनिया सारी देखेगी।
सपनों के इंद्रधनुष को अब, हकीकत में ढालना है,
अपनी मेहनत की ज्वाला से, अँधियारों को जलाना है।
बढ़ो निरंतर, रुको न क्षण भर, यही जवानी की रीत है,
संघर्षों से जो टकराता, उसी की होती जीत है।
स्वागत है ओ यौवन तेरा, नव-चेतना का संचार हो,
मेरे सपनों के इस भारत का, चहुँओर जय-जयकार हो!
अनुशासन की मुक्ति
नियम नहीं हैं लौह-शृंखला, न ही कोई कारागार,
ये तो केवल सेतु मात्र हैं, करने को भव-पार।
गढ़ो विधान ऐसे कि जो, गंतव्य तक पहुँचा दें,
पर जब चेतना जग जाए, तो बंधन खुद मिटा दें।
पूर्ण अनुशासन की भट्टी में, तपकर कुंदन बनना है,
पर ध्येय सदा ही स्वतंत्रता, अंबर जैसा होना है।
जहाँ नियम न बोझ बनें, बस सहज आचरण बन जाएँ,
भीतर का संगीत जगे, और बाहर मौन गहराएँ।
वही मौलिकता सच्ची है, जो द्वंद्वों को पी जाती है,
अनुशासन और मुक्ति को, एक तार पर लाती है।
जब स्वयं ही बन जाओ नियम, तब सीमाओं को तोड़ दो,
अनुगामी बन आए थे, अब पदचिह्न पीछे छोड़ दो।
अकेला ही शिखर है
जब घिरा हो तू हुजूम से, तब शक्ति का आभास नहीं,
भीड़ में जो गूँजती, वो तेरी अपनी प्यास नहीं।
असली नायक वह नहीं, जो साथ पाकर चलता है,
महान वही, जो ज्वाला बन अकेले ही जलता है।
जब तूफान का रुख हो तीखा, और दिशाएँ मौन हों,
जब अपने भी मुख मोड़ लें, और पूछें— "तुम कौन हो?"
वही घड़ी है परीक्षा की, वही शक्ति का द्वार है,
अकेले खड़ा जो डटा रहे, उसकी ही जय-जयकार है।
पर्वत खड़ा अकेला है, इसलिए तो ऊँचा है,
सूरज तपे अकेला ही, तभी तो उसने दुनिया को सींचा है।
डर को बना ले सीढ़ी तू, और काँटों को आधार,
एकाकी जो चलता है, उसकी थमती नहीं रफ़्तार।
मत ढूँढ सहारा कंधों का, मत माँग किसी से दान,
तेरी अपनी एकाग्रता ही, है तेरी असली पहचान।
शक्तिशाली तू तब नहीं, जब हाथ में सौ हाथ हों,
शक्तिशाली तू तब बनेगा, जब सिर्फ़ तेरा आत्मविश्वास साथ हो।
सत्य के अनंत रूप
पर्वत की चोटी एक ही है,
पर मार्ग वहाँ तक अनेक हैं,
कोई चढ़ता पथरीले रस्तों से,
पर सबके लक्ष्य विशेष हैं।
जैसे सागर का पानी ही,
लहरों में बँटकर बहता है,
कोई उसे ओस की बूँद कहे,
कोई दरिया उसे कहता है।
एक ही राग है जीवन का,
पर साज अलग और तार अलग,
अभिव्यक्ति की अपनी भाषा है,
पर सत्य नहीं है कभी अलग।
मजहब की दीवारें हों चाहे,
या दर्शन का विस्तार गहरा,
सत्य खड़ा है उन सबके पार,
लगाए मौन का एक पहरा।
हजार तरीकों से कहो उसे,
हर शब्द उसी की आहट है,
जैसे भी देखो उस सच को,
वो अंतर्मन की मुस्कुराहट है।
विधि का विधान
मिटा सके न कोई जग में, ऐसा अमित निशान है,
जो लिखा है प्रारब्ध में, वही विधि का विधान है।
चक्रवर्ती सम्राट थे जो, सत्य के प्रतिमान थे,
बिक गए काशी के घाट पर, वह भी एक विधान है।
राजपाट छूटा, पुत्र खोया, पर डिगे न धर्म से,
समय का पहिया किसे झुका दे, प्रभु की यही पहचान है।
कल होना था राजतिलक, सजी खड़ी अयोध्या थी,
पर नियति के हाथों में, कुछ और ही योजना थी।
छूटा महल, पहने वल्कल, राम चले वन की ओर,
सुख-दुख के इस ताने-बाने में, छिपा कोई वरदान है।
खिला फूल जो आज बाग में, कल उसका मुरझाना तय,
चढ़ा सूर्य जो शिखर पर, उसका भी ढल जाना तय।
बीज फटेगा तभी बनेगा, एक वृक्ष विशाल यहाँ,
मिटकर ही कुछ बन पाना, सृष्टि का विधान है।
मनु-स्मृति: धर्म का दर्पण
जहाँ 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' का पावन स्वर गुंजित होता,
वहाँ देवताओं का वास, साक्षात स्वर्ग सा संचित होता।
पर जहाँ तिरस्कृत होती शक्ति, वहाँ निष्फल हर कर्म है,
मनु की लेखनी कहती, यही सनातन धर्म है।
'धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं' के दस लक्षणों का हार बना,
मानवता के कंठ बीच, शुचिता का यह आधार बना।
न यह केवल विधि की संहिता, न केवल दंड का विधान है,
यह तो आत्म-नियमन का, विश्व-वंद्य व्याख्यान है।
'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिः'—सज्जन जिसका अनुगामी हो,
वह धर्म सदा जयवन्त रहे, जो सात्विक और निष्कामी हो।
जैसे बिना सारथी के रथ, पथ से विचलित हो जाता है,
बिन 'मनु-वचनों' के समाज, तिमिर में ही खो जाता है।
'धर्म एव हतो हन्ति'—जो धर्म का नाश करेंगे,
वे स्वयं काल के गाल में, घोर विनाश वरेंगे।
पर जो रक्षण करते धर्म का, धर्म उन्हें सहलाता है,
मनु का एक-एक श्लोक, जीवन का मर्म बताता है।
स्वार्थ से परमार्थ तक
अपने लिए जो जिए, तो क्या जिए, ये दिल तू ज़माने के लिए जिए। सिर्फ अपनी ख़ुशी में क्या रखा है,
मज़ा तो तब है, जब तू औरों के ग़म पिए।
फूल वही जो चमन में महक लुटा दे,
दीपक वही जो राह का अंधेरा मिटा दे।
खुद के लिए तो पशु भी जी लेते हैं यहाँ,
इंसान वही जो गिरते हुए को उठा दे।
किरण बन तू किसी की काली रात का, सहारा बन तू किसी के टूटते हाथ का। ये दौलत, ये शोहरत यहीं रह जाएगी,
साथ जाएगा बस नेक अमल तेरे साथ का।
समंदर सा बड़ा दिल रख अपने सीने में,
दूसरों के आंसू पोंछने के सलीके में।
जो सिमट गया खुद में, वो पत्थर हो गया,
जो बंट गया सबमें, वही अमर है जीने में।
अपने लिए जो जिए, तो क्या जिए, ये दिल तू ज़माने के लिए जिए।
कर्म का रंग
कल्पना के कोरे कागज पर,
सिर्फ चित्र बनाना काफी नहीं,
मंजिल को छूने की हसरत में,
सिर्फ ख्वाब सजाना काफी नहीं।
सफलता की मूरत तब बनती है,
जब कर्म का रंग तुम भरते हो,
जब अपने ऊंचे आदर्शों पर,
तुम अडिग भाव से चलते हो।
घबराओ मत तुम श्रम करने से,
आलस तो गहरी खाई है,
मेहनत से जो मुंह मोड़ लिया,
तो समझो जीत पराई है।
तुम्हारी आत्मा ही वह शक्ति है,
जो इच्छाओं को बल देती है,
परिश्रम की तपती भट्टी ही,
सोने को कुंदन करती है।
दुनिया में क्यों तुम भटक रहे?
खुद ही अपने आधार बनो,
तुम स्वयं गुरु, निर्देशक हो,
अपने पथ के उद्धार बनो।
पहले अपने भीतर झांक जरा,
मन के विश्वास को दृढ़ कर ले,
ला अपनी रूह में मजबूती,
विचारों को पर्वत-सा स्थिर कर ले।
जीवन का रखवाला
नभ की चादर, धरा का आँगन,
साँसों में जो भरा स्पंदन,
हर धड़कन का जो रखवाला,
वही है जग का उजियारा।
कभी वह प्रकृति बनकर आता,
तरु-पल्लव में जीवन पाता,
नदियों की कल-कल में बहता,
प्यास बुझाकर सब कुछ सहता।
माटी की वह सोंधी खुशबू,
बीज में छुपा नया संवेग,
हर अंकुर का जो रखवाला,
वही प्रकृति का अनमोल वेग।
कभी वह साहस बनकर खड़ा,
तूफानों से जो है लड़ा,
भीतर बैठा वह विश्वास,
जो जगाता है नई आस।
जब थककर पाँव ठहरते हैं,
जब सपने धुंधले पड़ते हैं,
हिम्मत का जो रखवाला,
वही अंधेरों में है उजाला।
वह कोई बाहर का दूत नहीं,
सिर्फ ईश्वर का ही रूप नहीं,
वह मानवता की वह ढाल है,
जो हर निर्बल का प्रतिपाल है।
प्रेम, दया और सेवा में,
छिपा हुआ वह भाव निराला,
सच्ची निष्ठा ही तो है,
इस जीवन का रखवाला।
चलो, फिर से मुस्कुराते हैं
वो जो बीती बातें थीं, उन्हें एक ख्वाब रहने दो,
पुरानी उलझनों का अब न कोई हिसाब रहने दो।
शिकायतों की दीमक ने बहुत कुछ चाट डाला है,
गिले-शिकवे जो दिल में थे, उन्हें अब राख रहने दो।
मुट्ठियां भींचकर रखने से, हाथ खाली ही रहते हैं,
हथेलियां तुम खुली रखना, कि इनमें प्यार बहने दो।
ये जीवन चार दिनों का है, इसे नफरत में क्यों खोएं?
कांटे जो चुभते रहे कल तक, उन्हें अब क्यों भला ढोएं?
वक्त की ये धारा देखो, बहती ही चली जाए,
बीज अब हम नफ़रतों के, फिर कभी न बोएं।
मोहब्बत की ज़मीं पर, रहमतों की बरसात होने दो,
चलो गिले-शिकवे छोड़कर, आज बस प्यार की बात होने दो।
सुलह का हाथ तुम बढ़ाओ, झुकने में भी शान है,
बैर पालना तो मिट्टी है, माफ़ करना आसमान है।
रिश्तों की ये खुशबू ही, ज़िंदगी का असली गहना है,
वरना इस भीड़ में हर शख्स, बिलकुल ही अनजान है।
अंधेरे बहुत देख लिए, अब चिरागों को जलने दो,
रुके हुए इन कदमों को, प्यार की राह पर चलने दो।
ईश्वरीय राग
एक नगमा गूँजता है फिजाओं के दरमियाँ,
जैसे बहती हो खुदा की कोई पावन सी जुबाँ।
हर सुर में छिपा है उस असीम का नूर,
जो कर देता है मन के हर अंधेरे को दूर।
नगमानिगार तो बस एक जरिया है, एक साज है,
उसके गीतों में छिपी उस रब की ही आवाज है।
जब रूह छू लेती है अर्श के किनारों को,
तभी मिलती है प्रेरणा इन सुरों के सितारों को।
कागज पर कलम नहीं, ईश्वरीय स्पर्श चलता है,
तभी तो हर लफ्ज़ में एक नया सूरज ढलता है।
ये मौसीकी नहीं, ये तो रूहानी इबादत है,
नगमानिगार के हुनर में खुदा की ही बरकत है।
न कोई बंदिश यहाँ, न कोई सरहद की दीवार,
जहाँ प्रेम का नगमा हो, वहीं बसता है करतार।
ये स्वर, ये लय, ये शब्द सब उसकी ही देन हैं,
ईश्वर की प्रेरणा ही संगीत का असली चैन है।
दृष्टिकोण का दर्पण
राह में जो आए पत्थर, उन्हें तुम आधार मान लो,
हर कठिन उस चुनौती को, प्रगति का उपहार मान लो।
सीख छिपी है हर ठोकर में, अनुभव का भंडार लिए,
बुलंदियाँ खड़ी हैं सम्मुख, बाहें अपनी पसार दिए।
निकलता है हर पल अनूठा, अपने आप में पूर्ण है,
जो बीत गया वो राख नहीं, जो आ रहा वो स्वर्ण है।
हर घटना के भीतर देखो, अवसर एक खड़ा होगा,
मुश्किलों के इस आवरण में, बीज कोई बड़ा होगा।
शुरुआत में शायद लगे कि, ये मार्ग बड़ा ही भारी है,
पर याद रहे, ये संघर्ष ही, चमत्कार की तैयारी है।
यदि देख न पाए छिपी हुई, कुदरत की इस माया को,
तो खो दोगे तुम जीवन की, उस दिव्य प्रकाश की छाया को।
समझो इस सिद्धांत को तुम, मन का मैल हटाकर के,
भाग्य का सूरज चमक उठेगा, खुद को जरा जगाकर के।
चुनौती नहीं ये वरदान है, बस नजरिया तुम बदल लेना,
हर काँटे की ओट में छिपा, एक फूल तुम चुन लेना।
कल्पना की उड़ान और विश्वास की शक्ति
मन की अथाह गहराइयों में, एक बीज पलता है,
स्वप्न बनकर आँखों में, वो धीरे-धीरे ढलता है।
जो सोच लिया तूने एक बार, वो हकीकत बन सकता है,
गर अटूट हो विश्वास तेरा, तो पर्वत भी हिल सकता है।
कल्पना वो कूची है, जो शून्य में रंग भरती है,
अंधेरी सूनी राहों में, नया प्रकाश भरती है।
हवाई जहाज़ की उड़ानों में, पहले 'सोच' की ही परवाज़ थी,
राइट ब्रदर्स की आँखों में, छिपी वो इक आवाज़ थी।
थॉमस एडिसन को देखो तुम, हज़ार बार वो हारा था,
पर 'होगा उजाला'—मन में बस, यही एक सहारा था।
मिटा दिया अंधेरे को, उसने अपनी इक लगन से,
जीत लिया संसार उसने, बस कल्पना और मन से।
माउंट एवरेस्ट की चोटियाँ, जब पुकारती थी इंसान को,
कदमों ने तो बाद में नापा, पहले जीता था 'अरमान' को।
जो मन न माने हार कभी, वो इतिहास रच जाता है,
विश्वास की लौ जलती रहे, तो पत्थर भी देवता बन जाता है।
मत बांध तू अपनी सोच को, ये अंबर भी छोटा है,
संदेह की इस बेड़ी में, केवल समय ही खोता है।
जो कल्पना में बस गया, उसे हकीकत में तू लाएगा,
मन के जीते जीत है बंदे, तू जग जीत कर दिखाएगा।
प्रेम: कल्पना से परे एक सत्य
यह केवल नयनों का मिलना या बातों का मधुमास नहीं,
यह दो आत्माओं की सरगम है, कोई क्षणिक आभास नहीं।
कहीं यह मीरा की भक्ति है, कहीं बुद्ध का मौन अपार,
कभी यह राधा की व्याकुलता, कभी शिव का अटूट श्रृंगार।
प्रेम केवल मिलन नहीं, यह विरह की भी अग्नि है,
जहाँ तपकर कुंदन बनती है, जीवन की हर रागिनी है।
यह समर्पण की पराकाष्ठा है, जहाँ 'मैं' का अस्तित्व मिट जाता है,
और विश्वास की वह डोरी है, जिस पर सारा जग टिक जाता है।
यह माँ की ममता में झलकता, पिता के कड़े दुलार में है,
यह मित्र के निस्वार्थ साथ में, और प्रकृति के विस्तार में है।
कभी यह करुणा बन बहता है, किसी आर्त के आंसू पोंछने को,
कभी यह साहस बन खड़ा हुआ, अन्याय की राहें रोकने को।
बिन प्रेम के मानव जीवन, मरूस्थल की सूखी रेत है,
प्रेम ही वह वर्षा की बूंद है, जो हृदय को करती सतेज है।
यह सिखाता है हमें सहिष्णुता, परदुख में दुखी होना,
सिखाता है खुशियाँ बांटना, और अहम का विष खोना।
कल्पनाएं तो सुंदर होती हैं, पर वे केवल स्वप्निल माया हैं,
प्रेम वह जीवंत अनुभव है, जिसने ईश्वर को भी पाया है।
किसी के दुःख में मौन खड़े रहना, किसी की भूल को क्षमा करना,
यह श्रेष्ठ है किसी भी स्वर्ग की सुंदरतम कल्पना करने से।
क्योंकि... कल्पना केवल मस्तिष्क की उपज है, प्रेम हृदय का विधान है,
यह जीवन का आदि, मध्य और अनंत समाधान है।







