*अध्याय 10 — उपसंहार: काव्य-यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि*
ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा भावों की गहराइयों, संवेदनाओं की ऊष्मा और सामाजिक सरोकारों की प्रखर चेतना से निर्मित एक सतत प्रवाह है। यह यात्रा केवल कविता-लेखन का क्रम नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, अनुभवों और आत्मचिंतन का सुविस्तृत दस्तावेज है। उनकी रचनाओं में मनुष्य, समाज, प्रकृति, राष्ट्र और अंतर्मन—सभी के सुविचार, संघर्ष और आकांक्षाएँ शब्दों के माध्यम से साकार रूप लेते हैं।
इस काव्य-यात्रा का सारांश प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट रूप से अनुभव होता है कि उनकी कविता तीन प्रमुख धरातलों पर विस्तृत है—
1. *संवेदना का धरातल* – जहाँ वे मानवीय संबंधों और भावनाओं की सूक्ष्मता को छूते हैं।
2. *सामाजिक चेतना का धरातल* – जहाँ वे समय, समाज और व्यवस्था से संवाद करते हैं।
3. *आध्यात्मिक-आंतरिक धरातल* – जहाँ वे आत्मा, जीवन और अस्तित्व के प्रश्नों से रूबरू होते हैं।
इन तीनों धरातलों का संगम उनकी कृति को विशिष्ट बनाता है और यही उनकी काव्य-यात्रा की पहचान भी है।
### 🔹 बीते सफ़र की झलक
अब तक की उनकी यात्रा में—
* काव्य-चेतना का क्रमिक विकास
* विषय-वस्तु का विस्तार
* भाषा की परिपक्वता
* पाठकों से गहरा संबंध
स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शुरुआती रचनाओं की सरल भावुकता धीरे-धीरे गहरी विचार-समृद्धि में परिवर्तित होती है। यही क्रम उनकी कविता को मात्र अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि *अनुभव का परिष्कार* बनाता है।
### 🔹 रचनाकार का आत्मदायित्व
ललित मोहन शुक्ला स्वयं अपनी काव्य-यात्रा को व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ सामाजिक दायित्व भी मानते हैं। उनकी दृष्टि में कविता केवल सौंदर्य-बोध नहीं, बल्कि—
* मानवीय उत्थान
* नैतिक जागरण
* संवेदनशील समाज निर्माण
का माध्यम है।
इसलिए उनकी काव्य-यात्रा निरंतर *जिम्मेदारी से जुड़ी हुई यात्रा* के रूप में आगे बढ़ती है।
### 🔹 भविष्य की दृष्टि
भविष्य की ओर दृष्टि डालते हुए यह स्पष्ट है कि उनकी रचनात्मकता अभी थमी नहीं, बल्कि नये आयामों की खोज में अग्रसर है। आने वाला समय उनकी कविता में—
* नए सामाजिक प्रश्न
* बदलते मानवीय संबंध
* विज्ञान और तकनीक से प्रभावित जीवन
* वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय अस्मिता
जैसे विषयों को और अधिक विस्तार देगा।
उनकी कविता का भविष्य केवल संग्रहों में सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि डिजिटल मंचों, अंतरराष्ट्रीय पाठक-समूह और नई पीढ़ी की चेतना में भी अपनी जगह बनाएगा। इस प्रकार उनकी काव्य-यात्रा समय के साथ विकसित होती हुई, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-दीपक बनकर जलती रहेगी।
### 🔹 अंतिम भाव
“भाव-कलश” की यह यात्रा अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है—
जहाँ पीछे के अनुभव संजोए गए हैं और आगे के सपनों की आहट सुनाई देती है।
ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का मूल मंत्र यही है—
* *संवेदना को जीवित रखना*
* *मानवता की लौ को प्रज्वलित रखना*
* *शब्दों को केवल अलंकार नहीं, परिवर्तन का माध्यम बनाना*
इन्हीं भावों के साथ उनकी काव्य-यात्रा आगे भी निरंतर चलती रहेगी—
नए शब्दों के साथ, नई संवेदनाओं के साथ, और नई दिशाओं की ओर।
| 11. | परिशिष्ट (Appendix) | कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश |
भविष्य का निर्माण
सपनों के दीप जलाना होगा,
आलस को दूर भगाना होगा।
जो बीत गया, वह कल था साथी,
अब आगे कदम बढ़ाना होगा।
मेहनत की स्याही से ही तो,
किस्मत का लेख सजाना होगा।
लगातार चलना ही जीवन है,
रुकना तो गहरी जड़ता है।
जो समय की कीमत समझ गया,
इतिहास वही तो रचता है।
हर असफलता से सीख ज़रा,
मुश्किल से नहीं डराना होगा।
सपनों के दीप जलाना होगा...
विश्वास हृदय में रखना तुम,
खुद पर कभी न संशय करना।
सूरज की तरह गर चमकना है,
तो रोज़ तपन में ही जलना।
धैर्य, निरंतरता और लगन,
को जीवन-मंत्र बनाना होगा।
सपनों के दीप जलाना होगा...
बाधाएं तो बस इम्तिहान हैं,
राखों से फिर उठ जाना तुम।
अपनी मेहनत के दम पर ही,
कल अपना श्रेष्ठ बनाना तुम।
संसार झुकेगा कदमों में,
बस खुद को योग्य बनाना होगा।
सपनों के दीप जलाना होगा,
अब आगे कदम बढ़ाना होगा।
नाव (नौका)
आगे बढ़ती जाए नाव
लहरों से टकराती नाव,
आगे बढ़ती जाती नाव।
तूफानों से आँख मिलाकर,
अपना राह बनाती नाव॥
छोड़ किनारा बढ़ी धार में,
साहस के पतवार हाथ में।
गहरी नदियाँ, अथाह समंदर,
डरती नहीं किसी हालात में॥
लहरें आतीं, उसे डरातीं,
वह हँसकर ऊपर उठ जाती।
जितनी थपेड़ें खाती आगे,
उतनी ही रफ़्तार बढ़ाती॥
सूरज डूबे, रात घनेरी,
राह न रोके कोई अँधेरी।
तारों की रोशनी को तकीए,
चलती रहती सुबह-सवेरी॥
काठ का ढांचा, लोहे सा मन,
मंज़िल पाना इसका जीवन।
बैठ अकेला माँझी गाता,
जीत का सुंदर, प्यारा गुंजन॥
सीख हमें यह दे जाती है,
मुश्किल से मत घबराना तुम।
चाहे जितनी आए बाधा,
बस आगे बढ़ते जाना तुम॥
## शब्द: जीवन का दर्पण
शब्दों में होती है जान, शब्दों से ही है इंसान,
ये चाहें तो दे दें आदर, चाहें तो कर दें वीरान।
कभी तीर से तीखे होते, कभी मर्म पर मरहम हैं,
ये सृजन भी कर सकते हैं, और विनाश का परचम हैं।
मीठे बोल अगर मुख से निकलें, तो नफ़रत भी घट जाती है,
एक सांत्वना की वाणी से, हर विपदा छँट जाती है।
कड़वे शब्द अगर बोले तो, दिल में नश्तर चुभ जाता है,
बरसों का जो गहरा नाता, पल भर में टूट जाता है।
"कागा काको धन हरै, कोयल काको देय।
मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय।"
चलो प्रतिज्ञा आज करें हम, सोच-समझकर बोलेंगे,
जब भी अपना मुँह खोलेंगे, मिश्री सी रस घोलेंगे।
कम बोलें पर सार्थक बोलें, झूठ और छल से दूर रहें,
वाणी में हो सत्य का तेज, पर न कभी मग़रूर रहें।
शब्द ही पूजा, शब्द ही प्रार्थना, शब्द ही हैं इबादत,
सच्चे शब्दों को अपनाने की, डालो तुम भी आदत।
ये जहाँ बदल सकते हैं हम, बस इतनी सी बात समझनी है,
शब्दों की इस पावन शक्ति से, एक नई कहानी लिखनी है।
## सफलता का मंत्र: ध्यान और एकाग्रता
भटक रही जो चंचल चेतना,
उसे सँभालना सीख ले।
मन के इस विशाल सागर में,
गोता लगाना सीख ले॥
लक्ष्य सामने खड़ा हुआ है,
धीर धरो, मत हो बेहाल।
*ध्यान* धरोगे अगर आज तुम,
सुलझ जाएगा हर सवाल॥
मार्ग बहुत हैं भटकाने के,
शोर-शराबा चारों ओर।
*एकाग्रता* की ज्योति जलाकर,
लाओ मन में नया भोर॥
जैसे अर्जुन की तीखी दृष्टि,
बस चिड़िया की आँख पर थी।
वैसे ही तुम ध्यान लगाओ,
दृष्टि न भटके जहाँ-कहीं॥
बाधाएँ तो आती रहेंगी,
विचलित कभी न होना तुम।
सपनों को दो लगन की ऊर्जा,
सोए भाव जगाओ तुम॥
धीर-समीर-सा शांत हृदय हो,
पर्वत-सा उत्तुंग विचार।
जो मन को वश में कर लेता,
वही करे जग पर अधिकार॥
जब ध्येय तुम्हारा एक बनेगा,
मेहनत में रस आएगा।
*सफलता* तुम्हारे कदम चूमेगी,
परचम तेरा लहराएगा॥
उठो, साध लो अपनी साँसें,
मन को कर लो एकचित्त।
मेहनत और एकाग्रता ही,
मानव का सच्चा मित्र॥
## मिट्टी का गौरव, अंबर की उड़ान
जो पूर्वजों से सौंप कर, इक दीप हमको दे गए,
वह *विरासत* है हमारी, जिसे वे सींचकर ले गए।
वो नींव की दीवार हैं, वो त्याग की पहचान हैं,
उनकी बदौलत ही आज हम, छूते नया आसमान हैं।
मगर रुकना नहीं उस मोड़ पर, जहाँ ठहरती परछाइयाँ,
अब पंख खोलकर नापनी हैं, क्षितिज की गहराइयाँ।
मन में जगाकर इक अगन, जो रात-दिन जलती रहे,
वह *महत्वाकांक्षा* हमारी, राह पर चलती रहे।
सपनों को केवल देखना, ज़िंदादिली का काम नहीं,
जब तक न मंज़िल चूम ले, पैरों को विश्राम नहीं।
बाधाएँ आएँ लाख पर, तुम हौसला मत छोड़ना,
रुख आँधियों का देखकर, अपनी दिशा मत मोड़ना।
विरासत की उस नींव पर, जब भव्य मंदिर तान दोगे,
मेहनत और हर एक बूँद से, जब भाग्य को तुम थाम लोगे।
तब जन्म लेगी वह चमक, जो काल को भी मात दे,
वह *महानता* का शिखर होगा, जो सदियों तक साथ दे।
विरासत तो इक शुरुआत है, महत्वाकांक्षा इक राह है,
महानता उस मोड़ का, बस आखिरी पड़ाव है।
उठो, बढ़ो और रचो इतिहास, तुम ही कल के शूर हो,
इस धरा के तुम चमकते, सबसे दीप्त कोहिनूर हो।
*उद्देश्य पूर्ण जीवन*
उठो, धरो हुंकार ज़रा,
इस जग में नया सवेरा लाओ।
सपनों के केवल चित्र न खींचो,
तन-मन से संकल्प सजाओ।
बिना ध्येय के बहती धारा,
कभी न मंज़िल पाती है।
भटक-भटक कर तिनके जैसे,
सांसों को छल जाती है।
लक्ष्य चुनो तुम ऐसा जग में,
जो मन को विश्वास दिलाए।
मुश्किल चाहें कितनी भी हों,
राहों में न कदम डगमगाए।
आलस की यह चादर छोड़ो,
मेहनत से इतिहास लिखो।
गिटने में भी एक कला है,
उठकर फिर तुम चलना सीखो।
जीवन का अर्थ समझो प्यारे,
केवल जीना ही काम नहीं।
अगर न छोड़ा कोई निशान,
तो फिर जीवन का नाम नहीं।
दीप बनो तुम इस जग के,
जो औरों का भी पथ चमकाए।
उद्देश्य पूर्ण हो हर पल तुम्हारा,
जो मर कर भी अमर कहाए!
## जीवन का सच्चा धन
सोने-चाँदी में मत ढूँढो, जीवन का असली आधार,
सच्चे मूल्यों से ही सजता, यह सुंदर संसार।
दौलत तो आनी-जानी है, नाम मिटेगा माटी में,
सच्चाई की महक रहेगी, सदा हवा की घाटी में।
सत्य-अहिंसा का थामो पतवार,
प्यार से बदलो यह जग सारा।
जिस दिल में हो दया-भाव,
वही बने सब का सहारा।
कदम-कदम पर ध्यान रहे यह, धर्म न अपना छूटे,
स्वार्थ के खातिर कभी न किसी का, विश्वास भरोसा टूटे।
कर्म करो तुम निष्काम सदा, परिणाम प्रभु पर छोड़ दो,
नफ़रत की हर ऊँची दीवारें, प्यार-प्रेम से तोड़ दो।
विनम्रता ही आभूषण है, संस्कार ही सच्ची शक्ति है,
सेवा में जो सुख मिलता है, वही असल में भक्ति है।
ऊँचे नभ को छूना तुम, पर पाँव न भूतल से छूटे,
मुस्कानों का यह सुंदर दीपक, आँधी में भी न छूटे।
मूल्य बिना जीवन का साधन, बिना नाव की धारा है,
जिसने मूल्यों को अपनाया, वही जगत् का तारा है!
## जीवन एक संग्राम
पथ में आए चाहे बाधा,
तू ना रुकना, तू ना झुकना।
काँटों भरे राह पर चलकर,
सपनों को अपने न रुकने देना।
जीवन एक संग्राम है साथी,
लड़ना इसे हर हाल में।
डर को अपने दूर भगाकर,
आगे बढ़ हर हाल में।
भोर नई जब-जब आएगी,
नया एक पैगाम लाएगी।
हर असफलता सीख बनेगी,
मंजिल तुझे बुलाएगी।
घने अँधेरे से न घबराना,
तू ही तो सूरज बनकर चमकेगा।
तेरे दृढ संकल्प के आगे,
पर्वत भी सीस झुकाएगा।
गिरकर उठना, उठकर चलना,
यही तो वीरों की पहचान है।
जीत उन्हीं को मिलती यहाँ,
जिनके सपनों में जान है।
जीवन एक संग्राम है साथी,
हँसकर तू यह जंग जीत ले!
अनुशासन
पथ पर अगर आगे बढ़ना है,
शिखर सफलता का चढ़ना है,
जीवन को यदि रूप देना है,
सपनों में नव रंग भरना है,
तो एक मन्त्र बस अपनाना,
अनुशासन को न कभी भुलाना।
सूर्य समय पर नित्य उगता है,
चंदा भी अपनी धुन में जगता है।
नदियाँ बहतीं मर्यादा में,
ऋतुएँ आतीं अपनी सीमा में।
प्रकृति भी सिखलाती हमको,
नियम-धर्म का पाठ यह सबको।
चंचल मन को जो वश में लाए,
वही वीर जग में कहलाए।
समय गँवाकर जो सोता है,
कल जाकर केवल रोता है।
संयम, श्रम और निष्ठा धारो,
आलस को तुम दूर पछाड़ो।
अनुशासन बंधन नहीं, यह तो स्वतंत्रता का द्वार है,
जिसने इसको साध लिया, उसका जीवन साकार है।
आज तपोगे अगर नियम में,
कल चमकेगा नाम गगन में।
उठो, बढ़ो और कदम मिलाओ,
अनुशासन से जग हर्षाओ!
संगठित जीवन का स्वप्नद्रष्टा भारत
दिशा-दिशा में अलख जगाता, नव-प्रभात का गान है,
संगठित जीवन का सपना, देखता मेरा हिंदुस्तान है।
तपस्या, त्याग और निष्ठा से, जो गढ़ता नव इतिहास है,
अनुशासन की शक्ति पर ही, टिकता जग का विश्वास है।
भिन्न-भिन्न नदियाँ बहतीं पर, एक ही सागर में मिलतीं,
रंग-बिरंगी पंखुड़ियों से, एक संग ही कलियाँ खिलतीं।
सत्य, अहिंसा, बंधुभाव का, ऐसा यह अमर विहान है,
संगठित जीवन का सपना, देखता मेरा हिंदुस्तान है।
नियम-धर्म की डगर चलकर, समृद्ध राष्ट्र बनाना है,
जाति-पाति के बंधनों से ऊपर, अब बढ़ते जाना है।
हर नागरिक के भीतर सोए, स्वाभिमान को जगाना है,
संगठन की अमर शक्ति से, भारत श्रेष्ठ बनाना है।
कर्म योग की पावन धरती, पुरुषार्थ का यह धाम है,
हर हथेली में संबल हो, हर हाथ को यहाँ काम है।
एक संकल्प, एक ही राह पर, बढ़ता यह अभियान है,
संगठित जीवन का सपना, देखता मेरा हिंदुस्तान है!
## तू उठ, तू बढ़, तू निडर बने!
उठ, चीर के तू तूफानों को,
एक नया सवेरा लाएगा।
अगर खुद पर तुझको *विश्वास* रहे,
तू हर मंज़िल को पाएगा।
न डिगे कदम, न थमे राह,
तू *निडर* होकर आगे बढ़ता जा।
जो आए बाधा राहों में,
तू सिंह-सदृश टकराता जा!
तेरे भीतर ही वो शक्ति है,
जो हर छलावे को मिटाती है।
तेरी यह अटूट *इच्छाशक्ति* ही,
तेरी सोई किस्मत जगाती है।
पर्वत भी शीश झुकाएंगे,
जब साहस तेरा जागेगा।
डर का हर साया छँट जाएगा,
जब आत्मविश्वास मुस्काएगा।
तू *आत्मविश्वासी* बन वीर,
तू काट दे भय की हर ज़ंजीर।
तू निर्भीक, अटल, अविचल राही,
तू खुद ही लिख अपनी तक़दीर!
*अमृतत्व की इच्छा*
अमृतत्व की इच्छा केवल, काया की अमरता नहीं,
माटी के इस पुतले की, नश्वर सी कोई जिजीविषा नहीं।
यह तो मन का संकल्प प्रखर, जग में प्रकाश भर जाने का,
अंधियारे की छाती पर, नित नया दीप जलाने का!
क्षणभंगुर यह जीवन केवल, साँसों का व्यापार नहीं,
काल-चक्र से डर जाना, मानव का अधिकार नहीं।
जिसने जीवन के कैनवस पर, कर्मों के रंग बिखेरे हैं,
अंधियारी रातों के पीछे, उसी पुरुष के सवेरे हैं!
अमर वही जो मिट कर भी, मिट्टी को महका जाता है,
ज़िंदगी के हर एक कतरे से, नूतन कलश सजाता है।
भय का पर्दा चीर फेंक दे, तू भी उस उजियारे का,
बन जा राही निडर पन्थी, सत्य के उस किनारे का!
काया ढलती, समय बदलता, पर विचार अमर रहते हैं,
जो बहते हैं लोक-कल्याण में, वो ही निर्झर बहते हैं।
अमृतत्व पाना है तो, हर विपदा में मुस्कान धरो,
अपने सत्कर्मों के बल पर, जग के सारे कष्ट हरो!
अमर वही है, जो मानव के, अंतर में घर कर जाता,
इतिहास के पन्नों पर भी, स्वर्णिम नाम अंकित कर जाता।
उठ, जाग, बढ़ और रच दे, ऐसा इतिहास यहाँ,
तू रहे न रहे, पर गूँजे, तेरी ही गाथा जहाँ!
आत्मा की आवाज
जब दुनिया का शोर बढ़े, और रस्ते धुंधले हो जाएं,
जब मन के भीतर द्वंद्व जगे, और अपने भी सो जाएं।
तब भीड़-भाड़ की हलचल में, तुम खुद को तन्हा पाओगे,
आत्मा की आवाज* सुनो, तुम सही राह पर आओगे।
जब स्वार्थ खड़ा हो सामने, और सत्य दांव पर लगा रहे,*
जब झूठ पहन कर रेशम-सी, तेरी आँखों को ठगा रहे।
उस घड़ी जीत के लालच में, तुम अपना धर्म न खो देना,
भीतर की उस धड़कन को, बस एक बार तुम छू लेना।
जब न्याय-अन्याय के चौराहे पर, दुविधा घेरा डालेगी,*
जब दुनिया की कोई तर्क-शक्ति, हल न कोई निकालेगी।
तब मौन बैठ कर शून्य में, इक गहरी डुबकी लगा लेना,
जो रूह कहे वही सच है, उसे शीश झुका कर अपना लेना।
जब रिश्तों की कड़वाहट में, तुम खुद को घिरा हुआ पाओ,*
जब अहंकार के दलदल में, तुम गहरे धंसते ही जाओ।
तब झुकने का साहस देती, ये वाणी बड़ी निराली है,
जो इसे सुन ले ध्यान लगाकर, उसकी झोली खाली न रहने वाली है।
यह मंदिर, मस्जिद, गिरजों में, नहीं कहीं बाहर बसती,
ये अपनी ही पाकीज़गी है, जो मुश्किलों में नहीं फंसती।
*जरुरी है इसे सुनना वहाँ*, जहाँ जमीर बिकने वाला हो,
क्योंकि अंत में साथ वही देगी, जो भीतर का उजियाला हो।
*व्यस्कता की ओर*
उठो, बढ़ो, अब मोड़ नया है,
जीवन का एक छोर नया है।
बचपन की वो चंचल बातें,
छूट रहीं अब बीत के रातें।
सपनों को अब ढाल बनाना,
निज पथ पर आगे बढ़ जाना,
कदम तुम्हारे आज पुकारें,
नव-निर्मित आकाश तुम्हारे!
कठिन राह में डरना मत तुम,
जिम्मेदारी से मुड़ना मत तुम।
परिपक्वता का दीप जलाओ,
हर बाधा पर विजय पाओ।
विचारों में हो स्पष्ट उजेरा,
स्वयं रचो तुम नया सवेरा।
जो भी निर्णय आज करोगे,
कल का अपना भाग्य लिखोगे।
बांहों में भर लो हर तूफां,
मन में रहे विश्वास सदा ही।
ऊंचे उड़ना, दूर पहुंचना,
कभी न झुकना, कभी न रुकना।
व्यस्कता यह नया सवेरा,
सपनों का है यही बसेरा
परमार्थ और जीवन
जीवन का यह महासमंदर, केवल बहने के लिए नहीं,
खुद को पाना, खुद खो जाना, केवल रहने के लिए नहीं।
दीपक बनकर जलना सीखो, तम से लड़ना सीखो तुम,
परमार्थ की पवन चलाकर, खिलना-हँसना सीखो तुम।
जो केवल अपने हित सोचे, वह जीवन भी क्या जीवन?
जिसमें पर-दुख की पीड़ न हो, वह कैसा मरुथल सा मन?
फूल पिरोकर माला बनती, बूँद मिले तो सागर हो,
निःस्वार्थ भाव की गंगा में, तुम भी पावन आगर हो।
पेड़ न खाते फल अपने, न नदियाँ पीतीं अपना जल,
औरों के ही काज सँवारे, धरा गगन का हर एक पल।
जो देता है वही पाता है, यही सृष्टि का अविचल नियम,
दूसरों के आँसू पोंछो, यही धर्म है, यही परम संयम।
सच्ची ख़ुशी न धन में होती, न ऊँचे-ऊँचे महलों में,
वह तो बसती है अनजाने, किसी दुखिया की पलों में।
एक हाथ यदि बढ़ा सको तो, सोई आस जगा देना,
राह भूलते पथिकों के तुम, दीप जलाकर हँसा देना।
जीवन छोटा, राह बड़ी है, अमर वही जो दे जाए,
मरकर भी जो याद रहे, वह जग में पूजा जाए।
परमार्थ ही वो पंख है जिससे, आत्मा उड़ान भरती है,
परोपकार की राह पे चलके, धरती भी नमन करती है!
तीन संभावनाएँ
मिट्टी से निर्मित यह तन है, असीम ऊर्जा का यह घर,
शारीरिक क्षमता से अपनी, जीत ले तू हर कठिन डगर।
पर्वत का सीना चीर दे जो, ऐसा श्रम का तूफान बने,
हर बाधा झुक जाए आगे, तू ऐसा बलवान बने!
तन केवल आधार मात्र है, असली शक्ति तो विचार है,
बौद्धिक चेतना ही जीवन का, रचती नया शृंगार है।
बुद्धि की सूक्ष्म पतवारों से, अज्ञान का तम छँट जाता है,
सत्य और ज्ञान के दीपक से, जग का संशय मिट जाता है!
पर कोरी बुद्धि रूखी है, जब तक न मिले भावों की छाँव,
भावनात्मक गहराई से ही, जगमगाए हर सूना गाँव।
करुणा, प्रेम और सहानुभूति, दिल को देवत्व दिलाती है,
भीतर के इस कोमल रस से, आत्मा पावन हो जाती है!
तन का बल, बुद्धि का विवेक, और मन की पावन भावना,
इन तीनों का संगम ही तो, जीवन की श्रेष्ठ संभावना।
उठ, पहचान स्वयं के बल को, अपनी सीमाओं को तोड़,
इन तीनों शक्तियों को साधे, रच दे नया एक इतिहास मोड़!
## 🌿 स्वास्थ्य का सुंदर मंत्र 🌿
सुबह सवेरे जल्दी उठकर, नव-प्रभात को शीश नवाओ,
खुली हवा में ले सांसें तुम, *पहली आदत* यह अपनाओ।
उषाकाल की लालिमा संग, जीवन में भर लो नया उमंग।
ताज़ा फल और हरी सब्ज़ियाँ, *भोजन* हो सात्विक-अभिराम,
ज़ंक-फ़ूड को दूर भगाओ, *दूजी आदत* का रखो ध्यान।
जैसा अन्न वैसा ही मन, स्वस्थ रहेगा सुंदर तन।
नित्य करो *व्यायाम और योग*, मिट जाएंगे सारे रोग,
*तीजी आदत* खेल-कूद की, करे चुस्ती का नित्य प्रयोग।
पसीना जब बहाओगे तुम, ऊर्जा नई पाओगे तुम।
जल ही तो है जीवन का आधार, *चौथी आदत* पर करो विचार,
दिनभर पीते रहो *प्रचुर जल*, तन-मन बिखराए निखार।
विषैले तत्त्व सब बह जाएंगे, कांति नए रंग लाएगी।
दिनभर के श्रम के उपरांत, मन को दो विश्राम एकांत,
*पाँचवीं आदत* *गहरी नींद*, बनाएगी मस्तिष् को शांत।
आठ घंटे की नींद जो सोए, दुख-अवसाद न कभी संजोए।
याद रखें:-
इन पाँचों आदतों को जो जीवन में लाएगा,
वो आरोग्य का अमूल्य धन, सदा-सदा ही पाएगा!
*जहाँ ध्यान, वहाँ ऊर्जा!*
दिशा सही जब चुनती दृष्टि,
रचती तब अनुपम यह सृष्टि।
जहाँ हमारा ध्यान टिकेगा,
वहीँ उजाला और दिखेगा!
जहाँ ध्यान है, वहीँ समर्पण,
वहीँ झलकती मन की दर्पण।
जहाँ लगाओगे तुम चेतना,
वहीँ मिलेगी गहरी प्रेरणा।
व्यर्थ विचारों में बहना क्यों?
कमज़ोरी की बात सहना क्यों?
सच्ची राहों पर मन मोड़ो,
ऊर्जा को नव युग से जोड़ो।
फूल चुनोगे, महक मिलेगी,
कांटों से बस आह खिलेगी।
जिस विचार को तुम पोषोगे,
फल भी वैसा ही पाओगे।
तो क्यों न केवल सत्य निहारें?
सुंदर सपनों को सहलाएं।
आशा की लौ जहाँ जलेगी,
शक्ति वहीं पर नए सिरेगी!
दृढ़ संकल्प का दीप जलाकर,
बढ़ते जाओ राह बनाकर।
जहाँ तुम्हारी लगन रहेगी,
सफलता की सरिता बहेगी।
लक्ष्य साध लो शुभ-मंगल का,
काल मिटेगा सब संशय का।
जहाँ ध्यान, ऊर्जा का वास
रच दो नव इतिहास प्रकाश!
**मानव की नियति न हार कोई
घेरा चाहे हो कितना घना,
अँधियारों का अधिकार नहीं।
तू मिटने को जग में आया,
यह तेरा तो आधार नहीं।
उठ, पहचान सनातन बल को,
तू निर्मित दिव्य विचारों से,
**मानव की नियति न हार कोई,
तू जन्मा केवल जीतने को!**
पथ में शूलों का मेला हो,
या बाधाओं का घेरा हो,
रातों के गहरे साये में,
छिपा हुआ ही भोर सबेरा हो।
तू न थकेगा, तू न रुकेगा,
यह प्रतिज्ञा मन में भर ले,
संघर्षों से आँख मिलाकर,
हर विपदा को अब समर करे।
तू आंधी में भी दीप जला,
अंगारों पर मुसकाने को!
मानव की नियति न हार कोई,
तू जन्मा केवल जीतने को!
गगन तुम्हारे पंखों का है,
धरा तुम्हारी राह सजे,
तेरे दृढ़ संकल्पों के आगे,
समय स्वयं भी थम के रहे।
तू तो केवल पथिक नहीं है,
तू इतिहास बनाने आया,
अमिट नाम की अमूर्त गाथा,
इस जग पर छा जाने आया।
तू स्वप्न देख और रच दे कल,
नव सृजन का राग सुनाने को!
मानव की नियति न हार कोई,
तू जन्मा केवल जीतने को!
*जीवन का उद्देश्य*
राहों में यदि अंधकार हो,
तो तुम स्वयं चिराग बनो।
संघर्षों के इस समर में,
विजय-नाद का राग बनो॥
केवल साँसें लेना ही तो,
जीवन का पर्याय नहीं।
पथ की बाधाओं से डरकर,
रुक जाना अध्याय नहीं॥
उद्देश्य वही, जो औरों के,
जीवन में उजियारा भर दे।
स्वार्थ से ऊपर उठकर जग में,
परोपकार का रस घोल दे॥
गिरे हुए को हाथ थमाना,
उम्मीदों की जोत जलाना।
हर आँसू को पोंछ सको तुम,
बस यही एक लक्ष्य बनाना॥
पर्वत-सा उत्तुंग हौसला,
नदियों-सी बहती रवानी।
संघर्षों से रची जाएगी,
एक अमर अनमोल कहानी॥
कर्म करो तुम बिना झिझक के,
फल की चिंता छोड़ यहाँ।
जीवन वही सार्थक होता,
जिसमें परहित मोड़ यहाँ॥
नभ छूने की चाह भले हो,
पाँव मगर धरती पर हों।
जीवन के उद्देश्य हमारे,
सदा सत्य के पथ पर हों
## शिक्षा का मीठा फल
मार्ग कठिन है, राह पुरानी,
संघर्षों की यही कहानी।
जड़ें नीम सी कड़वी लगतीं,
प्यास जगे पर तृप्ति न मिलती।
रातों की जगरातों में,
मौन बसे सब बातों में,
जब-जब मन हताश हो जाए,
मेहनत का पथ कठिन दिखाए—
तब तुम यह विश्वास जगाना,
सपनों का आधार बनाना।
जड़ कड़वी है, सहना होगा,
अंगारों पर चलना होगा।
पुस्तकों के उलझे पन्ने,
अक्षर-अक्षर लगते धूंधले,
अनुशासन की जो बाड़ लगी है,
लगता कि कोई आग जगी है।
पर यह तपन खरा कर देगी,
जीवन में नव प्रकाश भर देगी।
धैर्य धरौ, हे वीर सिपाही!
विद्या ही है सच्ची राही।
पसीना जो आज बहेगा,
कल इतिहास वही लिखेगा।
कठिन तपस्या का यह फल,
लाएगा एक स्वर्णिम कल।
जब खिलेंगे सफलता के फूल,
उड़ जाएगी संशय की धूल।
मिलेगा पद, सम्मान, सफलता,
मिट जाएगी हर विषमता।
तब समझोगे उस कड़वाहट को,
त्याग, परिश्रम और सजावट को।
वृक्ष ज्ञान का जब लहराए,
अमृत जैसा फल दे जाए।
चखोगे जब मिठास उस फल की,
चिंता मिट जाएगी कल की।
इसलिए, मत हिम्मत हारो,
आज का हर पल संवारो।
शिक्षा की यह कड़वी जड़ ही,
जीवन की सबसे मीठी घड़ी है!
## *उठ, तू सूर्य है!*
उठ! कि अभी रात का ढलना बाकी है,
तेरी रगों में लहू का उबलना बाकी है।
ये जो छाई है मायूसी, ये बस एक बादल है,
तेरे भीतर छिपा हुआ, एक जीत का पागल है!
क्यों कहता है कि हार गया, तू टूट गया, तू थक गया?
क्या एक अंधेरी रात से, तू सूरज बनना भूल गया?
माना कि चोट गहरी है, और वक्त बड़ा ही भारी है,
पर देख जरा तू आइना, तू अब भी युद्ध में जारी है!
*मौत कोई हल नहीं, वो तो अंत है संभावनाओं का,*
*जीवन ही तो मार्ग है, ऊँची-ऊँची उड़ानों का।*
ये दर्द जो तुझे तोड़ता है, ये तुझे गढ़ने आया है,
तू राख नहीं, तू आग है, जिसे तूने ही दबाया है!
सोच उन्हें, जो तेरे हँसने की राह देखते हैं,
तेरी आँखों में अपनी खुशियों का गवाह देखते हैं।
तू एक गिरह है हिम्मत की, तू प्रेम का एक धागा है,
तू वो सिपाही है, जो रणभूमि से कभी न भागा है!
फेंक दे उन खयालों को, जो तुझे फंदे तक लाते हैं,
वो कायर हैं, जो डर के आगे घुटने टेक जाते हैं।
तू चीर के रख दे सीना इस गम की काली आंधी का,
तू वारिस है इस धरती पर, पौरुष और गांधी का!
*तू उठ! तू लड़! तू शोर कर!*
*अपने दुखों का रुख मोड़ कर!*
तेरी एक साँस की कीमत, पूरा ब्रह्मांड नहीं चुका पाएगा,
तू रुक गया तो बोल, ये जग कैसे मुस्कुराएगा?
अभी हाथ बढ़ा, अभी बात कर, तू अकेला बिलकुल नहीं,
ये जिंदगी एक जंग है दोस्त, और तू बुजदिल बिलकुल नहीं!
कल फिर एक सूरज उगेगा, तेरी जीत का जश्न मनाने को,
बस आज तू थाम ले खुद को, एक नया इतिहास बनाने को
*सुनहरी यादों का कारवां: छुट्टियों का आनंद*
आया फिर से वह प्यारा सा पल,
ठहर गया है आज सारा कल।
न बस्ते का बोझ, न घड़ी की टिक-टिक,
सुकून की लहरें हैं, खुशियाँ हैं मनचाही और सटीक।
सूरज की पहली किरण संग जागना,
बिना किसी जल्दी के बिस्तर पर लेटे रहना।
ठंडी हवाओं में उड़ते वो सपनों के पर,
आज अपना ही लगता है सारा अंबर।
कहीं दूर पहाड़ों की वादियों में खोना,
या मखमली घास पर बेफिक्र होकर सोना।
पेड़ों की छाँव में कहानियों का डेरा,
रंगीन हो गया है अब हर सवेरा।
न काम की चिंता, न कोई पुकार,
बस अपनों का साथ और ढेर सारा प्यार।
चाय की चुस्की में घुली है मीठी सी बातें,
चाँदनी में चमकती हैं अब ये सुकून भरी रातें।
थक हार कर लौटे जो ज़िंदगी की दौड़ से,
नाता टूट गया जैसे हर एक शोर से।
यह छुट्टियों का आनंद, ये दिल की राहत,
सपनों की दुनिया की है सबसे खूबसूरत चाहत।