रंग
एक समय की बात है, चित्रकार राघव जीवन से पूरी तरह निराश हो चुका था। उसे लगता था कि उसकी दुनिया बेरंग हो चुकी है। असफलता के तनाव में उसने अपने सारे ब्रश और चित्र अलग फेंक दिए।
तभी उसकी नज़र एक छोटे बच्चे पर पड़ी, जो ज़मीन पर गिर चुकी थोड़ी सी सूखी मिट्टी और बिखरे हुए रंगों की बूंदों से चित्र बनाने की कोशिश कर रहा था। लाल, पीला, नीला—रंगों के संगम से वह मुस्कुरा रहा था।
राघव को अहसास हुआ कि **'रंग'** केवल कैनवास पर उकेरी जाने वाली चीज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के दृष्टिकोण का प्रतीक है। परिस्थितियां चाहें कैसी भी हों, आशा और उत्साह का एक छोटा सा रंग भी पूरी ज़िंदगी को खूबसूरत बना सकता है।
राघव ने तुरंत ब्रश उठाया और एक नया कैनवास रंगे लगा। इस बार उसके चित्र में एक नया उजास और विश्वास था।