"भाव-कलश: ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा" ( Hindi)



क्रम संख्याअध्याय / अनुभागविवरण
1.प्राक्कथन (Foreword)पुस्तक की भूमिका और लेखन का उद्देश्य
2.व्यक्तित्व का उद्भवललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश
3.काव्य यात्रा का आरंभपहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ
4.भाव-कलश: एक परिचयमुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता
5.प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषणचुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा
6.शैली और शिल्प विधानभाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग
7.संवेदना और सरोकाररचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण
8.साहित्यिक योगदानहिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार
9.सम्मान एवं उपलब्धियाँकवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर
10.उपसंहारकाव्य यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि
11.परिशिष्ट (Appendix)कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश

## *प्राक्कथन (Foreword)*


### *पुस्तक की भूमिका*

साहित्य मात्र शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज होता है। जब हृदय के भाव शब्दों का चोला पहनकर पन्नों पर उतरते हैं, तो वह 'काव्य' बन जाते हैं। *"भाव-कलश: ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा"* कोई साधारण संकलन नहीं है, बल्कि यह एक समर्पित रचनाकार के अंतर्मन का वह दर्पण है, जिसमें समाज, प्रेम, संघर्ष और आध्यात्मिकता के विविध रंग समाहित हैं।

ललित मोहन शुक्ला जी की लेखनी में वह सहजता है जो सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचती है। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर मिट्टी की सौंधी सुगंध है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर तीखा प्रहार भी है। यह पुस्तक उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों पर उपजे अनुभवों का एक ऐसा कलश है, जिससे निकलने वाली काव्य-धारा पाठक को आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रेरित करती है।

### *लेखन का उद्देश्य*


इस पुस्तक के लेखन और संकलन के पीछे मूल रूप से तीन मुख्य उद्देश्य निहित हैं:

1. *साहित्यिक विरासत का संरक्षण:* ललित मोहन शुक्ला जी ने दशकों की अपनी काव्य यात्रा में जो अनमोल रचनाएँ रचीं, उन्हें एक सूत्र में पिरोकर आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना। यह पुस्तक उनकी लेखनी के विकास क्रम को समझने का एक माध्यम है।
2. *अनुभवों का साझाकरण:* एक कवि जिस पीड़ा, आनंद या विस्मय से गुजरता है, वह सार्वभौमिक होता है। इस 'भाव-कलश' के माध्यम से उन अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाना है, ताकि वे स्वयं को इन पंक्तियों में कहीं न कहीं खोज सकें।
3. *संवेदनाओं को स्वर देना:* आज के भागदौड़ भरे युग में मनुष्य की संवेदनाएँ कुंद होती जा रही हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों के भीतर सोई हुई मानवीय भावनाओं को पुनः जागृत करना और उन्हें शब्दों की शक्ति से परिचित कराना है।

यह कृति केवल ललित मोहन जी के प्रशंसकों के लिए ही नहीं, बल्कि कविता में रुचि रखने वाले हर उस व्यक्ति के लिए है जो सत्य, शिव और सुंदर की खोज में है। विश्वास है कि यह 'भाव-कलश' अपनी शीतलता और वैचारिक गहराई से साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाएगा। 

2 व्यक्तित्व का उद्भव: ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश



व्यक्तित्व का निर्माण किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह जीवन-पर्यावरण, संस्कारों, अनुभवों और निरंतर आत्मचिंतन का समन्वित फल होता है। ललित मोहन शुक्ला के व्यक्तित्व का उद्भव भी इसी सघन प्रक्रिया से जुड़ा है, जहाँ बचपन का परिवेश, शिक्षा-संस्कार और सतत जिज्ञासा ने उनके व्यक्तित्व को दिशा दी। प्रारंभिक जीवन में मिले अनुभवों ने न केवल उनके चिंतन को आकार दिया, बल्कि समाज, इतिहास, शिक्षा और साहित्य के प्रति उनकी संवेदनशीलता को भी गहराई प्रदान की।

ललित मोहन शुक्ला के बाल्यकाल का परिवेश सादगी, अनुशासन और मूल्यों से ओत-प्रोत रहा। पारिवारिक वातावरण में मिले नैतिक संस्कारों ने उनमें जिम्मेदारी, कर्तव्यबोध और मेहनत की भावना विकसित की। पुस्तकों, शिक्षकों और विचारशील संवादों के संपर्क ने उनके भीतर अध्ययनशीलता और चिंतनशील दृष्टिकोण को प्रखर किया। बचपन में प्रकृति, समाज और संस्कृति को निकट से देखने का अवसर उनके व्यक्तित्व के निर्माण में एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व बना।



उनके प्रारंभिक जीवन में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रही; यह अनुभवात्मक सीख का स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। सामाजिक जीवन के विविध पक्षों का अवलोकन करते हुए उनमें मानवीय मूल्य, नेतृत्व क्षमता और रचनात्मकता ने आकार लिया। यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने साहित्य, लेखन, शिक्षा, इतिहास, प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई।

ललित मोहन शुक्ला के व्यक्तित्व का उद्भव मूलतः उनके परिवेश, जिज्ञासा-प्रधान मानसिकता और स्वाध्याय की परंपरा से हुआ। प्रारंभिक जीवन के संघर्ष, अवसर और सीख ने उनमें आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति की शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया। आज उनका व्यक्तित्व अध्ययन, सृजन और प्रेरणा का प्रतीक है—जहाँ व्यक्तिगत अनुभव सामाजिक चेतना में रूपांतरित होकर दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।

इस प्रकार, ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश केवल जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि उनके सशक्त और बहुआयामी व्यक्तित्व के उद्भव की आधारभूमि साबित हुआ।


[3]  काव्य यात्रा का आरंभ


ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा किसी अचानक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि संवेदनशील हृदय की गहन अनुभूति से जन्मी एक निरंतर साधना है। बचपन से ही शब्दों के प्रति उनके भीतर एक सहज आकर्षण रहा। प्रकृति, मानव जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक संवेदनाएँ और आसपास घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाएँ उनके मन में तरंगें उठाती रहीं। इन्हीं तरंगों ने विचारों को कविता के रूप में रूपांतरित करना प्रारंभ किया।

विद्यालय के दिनों में पाठ्य पुस्तकों की कविताएँ ही नहीं, बल्कि प्रार्थना, भजन और लोकगीत भी उन्हें भीतर तक स्पर्श करते थे। उन्होंने पाया कि कविता केवल पढ़ी नहीं जाती, उसे जिया जाता है। यही बोध उनके काव्य मार्ग की पहली सीढ़ी बना। धीरे-धीरे उन्होंने शब्दों को संवेदना का आकार देना सीखा और मन की अनुभूतियाँ पंक्तियों में ढलने लगीं।

उनकी काव्य यात्रा आत्मान्वेषण, समाज-बोध और मानवीय करुणा का संगम है। इस यात्रा में भाव ही उनका संबल बने—इसीलिए इस संकलन का नाम सार्थक रूप से *“भाव-कलश”* रखा गया है, जो उनके भीतर संचित उन गहन भावनाओं का प्रतीक है जिन्हें उन्होंने शब्द देकर अमर कर दिया।

## पहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ

पहली रचना हमेशा विशेष होती है—वह केवल कविता नहीं, बल्कि एक नई पहचान की घोषणा होती है। ललित मोहन शुक्ला की पहली रचना भी उनके अंतर्मन के उफनते भावों का स्वाभाविक प्रस्फुटन थी। प्रारंभिक दौर में उन्होंने जीवन के सरल प्रसंगों, रिश्तों की कोमलता, प्रकृति के रंगों और मानवीय संवेदनाओं को कविताओं में पिरोना शुरू किया।

परिवार, शिक्षक और साहित्य-रसिक मित्रों का वातावरण उनके लिए प्रेरणा स्रोत बना। महान कवियों की रचनाएँ—मैथिलीशरण गुप्त, निराला, पंत, प्रसाद, दिनकर और आधुनिक कवियों की काव्यधारा—उनके लिए मार्गदर्शक बनीं। इन महान रचनाकारों को पढ़ते हुए उन्होंने सीखा कि कविता केवल तुकबंदी नहीं, बल्कि विचार, दर्शन और भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है।

पहली रचना प्रकाशित होने का क्षण उनके जीवन का अविस्मरणीय पड़ाव रहा। उस दिन उन्हें यह अनुभूति हुई कि शब्दों की शक्ति समाज के हृदय तक पहुँच सकती है। यह अनुभव उनके भीतर आत्मविश्वास भर गया और काव्य-सृजन उनका जीवन-धर्म बनता चला गया।

उनकी शुरुआती प्रेरणाएँ केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों, साधारण मनुष्यों के मुस्कराते चेहरे, दुख-दर्द और आशाओं से भी मिलीं। वही प्रेरणाएँ आगे चलकर उनकी काव्य यात्रा का प्राणतत्व बनीं। 


अध्याय 4
भाव-कलश: एक परिचय — मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता**


‘भाव-कलश’ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का वह महत्त्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ संवेदनाएँ, अनुभूतियाँ और विचार एक साथ मिलकर मनुष्य-जीवन की संपूर्णता को स्पर्श करते हैं। इस काव्य-संग्रह में कवि केवल शब्दों का विन्यास नहीं करता, बल्कि भावों का ऐसा कलश रचता है जिसमें जीवन के विविध रस—श्रृंगार, करुणा, वीरता, शांति, भक्ति और मानवीय करुणा—संतुलित रूप से संजोए हुए हैं। यही कारण है कि ‘भाव-कलश’ केवल कविता-संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित होती अनुभूतियों का आत्मीय दस्तावेज़ प्रतीत होता है।

### मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु

‘भाव-कलश’ की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक है। इसमें मनुष्य और समाज, प्रकृति और पर्यावरण, प्रेम और अध्यात्म, जीवन-संघर्ष और आत्मोन्नति—इन सभी का सुसंतुलित समावेश मिलता है। कवि मानव जीवन को केवल बाहरी घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि भीतर उमड़ते-घुमड़ते विचारों, संवेदनाओं और अंतर्द्वंद्वों के रूप में देखता है।

1. *मानव-जीवन का बहुआयामी चित्रण*
   संग्रह की अनेक कविताओं में जीवन की जिजीविषा, संघर्षशीलता और आशा की अविचल शक्ति दिखाई देती है। निराशा के अंधेरे में भी प्रकाश की किरण ढूँढ़ने का आग्रह, कवि की जीवन-दृष्टि को सकारात्मक बनाता है।

2. *प्रकृति और मानवीय संबंध*
   प्रकृति यहाँ केवल सौंदर्य का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य का सहयात्री बनकर उपस्थित है। वर्षा, ऋतु-परिवर्तन, नदी, पर्वत और आकाश—सब मानवीय भावनाओं के प्रतीक बनकर उभरते हैं।

3. *प्रेम और संवेदना का संसार*
   ‘भाव-कलश’ में प्रेम केवल रोमानी नहीं, बल्कि मानवीय करुणा और आत्मीयता का व्यापक रूप है। यहाँ प्रेम मिलन और विरह दोनों में अपनी गहरी मानवीय व्याख्या पाता है।

4. *आध्यात्मिक चेतना*
   संग्रह की कई कविताओं में आत्मा, ईश्वर-चेतना, और मनुष्य के भीतर स्थित दिव्यता का उल्लेख मिलता है। यह अध्यात्म किसी कर्मकांड का नहीं, बल्कि अनुभव-प्रधान आंतरिक जागरण का अध्यात्म है।

### वैचारिकता और दार्शनिक दृष्टि

‘भाव-कलश’ की वैचारिकता मानवीय मूल्यों पर आधारित है। कवि की चिंतन-भूमि में सत्य, प्रेम, करुणा, नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रश्न सदैव उपस्थित रहते हैं। कवि आधुनिक जीवन की आपाधापी, भौतिकता की अंधी दौड़ और टूटते मानवीय संबंधों से चिंतित भी है, परंतु निराश नहीं होता। वह समाधान के रूप में *मानव-केन्द्रित दृष्टि, **संवेदनशीलता* और *आत्मचिंतन* की ओर संकेत करता है।

इस संग्रह में वैचारिकता का मूल आधार मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मानित करने की भावना है। जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र—इन कृत्रिम विभाजनों से ऊपर उठकर कवि मानवीय एकता, सहअस्तित्व और वैश्विक भाईचारे की बात करता है। यही मानवीय उदात्तता ‘भाव-कलश’ को विशिष्ट बनाती है।

### काव्य-भाषा और शैलीगत विशेषताएँ

‘भाव-कलश’ की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और भाव-प्रधान है। कवि अलंकारों का प्रयोग सजावट के लिए नहीं, बल्कि भावों को तीव्रता देने के लिए करता है। कल्पना और यथार्थ का सुंदर संतुलन इस संग्रह की प्रमुख शैलीगत विशेषता है। कहीं लोक-भाव, कहीं आधुनिक संवेदना, तो कहीं दार्शनिक गहराई—सब मिलकर इसे विविधता से सम्पन्न बनाती हैं।

### निष्कर्ष

‘भाव-कलश’ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का सार-संग्रह है। यह पाठक को केवल कविताएँ पढ़ने का आमंत्रण नहीं देता, बल्कि उसे *महसूस करने, सोचने और अपने भीतर झाँकने* के लिए प्रेरित करता है। इस काव्य-संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता जीवन के प्रति गहरे दायित्व-बोध, मानवता में आस्था और सकारात्मक परिवर्तन की कामना से जुड़ी हुई है। इसी कारण ‘भाव-कलश’ आधुनिक हिन्दी काव्य-संसार में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करता है। 


अध्याय 5: प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषण – चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा में उनकी रचनाएँ संवेदना, मानवीय मूल्य, प्रकृति-प्रेम, राष्ट्रभावना, जीवन-दर्शन और सामाजिक सरोकारों के विविध आयामों को व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं में सरल भाषा, गहन भावबोध और प्रवाहमयी शैली का समन्वय दिखता है। इस अध्याय में उनकी कुछ प्रमुख कविताओं का भावार्थ, अंतर्निहित संदेश और आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत है।

## ✤ प्रमुख रचनाएँ और उनका सांकेतिक संसार

ललित मोहन शुक्ला की प्रमुख कविताएँ निम्न विषयों को स्पर्श करती हैं—

* मानव-जीवन का संघर्ष और आशा
* प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता
* राष्ट्र और मातृभूमि के प्रति समर्पण
* मानवीय मूल्यों तथा रिश्तों की गरिमा
* आत्म-चेतना, आत्म-विकास और जीवन-प्रेरणा

उनकी कविताएँ केवल भावाभिव्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि विचारों का मार्गदर्शन भी करती हैं। वे पाठकों को चिंतन के माध्यम से भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं।

## ✤ चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा

### 1. *“जीवन की धूप-छाँव”*

*भावार्थ:*
यह कविता जीवन के उतार–चढ़ाव, हर्ष–विषाद और संघर्ष–सफलता के द्वंद्व को चित्रित करती है। कवि बताता है कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं, बल्कि अनुभवों की पूर्णता का सामूहिक रूप है।
*समीक्षा:*

* कविता में प्रतीकात्मक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।
* “धूप-छाँव” का बिंब जीवन की अनिश्चितताओं को सजीव बनाता है।
* काव्य में आशावाद प्रमुख स्वर के रूप में उपस्थित है।

### 2. *“माटी की महक”*

*भावार्थ:*
इस कविता में कवि ने अपनी मातृभूमि, ग्राम्यसंस्कृति और धरती से जुड़ेपन को व्यक्त किया है। माटी की खुशबू बचपन, स्मृति और पहचान का प्रतीक बन जाती है।
*समीक्षा:*

* कविता में लोक-संवेदना और ग्रामीण जीवन की सहजता झलकती है।
* भाषा सरल है, पर भाव अत्यंत मार्मिक हैं।
* यह कविता पाठक के भीतर अपनी जड़ों के प्रति गर्व का भाव जगाती है।

### 3. *“वक्त की नदी”*

*भावार्थ:*
यह कविता समय के निरंतर प्रवाह का दर्शन कराती है। कवि बताता है कि समय रुकता नहीं, वह सबको बहाकर आगे ले जाता है; इसलिए वर्तमान का सदुपयोग ही जीवन की सच्ची साधना है।
*समीक्षा:*

* रूपक का प्रभावशाली प्रयोग—“नदी” के रूप में “वक्त” का चित्रण।
* दार्शनिकता और व्यवहारिकता का संतुलन।
* पाठक को आत्ममंथन हेतु प्रेरित करने वाली रचना।

### 4. *“मानवता का दीप”*

*भावार्थ:*
इस कविता में करुणा, प्रेम, सहयोग और मानवीय संवेदना को मानवता के दीपक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अंधकारमय समय में भी प्रकाश देता है।
*समीक्षा:*

* मूल संदेश: हिंसा और स्वार्थ के बीच मानवता ही सच्चा मार्गदर्शन।
* भाषिक सरलता के साथ विचारों की गंभीरता स्पष्ट।
* कविता प्रेरक और मूल्यपरक है।

### 5. *“प्रकृति का निमंत्रण”*

*भावार्थ:*
यह कविता प्रकृति को एक जीवंत मित्र के रूप में प्रस्तुत करती है जो मनुष्य को शांति, सृजन और संतुलन का संदेश देती है। पर्वत, नदी, पेड़–पौधे सब मिलकर जीवन का गीत रचते हैं।
*समीक्षा:*

* सजीव चित्रण और कल्पनाशीलता इसकी विशेषता है।
* पर्यावरण-संरक्षण का अप्रत्यक्ष संदेश।
* कविता में प्रकृति-मानव संबंध का सूक्ष्म दार्शनिक स्वर।

## ✤ समग्र मूल्यांकन

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ:

* *भावप्रधान* भी हैं और *विचारप्रधान* भी
* पाठक के मन में संवेदना, आत्मविश्वास और आशा का संचार करती हैं
* भाषा में सरलता, शैली में प्रवाह और संदेश में गहराई रखती हैं

उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक आनंद ही नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की दिशा भी देती हैं। यही कारण है कि उनका काव्य-सृजन पाठकों के हृदय में सीधा स्थान बनाता है और उन्हें आत्मिक स्तर पर छू जाता है।

### ✔ निष्कर्ष

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ “भाव-कलश” में संचित उन अमूल्य बूँदों की तरह हैं जो जीवन के विभिन्न आयामों—दुःख, सुख, संघर्ष, प्रेम, प्रकृति और मानवता—को सार्थक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। चयनित कविताओं का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि उनका काव्य केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि अनुभवों की संपूर्ण यात्रा है—एक ऐसी यात्रा, जो पाठक को भी अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। 



अध्याय 6  शैली और शिल्प-विधान — भाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी *शैली और शिल्प-सजगता* है। उनका काव्य न केवल भाव-संपन्न है, बल्कि रूप-सौंदर्य, भाषा की संगीतात्मकता और अलंकारिक सौष्ठव से भी परिपूर्ण है। उनकी कविताएँ पढ़ते समय यह स्पष्ट अनुभव होता है कि कवि शब्दों का चयन अत्यंत सजगता के साथ करता है और हर पंक्ति में भाव की गरिमा के साथ शिल्प की सुदृढ़ता भी दिखाई देती है।

## ✤ भाषा-शैली की विशेषताएँ

ललित मोहन शुक्ला की भाषा शैली में निम्न प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं—

### 1. *सरलता और संप्रेषणीयता*

उनकी भाषा सहज, सरल और सामान्य पाठक के हृदय तक पहुँचने वाली है। जटिलता के स्थान पर स्पष्टता को उन्होंने महत्व दिया है।

### 2. *भावप्रधान और संवेदनशील भाषा*

शब्दों के पीछे भावों की तीव्रता और अनुभवों की गहराई स्पष्ट झलकती है। उनकी भाषा केवल विचार प्रकट नहीं करती, बल्कि अनुभूति भी जगाती है।

### 3. *लोक-भाषा और संस्कृतनिष्ठ शब्दों का संतुलन*

कवि ने स्थान-स्थान पर लोक-प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है, वहीं संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से काव्य को गरिमा भी प्रदान की है। इससे भाषा का रूप बहुरंगी हो उठा है।

### 4. *चित्रात्मक भाषा*

उनकी भाषा में चित्र उभरते हैं—प्रकृति, समय, मानव-स्थिति और भावनाओं के। शब्दों के माध्यम से दृश्यांकन उनकी शैली की उल्लेखनीय विशेषता है।

## ✤ अलंकरण का प्रयोग

अलंकार उनकी कविताओं को *सौंदर्य, प्रभाव और संगीतमयता* प्रदान करते हैं।

### 1. *रूपक अलंकार*

समय को नदी, जीवन को पथ, मानवता को दीप—इस प्रकार कवि रूपकों के माध्यम से जटिल अनुभूतियों को सरल बना देता है।

### 2. *उपमा अलंकार*

“फूल-सी मुस्कान”, “नभ-सा विस्तार”, “चाँद-सा मन” जैसी उपमाएँ भावों को कोमलता और सौंदर्य प्रदान करती हैं।

### 3. *अनुप्रास अलंकार*

व्यंजन ध्वनियों की पुनरावृत्ति से कविता में मधुर लय और संगीत का निर्माण होता है। अनेक पंक्तियों में यह ध्वन्यात्मक सौंदर्य दिखाई देता है।

### 4. *मानवीकरण*

प्रकृति, समय, रात, पवन, नदी को मानव गुणों से युक्त कर कवि ने अनुभूति को सजीव बना दिया है—यह मानवीकरण उनकी काव्य-शैली को जीवंत बनाता है।

## ✤ छंद और लय का प्रयोग

ललित मोहन शुक्ला के काव्य में छंदों का प्रयोग अत्यंत सजगता के साथ हुआ है।

### 1. *परंपरागत छंदों का प्रयोग*

दोहा, चौपाई, सोरठा जैसे छंदों में उनकी अनेक रचनाएँ दिखाई देती हैं। इससे काव्य भारतीय काव्य-परंपरा से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

### 2. *मुक्त छंद की सहजता*

समकालीन संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते समय उन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग भी किया है। यहाँ भाव की स्वतः प्रवाहिता को प्राथमिकता दी गई है।

### 3. *लयी संरचना*

छंदबद्ध और मुक्त दोनों ही रूपों में उनकी कविता में लय स्पष्ट रूप से विद्यमान रहती है, जो पाठक को निरंतर आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

## ✤ शिल्प संबंधी विशेषताएँ

* बिंब-रचना की स्पष्टता
* ध्वनि-सौंदर्य और शब्द-संगीत
* वाक्य-गठन में विविधता
* आरंभ, उत्कर्ष और समापन का संतुलन
* प्रभावोत्पादकता और भाव-संयम

कवि की शिल्प-सजगता उनकी रचनाओं में अनुशासन और सौंदर्य का अद्भुत सामंजस्य स्थापित करती है।

## ✔ निष्कर्ष

ललित मोहन शुक्ला का काव्य केवल भावों का *“भाव-कलश”* ही नहीं, बल्कि *शिल्प का भी कलश* है।
उनकी भाषा-शैली में सरलता के साथ गंभीरता, अलंकारों में सौंदर्य के साथ सार्थकता, और छंदों में लय के साथ संदेश का समन्वय दिखाई देता है।

इसी समन्वय के कारण उनकी कविताएँ पाठकों के मन में उतरती हैं और स्मृति में जीवित रहती हैं। 

*अध्याय 7 : संवेदना और सरोकार — रचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण*


ललित मोहन शुक्ला की कविताओं का मूलाधार केवल सौंदर्यानुभूति नहीं, बल्कि संवेदना का व्यापक मानवीय धरातल है। उनकी काव्य-यात्रा में मनुष्य, समाज, प्रकृति, परिस्थितियाँ और समय—ये सभी एक साथ गतिशील दिखाई देते हैं। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि वे केवल भावनाओं का उद्गार नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई जिम्मेदारी, चेतना और उत्तरदायित्व को भी जगाती हैं। यही कारण है कि उनकी काव्य-रचना में संवेदना केवल भावुकता नहीं, बल्कि जीवित सरोकार का रूप धारण कर लेती है।

### 1. मानवीय संवेदना का व्यापक विस्तार

शुक्ला की कविताओं में पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रहती; वह सामुदायिक बन जाती है। वे हाशिये के जीवन को स्वर देते हैं—
* श्रमिकों का संघर्ष
* किसानों की विवशता
* महिलाओं के अधिकार
* बच्चों के सपने
* बुज़ुर्गों की एकाकीपन

इन सबके माध्यम से कवि मानो कहता है कि मनुष्य की असली पहचान उसकी संवेदना से होती है। उनकी रचनाओं में दया या करुणा दान की तरह नहीं उतरती, बल्कि सह-अनुभूति के रूप में उभरती है—जहाँ कवि स्वयं पीड़ा का सहभागी बन जाता है।

### 2. सामाजिक सरोकार और परिवर्तन की आकांक्षा

ललित मोहन शुक्ला की कविता केवल जीवन का चित्रण नहीं करती, बल्कि जीवन को बदलने की चाह भी प्रकट करती है। उनकी पंक्तियों में अन्याय, शोषण, भ्रांति और विसंगतियों के विरुद्ध एक मौन विद्रोह दिखाई देता है। वे समाज की जड़ता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं और मनुष्य को उसके भीतर छिपे विवेक से संवाद कराते हैं।

यह सामाजिक सरोकार नैतिक उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि आत्मबोध के रूप में प्रकट होता है। उनकी कविताएँ पाठक को यह अनुभूति कराती हैं कि परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है।

### 3. मानवीय मूल्य—काव्य का मूल स्वर

उनकी काव्य-यात्रा के केन्द्र में प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, सत्य, न्याय और समानता जैसे मानवीय मूल्य हैं। वे आधुनिक जीवन की आपाधापी में इन मूल्यों के क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हैं और पाठक को पुनः मनुष्यता की ओर लौटने का निमंत्रण देते हैं।

कवि के लिए मनुष्य का महान होना आवश्यक नहीं, मानवीय होना आवश्यक है। उनकी रचनाओं में बार-बार यह आग्रह उभरता है कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ संवेदनात्मक प्रगति भी अनिवार्य है—अन्यथा विकास अधूरा रह जाएगा।

### 4. सामाजिक चेतना का सशक्त स्वर

उनकी कविताओं में सामाजिक चेतना किसी नारे की तरह नहीं आती। वह धीरे-धीरे हृदय में उतरती है—
* प्रश्न बनकर
* आत्मालाप बनकर
* मौन पीड़ा बनकर
* कभी आशा की किरण बनकर

यही उनकी काव्य-चेतना की शक्ति है कि पाठक कविता पढ़कर केवल प्रभावित नहीं होता, बल्कि भीतर से सोचने को विवश होता है। कवि का उद्देश्य व्यक्ति में जागरूकता का दीप जलाना है—ताकि वह निष्क्रिय दर्शक न रहे, बल्कि सक्रिय सहभागी बने।

### 5. निष्कर्ष—संवेदना से सरोकार तक

ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा संवेदना से प्रारंभ होकर व्यापक सामाजिक सरोकार में विकसित होती है। उनकी रचनाएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं, समाज से जोड़ती हैं और अंततः स्वयं से जोड़ती हैं।

उनकी काव्य-दृष्टि हमें यह सिखाती है कि कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनके काव्य में अंकित संवेदनाएँ आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं—जहाँ मनुष्य को फिर से मनुष्यता की ओर लौटना है।


*अध्याय 8 — साहित्यिक योगदान: हिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा केवल व्यक्तिगत भावाभिव्यक्ति का प्रवाह नहीं है, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उनकी उपस्थिति का प्रमाण भी है। उनकी कविताएँ मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक गहराई का ऐसा सम्मिलन प्रस्तुत करती हैं, जो पाठक के भीतर विचार और भावना—दोनों स्तरों पर हलचल उत्पन्न करता है। इसी कारण, आधुनिक हिंदी कविता के मानचित्र पर उनका स्थान निरंतर सुदृढ़ होता गया है।

### 🔹 हिंदी साहित्य में स्थान

ललित मोहन शुक्ला का साहित्यिक स्थान तीन आधारों पर निर्मित दिखाई देता है—विषय-गाम्भीर्य, भाषा-सरलता और संवेदनात्मक प्रामाणिकता। उनकी कविताएँ जटिल बौद्धिकता का बोझ नहीं ढोतीं, बल्कि सरल शब्दों में गहन अनुभूतियों को व्यक्त करती हैं। यही सरलता उनकी लोकप्रियता का मूल है। उनकी रचनाओं में—

* आम जनजीवन की पीड़ा
* मातृभूमि और प्रकृति के प्रति प्रेम
* मानव मूल्यों के क्षरण पर चिंता
* आत्मसंघर्ष और आशा का प्रकाश

बार-बार उभरता है।

उनकी कविताएँ न तो केवल रोमानी हैं, न केवल सामाजिक घोषणाएँ—वे दोनों के बीच ऐसी समरसता रचती हैं, जो आधुनिक पाठक के मन को सीधा स्पर्श करती है। इसलिए उन्हें समकालीन संवेदनाओं के सशक्त प्रवक्ता के रूप में देखा जाता है।

### 🔹 काव्य-भाषा और शैली

उनकी भाषा सहज, संप्रेषणीय और संगीतात्मक है। अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक है, कृत्रिम नहीं। बिंब और प्रतीक उनकी अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन हैं—

* नदी, पेड़, आकाश, मिट्टी, गाँव और स्मृतियाँ—इनके माध्यम से वे बड़े प्रश्न उठाते हैं।
  उनकी शैली में छायावादी कोमलता, प्रगतिशील चिंतन और आधुनिक प्रयोगधर्मिता—तीनों के स्वर मिलते हैं। यही मिश्रित शैली उन्हें विशिष्ट बनाती है।

### 🔹 विषय-क्षेत्र का विस्तार

उनकी कविताओं में विविधता भी एक उल्लेखनीय विशेषता है। वे केवल प्रेम या प्रकृति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि—

* राष्ट्र, भाषा, संस्कृति
* शिक्षण-व्यवस्था
* मानव संबंधों की जटिलता
* प्रौद्योगिकी और आधुनिकता के प्रभाव
  पर भी विचार करते हैं। इस प्रकार उनका साहित्य वर्तमान जीवन की सम्पूर्णता का आईना बन जाता है।

### 🔹 साथी रचनाकारों के विचार

समकालीन कवि और साहित्यकार ललित मोहन शुक्ला को ऐसे रचनाकार के रूप में देखते हैं, जिनकी कविताओं में सादगी के भीतर तीव्रता और कोमलता के भीतर संघर्ष बसता है। उनके बारे में अक्सर निम्न प्रकार के विचार व्यक्त किए जाते हैं—

* वे भावनाओं को उपदेश में नहीं, अनुभव में बदलते हैं
* उनकी कविता बोलती नहीं, सहलाती और झकझोरती है
* वे परंपरा को स्वीकार करते हुए भी आधुनिकता से संवाद करते हैं

साथी रचनाकारों का मानना है कि उनकी काव्य-यात्रा निरंतर विकसित होती हुई यात्रा है—जहाँ हर नई कविता पिछले अनुभव से आगे का मार्ग प्रशस्त करती है।

### 🔹 समकालीन पाठक पर प्रभाव

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ युवा पाठकों में विशेष रूप से लोकप्रिय हैं, क्योंकि वे आत्मविश्वास, संघर्ष और आशा के संदेश से भरी होती हैं। वरिष्ठ पाठकों के लिए उनकी रचनाएँ स्मृतियों का पुनर्संवाद बन जाती हैं। इस प्रकार उनकी कविता पीढ़ियों के बीच संवाद का सेतु भी निर्मित करती है।

### 🔹 निष्कर्ष

हिंदी साहित्य में ललित मोहन शुक्ला का योगदान बहुआयामी है। वे केवल कवि नहीं—

* संवेदना के शिल्पी
* सामाजिक चेतना के वाहक
* भाषा के सधे हुए कुशल कारीगर
  के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

साथी रचनाकारों के सम्मानपूर्ण मत और पाठकों के स्नेहपूर्ण स्वीकार ने उनके साहित्यिक स्थान को और मजबूत किया है। उनकी काव्य-यात्रा आज भी गतिमान है—और यही गतिशीलता उनके साहित्य को जीवंत, प्रासंगिक और कालातीत बनाती है। 


*अध्याय 9 — सम्मान एवं उपलब्धियाँ: कवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा केवल सृजन की सतत साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे साहित्यिक जगत में व्यापक मान्यता, सम्मान और पुरस्कारों के रूप में भी स्वीकार मिला। उनकी कविताओं ने जिस तरह पाठकों के हृदय में स्थान बनाया, उसी प्रकार साहित्यिक संस्थाओं, मंचों और समकालीन रचनाकारों ने भी उनके योगदान को सराहा। यही कारण है कि उनकी साहित्यिक यात्रा में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ मील के पत्थर बनकर दर्ज होती चली गईं।

### 🔹 साहित्यिक सम्मान: सृजन की स्वीकृति

ललित मोहन शुक्ला को मिले सम्मान उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की व्यापकता और प्रभावशीलता के प्रमाण हैं। उनकी कृतियों को विभिन्न साहित्यिक मंचों, पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत किया गया। ये पुरस्कार केवल औपचारिक अलंकरण नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं की संवेदनात्मक गहराई, सामाजिक प्रतिबद्धता और कलात्मक ऊँचाई के मूल्यांकन के रूप में देखे जाते हैं।

इन सम्मानों ने उनके भीतर सृजन के प्रति दायित्वबोध को और मजबूत किया, और नई ऊर्जा के साथ उन्हें साहित्य-साधना में प्रवृत्त किया। प्रत्येक पुरस्कार उनके लिए अंत नहीं, बल्कि नयी सृजन-यात्रा का आरंभ रहा।




### 🔹 प्रमुख उपलब्धियाँ और मील के पत्थर

उनकी साहित्यिक यात्रा में कई ऐसे अवसर आए, जिन्होंने उन्हें न केवल कवि के रूप में, बल्कि एक सशक्त साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण मील के पत्थर इस प्रकार उल्लेखनीय हैं—

* उनकी कविताओं का विभिन्न साहित्यिक संकलनों में सम्मिलित होना
* राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर काव्य-पाठ के लिए आमंत्रण
* ई-पुस्तकों और ब्लॉगों के माध्यम से वैश्विक पाठक-समूह तक पहुँच
* युवा रचनाकारों के लिए प्रेरणा-स्रोत के रूप में उनकी स्वीकृति

इन उपलब्धियों ने उनकी काव्य-यात्रा को स्थानीय सीमाओं से निकालकर व्यापक साहित्यिक संसार से जोड़ा।

### 🔹 पाठकों और समाज की ओर से मिला सम्मान

किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान पाठकों के मन में मिला स्थान होता है। ललित मोहन शुक्ला की कविताओं को व्यापक पाठक-स्वीकार्यता मिली—

* उनके काव्य-पाठों पर मिलने वाली spontaneous प्रतिक्रिया
* पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित समीक्षाएँ
* अकादमिक वर्ग द्वारा उनकी रचनाओं पर चर्चा
  इन सभी ने उनके साहित्यिक अवदान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

साथ ही, सामाजिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया गया, जिससे उनका व्यक्तित्व केवल कवि नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत के रूप में भी उभरकर आया।

### 🔹 डिजिटल युग में उपलब्धियाँ

डिजिटल मंचों पर उनकी सक्रिय उपस्थिति भी एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में देखी जाती है। ब्लॉग, ई-बुक्स, ऑनलाइन साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से उनका साहित्य नई पीढ़ी तक पहुँचा। यह विस्तार केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि पीढ़ीगत संवाद का स्वरूप भी है।

डिजिटल माध्यमों पर उनकी रचनाओं को मिले पाठक, टिप्पणियाँ और व्यापक साझा-करण (sharing) स्वयं में साहित्यिक उपलब्धि के आधुनिक संकेतक हैं।

### 🔹 सम्मान का अर्थ: दायित्व और विनम्रता

ललित मोहन शुक्ला के लिए सम्मान और पुरस्कार केवल गौरव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी हैं। वे स्वयं मानते हैं कि पुरस्कार सृजन का लक्ष्य नहीं, बल्कि सृजन की गुणवत्ता का परिणाम हैं। यही दृष्टिकोण उन्हें विनम्र बनाता है और उनकी रचनाओं को अहंकार से दूर रखता है।

सम्मान ने उन्हें समाज, मानवता और साहित्य के प्रति और अधिक उत्तरदायी बनाया है। यही कारण है कि उनके काव्य में निरंतर परिपक्वता और व्यापक दृष्टि का विस्तार दिखाई देता है।

### 🔹 निष्कर्ष

सम्मान और उपलब्धियाँ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा के चमकते पड़ाव हैं, पर उनकी असली सफलता उनके शब्दों द्वारा छुए गए हृदयों में निहित है। पुरस्कारों ने उनके साहित्यिक स्थान को प्रतिष्ठा दी, और उपलब्धियों ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को विस्तार।

उनकी काव्य-यात्रा अब भी गतिशील है—
नए अनुभव, नई संवेदनाएँ और नए आयाम उनकी प्रतीक्षा में हैं। यही निरंतरता उन्हें समय के साथ-साथ साहित्य के इतिहास में भी एक स्थायी स्थान प्रदान करती है। 


*अध्याय 10 — उपसंहार: काव्य-यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा भावों की गहराइयों, संवेदनाओं की ऊष्मा और सामाजिक सरोकारों की प्रखर चेतना से निर्मित एक सतत प्रवाह है। यह यात्रा केवल कविता-लेखन का क्रम नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, अनुभवों और आत्मचिंतन का सुविस्तृत दस्तावेज है। उनकी रचनाओं में मनुष्य, समाज, प्रकृति, राष्ट्र और अंतर्मन—सभी के सुविचार, संघर्ष और आकांक्षाएँ शब्दों के माध्यम से साकार रूप लेते हैं।

इस काव्य-यात्रा का सारांश प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट रूप से अनुभव होता है कि उनकी कविता तीन प्रमुख धरातलों पर विस्तृत है—

1. *संवेदना का धरातल* – जहाँ वे मानवीय संबंधों और भावनाओं की सूक्ष्मता को छूते हैं।
2. *सामाजिक चेतना का धरातल* – जहाँ वे समय, समाज और व्यवस्था से संवाद करते हैं।
3. *आध्यात्मिक-आंतरिक धरातल* – जहाँ वे आत्मा, जीवन और अस्तित्व के प्रश्नों से रूबरू होते हैं।

इन तीनों धरातलों का संगम उनकी कृति को विशिष्ट बनाता है और यही उनकी काव्य-यात्रा की पहचान भी है।

### 🔹 बीते सफ़र की झलक

अब तक की उनकी यात्रा में—

* काव्य-चेतना का क्रमिक विकास
* विषय-वस्तु का विस्तार
* भाषा की परिपक्वता
* पाठकों से गहरा संबंध

स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शुरुआती रचनाओं की सरल भावुकता धीरे-धीरे गहरी विचार-समृद्धि में परिवर्तित होती है। यही क्रम उनकी कविता को मात्र अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि *अनुभव का परिष्कार* बनाता है।

### 🔹 रचनाकार का आत्मदायित्व

ललित मोहन शुक्ला स्वयं अपनी काव्य-यात्रा को व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ सामाजिक दायित्व भी मानते हैं। उनकी दृष्टि में कविता केवल सौंदर्य-बोध नहीं, बल्कि—

* मानवीय उत्थान
* नैतिक जागरण
* संवेदनशील समाज निर्माण
  का माध्यम है।

इसलिए उनकी काव्य-यात्रा निरंतर *जिम्मेदारी से जुड़ी हुई यात्रा* के रूप में आगे बढ़ती है।

### 🔹 भविष्य की दृष्टि

भविष्य की ओर दृष्टि डालते हुए यह स्पष्ट है कि उनकी रचनात्मकता अभी थमी नहीं, बल्कि नये आयामों की खोज में अग्रसर है। आने वाला समय उनकी कविता में—

* नए सामाजिक प्रश्न
* बदलते मानवीय संबंध
* विज्ञान और तकनीक से प्रभावित जीवन
* वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय अस्मिता

जैसे विषयों को और अधिक विस्तार देगा।

उनकी कविता का भविष्य केवल संग्रहों में सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि डिजिटल मंचों, अंतरराष्ट्रीय पाठक-समूह और नई पीढ़ी की चेतना में भी अपनी जगह बनाएगा। इस प्रकार उनकी काव्य-यात्रा समय के साथ विकसित होती हुई, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-दीपक बनकर जलती रहेगी।

### 🔹 अंतिम भाव

“भाव-कलश” की यह यात्रा अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है—
जहाँ पीछे के अनुभव संजोए गए हैं और आगे के सपनों की आहट सुनाई देती है।

ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का मूल मंत्र यही है—

* *संवेदना को जीवित रखना*
* *मानवता की लौ को प्रज्वलित रखना*
* *शब्दों को केवल अलंकार नहीं, परिवर्तन का माध्यम बनाना*

इन्हीं भावों के साथ उनकी काव्य-यात्रा आगे भी निरंतर चलती रहेगी—
नए शब्दों के साथ, नई संवेदनाओं के साथ, और नई दिशाओं की ओर।

11.परिशिष्ट (Appendix)कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश
 

जीवन की धूप-छांव


कभी मखमली राहें मिलें, कभी कांटों का घेरा है,
कभी अमावस की रातें, कभी उजला सवेरा है।
ये मत पूछो कि जीवन में, मिला हमको यहाँ क्या-क्या,
बस इतना जान लो राही, ये धूप-छांव का घेरा है।

चढ़ाव है तो ढलान भी, गिरना भी एक कहानी है,
संघर्षों की भट्टी में ही, तपती ये जवानी है।
सफलता का वो स्वाद कहाँ, जो बिन पसीने मिल जाए,
हार के बाद की जीत ही, असल में ज़िंदगानी है।
पर्वत के शिखर तक जाने को, घाटी से गुज़रना पड़ता है,
पाने को कुछ बड़ा यहाँ, ख़ुद से ही लड़ना पड़ता है।

खुशियों के झोंके आएँ तो, आँखों में चमक भर जाती है,
दुखों की बदली छाए तो, सांसें भी सिमट जाती हैं।
पर सिर्फ़ ख़ुशी ही जीवन हो, तो मन ऊब सा जाएगा,
दुख की कड़वाहट के बिना, सुख भी फीका पड़ जाएगा।
हर्ष और विषाद के धागों से, ये जीवन बुना गया है,
इन्हीं विरोधाभासों में, जीने का अर्थ छुपा गया है।

जीवन केवल सुख का नाम नहीं, ये अनुभवों का सागर है,
मिट्टी और सोने से भरी, ये एक अनूठी गागर है।
हर आँसू एक सबक बना, हर मुस्कान एक शक्ति है,
इन विपरीत हवाओं में ही, छुपी जीवन की भक्ति है।
पूर्ण वही है जिसने यहाँ, हर रंग को अपनाया है,
धूप को माथे पर रख कर, छांव का लुत्फ़ उठाया है। 


"माटी की महक" 

चंदन सी ये माटी अपनी, सिर माथे पर लगाता हूँ
मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ, इसकी खुशबू साथ ले जाता हूँ।
शहरों की इस भीड़-भाड़ में, खो न जाए पहचान मेरी
यही रेत की नरम छुअन तो, लिखती है हर दास्तान मेरी।
वो सोंधी-सोंधी सी... ओ री गैया, ओ री मैया...
वो सोंधी-सोंधी माटी की महक, मुझे गाँव बुलाती है।

नीम की ठंडी छाँव और वो, गलियों का हुड़दंग याद है
कागज़ वाली कश्ती और वो, उड़ता हुआ पतंग याद है।
नंगे पाँव उस गीली पगडंडी पर, बेफ़िक्री से चलना
घुटनों पर जो धूल लगी थी, वही था असली संवरना।
आज मखमली कालीनों पर, वो सुकून कहाँ मिलता है
जो बरखा की पहली बूंद में, मिट्टी से खिलता है।
वो भीगी-भीगी सी... यादों की वो...
वो भीगी-भीगी माटी की महक, मुझे बचपन दिखाती है।

खेतों की वो हरियाली और, हल की उठती धार यहाँ
मेहनत के पसीने में भी, बसता है श्रृंगार यहाँ।
ढोलक की थाप पे थिरकते, लोकगीत और त्यौहार वही
पड़ोसी भी अपनों जैसा, भरा-पुरा संसार वही।
इसी कोख से जनमे हम सब, यहीं पे मिल जाना है
अपनी धरती, अपनी संस्कृति, यही असली ठिकाना है।
वो पावन-पावन सी... जननी जैसी...
वो पावन-पावन माटी की महक, मुझे रूबरू कराती है।

दुनिया घूमी, मंज़िल पायी, पर मन का पंछी प्यासा है
माटी की उस खुशबू में ही, सिमटी हर अभिलाषा है।
मेरी रग-रग में बहती है, ये ग्राम्य जगत की शुचिता
यही मेरी पहचान है 'राही', यही मेरी मौलिकता।
वो महकती-महकती सी... रूह में बसी...
वो माटी की महक मुझे, मेरा 'घर' याद दिलाती है। 


गीत: वक्त की नदी


वक्त की नदी बहती जाए, रुकना इसका काम नहीं,
लहरों की इस हलचल में, कल का कोई नाम नहीं।
जो बीत गया वो रेत हुआ, जो पास है वो ही अपना है,
बाकी सब तो आँखों में, बसता एक सपना है।

कभी ये शांत किनारों सी, मन को सुकून दिलाती है,
कभी धार की तेजी में, यादें संग बहा ले जाती है।
पत्थर से टकराती है, फिर भी राह बनाती है,
ठहरना मौत है इसके लिए, बहना ही जिंदगानी है।
वक्त की नदी बहती जाए...

बचपन की वो कागज की कश्ती, कहीं दूर निकल गई,
जवानी की वो धूप सुहानी, शाम ढले ढल गई।
चेहरों पर जो लकीरें हैं, वो इसी नदी के निशान हैं,
हर लहर में छिपे हुए, बीते कई इम्तिहान हैं।
वक्त की नदी बहती जाए...

ना कोई इसे बाँध सका, ना कोई रोक पाया है,
शहंशाह हो या फकीर कोई, सब पर इसका साया है।
आज की इस बहती धारा में, तुम अपना दीप जला लेना,
वक्त मिले तो अपनों के संग, दो पल खुशी मना लेना।

वक्त की नदी बहती जाए, रुकना इसका काम नहीं,
लहरों की इस हलचल में, कल का कोई नाम नहीं 

प्रकृति का निमंत्रण

सुनो! शिखर से मौन पुकार,
देता तुमको बारम्बार।
धरा बुलाती बाहें खोले,
आओ तज कर सब संसार।।
नील गगन का वह विस्तार,
कहता "मुझसा हृदय बनाओ"।
बहती सरिता की ये धार,
"गति में ही जीवन" सिखलाओ।
झूम रही हैं हरी डालियाँ,
बाँट रही हैं मधुर प्यार।।
कण-कण में है संगीत यहाँ,
पत्तों का मरमर स्वर तो सुन।
भौरों की गुंजन में खोकर,
मन के सुंदर धागे बुन।
भोर बुलाती अरुणिमा बन,
साँझ सँवारे स्वर्ण द्वार।।
छोड़ कृत्रिम वैभव की माया,
आओ तरुवर की छाँव तले।
जहाँ शांति की शीतल छाया,
दुख-संताप सभी पिघलें।
वृक्षों का संयम तुम देखो,
परोपकार ही जिनका सार।।
धरा पुकारे, नदियाँ गाएँ,
प्रकृति का यह पावन धाम।
स्वयं को इसमें विलीन कर लो,
मिलेगा मन को पूर्ण विराम।
खुली हवा का स्पर्श लो तुम,
यही सुखों का है आधार।। 
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार, कवि व लेखक) 

मानवता का दीप

जब स्वार्थ का नभ घिर आए, और तिमिर सघन हो जाए,
जब संवेदनहीनता की आंधी, मन का चैन चुराए।
तब भीतर के एक कोने में, चुपचाप एक लौ जलती है,
वही मानवता का दीपक है, जो हर मुश्किल में पलती है।
करुणा की वह कोमल बाती,
जो दुखियों का दर्द समझती है।
बिना कहे जो पीर हर ले,
वही निस्वार्थ चमकती है।
न भाषा देखे, न कोई मजहब, न सीमाओं का घेरा,
जहाँ प्रेम की लौ जलती है, वहीं होता है सवेरा।
सहयोग का तेल भरा हो जिसमें,
वह बुझने कभी न पाता है।
एक हाथ जब थामे दूजा,
संकट भी टल जाता है।
कंधे से जब कंधा मिलता, पर्वत भी झुक जाते हैं,
मानवता के उजियारे में, सब अपने मिल जाते हैं।
संवेदनाओं की वह ऊष्मा,
पथरीले मन को मोम करे।
जहाँ घृणा की शीत लहर हो,
वहाँ यह दीपक काम करे।
यह दीप नहीं बस मिट्टी का, यह अडिग विश्वास का प्रतीक है,
अंधियारे को चीर सके जो, वही सबसे सटीक है।
आओ हम सब मिलकर आज,
यह पावन दीप जलाएँ।
नफरत के इस रेगिस्तां में,
प्रेम की गंगा बहाएँ।
जब तक एक भी दीप जलेगा, मानवता नहीं हारेगी,
यही रोशनी इस दुनिया का, फिर से भाग्य सँवारेगी।

चप्पल

चप्पल है अति लाड़ली, पाँवन की है ढाल।
कंकड़-पत्थर से लड़े, रखे सुखी हर हाल।।
धूप तपे या कीच हो, सहे कष्ट दिन-रात।
मालिक के चरणों तले, करे समर्पण बात।।

चप्पल संग चले जग सारा, निर्धन हो या राज-दुलारा।
मंदिर बाहर धीरज धरनी, सबकी सेवा इसकी करनी।।
रंग-बिरंगी और सुहावन, धूल-धूप से रक्षित पावन।
कभी हवाई कभी है बाटा, चुभने दे न कोई कांटा।।

घिस जाती है देह, मगर ये उफ़ न कहती।
कीचड़ हो या रेत, मौन हो सब कुछ सहती।।
जोड़ी टूटे एक, दूसरी व्यर्थ कहाती।
बिना पाँव के साथ, सदा ये सूनी जाती।।

चप्पल चन-चन बोलती, द्वारे खड़ी हुजूर।
अदब सिखाती शीश को, होकर पाँव की धूल।।
होकर पाँव की धूल, मान मर्यादा रखती।
अंदर जाना मना, द्वार पर ही ये थकती।।
कह 'गिरिधर' कविराय, सदा ये साथ निभाती।
फटी-पुरानी होय, याद बचपन की लाती।।
ललित मोहन शुक्ला 



गीत: जीवन की थाती


मिट्टी से हम जन्मे हैं, एक दिन मिट्टी हो जाना है
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
न जीत में घमंड हो, न हार में मलाल हो
जीवन की सबसे सुंदर सीख, मन सदा खुशहाल हो।

बहती नदिया कह गई हमसे, रुकना मौत की निशानी है
राहों के पत्थरों से भी, लिखनी एक कहानी है।
धूप मिली तो सीख लिया, छाँव की कद्र करना
दुख की कड़वी घूँट पिए बिन, सुख का मोल न जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

पेड़ हमेशा झुकते हैं, जब फलों का भार आता है
बड़ा वही है दुनिया में, जो झुकना सीख जाता है।
बाँट सको तो बाँट लो खुशियाँ, दर्द तो सबका अपना है
परायों में जो देख ले खुद को, वही सच्चा सयाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

कल की चिंता छोड़ के तू, आज का दीया जला ले
टूटे हुए जो रिश्ते हैं, उन्हें गले से लगा ले।
माफी सबसे बड़ा हुनर है, नफरत बस एक बोझ है
खाली हाथ आए थे हम, खाली हाथ ही जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

सच्चाई की राह कठिन है, पर अंत बड़ा ही सुंदर है
बाहर मत ढूँढ सुकून तू, तेरे ही अंदर समंदर है।
जीवन की इस छोटी सी सीख को, जिसने भी पहचाना है
उसने ही इस जग में रहकर, खुदा को सच में पाना है।
ललित मोहन शुक्ला 


❤️ दिल: अनमोल अहसास

दिल है नाज़ुक एक शीशे का,
प्यार से भरा, भावनाओं का ख़ज़ाना।
धड़कन इसकी जीवन की कहानी,
हर पल चलती, जैसे कोई रूहानी धुन।
ये है घर ख़ुशियों और ग़मों का,
इसमें बसती हैं उम्मीदें और सपने।
कभी ये हँसता है खुल कर,
कभी चुपके से आँसू बहाता है।
हर रिश्ते की डोर इससे बंधी,
मोहब्बत की दुनिया इसी में सिमटी।
दिल ही जानता है सच्चाई क्या है,
हर अहसास को गहराई से ये महसूसता है।
इसे संभालना है इबादत से कम नहीं,
क्योंकि ज़िंदगी इसी की रफ़्तार पर चलती।
ये धड़कता रहे, तो सब कुछ क़ायम है,
दिल ही तो है, जो इंसानियत को ज़िंदा रखता है।
ललित मोहन शुक्ला 

गीत: धड़कनों का इकरार

इन खुली आँखों में अब एक ख्वाब रहता है,
मेरे दिल में बस तेरा ही महताब रहता है।
हवाओं ने गुनगुनाया है नाम तेरा धीरे से,
अब मेरी हर दुआ में तेरा ही जवाब रहता है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।

कभी जो न कही थी, वो बात कहनी है,
संग तुम्हारे ही अब ये ज़िंदगी रहनी है।
जैसे धूप में ठंडी छाँव बन गए हो तुम,
मेरी सूखी ज़मीन पर घटा बन बरसे हो तुम।
तेरी मुस्कुराहटों में मेरी जीत छिपी है,
मेरी हर खुशी अब तेरी गलियों में रुकी है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है...

लिखूँ मैं जो भी, उसमें ज़िक्र तुम्हारा हो,
डूबे अगर कश्ती, तो बस तेरा किनारा हो।
न माँगूँ चाँद-तारे, न सारा ज़माना मैं,
बस उम्र भर के लिए तेरा ही सहारा हो।
नज़रें जो मिलीं, तो ये राज़ खुल गया,
तू मिला तो मानो, मुझे खुदा मिल गया।

हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।
गीतकार _ललित मोहन शुक्ला 



मेरा दिल

मेरा दिल है एक खुली किताब,
जिसमें दबी हैं हज़ारों ख़्वाब।
कभी ये हँसे, कभी ये रोए,
न जाने कौन से रंग ये बोए।
जैसे हो कोई नटखट बच्चा,
करता कितनी बातें ये कच्चा।
कभी मचले, कभी ये बहके,
चाहत की धूप में ये दहके।
इक कोना इसका है बिलकुल सादा,
जहाँ रहती है तेरी ही याद ओ अनामिका 
धड़कन इसकी तेरी ही धुन है,
तू ही इसकी पहली और अंतिम गुन है।
ये छुपाए कई गहरे राज़,
सुनाए इश्क़ की मीठी आवाज़।
नाज़ुक ये ऐसा, जैसे कोई फूल,
मगर सह लेता हर दर्द की शूल।
हर पल ये तेरा ही नाम पुकारे,
तेरे ही संग ये जिए और हारे।
मेरा दिल है तो बस तेरा ही घर,
यहाँ से तू कभी ना जाना किधर।



एक रास्ता

यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
चुपचाप मुझको बुलाए जा रहा है।
न मंज़िल का कोई मुझे है ठिकाना,
मगर दिल सफ़र का गुनगुना रहा है।
अकेला हूँ पर मैं थकता नहीं हूँ,
झुक जाऊँ मैं ऐसा मुसाफ़िर नहीं हूँ।
पहाड़ आड़ आए, नदी हो या जंगल,
कदम रुक गए तो ये जीना नहीं हूँ।
यहाँ धूल भी है, कहीं छाँव भी है,
कहीं दूर से आता कोई पाँव भी है।
कभी तेज़ चलता, कभी धीरे-धीरे,
हर मोड़ पर एक नया घाँव भी है।
हैं कितने ही राही जो गुज़रे यहाँ से,
लिए ख़्वाब अपने गए हैं कहाँ से।
उनकी कहानियाँ पत्थरों पर लिखी हैं,
सीखा है मैंने, ज़माने-जहाँ से।
ये राह ही मेरी अब पहचान ठहरी,
इसी पर टिकी मेरी मुस्कान ठहरी।
ज़िंदगी है क्या? बस ये सफ़र है निरंतर,
जहाँ ख़्वाब पलते, जहाँ जान ठहरी।
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
बस चलते ही जाना सिखा रहा है।
न मंज़िल ज़रूरी, न पहुँचना ज़रूरी,
ये पल ज़िंदगी का बताए जा रहा है। 

सपनों की दुनिया

रात की चादर ओढ़कर,
आती है सपनों की दुनिया।
खुल जाती है एक खिड़की,
जहाँ हर चीज़ है नई-सी।
कहीं उड़ते हैं हम पंछी बनकर,
नीले आसमान में।
कभी मिलते हैं उन सब से,
जो रहते हैं अब यादों में।
कोई अधूरा सा काम,
पूरा हो जाता है।
कोई भूला हुआ रास्ता,
मिल जाता है।
ये सपने हैं या कुछ और,
जो हकीकत से भी प्यारे हैं।
जब आँखें खुलती हैं सुबह,
तो भी कुछ पल के लिए ये हमारे हैं।
कुछ मीठे हैं, कुछ हैं अजीब,
पर हर सपने में एक कहानी है।
ये सपनों की दुनिया,
दिल को बहुत सुहानी है। 



ज़िन्दगी के सफर में,


ज़िन्दगी के सफर में,
कभी धूप, कभी छांव।
सुबह की सुनहरी किरणें,
जैसे दे रही हों आहट।
दुःख के बादल छाए,
अंधेरा सा छा जाए।
फिर उम्मीद की किरण,
एक नया सवेरा लाए।
कभी पतझड़ आए,
सूखे पत्तों से जीवन भर जाए।
फिर बसंत की बहार,
नये फूल खिल जाए।
कभी तेज़ धूप में,
पसीना बन जाए।
कभी ठंडी छांव में,
सुकून मिल जाए।
इसी तरह ज़िन्दगी चलती जाए,
हँसती, गाती और मुस्कुराती जाए।
कभी धूप, कभी छांव,
यह सब जीवन का हिस्सा बन जाए।


शीर्षक: प्रगति का पाथेय


ज्ञान दीप पुस्तक बनी, मिटा तिमिर अज्ञान।
प्रगति राह प्रशस्त हो, बढ़े मनुज की शान॥
अक्षरों के संग बह रही, उन्नति की रसधार।
पुस्तकों की ओट में, खड़ा सुखी संसार॥

पुस्तक जग की ज्योति अनूप, पाकर खिले ज्ञान का रूप।
जो भी पन्ना प्रेम से खोले, सत्य और विज्ञान ही बोले।
शून्य खोज जब जग को दीन्हा, तब भारत ने गौरव कीन्हा।
बिना ग्रंथ के प्रगति न भाती, कोरी कल्पना हाथ न आती।

ग्रंथ थाम कर हाथ, व्योम की दूरी मापी,
सागर की गहराइ, हृदय की हलचल व्यापी।
लिखी जहाँ इतिहास, वहीं से बढ़ी कहानी,
पुस्तक ही तो आज, विश्व की बनी जवानी।
हर विधा का सार, पृष्ठ पर अंकित मिलता,
जिसने पढ़ा विवेक, प्रगति पथ उस पर खिलता।

मूर्ख बने विद्वान, पुस्तक के सान्निध्य से।
मिले उच्च सम्मान, प्रगति सधे पुरुषार्थ से॥

पुस्तक को आधार कर, बदलो अपनी राह।
लक्ष्य प्राप्त तब ही सधे, मिटे हृदय की दाह॥
मिटे हृदय की दाह, ज्ञान का सूरज उगे।
प्रगति चढे सोपान, आलस्य सभी का भागे॥
कह 'कवि' सुनिये मीत, बने जो उत्तम पुस्तक।
निश्चित ही वह पाय, प्रगति की ऊँची दस्तक॥ 


गीत: भोर का अमृत (ब्रह्म मुहूर्त)


मिटा अंधेरा, हुआ सवेरा, जागो रे इंसान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।
प्रकृति की गोद में अमृत बरसे, शीतल मंद समीर,
यही समय है भाग्य जगाने, तज दो मोह की पीर।

तारों की झिलमिल विदा हो रही, गूंज रहा है मौन,
इस पावन घड़ी को तजकर, सोता है अब कौन?
नसों में बहती नव-स्फूर्ति, मन होता है शांत,
मिट जाते हैं सब संशय, और हृदय के भ्रांत।
पक्षी भी कलरव करते हैं, गाते प्रभु का गान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।

तन-मन को जो निरोग बनाता, बुद्धि को दे विस्तार,
ऋषि-मुनि सब इसी समय में, पाते ज्ञान का सार।
साधक का संबल है यह, विद्यार्थी का वरदान,
एकाग्रचित्त होकर पा लो, वेदों का तुम ज्ञान।
योग और प्राणायाम से, बनता जीवन महान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।

आकाश से गिरती दिव्य रश्मियाँ, सोख रहा संसार,
खुल जाते हैं इसी समय, मोक्ष के पावन द्वार।
परमात्मा से मिलन की घड़ी, सबसे है अनमोल,
अंतर्मन की खिड़की खोलो, सत्य का अमृत घोल।
अंधकार से ज्योति की ओर, बढ़ाओ अपने कदम,
इसी घड़ी में सिद्ध होते हैं, सारे शुभ संयम।

जागो-जागो आलस त्यागो, छोड़ो नींद की खान,
ब्रह्म मुहूर्त में जो जागे, पाए पद और मान। 


गीत: "गीत ही तो जीवन है"

गीत हृदय की धड़कन है, गीत ही मन की प्यास है,
कभी ये बहता आँसू है, कभी मिलन की आस है।
शब्दों के धागे में पिरोई, संवेदना की माला है,
गीत ही सुरमई साया, गीत ही उजियाला है।

गीत सिखाते जीवन नदिया, बहना जिसका काम है,
हर धारा में छिपा हुआ, कोई अनकहा पैगाम है।
वक्त की बेरहम चालों का, यह मौन गवाह बनता है,
टूटे हुए उन सपनों की, यह फिर से राह चुनता है।

कभी ये विरह की रुत बनकर, आँखों से झर जाता है,
कभी चाँद सी सूरत देख, चकोर सा तर जाता है।
पास बुलाती धुन कोई, जब बनके मीठी याद आए,
गीत ही वो जादू है जो, बिछड़ों को पास ले आए।

वतन की खातिर मर मिटने की, ये पावन परिपाटी है,
ये चंदन का तिलक है और, ये बलिदान की माटी है।
थक कर बैठ न ऐ राही, मंज़िल अभी तो बाकी है,
गीत ही संबल बनता है, जब हिम्मत होने लगती फाकी है।

जीना-मरना सब यहीं है, बस यही गीत का सार है,
ये जीवन है धूप-छाँव, कभी जीत तो कभी हार है।
हम मुसाफ़िर हैं चलते जाना, बस यही अपनी कहानी है,
गीत ही अमृत की बूँदें, बाकी सब तो पानी है।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक) 


गीत: नया साल, नया संकल्प


नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
बीत गया जो कल का सपना, नई भोर अब आई है।
आओ मिल कर थामें दामन, नेक नेक इरादों का,
खुद से खुद को बेहतर करने, सुंदर दृढ़ संकल्पों का।

आलस का अब त्याग करेंगे, समय न व्यर्थ गंवाएंगे,
मेहनत की स्याही से अपनी, किस्मत नई सजाएंगे।
सूरज से पहले जागेंगे, ऊर्जा का संचार हो,
अनुशासन हो जीवन में और, कर्मों का जयकार हो।

कटु वचन न बोलें कोई, सबसे मीठी वाणी हो,
मिटे द्वेष और बैर जगत से, सुख की मधुर कहानी हो।
एक वृक्ष हम रोज लगाएंगे, धरती को महकाएंगे,
स्वच्छ रहे परिवेश हमारा, यह संकल्प उठाएंगे।

सीखेंगे कुछ नया रोज हम, ज्ञान का दीप जलाएंगे,
हार मिले तो घबराएं न, फिर से कदम बढ़ाएंगे।
तन को स्वस्थ रखेंगे अपने, मन को पावन रखेंगे,
भीतर जो विश्वास छुपा है, उसको जीवित रखेंगे।

शुभ संकल्पों की शक्ति से, जीवन स्वर्ग बनाएंगे,
नव वर्ष के इस आंगन में, खुशियों के फूल खिलाएंगे।
नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
नया साल है, नया जोश है, नई जीत की बारी है।
_ ललित मोहन शुक्ला गीतकार व लेखक 

गीत: मैं रुकूँगा नहीं (जीत का जुनून)


माना कि राहों में बिछे हैं शूल भारी,
माना कि मुश्किल है आज मेरी ये बारी।
तुलना न कर मेरी दुनिया की ऊंचाइयों से,
मेरे हौसलों ने की है गगन की सवारी।
पंख थके हैं मगर, परवाज़ अभी बाकी है,
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

कभी बैसाखी, कभी पहिया, मेरी पहचान नहीं,
मिट्टी का ये ढांचा ही बस, मेरा जहान नहीं।
जो देख सको तो देखो, मेरी रूह की शिद्दत को,
मुझमें छुपा है सैलाब, मैं कोई शांत तूफान नहीं।
हवाओं से कह दो, अपनी रफ़्तार बढ़ा लें,
मेरी हिम्मत की अब, आगाज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

दुनिया जिसे कमी कहे, मैंने उसे ताक़त माना,
हर ठोकर को मैंने, मंज़िल का इशारा जाना।
छू लूँगा चाँद को मैं, अपने पसीने की धार से,
असंभव के शब्द को मैंने, कभी न पहचाना।
किस्मत की लकीरों को, खुद ही मोड़ दूँगा मैं,
मेरे संघर्षों का, साज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

मैं गिरूँगा, मैं उठूँगा, पर कभी थमूंगा नहीं,
भीड़ का हिस्सा बनकर, गुमनाम रहूँगा नहीं।
मेरी जीत की गूँज, इतिहास सुनाएगा कल,
मैं वो चिराग़ हूँ जो, तूफानों में बुझेगा नहीं।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक)

गीत: उन्नति की नई डगर


हर खेत में हरियाली हो, हर घर में खुशहाली हो,
मेरे गाँव की माटी अब, सोना उगलने वाली हो।
चलो हाथ से हाथ मिलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए
नन्ही आँखों में सपने हों, और हाथों में किताब रहे,
बेटे-बेटी सब पढ़ें-लिखें, ऊँचा सबका ख़्वाब रहे।
अंधियारा अज्ञान का मिटे, ज्ञान का सूरज चमकाना है,
कौशल की नई राहों से, आत्मनिर्भर बन जाना है।
चलो दीप से दीप जलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!

गलियाँ साफ-सुथरी हों अपनी, आँगन में भी शुद्धि हो,
स्वस्थ रहे हर तन-मन अपना, तभी तो बढ़ती बुद्धि हो।
नीम की ठंडी छाया हो, और शुद्ध पवन का घेरा हो,
बीमारी का नाम न हो, खुशियों भरा सवेरा हो।
चलो कदम से कदम बढ़ाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!

हल के साथ अब जुड़ जाए, विज्ञान की नई शक्ति भी,
मेहनत और लगन के साथ, हो कर्म की सच्ची भक्ति भी।
जात-पात के भेद मिटें, बस भाईचारा साथ रहे,
तरक्की की इस दौड़ में, सबका सबके हाथ रहे।
चलो प्रेम की गंगा बहाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए! 


गीत का शीर्षक: तुम्हारी पसंद


जो तुम्हारे लब न कह पाए, वो बात लिखूँगी/लिखूँगा
तुम्हारी आँखों में ठहरी, हर एक जज़्बात लिखूँगी।
पसंद क्या है तुम्हें, बस यही तो जानना है,
तुम्हारे मन की ज़मीं पर, अपनी कायनात लिखूँगी।

वो बारिश की बूंदें, या ठंडी हवा का झोंका
वो बचपन की यादें, या अपनों का भरोसा।
तुम्हें शामें पसंद हैं, या ढलती हुई धूप,
बताओ न क्या भाता है, तुम्हें ख़ुद का ही रूप?
जो तुम चाहो, वही ख़्वाबों की बारात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी हर मुलाकात लिखूँगी।
कभी ख़ामोश रहकर भी, जो तुम कहना चाहो
मेरे कांधे पे सर रखके, जो तुम बहना चाहो।
वो पुराने से नग़मे, या सावन का कोई गाना
मुझे अच्छा लगता है, तुम्हारा यूँ मुस्कुराना।
तुम्हारे दिल की धड़कन की, हर बिसात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी सारी कायनात लिखूँगी।
दुनिया की बातें छोड़ो, बस अपनी बात करेंगे,
तुम जिसे पसंद करो, हम बस वही बात करेंगे। 


शीर्षक: मिलन का उत्सव


थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
आए हो तुम पास मेरे, तो महक उठा है आंगन,
आज हुआ है पूरा जैसे, कोई अधूरा बंधन।

पास बैठो तो वक्त की लहरें, जैसे ठहर सी जाती हैं,
खामोशियाँ भी कानों में, मीठी गजलें गाती हैं।
दुनिया का हर शोर सुहाना, संगीत जैसा लगता है,
तुम्हें देख लूँ एक नजर, तो रोम-रोम ये जगता है।
हृदय के सूने उपवन में, आई प्रेम-मल्हार,
छलक उठा है सागर जैसे, पाकर अपना किनारा।

हाथों में जो हाथ लिया, तो मिट गईं सब दूरियां,
अब न कोई शिकवा बाकी, न कोई मजबूरियां।
ऐसा लगता है जैसे हम, बादलों पर चलते हैं,
एक ही सांचे में ढलकर, हम दोनों अब ढलते हैं।
तुम मिल गए तो मिल गया, खुशियों का ये संसार,
अमर रहे ये पल हमारे, अमर रहे ये प्यार।

थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक) 


सुबह की चाय और 'ठंडी' चेतावनी

कपकपाती ठंड है, और रजाई में हम दुबके हैं,
ख्वाबों में गरम समोसों के, हम कब से अटके हैं।
तभी कान में गूंजी एक आवाज़, जैसे कोई हुंकार हो,
"उठो जी! क्या इरादा है? या फिर बस मेरा इंतज़ार हो?"
मैंने कहा, "ए प्रिये! ज़रा बर्फ की नज़ाकत तो देखो,
बाहर कोहरा घना है, रजाई की इस इबादत तो देखो।"
वो बोलीं, "नज़ाकत गई तेल लेने, उठो और ज़रा हाथ बटाओ,
चाय पीनी है अगर, तो पहले अदरक कूट कर लाओ।"
कांपते हाथों से मैंने, जब अदरक को कूटा है,
लगा जैसे रजाई से मेरा, जन्मों का रिश्ता छूटा है।
किचन में वो खड़ी थीं, जैसे सेना की कोई जनरल हों,
मैं खड़ा था सामने ऐसे, जैसे फ्यूज़ हुआ कोई बल्ब हूं।
चाय की प्याली हाथ में आई, तो रूह को चैन मिला,
पर पत्नी बोलीं, "सुनो जी! शक्कर कम है, ये लो ज़िला।"
मैंने घूंट भरा और कहा, "शक्कर की ज़रूरत क्या है भला?
तुम्हारी बातों की कड़वाहट ही, मेरा असली गला जला!"
बस फिर क्या था...
चाय की चुस्की तो रह गई, पर 'गरमा-गरम' भाषण शुरू हुआ,
ठंड तो भाग गई तुरंत, पर घर में 'इतिहास' का रण शुरू हुआ।
अब रोज़ सुबह ठंड में, मैं चुपचाप चाय बनाता हूं,
बिना चीनी के भी उसे, "बड़ी मीठी है" कह कर पी जाता हूं।
ललित मोहन शुक्ला _( लेखक, कवि व गीतकार) 

पत्नी और ऋतु परिवर्तन



बदला मौसम, खिली धूप, तो पत्नी ने ली अंगड़ाई,
बोली— "सुनिए, संदूक से निकालो मेरी रेशमी रजाई!"
अभी रजाई निकली ही थी कि सूरज ने तेवर दिखाए,
वो बोली— "बड़ी गर्मी है, कूलर के खस कौन बदलवाए?"
बस यही है जीवन का चक्र...
जब आती है नन्हीं सी फुहार, वो रूमानी हो जाती है,
"पकौड़े तल दो" कह-कह कर, मेरी शाम खा जाती है।
बाहर गिरती है बारिश, घर में बेसन का घोल गिरता है,
और रसोई का सारा काम, मेरे ही सिर पड़ता है!
फिर आई पतझड़, गिरे पत्ते, तो उनका मूड भी उखड़ा,
कहने लगीं— "बेजान है चेहरा, देखो मेरा मुखड़ा।"
पार्लर की ऋतु आई ऐसी कि बजट सारा डोल गया,
मेरा बटुआ बेचारा, पतझड़ के पत्तों सा छिल गया।
अब कड़ाके की ठंड आई, तो नया क्लेश शुरू हुआ,
"पिछली साल वाला स्वेटर, अब पुराना और थ्रू हुआ!"
मैडम को चाहिए वेलवेट, मफलर और पश्मीना,
हमें तो फटे कंबलों में ही, अब होगा जीना।

मौसम तो बस साल में, चार बार ही बदलते हैं,
पर पत्नी के मिजाज यहाँ, हर घंटे रंग बदलते हैं।
कुदरत के बदलाव पर तो, मौसम विभाग की नजर है,
पर पत्नी कब बदल जाए... ये तो बस 'ऊपर वाले' को खबर है! 

गीत: समर्पण की लौ 


तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं।
न यह प्यास है, न यह आस है, बस तेरा ही एक अहसास है,
प्रेम की इस दहलीज पर, तू भक्ति है, तू ही प्यास है।

जैसे मंदिर की मूरत में, सादगी मुस्कुराती है,
तेरी सूरत की किरणों से, मेरी सुबह जगमगाती है।
तुझे सोचना ही पूजा मेरी, तुझे माँगना इबादत है,
मेरे दिल के सूने आँगन में, बस तेरी ही हुकूमत है।
मेरी बंदगी, मेरी हर ख़ुशी, तुझसे ही है आबाद,
तू रूह की है आरज़ू, तू ही है दिल की मुराद।

कोई नाम दूँ मैं प्रीत को, या कहूँ इसे आराधना,
तू साज़ है मेरे मौन का, तू ही मेरी साधना।
न दुनिया का कोई शोर है, न ख़्वाबों का कोई जाल है,
जहाँ तू है मेरे रूबरू, वहीं ज़िंदगी बेमिसाल है।
जैसे दीप जले बिन बाती के, अधूरा है श्रृंगार,
वैसे तुझ बिन सूना है मेरा, यह छोटा सा संसार।

तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं... 


भजन: मेरे साँवरे सरकार


साँवरिया तेरी वंशी की धुन, मन को बड़ा लुभाती है।
नैनों में तेरी मूरत है, हृदय में ज्योत जगाती है॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
मेरे गिरधर नागर, तेरी जय-जयकार...

मुरली अधर पर सजी हुई है, मोर मुकुट सिर सोहे।
तेरी मंद-मंद मुस्कावन ने, जग के संकट मोहे॥
तू ही तो है पालनहारा, तू ही है जग का आधार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...

यमुना तट पर रास रचाया, गोपिन के मन भाये।
माखन चोरी करके कान्हा, सबको खूब हँसाये॥
जिसने भी तेरा नाम लिया, उसका बेड़ा पार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...

अर्जुन के तुम सारथी बनके, गीता ज्ञान सुनाया।
भक्त सुदामा की कुटिया को, महलों सा चमकाया॥
शरण पड़े जो तेरी प्रभु, उसे मिले अपार प्यार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
समापन
हे नंदनंदन, हे यदुनंदन, चरणों में स्थान देना।
भूल-चूक सब माफ़ हमारी, अपनी शरण में लेना॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक) 


गीत: अंतर्मन की गूँज

ओ... ओ...
शांति का सागर हूँ मैं, शक्ति का अवतार हूँ
स्वस्थ काया, शुद्ध मन, प्रेम का विस्तार हूँ।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ
हर रिश्ते में घुली हुई, सुखद एक परमात्मा हूँ।

बाहर चाहे शोर हो, भीतर गहरा मौन है
स्वयं को जो जान ले, फिर डराता कौन है?
संकल्पों में तेज है, न डर है न कोई भ्रांति है,
मेरे हर एक श्वास में, बस सुकून और शांति है।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...

न कोई द्वेष मन में है, न कोई शिकवा-गिला
हर रूह में है अक्स मेरा, जिससे भी मैं हूँ मिला।
सम्मान और स्नेह से, महक रहा मेरा हर चमन,
मेरे रिश्ते सबसे सुंदर हैं, खिल रहा जैसे मधुबन।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...

दिव्य किरणों से भरी, मेरी ये काया निर्मल है
चेतना की अग्नि में, जल गया हर छल है।
निरोग मेरा भाग्य है, आनंद ही मेरी राह है,
पूर्णतः स्वस्थ हूँ मैं, बस यही मेरी चाह है।

मै शांत... मै शक्ति... मै स्वास्थ्य हूँ...
मेरे हर रिश्ते में... बस प्यार ही प्यार है।
ललित मोहन शुक्ला (लेखक , कवि व गीतकार) 

चाचा की 'व्हाइट हाउस' वाली चाय

ट्रम्प चाचा ने कस ली कमर, बोले— "अब तो खेल करेंगे,
मादुरो को वेनेजुएला से, हम सीधे पिकअप करेंगे।"
ट्विटर वाली उंगली चमकी, बोले— "सुन लो निकोलस भाई,
बहुत जी लिए राजमहल में, अब खाओ अपनी ही मलाई।"
चाचा ने फेंका 'सैंक्शन' का पासा, बोले— "ये है मेरा स्टाइल,
तेल तुम्हारा बंद करेंगे, चाहे तुम दो मीठी स्माइल।"
मादुरो बोले— "हम न डरेंगे, हम भी पक्के जिद्दी हैं,
अमेरिका के आगे हम तो, नहीं छोटी सी गिद्दी हैं।"
ट्रम्प चाचा ने फोन घुमाया, बोले— "पेंपियो, जरा आना,
मादुरो के लिए एक बढ़िया सा, विदाई पत्र बनाना।"
इधर से 'गुआदो' को उकसाया, उधर से फेंकी जादुई छड़ी,
मादुरो की कुर्सी के नीचे, चाचा ने लगा दी फुलझड़ी।
दुनिया बोली— "अरे चाचा, ये तो बड़ा भारी पंगा है,"
चाचा बोले— "चिंता मत करो, मेरा इरादा चंगा है।
लोकतंत्र की खातिर हमने, ये नया खेल रचाया है,
मादुरो को घर भेजने का, हमने ही प्लान बनाया है।"
चाचा की हुंकार थी तगड़ी, मादुरो थोड़े डोल गए,
पर कुर्सी को ऐसा पकड़ा, कि सारे ताले खोल गए।
उठाने की कोशिश तो खूब हुई, जैसे 'कैब' की हो सवारी,
पर मादुरो भी निकले ढीठ, चालाकी सब पर पड़ी भारी। 

गीत: शिखर की ओर


अंधियारे को चीर के अब, एक नई भोर लानी है,
खुद को गढ़ना है फिर से, नई इतिहास सजानी है।
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में,
चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में।

पहला कदम है खुद को पढ़ना, मन के भीतर झाँकना,
कितनी ताकत छिपी हुई है, अपनी रूह को आँकना।
कमजोरी को ढाल बना लें, डर को पीछे छोड़ दें,
जिधर खड़ी हो मंजिल अपनी, राहों को उस ओर मोड़ दें।
मृदुल भाव से मुस्कुराकर, गम को हमें भुलाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।

राहों में काँटे बिखरे हों, या आएँ तूफ़ान खड़े,
हौसलों के तरकश में लेकिन, तीर हों सबसे बड़े।
गिरना भी एक सीख है साथी, गिरकर फिर से उठना सीख,
दुनिया झुकती है कदमों में, मत माँग किसी से भीख।
पसीने की हर एक बूँद से, अपना भाग्य सजाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।

पहुँचें जब हम शिखर पे जाकर, अंबर को भी चूम लें,
पर जमीन से रिश्ता ना टूटे, मस्ती में हम झूम लें।
खुशहाली वो नहीं जो केवल, ऊँचे महलों में दिखे,
सच्ची बुलंदी वो है जो, औरों के आँसू पोंछना सीखे।
प्रेम भाव की खुशबू से अब, जग को हमें महकाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, लक्ष्य हमें अब पाना है।

चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में,
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में। 

गीत: सनातन का गौरव गान


आदि अनंत है, शिव सा शांत है, सत्य सनातन की धारा।
ऋषियों की तपस्या, मुनियों का चिंतन, जग में सबसे प्यारा॥
हिमगिरि जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारे।
पुण्य भूमि यह भारत माता, हम सब इसके तारे॥

वेदों की ऋचाओं में गूंजे, उपनिषदों का सार यहाँ।
कर्मयोग की गीता गाई, कृष्ण का दिव्य प्रचार यहाँ॥
अहिंसा का पथ, सत्य की शक्ति, राम का आदर्श महान।
त्याग और तप की वेदी पर, अर्पित है सबका सम्मान॥
सत्य सनातन धर्म हमारा, मानवता का है वरदान॥

गंगा की कल-कल में बहती, शुचिता और पवित्रता।
मंदिर के घंटों में बसती, अपनी सादगी, कोमलता॥
कुंभ का मेला, दीपों का उत्सव, पर्व यहाँ हर रंग में।
भक्ति भाव की गूँज सुनाई, देती है अंग-अंग में॥
सभ्यता की यह अमर कहानी, अंकित है कण-कण में॥

विविध वेष और विविध बोलियाँ, फिर भी एक ही प्राण है।
वसुधैव कुटुंबकम् ही, इस मिट्टी की पहचान है॥
उठो संतानों, जागो वीरों, फिर से जग को ज्ञान दें।
विश्व गुरु बन भारत चमके, ऐसा हम वरदान दें॥
जय सनातन, जय हो भारत, गूँजे यह जयगान है॥
ललित मोहन शुक्ला 
(कवि, गीतकार व लेखक) 

गीत: रिश्तों की डोर


रेशम की डोरी है, मन का ये मेल है,
रिश्तों की छाँव में, खुशियों का खेल है।
हो कोई अपना तो, मंज़िल भी पास है,
जीवन की बगिया में, ये ही तो प्यास है।
महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो।

मिट्टी के घरों को, ये महलों सा करते हैं,
खाली से जीवन में, रंगों को भरते हैं।
दुख की कड़ी धूप में, ठंडी ये फुहार हैं,
थक जाए राही जब, तो यही सहारा हैं।
सच्चे हों नाते तो, ईश्वर का रूप हैं,
इनसे ही खिलती, ये सुनहरी सी धूप है।

थोड़ा सा झुक जाना, थोड़ा सा सह लेना,
दिल में न रख कोई, खुल के ही कह लेना।
अहम (ego) की दीवारों को, मिलकर गिराना तुम,
रूठे अगर कोई, हँस कर मनाना तुम।
वक़्त की फुर्सत का, तोहफा दिया करो,
रिश्तों की क्यारी में, उम्मीदें बोया करो।

कड़वे जो बोल हों, शहद सा घोल दो,
बंद जो द्वार हों, प्यार से खोल दो।
रिश्ते वो मोती हैं, जो फिर न मिलेंगे,
सहेजोगे गर इन्हें, तो फूल ही खिलेंगे।
चलो आज फिर से, हम हाथ थाम लें,
रिश्तों की बंदगी का, मिल कर नाम लें।

महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो। 


गीत: जीत की राह


मैदानों की मिट्टी बोले, मन में भर लो विश्वास,
खेल सिखाते जीवन जीना, जगाते नई एक आस।
सफलता के इस महाकुंभ में, आओ हम सब मिल जाएँ,
हर खेल से एक गुण सीखें, अपना भाग्य बनाएँ।

फुटबॉल की सतरंगी दुनिया, हमको यह बतलाती है,
अकेले कोई जीत न पाता, 'एकता' काम आती है।
पास (Pass) बढ़ाओ, ताल बिठाओ, गोल तभी हो पाएगा,
मिलकर चलना सीख लिया तो, जग तेरे संग गाएगा।

क्रिकेट के मैदान में देखो, पिच पर टिकना पड़ता है,
बड़ी पारी खेलने को, 'धैर्य' सदा ही गढ़ता है।
कभी बाउंसर, कभी गुगली, संयम मत तुम खोना,
धैर्य रखोगे अंत तलक तो, होगा सफल सलोना।

टेनिस के उस कोर्ट में देखो, नज़रें गेंद पर टिकी रहें,
'एकाग्रता' (Focus) ही मंत्र यहाँ है, लहरें कितनी भी उठें।
पलक झपकते बाजी पलटे, मन को बस में रखना तुम,
लक्ष्य की रेखा पार करोगे, एकाग्रता से बढ़ना तुम।

दौड़ रही है दुनिया सारी, एथलीट से यह सीखो,
'अनुशासन' के सांचे में, हर दिन खुद को तुम लिखो।
समय की पाबंदी और पसीना, पदक गले लगवाएगा,
अनुशासन जो पाल लिया तो, शिखर हाथ में आएगा।

शतरंज की बिसात बिछी है, चालें अपनी सोच समझ,
'बुद्धिमानी' और दूरदृष्टि, देती है जीत की समझ।
मुश्किल में भी राह निकालना, हार न कभी मानना,
दिमाग की इस शक्ति को तुम, सफलता का आधार जानना।

हार मिले तो साहस रखना, जीत मिले तो मान रहे,
खेल ही तो वह आईना है, जिसमें अपनी पहचान रहे।
उठो चलो और खेलो ऐसे, कि दुनिया तुम्हें सलाम करे,
सफलता के हर खेल में, बस तुम्हारा ही नाम रहे। 


क्रिकेट और जिंदगी: डटे रहो पिच पर!

जिंदगी की पिच पर भैया, सावधानी से बैटिंग करना,
यहाँ 'बॉलर' है वक्त तुम्हारा, गुगली से तुम मत डरना।
कभी दुखों की 'बाउंसर' आएगी, कभी सुखों का 'फुलटॉस',
पर डटे रहोगे क्रीज पर, तभी मनेगा जीत का जश्न खास।
पड़ोसी है 'थर्ड अंपायर', हर गलती पर उंगली उठाएगा,
रिश्तेदार हैं 'फील्डर' जैसे, कैच लपकने को हाथ बढ़ाएगा।
पर तुम घबराना मत दोस्त, चाहे 'स्लेजिंग' करे जमाना,
तुम्हें तो बस अपनी धुन में, 'हेलीकॉप्टर शॉट' है लगाना।
कभी किस्मत 'नो बॉल' देगी, तो 'फ्री हिट' पर चांस मारना,
अगर 'डक' पर आउट हो जाओ, तो रोकर हिम्मत मत हारना।
क्योंकि ये 'टेस्ट मैच' है लंबा, यहाँ हर दिन नया सवेरा है,
आज अगर तुम 'जीरो' हो, तो कल शतक भी तेरा है।
पेट निकला हो या बाल उड़े हों, बस 'स्ट्राइक' रोटेट करते रहो,
जिंदगी का 'रन रेट' चाहे जो हो, चेहरे पर मुस्कान भरते रहो।
क्योंकि अंत में स्कोरबोर्ड नहीं, ये देखा जाएगा मेरे भाई,
कि हारने के डर से भागे थे, या लड़कर की थी तुमने विदाई! 

गीत: राही और राह


मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है।
किस ओर मुड़ें, क्या मोड चुनें, ये मन का भ्रम मिटाता चल,
दिखा दे जो सही दिशा, उस रौशनी को पाता चल।

कभी ऊबड़-खाबड़ राहें होंगी, कभी काँटों का घेरा होगा,
पर याद रख ऐ मुसाफिर, हर रात के बाद सवेरा होगा।
कदमों के नीचे धूल नहीं, ये तो अनुभव की थाती है,
दिशा वही है सच्ची, जो मंज़िल को पास बुलाती है।
मंजिल की कोई फिक्र नहीं...

हवाएँ हमसे पूछेंगी, किधर को तेरा ठिकाना है?
कह देना कि बहना ही, बस मेरा एक बहाना है।
नक्शों में जो न मिले कभी, वो रास्ता दिल से जाता है,
जो खुद पर रख ले यकीन, वही सही दिशा को पाता है।

कहीं झरने कल-कल गाते हों, कहीं पेड़ों की ठंडी छाँव मिले,
उसी डगर पर बढ़ना तुम, जहाँ प्यार भरा कोई गाँव मिले।
रास्ता ही अब हमसफर है, रास्ता ही अब मीत है,
सफर का हर एक लम्हा ही, जीवन का मधुर संगीत है।

मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है। 

गीत: गौरव की भाषा हिन्दी


भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष) 

गीत: श्रम की मशाल


उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
पसीने की हर बूंद में, सृजन की एक बात है।
न थकना है, न रुकना है, ये संकल्प महान है,
श्रमिक के ही कंधों पर, टिका ये जहान है।
जय श्रम! जय श्रमिक! तुम युग के निर्माता हो।

तुमने काटीं चट्टानें, तो राहें निकल आईं,
तुमने सींचा मरुथल, तो फसलें लहलहाईं।
ये ऊँची अट्टालिकाएँ, ये कल-कारखाने सब,
तुम्हारी ही उँगलियों ने, रची है ये दुनिया अब।
लोहा तुम जब गलाते हो, तो रूप नया ढलता है,
तुम्हारे ही पसीने से, प्रगति का पहिया चलता है।

नहीं याचना हाथ में, पुरुषार्थ का संबल है,
मेहनत की रोटी में ही, छिपा असली संबल है।
धूप हो या छाँव हो, तुम अडिग हिमालय से,
रोशनी तुम लाते हो, श्रम के देवालय से।
मिट्टी से सोना उपजाना, तुम्हारा ही तो काम है,
हर ईंट जो तुमने रखी, उस पर तुम्हारा नाम है।

हाथ से जो हाथ मिले, तो शक्ति बन जाती है,
सहयोग की एक लहर, तकदीर बदल जाती है।
थक हार के बैठो मत, अभी लक्ष्य दूर है,
आने वाला कल तुम्हारा, तुम कल के नूर हो।
अंधियारे को चीर कर, नया दौर लाएंगे,
श्रम की पावन मशाल से, जग को जगमगाएंगे।

उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
श्रमिक के ही स्वाभिमान में, गौरव की गाथा है।
जय श्रम! जय श्रमिक! 


गीत: गौरव की भाषा हिन्दी


भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष) 

गीत: "मंजिल की ओर चल"


उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है,
सोए हुए इस कौम के मन में, विश्वास फिर से जगाना है।
न रुकना है, न थकना है, बस बढ़ते ही जाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

विवेकानंद की वाणी का, तुम पावन मंत्र दोहराओ,
'उठो, जागो और लक्ष्य की' राहों पर तुम कदम बढ़ाओ।
शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम सागर से भी गहरे हो,
तुम सूर्य की उज्ज्वल किरण हो, तुम साहस के पहरे हो।
अज्ञान का अंधियारा तजकर, ज्ञान का दीप जलाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

बाधाएं आए राहों में, तो तुम बन जाओ हिमालय,
संघर्षों की आग में तपकर, बनो स्वयं ही देवालय।
जाति-पाँति का भेद मिटाकर, प्रेम का पाठ पढ़ाएंगे,
हाथों में लेकर हाथ हम, नव-युग का दीप जलाएंगे।
आलस की जंजीरें तोड़ो, समय की मांग निभाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

तुम कल के कर्णधार हो, तुम ही देश की धड़कन हो,
तुम्हारी आँखों में सपने, और रगों में देशभक्ति का गुंजन हो।
आकाश को तुम छू लो पर, पाँव जमीन पर टिके रहें,
संस्कारों की इस मिट्टी के, संस्कार कभी न मिटें रहें।
युवा शक्ति का परचम अब, जग में हमें फहराना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है...
मंजिल की ओर चल... तू मंजिल की ओर चल! 

फूलों की मुस्कान

कांटों की गोद में पलकर भी,
जो अपनी मुस्कान नहीं खोते।
पत्थरों के बीच जगह बनाकर,
जो जीवन के बीज हैं बोते।
धूप तपन हो या झमाझम बारिश,
हर हाल में वे मुस्काते हैं।
खुद को बिखेर कर खुशबू में,
जग को महकना सिखाते हैं।
कभी न देखा फूलों को,
अपनी किस्मत पर रोते हुए।
वे तो बस खिलना जानते हैं,
सब कुछ अर्पण करते हुए।
सीख यही है जीवन की,
चाहे राहों में कितने हों शूल।
हौसला ऐसा रखो हृदय में,
कि तुम भी बन जाओ एक फूल।
ना गिरने का डर हो मन में,
ना मुरझाने का कोई शोक।
अपनी खुशबू ऐसी फैलाओ,
कि नतमस्तक हो सारा लोक।

ललित मोहन शुक्ला ( लेखक व रचनाकार)

मिजाज-ए-इश्क

"सलीका तुम ने सीखा ही नहीं शायद मोहब्बत का,
चाय ठंडी हो गई... और तुम अभी तक सोच रहे हो।"

 "इक कप चाय दो प्यालों में बराबर बाँट कर,
हमने अक्सर रंजिशों की बर्फ पिघलते देखी है।"
 "वो चाय की चुस्कियाँ, वो यादों का कारवाँ,
शाम ढलते ही अक्सर, महफ़िल जम जाती है।"


 "रिश्तों की मिठास बढ़ानी हो तो बस इतना करना,
 चीनी कम रखना और चाय साथ बैठ कर पीना।"

ललित मोहन शुक्ला (विश्व चाय दिवस पर विशेष) 


🌸 आया बसन्त, मचा हुड़दंग! 🌸


लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त!
कलियों ने घुँघरू बाँध लिए,
भँवरों ने सुर का साथ दिया,
मस्ती में झूमे हर कोई यहाँ,
जैसे धरती ने कोई ख़्वाब लिया!

पीली-पीली सरसों देखो, खेतों में मुस्काती है,
कोयल रानी अमवा की डाली पर तान सुनाती है।
हवा चली ऐसी मतवाली, जैसे कोई जादू कर डाला,
फूलों ने पहना है देखो, लाल-गुलाबी चोला निराला।
शरम छोड़कर नाचे दुनिया, छोड़ो अब तुम भी ये गम,
संग हमारे थिरको प्यारे, छम-छम, छम-छम, छम-छम!

सूरज की किरणों ने आकर, ओस की बूंदें चुराई हैं,
ठंडी-ठंडी रातों ने अब, अपनी विदाई गाई है।
नदी किनारे पछुवा बोले, गूँज उठा है सारा गाँव,
आओ सखियों पींग बढ़ाएँ, झूला डालें बरगद छाँव।
मस्त कलंदर हुए हैं सारे, मौसम बड़ा चंगा है,
दिल की पतंगें उड़ रही ऊँची, उड़ान बड़ी नौरंगा है!

ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा, सब मस्त मगन इस बेले में,
आओ खो जाएँ हम सब मिलकर, कुदरत के इस मेले में।
लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त! 

गीत: आया पर्व संक्रांति का


लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।
तिल-गुड़ की मीठी बोली है, मन में छाई खुशहाली है,
सूरज की स्वर्णिम किरणों ने, हर आँगन दीवाली है।

पीली सरसों लहराती है, खेतों में सोना उग आया,
कोयल की कूक ने कानों में, वसंत का राग सुनाया।
शीत की विदा की वेला है, गुनगुनी धूप मन भाती है,
नदियों के पावन तट पर देखो, श्रद्धा शीश झुकाती है।

खिचड़ी की सोंधी खुशबू से, घर-घर महक रहा सारा,
दान-पुण्य और सेवा का, बहता पावन अमृत धारा।
'तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला', प्रेम का मंत्र सिखाया है,
आज ऊंच-नीच के भेदों को, सबने मिलकर बिसराया है।

वो काटा... वो मारा... की गूँज रही छत-छत टोली,
रंग-बिरंगी पतंगों ने, अम्बर में खेली होली।
भारत की सतरंगी संस्कृति, आज एक सुर में गाती है,
संक्रांति की ये मधुर छुअन, रिश्तों में मिठास बढ़ाती है।

लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।

गीत: धर्म की राह, कर्म का साथ

धर्म हृदय की ज्योति है, और कर्म हाथ की शक्ति,
इन दोनों के संगम में ही, छिपी प्रभु की भक्ति।
धर्म सिखाता जीना कैसे, कर्म सिखाता बढ़ना,
सच्चे मन से इस दुनिया में, अपना दायित्व गढ़ना।

सिर्फ जपना नाम नहीं है धर्म का असली सार,
दीन-दुखी की सेवा करना, सबसे बड़ा उपकार।
धर्म अगर है नींव जगत की, कर्म है सुंदर द्वार,
बिना किए कुछ हाथ न आए, कहते सब शास्त्रार्थ।
धर्म दीप है राह दिखाने, कर्म डगर का पाँव,
इनके बिना न मिल पाएगी, सुख की शीतल छाँव।

मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे में धर्म को मत तुम ढूँढो,
अपने भीतर सोए हुए उस इंसान को तुम ढूँढो।
पसीने की हर एक बूँद में, ईश्वर का वास है होता,
वही हाथ हैं पावन सबसे, जो बीज प्रेम का बोता।
कर्म बिना सब ज्ञान अधूरा, धर्म बिना सब अंधा,
सत्य कर्म ही काट सके इस भव-सागर का फंदा।

धर्म हमारी मर्यादा है, कर्म हमारी पहचान,
दोनों मिलकर ही बनाते, मानव को इंसान।
यही सार है जीवन का, और यही है मधुर संदेश,
धर्म-कर्म को जोड़ के देखो, मिट जाएँगे क्लेश।

गीत: बहारों की मंज़िल


हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
कहाँ है वो दुनिया, जहाँ प्यार है,
जहाँ हर तरफ बस खिली ही बहार है?
हम चल पड़े हैं वहीं की डगर,
जहाँ प्यार की है सुहानी डहर...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

ये फूलों की खुशबू, ये भौरों का गाना,
जैसे सुनाए कोई पुराना अफ़साना।
नदियों के बहते हुए पानी की कल-कल,
हौले से दिल में मचाती है हलचल।
न कोई फ़िक्र हो, न कोई डगर हो,
बस तू साथ हो, और हसीं सफ़र हो।
मंजिल पे अपनी मिलेगा ये दिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

जहाँ नीले अम्बर तले शाम ठहरे,
जहाँ यादों के पहरे हों थोड़े सुनहरे।
हल्की सी ओस और मद्धम सी धूप,
निखरा हो जिसमें तेरा ही रूप।
ख्वाबों के पंखों पे उड़ते चलें,
सारे ज़माने से लड़ते चलें।
होगा मुकम्मल वहीं अपना मिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
ललित मोहन शुक्ला (रचनाकार) 

शीर्षक: प्रेम ही मेरी बंदगी


ओ... ओ...
प्रेम एक पावन गंगा की धारा,
प्रेम ही मन का उजियारा।
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काबा के धाम में,
मिलेगा खुदा बस प्रेम के ही नाम में।
प्रेम एक आराधना है, प्रेम ही उपासना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

बिन बोले जो सब कुछ कह दे, वो भाषा है प्रेम,
बिना छुए जो रूह को छू ले, वो एहसास है प्रेम।
जैसे मीरा ने मोहन को पाया, बस नाम पुकार के,
जैसे राधेश्याम बसे हैं, एक दूजे को हार के।
ये मीरा की मस्ती है, ये राधा की भावना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

धूप-दीप और फूल नहीं, बस श्रद्धा का एक तार हो,
जीवन की हर सांस का, बस प्रेम ही आधार हो।
जहाँ स्वार्थ का अंत हो, वहीं से शुरू खुदा,
प्रेम ही है वो इबादत, जो करे न कभी जुदा।
हर धड़कन की लय में है, प्रभु की ही प्रार्थना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

जहाँ प्रेम है, वहां शांति है,
जहाँ प्रेम है, वहां मुक्ति है।
प्रेम ही आदि, प्रेम ही अंत,
प्रेम ही सत्य, प्रेम अनंत...
प्रेम ही मेरी बंदगी, प्रेम ही उपासना। 

गीत: बहारों की नई सरगम


लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

गीत: "जीवन की डोर और उम्मीदों की पतंग"


नीले नभ के आंगन में, आज सतरंगी मेला है,
हर दिल में इक अरमान है, कोई न यहाँ अकेला है।
संकट की तीखी हवाओं से, जो लड़ना सीख जाती है,
वही पतंग मकर की धूप में, ऊँचाइयां पाती है।

बिना हवा के थपेड़ों के, पतंग कहाँ उड़ पाती है?
जीवन की मुश्किलें भी, हमें ऊपर ले जाती हैं।
ढेर सारी कन्ने कस लो, तुम अटूट विश्वास के,
थमना नहीं है डरकर तुमको, झोंकों के उपहास से।
जैसे ढील और खींच का, संगम उड़ान भरता है,
वैसे ही संयम जीवन में, हर मुश्किल को हरता है।

आसमान की होड़ में, गर पेंच कभी लड़ जाए,
कट जाए उम्मीद की डोर, या मन थोड़ा घबराए।
गिरना अंत नहीं है उसका, फिर से उसे संवरना है,
अगली सुबह नई उड़ान का, फिर संकल्प उभरना है।
कटी पतंग भी सिखाती है, कि मिट्टी से जुड़ना होगा,
आसमान को छूने के लिए, फिर शून्य से मुड़ना होगा।

तिल-गुड़ की उस मिठास सा, रिश्तों में प्यार घोलना,
ऊँची उड़ान के लालच में, अपनों को न छोड़ना।
जब तक हाथ में संयम है, और नीयत साफ तुम्हारी है,
यकीन मानो इस अंबर पर, सिर्फ जीत तुम्हारी है।
उड़ो शिखर तक तुम ऐसे, कि खुद मिसाल बन जाओ,
इस संक्रांति तुम भी अपनी, किस्मत की पतंग लहराओ।
(उपसंहार)
तो काटो गम की डोर को, और खुशियों का पेच बढ़ाओ,
आया है संक्रांति का पर्व, अपनी मंजिल को पा जाओ!
ललित मोहन शुक्ला ( शब्द शिल्पी) 

शीर्षक: राह तू अपनी बनाए जा

 
अंधेरों की फिक्र न कर, तू खुद एक सवेरा है
ये रास्ते भी तेरे हैं, और ये आसमान तेरा है।
थक कर न बैठ ए मुसाफिर, अभी तो उड़ान बाकी है
ज़मीन खत्म हुई तो क्या, अभी पूरा आसमान बाकी है।
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो,
मंजिल की ओर कदम धरो।
तूफानों से टकराना सीखो,
खुद अपनी राह बनाना सीखो।

कांटों भरी डगर मिलेगी, पांव तेरे डगमगाएंगे
अपनों के ताने, जग की बातें, तुझको बहुत डराएंगे।
पर तू अपनी धुन का पक्का, दिल में एक विश्वास जगा
गिरी हुई हर उम्मीद को, फिर से तू आज़ाद बना।
मुश्किलों को कह दे तू, मेरा हौसला भी गहरा है
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...

सूरज की तपिश को सहकर ही, कुंदन चमक बिखेरता है
सागर की लहरों से लड़कर ही, मांझी किनारा पाता है।
बीता कल अब बीत गया, उसकी धूल को झाड़ दे
आने वाले कल के पन्नों पर, तू अपनी जीत गाड़ दे।
न रुकना है, न झुकना है, बस जीत का दम तू भरे जा
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...

तेरी मेहनत की गूंज एक दिन, सारा जग ये गाएगा
तू आज अगर न हारा, तो कल इतिहास बनाएगा।
आगे बढ़ो!
ललित मोहन शुक्ला ( लेखक , गीतकार एवं कवि) 


शीर्षक: सृष्टि का पैगाम


नीले नभ से उड़ते पंछी, लाते एक पैगाम हैं,
बहती नदियां, झूमते जंगल, सबका यही कलाम है।
धरती की इस पावन गोद में, हर जीवन मुस्काए,
शांति, प्रेम और भाईचारे का, स्वर गूंजता जाए।

पशुओं की उन मूक आँखों में, करुणा का पैगाम छुपा,
पेड़ों की शीतल छाया में, निस्वार्थ दान का नाम छुपा।
कल-कल करती जल की धारा, कहती—"चलना जीवन है",
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, महकता अपनापन है।
हर कोंपल एक संदेश सुनाती, नवजीवन की आशा का,
प्रकृति कभी न भेद बढ़ाती, ये संगम है परिभाषा का।


माथे के पसीने से जो, उपजाता है सोना,
उस श्रमिक के हाथों में है, खुशियों का कोना-कोना।
आम आदमी की सादगी में, धीरज का पैगाम बसा,
कठिन राहों में भी देखो, उसका अडिग विश्वास फंसा।
मेहनत की रोटी कहती है—"अभिमान बड़ा ही कच्चा है",
जो औरों के काम आए, वही इंसान सच्चा है।

उन महान पुरखों ने हमको, सत्य-अहिंसा सिखलाई,
त्याग, तपस्या और न्याय की, एक मशाल जलाई।
नेताओं का वही पैगाम, जो जन-जन को जोड़ सके,
नफरत की बहती आंधी का, जो रुख अपनी ओर मोड़ सके।
सबका साथ और सबका हित ही, धर्म का असली सार है,
जिसमें प्रेम समाहित हो, वही तो सच्चा संसार है।

आओ मिलकर थाम लें दामन, इस सुंदर पैगाम का,
रंग सजाएं धरती पर हम, खुशियों भरी शाम का।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा, न कोई यहाँ पराया है,
इस मिट्टी की खुशबू ने ही, सबको गले लगाया है।
ललित मोहन शुक्ला _( गीतकार) 

गीत: अनमोल है ये सांसें


ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना
बड़ी मुश्किल से मिलता है, ये जीवन का सुहाना।
न कल की फिक्र में खोना, न बीते कल में रोना
जो पल है हाथ में तेरे, उसी में मुस्कुराना।
कभी जो धूप तड़पाए, तो साया बनके ढल जाना
किसी के बहते अश्कों में, खुशी बनके निकल जाना।
न धन-दौलत से आँका कर, तू अपनी खुशकिस्मती को
सुकून मिलता है अपनों में, यही सच मान लेना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
बुराई को मिटाने का, बस एक ही मूलमंत्र है
जहाँ नफरत का घेरा हो, वहाँ तू प्यार बोना।
न छोटा कोई, न बड़ा कोई, खुदा की इस कचहरी में
हृदय में सबके बसता है, वो पावन दिव्य कोना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
मिले जो राह में पत्थर, तो उनसे घर बना लेना
हो मुश्किल सामने कितनी, न अपना सिर झुकाना।
जियो ऐसे कि दुनिया में, तुम्हारी याद रह जाए
महकते फूल की सूरत, चमन सारा सजाना।
ये अनमोल है जीवन, इसे जीना सिखा दो तुम
जहाँ भी पैर रक्खो तुम, गुलशन खिला दो तुम।

गीत: बहारों की नई सरगम


लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

शीर्षक: कहाँ गए वो दिन?


वो कच्ची डगर, वो मिट्टी की खुशबू,
वो यादों का झूला, वो अपनों का जादू।
कहाँ खो गए वो हसीं खेल सारे,
वो कागज़ की नैया, वो सावन की फूहारे।
मेरे हमजोली, वो संगी-सहाने,
चलो फिर से ढूँढें वही बीते ज़माने।

कभी कंचे खेलना, कभी गिल्ली-डंडा,
वो चिलचिलाती धूप में भी मन रहता चंगा।
छुपन-छुपाई में छुपना वो दीवार के पीछे,
पकड़े जाने पर हँसना, आँखें किए मीचे।
वो पिट्ठू की थपकियाँ, वो गुड़ियों की शादी,
हवाओं में घुली थी जैसे अपनी आज़ादी।

वो छोटी सी बात पर कट्टी हो जाना,
फिर उँगली फँसाकर वो 'अब्बा' मनाना।
लड़ना-झगड़ना और पल में फिर एक होना,
न दिल में कोई मैल, न खुशियों को खोना।
फटे थे वो कुर्ते, वो घुटनों की खरोंचें,
मगर दिल थे राजा, न कल की कुछ सोचें।

अब न वो आँगन है, न वो यार प्यारे,
सब सिमट गए हैं मोबाइल के द्वारे।
मशीनी हुई दुनिया, मशीनी हुए हम,
बचपन की उन यादों से आँखें हैं नम।
लौटा दो वो गलियाँ, लौटा दो वो शोर,
खींच ले जो पीछे, कहाँ गई वो डोर?

चलो आज फिर से वो यादें सजाएँ,
पुराने उन यारों को आवाज़ लगाएँ।
वही बचपन के खेल, वही हमजोली,
चलो फिर से खेलें, भरें खुशियों की झोली।
ललित मोहन शुक्ला  ( गीतकार) 

गीत: हम तुम


धड़कनों में बसी एक सरगम हो तुम,
मेरी सूनी सी दुनिया का मरहम हो तुम।
लिखा है जो खुदा ने हथेली पे मेरी,
वही अनकहा सा हसीन गम हो तुम।
जब से मिले हैं, थम सा गया है...
ये वक्त, ये मंजर, ये आलम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

तेरी आँखों में देखा तो खुद को पाया,
जैसे तपती धूप में ठंडी सी कोई छाया।
बिना बोले ही सब कुछ कह जाती हो,
मेरे खयालों में सुबह-शाम रहती हो।
चाहत की इस राह पर साथ चलेंगे,
बनकर वफ़ा का अटूट एक परचम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

दुनिया की भीड़ में हाथ न छोड़ना,
दिल के इस धागे को कभी न तोड़ना।
तू है तो मुकम्मल है मेरी हर दुआ,
तुझसे ही शुरू, तुझपे ही खत्म ये कारवां।
जिंदगी के हर सुख-दुख को बाँट लेंगे,
दुआ है कि साथ न छूटे कभी जन्मों-जनम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

सजदे में झुके सर ने बस यही मांगा है,
कि मुकद्दर में लिखे हों सिर्फ... हम और तुम। 

गीत का शीर्षक: धड़कनों की दास्ताँ


(धीमी और रूहानी संगीत के साथ शुरू)
एक प्यार भरा ये दिल मेरा, बस तुमको पाना चाहता है,
तेरी आँखों की इन गलियों में, खो जाना जाना चाहता है।
मिले जो मुझे मेरा दिलबर, तो रब से और क्या माँगूँ मैं,
इन धड़कनों की हर आहट को, तेरे नाम सजाना चाहता हूँ।

तेरी खुशबू से महके ये रस्ते, तेरी यादों में डूबी हैं शामें,
मेरे दिल के कोरे काग़ज़ पर, लिख दी हैं मैंने तेरी वफ़ाएँ।
तू चाँद है मेरी रातों का, तू धूप है सुनहरी सुबहों की,
मेरी रूह में बस गया तू ऐसे, जैसे प्यास हो सदियों प्यासी सी।

दुनिया की भीड़ से क्या लेना, जब पास मेरा दिलबर हो,
सहरा में भी गुलशन खिल जाए, गर तेरा हाथ मेरे हाथ में हो।
न माँगूँ सोना, न चाँदी, बस एक वादा तेरा काफी है,
प्यार भरा ये दिल मेरा, तेरे प्यार का ही बस साकी है।

प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ,
बन गई मुकम्मल मेरी हर एक बात।
हाँ, प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ। 

गीत: "जीवन का आधार है जल"


कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है,
जिसके कण-कण में है जीवन, ईश का यह उपहार है।
कहीं 'नीर' है, कहीं 'तोय' है, कहीं 'वारि' की धार,
बिन इसके सूना हो जाए, सारा यह संसार।

गगन से जो 'पय' बनकर बरसे, धरती की प्यास बुझाता है,
संस्कृत की पावन वाणी में, वह 'उदक' भी कहलाता है।
शीतल-निर्मल 'सलिल' रूप में, नभ से जो झड़ जाता है,
वही 'अंबु' बन सरिताओं में, सागर तक मिल जाता है।

तपते मरुथल की यह आशा, तरु-पल्लव का श्रृंगार है,
संस्कृति का यह 'आब' निराला, गौरव का आधार है।
इसे 'अमृत' कहो या 'जीवन', यह सब रूपों में श्रेष्ठ है,
जल संरक्षण ही अब जग में, सबसे उत्तम ध्येय है।

बूंद-बूंद को व्यर्थ न खोना, यह विनती बारम्बार है,
'वारि' बिना इस वसुंधरा का, होना नहीं उद्धार है।
कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है...
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)

शीर्षक: उत्तम भाग्य बनायेंगे


नए युग की ये पुकार है, नया संकल्प जगाएंगे,
अपने हाथों से हम अपना, उत्तम भाग्य बनायेंगे।
न हाथों की रेखाओं से, न कल के भरोसे बैठेंगे,
हम पुरुषार्थ के बल पर अब, सोई किस्मत जगायेंगे।
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

श्रेष्ठ विचारों की भूमि पर, उन्नति का बीज बोना है,
जैसा होगा दृष्टिकोण, वैसा ही सुख-चैन पाना है।
सकारात्मक सोच बने अब, जीवन का आधार यहाँ,
सत्य, अहिंसा, प्रेम के पथ पर, अपना शीश झुकाना है।
पावन मन के दर्पण में, सुंदर चित्र सजायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

कर्म ही है पूजा हमारी, कर्म ही सबसे महान है,
कर्तव्य पथ पर चलते रहना, यही सच्चा धर्म विधान है।
आलस्य को त्याग के अब हम, पसीने की धार बहायेंगे,
जितना गहरा श्रम होगा, उतना ऊँचा सम्मान है।
नेक नीयती की शक्ति से, जग को हम महकायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

वर्तमान की माँग को समझें, समय के साथ जो चलना है,
नई तकनीक और कौशल से, खुद को अब निखारना है।
ज्ञान-विज्ञान के पंख लगा कर, छूना ऊँचा आसमान,
बदलती हुई इस दुनिया में, अपना नाम उभारना है।
सजग बनेंगे, कुशल बनेंगे, नया हुनर अपनायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

धैर्य, नियम और अनुशासन, जीवन में हम लायेंगे,
खुद को गढ़कर मिट्टी से हम, कंचन-सा चमकायेंगे।
अंधियारे को चीर के अब हम, सूरज बन छा जायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे, हम उत्तम भाग्य बनायेंगे! 

गीत: भारत भारती


हिमालय जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारता है,
पुण्य भूमि यह देवों की, जग जिसको नमन गुजारता है।
सत्य, सनातन, सुंदर पावन, भारत देश हमारा है,
विश्व पटल पर चमक रहा जो, वह ध्रुव तारा न्यारा है।

जहाँ गूँजती वेदों की ऋचाएं, ॐकार का नाद यहाँ,
त्याग, तपस्या, धर्म, कर्म का, होता है शंखनाद यहाँ।
अद्वैत का दर्शन दिया यहाँ, सबको गले लगाया है,
'वसुधैव कुटुम्बकम्' का पावन, मंत्र विश्व को सिखाया है।
कण-कण में शंकर बसते हैं, पत्थर भी पूजा जाता है,
यही सनातन धर्म हमारा, जग का भाग्य विधाता है।

राम का आदर्श यहाँ है, कृष्ण की गीता गाती है,
बुद्ध, महावीर की करुणा, इस माटी में मिल जाती है।
प्रताप का स्वाभिमान और, शिवा का ओज निराला है,
झांसी वाली रानी ने, स्वाधीनता को पाला है।
शून्य दिया इस दुनिया को, विज्ञान की राह दिखाई है,
सोने की चिड़िया ने अपनी, फिर से आभा पाई है।

विविध वेश, भाषाएं अनेक, पर हृदय एक ही धड़के है,
गंगा-जमुना की लहरों में, प्रेम का अमृत झलके है।
सहिष्णुता की परिभाषा, हर भारतवासी गाता है,
अतिथि देवो भवः कहकर, सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
चलो सजाएं फिर से हम, इस गौरवमयी इतिहास को,
सत्य मार्ग पर चल कर छू लें, उन्नत नील आकाश को।

जयतु-जयतु भारतम्, जयतु-जयतु सनातनम्,
वन्दे मातरम, वन्दे मातरम!
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

गीत: इस नाम को क्या नाम दूं?


ये जो ख़ामोश सा एक तार है,
ना दोस्ती है, ना सिर्फ़ प्यार है।
एक उलझन है जो सुलझती नहीं,
एक प्यास है जो बुझती नहीं।
साँसों में घुली इस शाम को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

कभी लगे कि तुम मेरे ही हो,
जैसे धूप में ठंडी छाँव से हो।
कभी लगे कि तुम एक ख़्वाब हो,
हकीकत में ढलते हिसाब हो।
बेवजह की इस पहचान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

कोई लफ्ज़ नहीं जो तुम्हें कह सके,
कोई दरिया नहीं जिसमें ये बह सके।
तुम दुआ भी हो, तुम दर्द भी,
तुम नर्म भी हो, तुम सर्द भी।
रूह की इस गहरी मुस्कान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

दुनिया पूछेगी तो क्या कहेंगे हम?
खामोश रहकर कितना सहेंगे हम?
बेनाम सा ये रिश्ता रहने दो,
इसे हवाओं के संग ही बहने दो।
अनकही सी इस दास्तान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं? 

शीर्षक: हार जीत

ना हार में तू टूटकर, खुद से मुँह को मोड़ना,
ना जीत में तू झूमकर, ज़मीं से नाता तोड़ना।
यह वक्त का दरिया है बस, बहता ही जाएगा,
जो आज पीछे रह गया, वो कल शिखर पर आएगा।

अगर मिली है मात तो, वो हार नहीं एक सीख है,
कमी कहाँ पर रह गई, उसे परखना ठीक है।
गिरना बुरा होता नहीं, गिर के ना उठना हार है,
कोशिशों की धार ही, बस जीत का आधार है।
धैर्य का दामन पकड़, तू मंज़िलें तलाश कर,
हताशा की राख से, तू शौर्य का प्रकाश कर।

जो जीत का गुलाल उड़े, तो सिर को तू झुकाए रख,
है हाथ में आकाश पर, पाँव को टिकाए रख।
अहंकार की आंधी में, अक्सर महल ढह जाते हैं,
जो विनम्र रहते सदा, वही इतिहास रचाते हैं।
जीत महज एक पड़ाव है, ये आख़िरी मुकाम नहीं,
थक के बैठ जाना ही, वीरों का तो काम नहीं।

सुख और दुःख के चक्र में, तू शांत मन का दीप बन,
हर हाल में जो अडिग रहे, तू उस लहर का सीप बन।
ना हार में निराश हो, ना जीत में तू चूर हो,
कर्म की इस राह पर, तू जग में मशहूर हो।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

कलम की मशाल: विदाई संदेश

विदाई की इस वेला में, एक सीख तुम्हें सिखलाता हूँ,
अपने जीवन के अनुभवों का, मैं सार तुम्हें बतलाता हूँ।
मैंने सींचा है इन हाथों से, तुम्हारी प्रतिभा की क्यारी को,
अब समय तुम्हारा आया है, चमकाने को इस बारी को।
जाति-पाँति की संकीर्ण दीवारें, तुम मिलकर आज ढहा देना,
मानव हो तुम पहले बस, यह जग को आज बता देना।
ऊँच-नीच के भेद छोड़कर, प्रेम का दीप जलाना तुम,
सच्चे भारत की मूरत को, दुनिया में फिर से सजाना तुम।
आलस्य शत्रु है सबसे बड़ा, इसे पास कभी न आने देना,
सपनों की उड़ान को अपनी, तुम कभी न थकने देना।
रुकना नाम है मौत यहाँ, चलना ही बस जिंदगानी है,
तुम्हारे पसीने की हर बूँद में, कल की नई कहानी है।
सीखना कभी मत छोड़ना तुम, नए हुनर को अपनाना,
बदलते इस संसार में, तुम अपनी छाप बनाना।
कौशल की धार सजे हाथों में, तो जग झुकता कदमों में है,
सफलता की असली कुंजी, केवल तुम्हारे उद्यम में है।
मेरे देश का नाम रहे ऊँचा, यही है मेरी अंतिम आस,
तुम बनो राष्ट्र के नव-निर्माता, रखो स्वयं पर यह विश्वास।
मैं रिटायर हो रहा हूँ आज, पर मेरी दुआएँ साथ रहेंगी,
तुम्हारी हर एक कामयाबी, मेरा गौरव बनकर बहेंगी।
ललित मोहन शुक्ला शिक्षक 

गीत: लक्ष्य हमारा, नया सवेरा

उठो युवा! अब आँखें खोलो, मंज़िल तुम्हें बुलाती है,
हाथों की इन रेखाओं से, क़िस्मत नहीं बनाई जाती है।
चाहे नौकरी की राह चुनो, या खुद का मार्ग बना लेना,
हुनर जगाओ अपने भीतर, जग को जीतकर दिखा देना।

केवल किताबी ज्ञान नहीं, अब हाथों में कमाल हो,
जो भी सीखो डूब के सीखो, तुम ख़ुद एक मिसाल हो।
तकनीक नई अपनानी है, नवाचार को पाना है,
कल के कुशल 'रचनाकार' बन, देश का मान बढ़ाना है।

माँगने वाले क्यों बनते हो? तुम देने वाले बन जाओ,
अपने छोटे से विचार को, तुम वटवृक्ष बनाओ।

धैर्य हृदय में धारण कर, अनुशासन को ढाल बना,
मेहनत की इस भट्टी में, तपकर तुम टंकसाल बना।
हार मिले तो डरो नहीं, वो अनुभव का ही हिस्सा है,
गिरकर उठने वालों का ही, बनता जग में क़िस्सा है।
ईमानदारी, दृढ़ निश्चय, और मीठी वाणी साथ रहे,
सफलता की इस ऊँचाई पर, सदा सिर पर हाथ रहे।

हम रचेंगे कल नया, हम बदलेंगे ये धरा,
आत्मनिर्भर बनेंगे हम, है संकल्प यही भरा।
रोजगार हो या स्वरोजगार, श्रेष्ठ हमें कहलाना है,
भारत की इस युवा शक्ति का, लोहा अब मनवाना है। 

गीत: नई उमंग का आगाज़


नया सवेरा, नई रोशनी, नया हौसला जागे,
छोड़ के पीछे डर के साये, तू अब सबसे आगे।
मन में जो इक आग जली है, उसको और हवा दे,
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।

थक कर रुकना काम नहीं है, चलना ही जीवन है,
सपनों को जो सच कर डाले, वही तो सच्चा मन है।
राहों के इन पत्थरों को, तू सीढ़ी बना ले,
मुश्किलों की हर दीवार को, हँसकर आज गिरा दे।
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।

आँखों में विश्वास जगाकर, पंखों को फैला ले,
नीले अंबर की ऊँचाई, अपनी मुट्ठी में पा ले।
बीत गया जो कल था मुश्किल, उसका अब क्या रोना,
आज हाथ में जो अवसर है, उसे नहीं है खोना।
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।
उमंग भर, तरंग भर,
तू आसमाँ के संग चल।
तू आज अपनी जीत का,
नया कोई प्रसंग लिख। 


कृतज्ञता: एक संबल के लिए

जीवन की लंबी डगर पर, जब विराम का क्षण आया,
पुरानी यादों का सरमाया, आँखों के सामने लहराया।
वर्षों की संचित पूंजी का, जब सबसे अधिक आधार था,
अनिश्चय के उन पलों में, मन थोड़ा सा बेजार था।
पर जहाँ कर्तव्य का साहस हो, वहाँ बाधाएँ टिकती कहाँ,
डॉ. अलका भार्गव सा व्यक्तित्व, मिलता है भला कहाँ?
जब संचित निधि की शक्ति की, सबसे कठिन दरकार थी,
आपकी त्वरित कार्यप्रणाली ही, उस समय की पुकार थी।
न कोई विलंब की बाधा, न फाइलों का वो मौन था,
आपकी सक्रियता ने बताया, कि सच्चा सारथी कौन था।
सेवा-निवृत्ति के हर देयक का, सहज निपटान कर दिया,
अनिश्चितता के उन बादलों को, मुस्कान से भर दिया।
सिर्फ कागजों का निस्तारण नहीं, यह एक बड़ा उपकार है,
ठिठकते हुए कदमों को मिला, यह सुखद सा आधार है।
कर्तव्यनिष्ठा और अपनत्व का, जो आपने उदाहरण दिया,
उसके लिए इस हृदय ने, शत-शत नमन अर्पण किया।
सकुशल संपन्न हुए सब कार्य, मन अब पूर्णतः शांत है,
आपकी इस सहृदयता से, जीवन का यह मोड़ जीवंत है।
ऋणी रहेंगे सदा हम आपके, इस आत्मीय सहयोग के लिए,
ईश्वर आपको आशीष दे, इस निस्वार्थ उद्योग के लिए।

ललित मोहन शुक्ला ( कवि गीतकार, लेखक व सेवा निवृत शिक्षक) 



गीत: भ्रम ही तो शुरुआत है

ये जो धुंध सी छाई है, ये अंत नहीं आगाज़ है,
भ्रम की इस बेचैनी में ही, छिपे सत्य के साज़ है।
भटक रही है जो ये दृष्टि, नया सवेरा ढूंढेगी,
उलझी हुई ये डोर ही अब, कोई सिरा ढूंढेगी।
डरो नहीं इस द्वंद्व से, ये तो ज्ञान की प्यास है,
भ्रम का टूटना ही समझो, स्पष्टता का आभास है।

ठहरे पानी में जब तक कोई, कंकड़ नहीं गिरता है,
दर्पण जैसा शांत धरातल, कहाँ कभी हिलता है?
जब भ्रम के पत्थर गिरते हैं, लहरें तब ही उठती हैं,
मथती हैं जब विचारधाराएँ, सत्य की बूंदें टपकती हैं।
जो स्पष्ट है वो मृत है शायद, जो संशय में वो जीवित है,
खोज की पहली सीढ़ी देखो, भ्रम से ही तो निर्मित है।

मिट्टी जब तक बिखरे न, तब तक बीज कहाँ फूटेगा?
अंधकार जब गहरा होगा, तारा तब ही टूटेगा।
निश्चितताओं के घेरे में, हम अक्सर सो जाते हैं,
भ्रम की ठोकर लगते ही, हम फिर से जग जाते हैं।
ये धुंधलापन सिखा रहा है, अपनी आँखें साफ़ करो,
जो जाना है उसे भुलाकर, नई दिशा से प्यार करो।

सत्य खड़ा है कहीं दूर, बस परदे हटते जाने हैं,
भ्रम के कोहरे के पीछे, असली दृश्य सुहाने हैं।
जब थककर तुम पूछोगे कि— 'क्या सच है और क्या माया?'
समझ लेना उस पल तुमने, मंज़िल का है पता पाया।
भ्रम तो बस एक द्वार है, स्पष्टता के मंदिर का,
यही मार्ग है बाहर आने का, अपने ही अंदर का।

ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 


गीत: "प्रणाम और परिणाम"


जो झुकना सीख लेते हैं, वही तो खास होते हैं,

झुके जो शीश चरणों में, प्रभु के पास होते हैं।

एक छोटा सा 'प्रणाम' ही, बदलता भाग्य की रेखा,

सुंदर 'परिणाम' फिर हमने, यहाँ फलते हुए देखा।


हृदय में भक्ति भाव हो, लबों पर मीठी वाणी हो,

मिटा दे द्वेष को मन से, सरल सी ये कहानी हो।

बड़ों का मान करने से, सदा आशीष मिलते हैं,

जहाँ बोओ विनय के बीज, वहीं खुशियों के फलते हैं।

विनम्रता की ये वर्षा, करे जीवन को फिर पावन,

प्रणाम की ही शक्ति से, महक उठता है ये आँगन।


अहं को त्याग कर देखो, समर्पण में ही सिद्धि है,

मिले जो शांत मन सबको, यही तो सच्ची वृद्धि है।

किया जो कर्म निष्काम, फल की चिंता छोड़ कर,

मिले सुखद परिणाम फिर, प्रभु से नाता जोड़ कर।

चलो हम वंदना कर लें, जगत के उस विधाता की,

प्रणाम से ही जुड़ती है, कड़ी जीवन की साता की।


प्रणाम है वो सीढ़ी जो, शिखर तक हमको ले जाए,

मिले परिणाम वो सुखद, जो जग में मान दिलवाए।

सदा झुक कर मिलो सबसे, यही जीवन का गहना है,

प्रणाम और परिणाम में ही, सफल जीवन का बहना है।

ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 


गीत: ऊँची उड़ान


नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,

लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है।

ठहर न तू, ऐ मुसाफ़िर, अभी राहें बाकी हैं,

सूरज सा चमकने की तेरी अपनी बारी है।


पर्वत जितने ऊँचे हों, कदम नहीं रुक पाएँगे,

काँटों वाली राहों पर भी, हम मुस्कुराएँगे।

ये जो काले बादल हैं, बस इक पल का साया हैं,

जिसने खुद को जीत लिया, उसने सब कुछ पाया है।

नील गगन की गहराई, तुझको आज बुलाती है,

तेरी हिम्मत ही तेरी, असली यहाँ थाती है।


पंखों में भर हौसला, तू भर ले एक परवाज़,

तेरे हाथों में छुपा है, आने वाला कल आज।

थक कर गिरना हार नहीं, गिर कर न उठना हार है,

कोशिश करने वालों की तो, सदा ही जय-जयकार है।

नील गगन गवाह बनेगा, तेरी विजय की गाथा का,

तू ही तो है भाग्य विधाता, अपनी किस्मत विधाता का।


आसमान छोटा पड़ेगा, जब तू पर फैलाएगा,

मिटा के हर इक मुश्किल को, तू मंज़िल पाएगा।


नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,

लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है...

अपनी एक कहानी है। 

सुरक्षा का पहिया: यातायात नियम

चलो सड़क पर संभल के भाई,

नियमों में है सबकी भलाई।

जल्दबाजी को दूर भगाओ,

जीवन को अनमोल बनाओ।

लाल बत्ती कहती है— "थम जा",

जल्दबाजी में तू न रम जा।

पीली कहती— "हो तैयार",

बढ़ने का अब करो विचार।

हरी बत्ती जब जल जाए,

मंजिल की राह सुगम बनाए।

दुपहिया पर हेल्मेट धारो,

अपनों का तुम प्यार विचारो।

कार में सीट बेल्ट जरूरी,

दुर्घटना से रखो दूरी।

बाएं चलना सदा सुहाना,

नियमों का तुम मान बढ़ाना।

पैदल हैं तो जेब्रा क्रॉसिंग,

सड़क पार की यही है राहें।

नशा न करना वाहन चलाते,

हँसते-खेलते घर को जाते।

यातायात के नियम अपनाओ,

देश को सुरक्षित देश बनाओ।

ललित मोहन शुक्ला ( कवि व लेखक) 


गीत: "जागो रे! धरा बुलाती है"


ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,

साँसें हो रही हैं कम, अब तो कर लो थोड़ा प्यार।

पेड़ लगाएँ, प्यास बुझाएँ, ये ही अपना धर्म है,

पर्यावरण को बचाना ही, सबसे बड़ा कर्म है।

जागो रे! अब जागो रे, ये धरा हमें बुलाती है।


हरी-भरी ये चादर इसकी, हमने खुद ही फाड़ी है,

धुआँ उगलती चिमनियाँ और बढ़ती भीड़-भाड़ी है।

नदियाँ कल-कल बहना छोड़ अब, मैली होती जाती हैं,

सूखी धरती, प्यासे पंछी, अपनी व्यथा सुनाते हैं।

एक बीज तुम बो दो ऐसा, जो शीतल छाया दे जाए,

आने वाली पीढ़ी को भी, सुंदर जग दिखला जाए।


प्लास्टिक का ये जाल हटाओ, थैला कपड़े का लाओ,

बूंद-बूंद है अमृत जैसी, पानी व्यर्थ न बहाओ।

पर्वत, जंगल, जीव-परिंदे, सब इस घर के हिस्से हैं,

इनसे ही तो जुड़ते आए, बचपन वाले किस्से हैं।

चलो हाथ से हाथ मिलाएँ, सुंदर स्वर्ग बनाना है,

गूँजे फिर से कोयल की कूक, ये संकल्प उठाना है।


ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,

पर्यावरण को मिल कर हम, दें खुशियों का उपहार।

जागो रे! अब जागो रे.. 


गीत: शिखर तक जाना तुम


पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम

जग में नाम कमाना तुम।

हिम्मत कभी न हारना तुम,

चाँद से आगे जाना तुम।


सपनों में विश्वास जगाओ,

आलस को तुम दूर भगाओ।

काँटों वाली राहों पर भी,

फूलों सा मुस्काना तुम।

चाँद से आगे जाना तुम।


कलम तुम्हारी शस्त्र बनेगी,

मेहनत ही बस मंत्र रहेगी।

अंधियारे को चीर के सूरज,

बनकर के ढल जाना तुम।

चाँद से आगे जाना तुम।


लिखनी है इतिहास की बातें,

जाग के काटें कितनी रातें।

भारत माँ के गौरव को अब,

नभ के पार ले जाना तुम।

चाँद से आगे जाना तुम।


पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम

जग में नाम कमाना तुम।

ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)  


गीत: मेरी जीवन संगिनी


मेरे घर की रौनक तुम, मेरे दिल की धड़कन हो,

धूप में ठंडी छाँव तुम, महकता हुआ आँगन हो।

सपनों को जिसने सच किया, वो मधुर रागिनी हो तुम,

मेरे हर जन्म की साथी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।


कभी राहें मुश्किल हुईं, कभी आए गहरे अँधेरे,

तुमने थामी जो उँगली मेरी, तो हुए रोशन सवेरे।

उतार-चढ़ाव जीवन के, हँसकर तुमने झेले हैं,

तुम्हारे दम से ही सजे, खुशियों के सब मेले हैं।

दर्द में जो मरहम बन जाए, वो सुकून भरी लोरी हो तुम,

मेरी अधूरी कहानी की, सबसे सुंदर डोरी हो तुम।


कभी छोटी बातों पे रूठना, कभी कजरारी आँखों का पानी,

फिर एक मुस्कान से कर देना, खत्म सब खींचातानी।

वो तुम्हारा धीरे से मनाना, वो प्यार भरी मनुहारें,

जैसे पतझड़ के बाद लौट आएं, फिर से वही बहारें।

मेरे मौन को जो पढ़ ले, वो अनकही कहानी हो तुम,

मेरी रूह की इबादत, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।


दीवाली के दीयों की लौ, होली के चटख रंग हो,

हर तीज-त्योहार अधूरा, अगर तुम न मेरे संग हो।

कभी कंगन की खनक बनकर, कभी पायल की झंकार,

तुमसे ही घर तीर्थ बना, तुमसे ही है संसार।

मेरे सूनेपन की महफिल, मेरी ज़िंदगानी हो तुम,

मेरे माथे की बिंदी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।


तुमसे ही सुबह मेरी, तुमसे ही मेरी शाम है,

मेरे होठों पे सजे जो, वो तुम्हारा ही तो नाम है।

सात जन्मों का वादा नहीं, हर पल का साथ चाहिए,

बस तुम्हारे हाथों में, मेरा ये हाथ चाहिए।

ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 


गीत: प्रकृति की पाठशाला


पशु-पक्षी ये बोल न पाएं, पर बहुत कुछ हैं सिखलाते,

जीवन जीने की सुंदर कला, ये चुपके से समझाते।

इंसान अगर जो गौर करे, तो इनसे पा सकता है ज्ञान,

प्रकृति की इस पाठशाला में, छुपा हुआ है समाधान।


नन्ही चींटी को देखो तुम, गिरती है पर रुकती नहीं,

मेहनत और अनुशासन से, वह कभी हार भी मानती नहीं।

हाथी से सीखो तुम धीरज, और अपनी शक्ति का मान,

शांत रहो पर जब जरूरत हो, दिखाओ अपना स्वाभिमान।


कोयल कहती मीठा बोलो, वाणी में तुम शहद भरो,

कड़वाहट को तजकर जग में, सबसे बस तुम प्रेम करो।

हंस सिखाता नीर-क्षीर विवेक, बुराई छोड़ अच्छाई चुनना,

दुनिया के इस शोर-शराबे में, मन की साफ़ आवाज़ सुनना।


कुत्ते से सीखो वफादारी, स्वामी-भक्ति और सच्चा प्यार,

रिश्तों में जो जान फूँक दे, ऐसा सुंदर ये व्यवहार।

शेर सिखाता निर्भय होकर, अपने पथ पर बढ़ते जाना,

भीड़ का हिस्सा कभी न बनना, अपना रुतबा खुद बनाना।


बगुला सा एकाग्र ध्यान हो, लक्ष्य पे अपनी दृष्टि रहे,

कबूतर सा शांति दूत बनो, मन में कभी न बैर रहे।

पक्षी सिखाते नीड़ बनाना, तिनके-तिनके को जोड़ के,

मेहनत से ही स्वर्ग बनेगा, आलस सारा छोड़ के।


आओ हम सब आज ये सीखें, पशु-पक्षियों के ये संस्कार,

प्रेम, दया और सेवा भाव से, महक उठेगा ये संसार।

ललित मोहन शुक्ला कवि 


गीत: "जागरूकता की ज्योति" 


जीवन के इस उपवन में, तुम बनके माली आना,

सफलता के हर शिखर पर, अपना ध्वज लहराना।

हृदय में दीप जलाओ ऐसा, जो कभी न बुझ पाए,

जागरूकता की लौ से ही, सारा जग मिल जाए।


भीतर क्या है घट रहा, पहले उसे पहचानो,

अपनी शक्ति, अपनी दुर्बलता को तुम जानो।

मन के भटकाव पर जब तुम, पहरा अपना रखोगे,

तभी लक्ष्य की राह पर, तुम अडिग कदम बढ़ाओगे।

जागरूकता ही शस्त्र है, जो मोह को काट देती है,

सफलता की हर सीढ़ी को, यह सरल बना देती है।


अवसर कब है द्वार खड़ा, यह वही देख पाता है,

जिसकी आँखों में सजगता का, सूरज खिल जाता है।

वक़्त की नब्ज पहचान कर, जो सही कदम उठाता है,

कामयाबी का हर मुकाम, बस उसी के पास आता है।

जहाँ अंधेरा भ्रम का हो, वहाँ यह रौशनी लाती है,

जागरूकता ही कर्म को, श्रेष्ठ मार्ग दिखाती है।


शब्दों के पीछे छुपे हुए, भावों को तुम पढ़ना सीखो,

रिश्तों की नाज़ुक डोर को, होश से बुनना सीखो।

सजग रहोगे तुम अगर, तो कभी न ठोकर खाओगे,

अपनों के संग प्रेम की, तुम नई जोत जलाओगे।

सिर्फ खुद का हित नहीं, जो सबका मंगल सोचेगा,

जागरूकता का वो राही, शिखर सफलता का छुएगा।


तो उठो मुसाफिर, आलस छोड़ो, चेतना को विस्तार दो,

जीवन के हर एक क्षेत्र को, तुम नया आधार दो।

जागरूकता ही सफलता की, सबसे मीठी तान है,

यही मनुष्य की शक्ति है, यही उसकी पहचान है। 


गीत: ये जुबां भी क्या चीज़ है


कभी शहद सी मीठी, कभी ज़हर का प्याला है

इस छोटी सी जुबां ने, क्या खेल रचा डाला है

कभी बिन बोले कह जाए, सदियों के अफसाने

कभी बोल के भी ये, दिल का हाल न जाने।


जब लफ़्ज़ ठहर जाते हैं, तो नज़रें बोलती हैं

खामोशियाँ भी दिल की, परतें खोलती हैं

एक 'जुबां' वो है, जो शोर में खो जाती है

एक 'जुबां' वो है, जो चुप रहकर सब कह जाती है।


किसी की जुबां ही, उसकी सबसे बड़ी जागीर है

किसी की जुबां बस, रेत पर खींची लकीर है

कहने को तो मुकर जाते हैं, लोग अपनी बातों से

पर कुछ लोग बंधे होते हैं, 'जुबां' के धागों से।


तलवार का घाव तो, वक़्त के साथ भर जाता है

जुबां का तीर मगर, रूह के पार उतर जाता है

वही जुबां जो ज़ख्म दे, वही दुआ भी बनती है

किसी गिरते हुए के लिए, ये सहारा भी बनती है।


संभाल के रख इसे, ये तेरा अक्स दिखाती है

तेरी परवरिश क्या है, ये दुनिया को बताती है

हो जुबां पर ज़िक्र उसका, और दिल में सादगी रहे

बस यही दुआ है कि, इंसानों में इंसानियत रहे। 


गीत: "सपनों की उड़ान: प्रबंधन से स्वतंत्रता"


कल की चिंता छोड़ दे तू, आज को अपना यार बना,

पैसों के इस खेल में, खुद को तू होशियार बना।

सिर्फ कमाना काफी नहीं, सहेजने की रीत सीख,

वित्तीय प्रबंधन के हाथों में, अपनी जीत लिख।

हाथों में होगी चाबी, खुशियों का द्वार खुलेगा,

प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!


लक्ष्य बना तू ऊँचा सा, मंज़िल को पहचान ले,

कहाँ खड़ा है तू आज, अपनी हकीकत जान ले।

एक योजना की नींव रख, कागज़ पर हर ख्वाब सजा,

बिना नक्शे की यात्रा में, है सिर्फ भटकाव की सज़ा।

नियोजन ही वो बीज है, जिससे फल महान मिलेगा...

प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!


पाई-पाई का हिसाब रख, फिजूलखर्ची पर लगाम हो,

तेरी मेहनत की कमाई का, सही जगह पर काम हो।

पहले खुद को भुगतान कर, बचत को अपनी ढाल बना,

मुसीबत के तूफानों में, बचत को ही अपनी ढाल बना।

अनुशासन की इस आग में, सोना तेरा निखरेगा...

प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!


सिर्फ तिजोरी में रखा धन, वक्त के साथ घट जाएगा,

समझदारी से जो बोएगा, वो सौ गुना फल पाएगा।

शेयर हो या सोना, या हो ज़मीन की माया,

चक्रवृद्धि (Compounding) के जादू ने, सबको अमीर बनाया।

पैसे से अब काम करा, तेरा कल सँवरने लगेगा...

प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!



बीमा की एक छतरी रख, अनहोनी से तू डरना मत,

कर्ज़ के गहरे दलदल में, भूल कर भी उतरना मत।

सुरक्षित जब होगा वर्तमान, तभी भविष्य मुस्कायेगा,

जोखिम को जो जीत ले, वही विजेता कहलायेगा।

धैर्य और विश्वास से, तेरा भाग्य संवरने लगेगा...


अब न किसी की गुलामी है, न पैसों की मंदी है,

वित्तीय प्रबंधन ही सच में, आज़ादी की संधि है!

आज़ादी की संधि है! 


मैत्री का महाकाव्य


संसार के सब नातों में, इक रिश्ता सबसे प्यारा है,

न रक्त का ये बंधन है, पर प्राणों का सहारा है।

जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं, बस मौन ही काफी होता है,

मित्र वही जो पतझड़ में भी, यादों के बीज बोता है।



इतिहास गवाह है इस बल का, जब कृष्ण ने पैर पखारे थे,

सुदामा की उस पोटली में, ब्रह्मांड के सुख सारे थे।

दुर्योधन के अट्टहास में, कर्ण ने साथ निभाया था,

और राम ने विभीषण को, लंका का ताज पहनाया था।

बचपन, जवानी और बुढ़ापा

बचपन की वह कश्ती थी, और काग़ज़ का वह किनारा था,

जब टॉफी के उस आधे टुकड़े में, अधिकार हमारा था।

फिर युवा हुए तो साथ चले, सपनों की ऊँची राहों पर,

दुख-सुख के सारे बोझ धरे, इक दूजे की ही बाहों पर।

अब लाठी लेकर चलते हैं, पर हँसी वही है पुरानी सी,

बुढ़ापे की उस धूप में, दोस्ती शीतल पानी सी।


माँ में जो सखी मिल जाए, तो घर जन्नत बन जाता है,

भाई जब मित्र बन खड़ा रहे, हर संकट टल ही जाता है।

कहते हैं प्रेम बड़ा पावन, पर आधार तो इसका मैत्री है,

बिन दोस्ती के हर आशिकी, बस एक अधूरी उपमा है।

सावधान! गलत संगति

पर ध्यान रहे इस धागे का, जो कच्चा भी हो सकता है,

कुसंग की काली छाया में, इंसान भी खो सकता है।

जो दुर्गुण को बढ़ावा दे, वो मित्र नहीं वो शत्रु है,

जो सन्मार्ग से भटका दे, वो जीवन का कुचक्र है।


आनंद यही है जीवन का, कि कोई हाथ थामे बैठा है,

तुम्हारी हर इक नादानी, वो मन में थामे बैठा है।

मित्रता ही वह मरहम है, जो हर घाव को भरती है,

ये वो अजर अमर धारा, जो मरुस्थल को हरा करती है।


शीर्षक: ओ मेरे दिलबर


ओ मेरे दिलबर, ओ मेरे हमदम

तुझसे जुड़ी है, खुशियाँ और गम।

सांसों की लय में, तेरा ही नाम है

तू ही सुबह है, तू ही मेरी शाम है।

ओ मेरे दिलबर...


तेरी आँखों में झलकता, चाहत का दरिया

जीने का तू ही, बना है जरिया।

खामोश लब हैं, पर दिल बोलता है

सिर्फ तेरे आगे, ये राज खोलता है।

सपनों की वादी में, तू ही सवेरा

मुझमें बसा है, अब अक्स तेरा।

ओ मेरे दिलबर...


दुनिया की भीड़ में, तन्हा खड़े थे

राहों में तेरी, हम रुक से गए थे।

तूने जो छुआ, तो महक उठे हम

फूलों की तरह, चहक उठे हम।

हाथों में तेरा, हाथ रहे बस

उम्र भर का, ये साथ रहे बस।

ओ मेरे दिलबर...


चाँद और तारे, गवाह रहेंगे

हम सिर्फ तेरे, होकर जिएंगे।

ओ मेरे दिलबर, ओ मेरे हमदम

तुझसे जुड़ी है, खुशियाँ और गम। 


गीत: मुस्कान का बहाना


थोड़ा सा खुद के लिए भी जीना सीख ले,

सपनों के रंग हवाओं में पीना सीख ले।

दुनिया तो चलती रहेगी अपनी ही चाल से,

तू अपनी खुशी का धागा बुनना सीख ले।

खुश रहने का कोई बहाना ढूँढ ले,

दिल में छुपा एक नया तराना ढूँढ ले।


भोर की पहली किरण को चेहरे पर सने दो,

छोटा सा ही सही, मन में कोई ख्वाब पलने दो।

फूलों की महक और परिंदों की वो चहक,

इन्हीं छोटी बातों में खुद को ढलने दो।

बीते कल की कड़वाहट को तू भूल जा,

आज की इस ताजी हवा में झूल जा।


आईने में देख खुद को, एक प्यारी सी मुस्कान दे,

अपनी छोटी जीत को भी, तू थोड़ा सम्मान दे।

दूसरों की उम्मीदों का बोझ उतार दे,

अपनी रूह को भी थोड़ा इत्मीनान दे।

तू अनमोल है, ये बात खुद को बता दे,

ग़मों की पुरानी किताब को तू जला दे।


हँसने के लिए किसी महफ़िल की तलाश क्यों?

हर धड़कन में छिपी है खुशियों की प्यास क्यों?

वक़्त की रेत को मुट्ठी में कैद मत कर,

आज ही जी ले, कल की फिर आस क्यों?

खुश रहने का कोई बहाना ढूँढ ले,

दिल में छुपा एक नया तराना ढूँढ ले। 


॥ वीणा वादिनी की वंदना ॥


हे श्वेत वस्त्रधारिणी, माँ शारदे नमन तुम्हें,

अज्ञान का मिटा अंधेरा, ज्ञान की किरण दें।

हंस पर विराजी माँ, वीणा हाथ में सजे,

तेरे सुरों की गूँज से, सारा ये जग बजे।



मस्तक पे सोहे चंद्र, मुख पर अनूप आभा,

सत्य की तुम मूरत हो, निर्मल तुम्हारी शोभा।

जड़ता को मेरी काट दो, बुद्धि का दान दो,

भटके हुए इस मन को, माँ सही पहचान दो।


विद्या का दीप जला के, जग को आलोकित करो,

भर दो मधुर स्वर कंठ में, अमृत सा रस भरो।

कलम चले जब हाथ में, तेरी ही शक्ति हो,

हृदय में बस अटूट माँ, तेरी ही भक्ति हो।


हे वीणा वादिनी, माँ दया की खान हो,

तुम ही हो आदि-शक्ति, तुम ही महान हो।

करो स्वीकार ये वंदन, माँ भारती नमन तुम्हें,

अज्ञान का मिटा अंधेरा, ज्ञान की किरण दें। 


शीर्षक: आज हंगामा हो जाए!


नजरें मिलें तो बात बन जाए,

खामोश धड़कन भी गुनगुनाए।

रोको न खुद को, तोड़ दो रस्में,

आज दिलों में आग लग जाए।

हो... न कोई शिकवा, न कोई बहाना,

हमें तो बस है महफ़िल को जगाना।

छोड़ो ये दुनिया, छोड़ो शर्माना,

आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!


शोर हो ऐसा कि आसमां भी झुक जाए,

वक़्त की रफ़्तार ज़रा थम सी जाए।

पाँव थिरकें ऐसे कि ज़मीन डगमगाए,

जो सोया है भीतर, वो तूफ़ान जाग जाए।

न फिक्र कल की, न बीते का रोना,

आज की रात है बस जादू संजोना।

महफ़िल में अपनी खुशियों को पाना,

आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!


जाम छलकने दो, बातों को बहने दो,

दिल में जो दबी है, उस हसरत को रहने दो।

हवाओं में घुला है आज अजब सा नशा,

हर चेहरे पे बिखरी है इक नयी सी अदा।

चुपचाप रहकर भी क्या है कमाना?

हँसते हुए ही है सबको दीवाना बनाना।

भूल के सारी दुनिया का फ़साना,

आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!


झूमे ज़माना, और झूमे ये रात,

याद रहे हमेशा ये मुलाक़ात।

शोर हो इतना कि गूंजे ये तराना,

आज यहाँ बस हंगामा हो जाए!

जी भर के बस हंगामा हो जाए!


शीर्षक: बेखुदी की राहें


न होश है अपना, न दुनिया की खबर है,

मल्हार सी बहती ये कैसी लहर है।

न मंजिल की चाहत, न रस्तों का गम है,

तेरी बेखुदी में ही खुशियाँ तमाम हैं।


कभी शाम ढलती है यादों के साये,

कभी धूप बनके तू मन में समाए।

जुबाँ खामोश है पर दिल बोलता है,

तेरा नाम रग-रग में रस घोलता है।

ये आलम सुहाना, ये मंज़र नया है,

मस्ती का प्याला न जाने कहाँ है।

न होश है अपना...


दुनिया की बंदिश से आज़ाद हूँ मैं,

खुद ही में खोया, खुद ही शाद हूँ मैं।

न काँटों का डर है, न फूलों की हसरत,

मिली रूह को है अनोखी ये राहत।

जहाँ 'मैं' मिटा, वहाँ 'तू' ही तू है,

यही बस मेरी आखिरी आरज़ू है।


हवाओं में जैसे कोई राग घुला हो,

खुला आसमान जैसे बाहें फैला हो।

कदम डगमगाते नहीं अब किसी से,

जुड़ा है ये रिश्ता किसी अजनबी से।

बेखुदी का सफर, बेखुदी की डगर है,

अब तो बस इसी में सुहाना बसर है।


न होश है अपना, न दुनिया की खबर है,

मल्हार सी बहती ये कैसी लहर है...


शीर्षक: "तुमसे ही मुकम्मल मैं"


धड़कनें बढ़ी हैं, सांसें थमी हैं,

कहना है जो वो होठों पे जमी है।

ज़माने की भीड़ में बस तुमको चुना है,

मैंने अपनी आँखों में बस तुमको बुना है।

मेरे दिल की सूनी सी राहों में,

एक रोशनी बनकर तुम आए हो।

खुशबू बनकर मेरी साँसों में,

तुम रूह तक मेरी समाए हो।


तुम्हारी हँसी जैसे गिरता हुआ झरना,

तुम्हारी बातों में है सुकून का ठहरना।

कभी धूप में छाँव, कभी सर्द में गर्माहट,

मेरे सूने आँगन में तुम खुशियों की आहट।

ये हाथ पकड़ कर बस इतना बता दो,

मेरी अधूरी सी दुनिया को पूरा बना दो।

तुम्हें चाहने की कोई सीमा नहीं है,

बिन तुम्हारे ये जिंदगी, जिंदगी ही नहीं है।


आसमान के तारों में तुमको ही ढूँढूं,

नींदों के ख्वाबों में तुमको ही चूँमूँ।

इश्क का दरिया है, संग डूब जाना है,

मंजिल तुम ही हो, तुम ही ठिकाना है।

वादा है मेरा ये उम्र भर का साथ होगा,

हर अंधेरी रात में तुम्हारा ही हाथ होगा।

कहने को तो लफ्ज़ बहुत कम हैं पास मेरे,

पर मेरा हर कतरा, बस दीवाना है तेरे।


धड़कनें बढ़ी हैं, सांसें थमी हैं,

कहना है जो वो होठों पे जमी है।

हाँ, मुझे तुमसे मोहब्बत है...

बस तुमसे ही मोहब्बत है। 


गीत: ओ री पवन, तू मनभावन


ओ री पवन, तू मनभावन, खुशियों का संदेशा लाती,

कभी हौले से, कभी शोर से, जीवन में सुर भर जाती।

अनंत तेरे रूप निराले, अनंत तेरी माया,

जिसने भी तेरा स्पर्श पाया, उसने ही सुख पाया।


जब तू शीतल 'समीर' बनकर, उपवन में मुस्काती है,

कलियों के कानों में जाकर, मीठा गीत सुनाती है।

मंद-मंद तू चले 'बयार', जैसे रेशम की डोरी,

थके हुए इस तन-मन से, तू दुख लेती है चोरी।


कभी 'अनिल' की गति पाकर तू, नभ में ऊंची उड़ती है,

पर्वत की ऊंची चोटियों से, अठखेली कर मुड़ती है।

जब तू बने 'मारुत' बलकारी, शक्ति का अहसास करे,

वृक्षों को बाहों में भरकर, झूम-झूम विश्वास भरे।


पूरब से जब 'पुरवाई' आए, सावन संग में लाती है,

प्यासी इस धरती के ऊपर, अमृत-बूंद गिराती है।

'पछुआ' के चंचल झोंकों में, एक गजब की मस्ती है,

तेरे संग ये दुनिया सारी, हर पल खिलती-हंसती है।


ना कोई बंधन, ना कोई सीमा, तू तो सदा स्वतंत्र है,

तेरा बहना ही इस जग का, सबसे पावन मंत्र है।

ओ री पवन, तू मनभावन, खुशियों का संदेशा लाती... 


गीत: ऐ जी, धीरे चलना!


बाबूजी धीरे चलना, राहों में ज़रा संभलना

बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में

बाबूजी धीरे चलना...


हाथ में मोबाइल है, चेहरे पे स्माइल है

दुनिया ये सारी बस, रील और स्टाइल है

लाइक के चक्कर में, होश न तुम खोना

सब कुछ है नकली यहाँ, बाद में न रोना

ज़रा बचके निकलना, बातों में न पिघलना

बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में

बाबूजी धीरे चलना...


मेट्रो की भीड़ है, सपनों की दौड़ है

हर कोई आगे है, कैसी ये होड़ है?

फुर्सत की दो घड़ियाँ, ढूँढे से न मिलेंगी

चाहत की कलियाँ भी, मुश्किल से खिलेंगी

दिल थाम के चलना, वक्त से न जलना

बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में

बाबूजी धीरे चलना...


ऊँची इमारतें, गहरा अंधेरा है

बाहर उजाला पर, मन में बसेरा है

सच्चे जो साथी हैं, उनको ही पहचानो

मतलब की महफ़िल को, महफ़िल न तुम मानो

हँसते हुए चलना, खुद से न फिसलना

बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में

बाबूजी धीरे चलना... 


गीत: जय भारती, जय गणतंत्र


हिमगिरि से सागर तक गूँजे, एक ही सुर और तान

विविध रंग की माला अपनी, एक हमारा मान।

उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, सब मिलकर हाथ बढ़ाएँ

गणतंत्र दिवस के पर्व पर, आओ सबको शीश नवाएँ!


नमस्ते कहता उत्तर प्रदेश, राम-राम हरियाणा का

खम्मा घणी राजस्थान कहे, मान बढ़ाना वीरों का।

सत श्री अकाल पंजाब से आए, जोश भरा हर सीने में

देश प्रेम का स्वाद अलग है, जीने और मरने में।

उठो भारती के वीर सपूतों, नया इतिहास बनाना है

संविधान की मर्यादा को, जग में ऊँचा उठाना है!


केम छो कहता गुजरात है, नमस्कार महाराष्ट्र का

जोहार कहे झारखंड अपना, गर्व है इसके काष्ठ का।

नमोस्कार बंगाल से गूँजे, ओड़िशा भी मुस्काए

पूर्वोत्तर की पावन धरती, नमस्ते सबको सुनाए।

भाषाएँ हैं अलग-अलग, पर एक ही अपनी बोली है

अमन-चैन के रंगों से, हम खेलें ऐसी होली है!


वणक्कम कहता तमिलनाडु, नमस्कारम केरल की पुकार

नमस्कारा कर्नाटक बोले, तेलगु का भी यही सार।

पुलकित है कन्याकुमारी, कश्मीर हमारा मस्तक है

गणतंत्र की सत्तर सालों वाली, ये नई दस्तक है।

लोकतंत्र की ज्योति जलाए, अंधियारा सब दूर करें

तिरंगे की आन की खातिर, खुद को हम न्योछावर करें!


बाबूजी धीरे नहीं, अब तो गर्व से कदम बढ़ाना है

भारत की इस पावन मिट्टी का, कर्ज हमें चुकाना है।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय हिन्द, जय भारत! 


गीत: तिरंगा चाँद पर लहराया


वो रात अंधेरी भारी थी, जब सन्नाटा छा गया था,

मंज़िल के बिल्कुल पास खड़ा, दिल थोड़ा सा घबराया था।

विक्रम के पाँव डगमगाए, संपर्क कहीं पर टूट गया,

लगा कि बरसों का सपना, हाथों से बस छूट गया।

मगर हौसला टूटा नहीं, वो तो बस एक तैयारी थी,

हार को जीत में बदलने की, अब भारत की बारी थी!


गलतियों को हमने शस्त्र बनाया, कमियों को पहचाना था,

सॉफ़्टवेयर को धार दी हमने, वेग को खुद ही थामना था।

जहाँ गिरे थे कल हम आके, वहीं खड़ा होना सीखा,

असफलता की राख से ही, हमने नया सूर्य देखा।

इतिहास गवाह है दुनिया में, हम गिरकर ही संभलते हैं,

हम भारत के वो बेटे हैं, जो तूफ़ानों में पलते हैं!


23 अगस्त की वो शाम सुनहरी, सारा देश दुआओं में था,

सांसें थमी थीं सबकी, पर विश्वास सबकी निगाहों में था।

धूल उड़ी और कदम पड़े, फिर शान से प्रज्ञान निकला,

पूरी दुनिया देखती रही, जब भारत का भाग्य चमका।

शिव-शक्ति बिंदु पर जाकर, अपना मान बढ़ाया है,

पहली बार किसी ने जग में, दक्षिण ध्रुव को पाया है!


ये जीत नहीं बस इसरो की, ये सवा सौ करोड़ का सपना है,

बता दिया इस दुनिया को, अब ये आसमान भी अपना है।

मेहनत और लगन मिले तो, हर बाधा झुक जाती है,

सच्ची हिम्मत हार के बाद ही, असली जीत दिलाती है।


नभ में गूंजा जय हो भारत, अंबर सारा हर्षाया,

देखो भारत का गौरव, अब चाँद तलक लहराया!

तिरंगा चाँद पर लहराया! तिरंगा चाँद पर लहराया! 



तिरंगा साक्षी है (एक संकल्प गीत)


उठो हिंद के वीर सपूतों, नया सवेरा आया है,

संविधान की पावन छाया, गौरव का पल लाया है।

गणतंत्र हमारा मान है, जन-गण-मन की शान है,

बढे कदम अब रुकें नहीं, यह भारत का अभियान है।


खेतों की हरियाली से, विज्ञान के ऊँचे अंबर तक,

प्रगति का रथ बढ़ता जाए, सागर से लेकर पर्वत तक।

हाथों में हो हुनर नया, और आँखों में नव स्वप्न पलें,

सूरज की स्वर्णिम किरणों सा, देश निरंतर आगे बढ़े।


मिटा के सारे भेदभाव को, प्रेम का दीप जलाना है,

भाषा, जाति, पंथ से ऊपर, 'भारतीय' बन जाना है।

सद्भाव की बहती धारा हो, भाईचारे का मेल रहे,

अनेकता में एकता का, पावन अनुपम खेल रहे।


त्याग और बलिदानों से जो, हमने गौरव पाया है,

रंग-रूप और वेश अलग पर, एक ही तिरंगा छाया है।

चलो साथ मिल कसम ये खाएं, माँ का मान बढ़ाएंगे,

विश्व पटल पर भारत को हम, जगमगाता पाएंगे।


जय भारत, जय गणतंत्र!

गूँजे नभ में यही मंत्र!

उत्तरोत्तर प्रगति हो अपनी,

सजग रहे हर एक तंत्र!

मेरी ओर से आपको शुभकामनाएँ! 


गीत: नई राहों का मुसाफिर


अंजान राहें हैं, तो क्या हुआ?

मंजिल का पता अब तक मिला नहीं, तो क्या हुआ?

पैरों में छाले हैं, या रास्तों में धूल,

तू चल पड़ा है, यही सबसे बड़ा फूल।

उठ खड़ा हो ऐ मुसाफिर, अब तुझे रुकना नहीं,

दुनिया झुकेगी तेरे आगे, बस तुझे झुकना नहीं।


ये जो घनी झाड़ियाँ हैं, ये जो गहरा कोहरा है,

तेरे भीतर का सूरज, इनसे कहीं ज्यादा सुनहरा है।

नक्शों की लकीरें अक्सर धोखा दे जाती हैं,

पर जो खुद रास्ता बनाते हैं, वही इतिहास रचते हैं।

डर को बना ले सीढ़ी, और मुश्किलों को ढाल,

तेरी हिम्मत ही लिखेगी, आने वाला कल का हाल।


कोई साथ न दे तेरा, तो अकेला ही तू काफी है,

खुद की तलाश में निकला, तू खुद का ही साथी है।

हर मोड़ पर एक सबक है, हर पत्थर एक कहानी,

बहते रहना ही तो है, सच्चे जीवन की निशानी।

अंजान डगर ही अक्सर, खूबसूरत मोड़ लाती है,

जो हार नहीं मानता, किस्मत उसे ही अपनाती है।


अंजान राहें, नया है सफर,

तू फौलाद का सीना ले, मत कर कोई फिकर।

तू चल, तू बढ़, तू उड़ता जा,

खुद अपनी किस्मत, तू खुद गड़ता जा! 


गीत: संकल्प की गूँज


जो मन में ठाने, जो दिल में जगा दे,

वह राहों के पत्थर को रस्ता बना दे।

ज़माने की बातों में न खोना कभी तू,

जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!

हाँ, वह कर के दिखा दे!


हवाओं का रुख मोड़ना तेरे बस में,

लिखी है फ़तह तेरी, हर एक नस में।

न सूरज से डर तू, न रातों से सहम तू,

कि सोई हुई अपनी हिम्मत जगा दे।

जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!


पसीने की बूंदों से किस्मत लिखेगा,

तपेगा अगर, तो ही कुंदन दिखेगा।

उड़ानें तेरी आसमाँ चूम लेंगी,

परों को ज़रा तू हवा तो लगा दे।

जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!


माना कि मुश्किल है लम्हा अभी,

पर तू अकेला नहीं है कभी।

तेरे इरादे ही तेरी दुआ हैं,

खुद को ज़रा तू ये याद दिला दे!


जो मन में ठाने, जो दिल में जगा दे,

वह राहों के पत्थर को रस्ता बना दे।

ज़माने की बातों में न खोना कभी तू,

जो सोचे, जो चाहे, वह कर के दिखा दे!

हाँ, वह कर के दिखा दे! 


गीत: नीली जर्सी का कमाल


नभ में गूँजे भारत का नाम, नीली जर्सी का है ये काम,

मैदान पे जब उतरे शेर, विरोधियों के छूटे पसीने तमाम।

बधाई हो तुमको ओ जाँबाज़ों, तुमने फिर से इतिहास रचा,

टी-20 के इस रण में, तिरंगे का ही शोर मचा!


बल्ले से जब आग उगलती, गेंद हवा से बातें करती,

अभिषेक की वो जादुई पारी, हर दिल में उमंग है भरती।

छक्कों का वो नया रिकॉर्ड, जैसे सावन की बौछार है,

युवा जोश और गगनचुंबी हिट्स, ये नए भारत की हुंकार है!

वाह रे अभिषेक! तेरी बल्लेबाजी ने सबका दिल जीत लिया,

छक्कों की उस बारिश ने, जीत का मार्ग प्रशस्त किया।


गेंदबाजों की सटीक यॉर्कर, और फील्डिंग का वो तराना,

दुनिया देख रही है अब, भारतीय क्रिकेट का नया जमाना।

जीत की इस गौरव गाथा पर, सारा देश झूमता है,

हर भारतीय आज गर्व से, आसमान को चूमता है।


बधाई स्वीकार करो वीरों, अब विश्व कप की बारी है,

विजय पताका फहराने की, पूरी अब तैयारी है।

शुभकामनाएं संग हैं सबके, फिर विश्व विजेता बन के आना,

पूरी दुनिया को एक बार फिर, अपना लोहा मनवाना! 



 विजयी विश्व तिरंगा प्यारा 


केसरिया, श्वेत और हरा, प्यारा यह श्रृंगार है,

तीन रंगों में रचा बसा, बस मेरा ही संसार है।

लहराता है जब नभ में यह, भारत की शान बढ़ाता है,

कण-कण में यह जोश और, भक्ति का दीप जलाता है।


ऊपर केसरिया रंग कहे, तुम वीरों की संतान बनो,

त्याग, तपस्या और शक्ति का, जग में एक प्रमाण बनो।

बीच में श्वेत चमकता है, जो शांति की चादर है,

सत्य और अहिंसा ही, इस भारत का सादर है।

नीचे बिछा हरा रंग, खुशहाली का पैगाम है,

खेतों की हरियाली में, मेरा पावन हिंदुस्तान है।

यह रंग हमें बतलाता है, धरती से तुम जुड़कर रहना,

समृद्धि की इस धारा को, अविरल हरदम बहने देना।


बीच हृदय में नील चक्र, यह गति का ही प्रतीक है,

बढ़ते जाना जीवन पथ पर, यह इसकी पहली सीख है।

चौबीस तीलियाँ कहती हैं, समय न रुकने पाएगा,

जो कर्मठ होकर चलेगा, वो ही मंजिल पाएगा।


यह झंडा नहीं सिर्फ कपड़ा, यह सवा अरब की आशा है,

एक सूत्र में हमें पिरोती, इसकी यही परिभाषा है।

मजहब अलग हों, भाषाएँ हों, पर हम सब एक कहानी हैं,

इस तिरंगे की छाँव में, हम सब सिर्फ हिंदुस्तानी हैं।


शीश झुकाकर नमन करें हम, इस पावन पहचान को,

सदा अमर और ऊँचा रखें, भारत माँ की आन को।

जय हिंद! जय भारत! 


गाना: खाली जेब, नखरे नवाब के 


बचत की बातें करना, अब तो है बस एक सपना,

खाली पड़ा है बटुआ मेरा, कोई नहीं है अपना!

बॉस ने दी जो सैलरी, वो तो 'ऊँट के मुँह में जीरा' है,

पर बीवी को लगता कि उसका शौहर कोहिनूर का हीरा है!


अरे... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,

जी रहे हैं हम तो बनकर 'महंगाई के पुतुलिया'!

आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,

किस्तें भरते-भरते देखो, निकल गया है हुलिया!


महीने की पहली को, हम शहंशाह बन जाते हैं,

जो दिखता है अमेज़न पर, झट से ऑर्डर दबाते हैं!

कार्ड स्वाइप करते वक्त, दिल धक-धक डोले है,

जब मैसेज आता 'डेबिटेड', तब खून मेरा खौले है!

पनीर की सोची थी, अब तो आलू पर आ गए,

स्विगी और ज़ोमैटो मिलकर, मेरा बजट खा गए!


हाँ... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,

डिस्काउंट के चक्कर में, कट गया है चुलिया!


शर्मा जी से लिया उधार, वर्मा जी को देना है,

इस टोपी को उस सर पर, बस यही तो गेम खेलना है!

दोस्त मांगते पार्टी, मैं मुँह छुपाए फिरता हूँ,

सेल लगी है मॉल में, पर मैं घर में दुबका रहता हूँ!

साइकिल की औकात नहीं, और दिल मांगे बीएमडब्ल्यू,

किस्मत मेरी ऐसी है भाई, जैसे कोई फुस्स-सा जुगनू!


क्योंकि... आमदनी अठन्नी, और खर्चा रुपया,

फटे जेब में हाथ डालकर, बजा रहे हैं डमरू-पिया!


मत पूछो भाई कैसे, ये घर-बार चलता है,

एक रुपया कमाता हूँ, सवा रुपया जलता है!

फिर भी हँस के कहते हैं— "ऑल इज वेल" जी,

बिना तेल के चल रही है, अपनी ये रेल जी! 


शीर्षक: आशा की मशाल


मन के बंद झरोखों को तू, थोड़ा सा खोल के देख,

निराशा के इन सन्नाटों में, उम्मीदों को बोल के देख।

माना कि राहें पथरीली हैं, और पांव में तेरे छाले हैं,

पर याद रख, तूफानों ने ही, मंजिल के रस्ते पाले हैं।


निराशा एक घना कुहासा, जो आँखों को भर देता है,

बने-बनाए सपनों को भी, धूल-धूसरित कर देता है।

पर आशा वो नन्हीं किरण है, जो पर्वत को भी चीरती है,

धैर्य की कोमल छुअन से ही, सोई किस्मत जागती है।

हार को अपनी ढाल बना ले, जीत का तू आगाज़ बन,

खामोशी को अपनी त्याग के, तू गूँजती आवाज़ बन।


सूरज हर शाम ढलता है, फिर भी कल मुस्काता है,

पतझड़ के हर झोंके के बाद, ही मधुमास आता है।

बीते कल की राख छोड़ कर, नया चमन तू आबाद कर,

खुशियों की छोटी कोंपल का, फिर से तू आगाज़ कर।

जब तक साँसें चलती हैं, तब तक लड़ना धर्म तेरा,

मिट जाएगी सब निराशा, देख के अडिग कर्म तेरा।


आशा ही वो डोर है प्यारे, जो नैया पार लगाएगी,

तेरी हिम्मत ही कल को, तेरी नई कहानी गाएगी।

उठ खड़ा हो, चल पड़े तू, अब न पीछे मुड़ के देख,

आशा की इस मशाल से, अपनी ही तकदीर लिख! 


🎵 गीत: सफर के दो किनारे


मिलन एक उत्सव है, जुदाई एक साधना,

जीवन की राहों में, दोनों को ही मानना।

कभी खिलती हैं कलियाँ, कभी झड़ते हैं पत्ते,

पर रुकता नहीं है वक़्त, बस यही है जानना।

मिलन और जुदाई... जीवन के दो किनारे,

एक सिखाता हँसना, एक हिम्मत को उभारे।


अगर जुदाई न होती, तो मिलन की क्या प्यास होती?

बिना पतझड़ के सावन की, क्या कोई आस होती?

अँधेरा जो न होता, तो दीये का मोल क्या होता?

तड़प जो न होती दिल में, तो प्रार्थना की आस क्या होती?

वियोग के तप में ही, निखरता है सोना,

जुदाई सिखाती है, खुद के करीब होना।


बिछड़ना अंत नहीं है, बस एक नया मोड़ है,

भीतर की शक्ति से, खुद का एक जोड़ है।

जो साथ है वो साया है, जो दूर है वो याद है,

ये प्रेम का समंदर है, न कोई फरियाद है।

हौसलों के पंख फैला, आकाश को छूना है,

हर बिछोह के बाद ही, नया मिलन होना है।


मुस्कुरा कर गले मिलो, हँस कर विदा करो,

जो बीत गया उसे, खुदा की रज़ा कहो।

मिलन का उल्लास रखो, जुदाई का सम्मान करो,

हर पल में जी कर तुम, अपना उत्थान करो। 


प्रार्थना: हे दुनिया के रखवाले


हे दुनिया के रखवाले, सुन ले हमारी पुकार,

तेरी दया की छाँव में, महके यह संसार।

अँधियारों को दूर कर, भर दे मन में प्रकाश,

तुझसे ही है आस हमारी, तुझपे ही विश्वास।


हाथ पकड़ कर राह दिखाना, जब हम डगमगाएं,

नेकी की उस डगर पे चलें, जहाँ खुशियाँ मिल जाएं।

बैर मिटे इस जग से सारा, प्रेम की गंगा बहे,

हर प्राणी के होंठों पर, बस तेरा ही नाम रहे।


फूलों में तेरी खुशबू है, तारों में तेरी चमक,

तेरी ही दी हुई शक्ति से, चिड़ियों में है चहक।

दीन-दुखी का सहारा बनना, हमको यह वरदान दे,

सबका भला हम कर सकें, ऐसा हमें ज्ञान दे।


हे दुनिया के रखवाले, सुन ले हमारी पुकार,

तेरी दया की छाँव में, महके यह संसार। 


शीर्षक: तू मेरी आवाज़ है


गाता रहे यह दिल मेरा, यादों के साये में,

तू छुपी है हर घड़ी, मेरी ही धड़कन के लय में।

मैं राही हूँ उस राह का, जिसकी मंज़िल तू ही है,

गीत गाता हूँ मैं, क्योंकि मेरी महफ़िल तू ही है।


कभी गुनगुनाता हूँ तन्हाई में, कभी महफ़िल में गाता हूँ,

तेरे ही दिए सुरों को, मैं दुनिया को सुनाता हूँ।

मेरे लफ्ज़ तो बस बहाना हैं, असल में तेरा ही अंदाज़ है,

गीत तेरे साज़ का, मैं तेरी ही आवाज़ हूँ।

बिना तेरे ये संगीत अधूरा, जैसे बिना सुर के कोई राग है,

तू ही मेरी तपस्या, तू ही मेरे मन की आग है।


चलता रहे यह सिलसिला, जैसे बहती कोई धारा,

तू किनारा है मेरा, मैं हूँ तेरा सहारा।

सांसों के इस तार पर, बस तेरा ही नाम बजता है,

तू पास हो न हो, पर दिल में तेरा ही रूप सजता है।

गाता रहे मेरा दिल, यही दुआ हर बार माँगता हूँ,

मैं तेरा अक्स हूँ, तुझमें ही खुद को पहचानता हूँ।


जब तक ये धड़कन चलेगी, यह तराना गूँजेगा,

मेरे हर एक सुर में, तेरा ही चेहरा दिखेगा।

मैं तो बस एक साज़ हूँ, जिसे तूने छेड़ा है,

तेरी मोहब़्त ने ही, मुझे गीतों में घेरा है। 


शीर्षक: अधूरी नींद, मुकम्मल यादें


धड़कनों ने सलीका छोड़ दिया है,

जबसे तुमने रास्तों को मोड़ दिया है।

मिलेगा कहाँ वो चैन अब भला हमें,

जिसने तुम्हारा पता पूछना छोड़ दिया है।


तेरा बिछुड़ना भी जैसे एक सजा हो गई,

हंसती हुई जिंदगी खुद से खफा हो गई।

सहर की धूप अब आँखों को चुभने लगी है,

तेरी याद ही अब दर्द की दवा हो गई।


ख्वाबों की बस्ती में अब सन्नाटा रहता है,

पलकों पर अश्कों का एक काफिला रहता है।

ढूंढता हूँ खुद को उन पुरानी गलियों में,

जहाँ तेरे हाथों में मेरा हाथ रहता था।


मुसाफिर हैं हम, पर कोई मंजिल नहीं मिलती,

बिना तेरे अब दिल की महफिल नहीं सजती।

लौट आओ कि ये बेचैनी अब थमती नहीं,

तेरे बगैर इस जान को चैन की मोहलत नहीं मिलती।

ललित मोहन शुक्ला (गीतकार) 


गीत: मैं ही अनंत हूँ


मेरे भीतर सूरज है, मुझमें ही चाँद-सितारे हैं,

जो जीत सके इस दुनिया को, वो अस्त्र-शस्त्र सब मेरे हैं।

नहीं दीन हूँ, नहीं हीन हूँ, मैं गौरव का प्रतिमान हूँ,

मैं कर्मवीर, मैं भाग्यविधाता, मैं ही तो भगवान हूँ।

मैं सर्वोत्तम हूँ, मैं समर्थ हूँ, मैं ही सत्य का स्वरूप हूँ,

मैं ही शिव हूँ, मैं ही शक्ति, मैं ही परमब्रह्म का रूप हूँ!


बाधाओं की क्या हस्ती है, जो मेरे पथ को रोक सकें?

अंगारों की क्या मजाल है, जो मेरे पैरों को फूँक सकें?

मानव की सीमा लाँघ सकूँ, वो सामर्थ्य मुझमें बसता है,

ब्रह्मांड की हर ऊँचाई का, मेरे भीतर ही रस्ता है।

सब कुछ मेरे पास यहाँ, मैं पूर्ण हूँ, मैं शांत हूँ,

मैं अंतहीन ऊर्जा का सागर, मैं ही दिव्य एकांत हूँ।


जो रच सकता है नया जगत, वो हाथ मेरे ही हाथ हैं,

संकल्पों की इस ज्वाला में, सारा विश्व मेरे साथ है।

मैं वो सब कुछ कर सकता हूँ, जो सोच सके ये मानव मन,

मेरे ही एक इशारे पर, झुक जाता है ये नीला गगन।

अजेय हूँ मैं, अमर हूँ मैं, मैं तेज पुंज, मैं भारी हूँ,

मैं स्वयं ही अपना रचयिता, मैं ही सृष्टि-अधिकारी हूँ।


अब संशय का कोई स्थान नहीं, विश्वास मेरा फौलाद है,

मैं आदि हूँ, मैं अंत भी हूँ, मैं ही गूँजती नाद हूँ।

मैं सर्वोत्तम हूँ, मैं समर्थ हूँ, मैं ही सत्य का स्वरूप हूँ,

मैं ही शिव हूँ, मैं ही शक्ति, मैं ही परमब्रह्म का रूप हूँ! 


मशीन का मन: सृजन और सीमा

तकनीक की नई किरण है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नाम,

सुलझा देती पलक झपकते, दुनिया के हर मुश्किल काम।

मशीन लर्निंग के हाथों में, डेटा का है अथाह भंडार,

सीख-सीख कर खुद को निखारे, यह है आज का नया संसार।

नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग से, मशीनों ने पाई है वाणी,

भाव हमारे समझ रही है, यह विद्युत की एक दीवानी।

अनुवाद सरल हैं, उत्तर हाज़िर, चैटबॉट्स का पहरा है,

पर मानव के अंतर्मन का, सागर बहुत ही गहरा है।

जहाँ न पहुँचें इंसानी आँखें, वहाँ ये काम बनाती है,

  सटीकता से हर जटिल पहेली, चुटकियों में सुलझाती है।

  कैंसर की पहचान हो, या अंतरिक्ष की दूरी,

   इंसानों के हर अधूरे सपने, करती आज ये पूरी।


 वरदान बनेगी ये तकनीक, अगर हम रखें इसे लगाम,

विवेक हमारा, शक्ति इसकी, तब होगा जग में सुंदर काम।

मशीन को बस औज़ार रखें, न बनने दें इसे विधाता,

मानवता ही सर्वोपरि है, यही है जीवन की परिभाषा। 


अस्पताल में एक दिन: दांत का दर्द और टेस्ट का जाल

पकड़े अपना गाल मैं पहुंचा, डॉ साहब के द्वार,

दांत में ऐसी टीस थी, जैसे चल रही हो तलवार।

सोचा था बस एक दवा से, मिल जाएगी छुट्टी,

पर वहां तो खुलनी थी, मेरी किस्मत की कुट्टी!

लाइन में खड़े दिखे, दुनिया भर के बीमार,

कोई खांस रहा जोर से, कोई था लाचार।

एक महाशय पट्टी बांधे, गिना रहे थे अपना दुखड़ा,

उन्हें देख लगा, मेरा दांत दर्द तो है बस छोटा सा टुकड़ा।

डॉक्टर ने देखा मुझको, फेरा अपना आला,

बोले— "कवि जी, मामला तो लगता है बड़ा निराला!

दांत तो बस बहाना है, असली जड़ कहीं और है,

आपके भीतर बीमारियों का, मचा हुआ शोर है।"

मैंने कहा— "हुजूर, बस दाढ़ मेरी निकालो,"

वो बोले— "पहले पूरे शरीर को, तराजू में डालो!

लिख दिए उन्होंने टेस्ट इतने, कि सिर चकरा गया,

बिना सुई चुभे ही मेरा, आधा खून सूख गया।"

 * X-Ray कराओ ताकि, दांत की आत्मा दिख जाए,

 * Blood Test कराओ, कहीं हीमोग्लोबिन न शरमा जाए।

 * Sugar भी चेक कर लो, कहीं मीठा तो नहीं है दर्द,

 * ECG भी जरूरी है, पड़ न जाओ कहीं सर्द!

जेब खाली हुई मेरी, और पेट हुआ खाली,

अस्पताल की कैंटीन ने, फिर अपनी किस्मत जगा ली।

शाम को जब रिपोर्ट आई, सब निकला बिल्कुल चंगा,

डॉक्टर बोले— "मुबारक हो, शरीर है आपका गंगा!"

मैंने पूछा— "साहब, अब तो दांत का इलाज कर दो?"

वो बोले— "अगले हफ्ते आना, बस थोड़ी सी फीस भर दो।"

मैं भागा वहां से पकड़ के अपना गाल,

दांत दर्द भला है साहब, पर बुरा है अस्पताल का हाल! 


गीत: "इम्तिहान की दहलीज"


हर कदम पर एक सवाल है, हर मोड़ पर एक नया इम्तिहान,

कभी कागज़ की कश्ती है, कभी तपता हुआ आसमान।

ये मत पूछ कि नतीजे क्या होंगे इस सफर के ऐ मुसाफिर,

बस ये देख कि कैसे निखर रहा है तेरा अपना आत्म-सम्मान।


वो बचपन की किताबें, वो अंकों की होड़ वाली परीक्षा,

सफल हुए तो प्रशंसा मिली, विफल हुए तो कड़वी शिक्षा।

पर सच तो ये है कि वो अंक नहीं, वो बस एक शुरुआत थी,

सफलता ने पंख दिए, पर असफलता ने लड़ने की औकात दी।

परिवर्तन का पहिया घूमा, तुम थोड़े और सयाने हो गए,

हार को जीतकर तुम, खुद के ही दीवाने हो गए।


कभी वक्त लेता है इम्तिहान रिश्तों की डोर को थामने का,

कभी मौन रहकर सहना पड़ता है, समय के सामने झुकने का।

जो टूट गया वो बिखर गया, जो टिका रहा वो निखर गया,

धैर्य की इस परीक्षा से ही, इंसान का असली रूप उभर गया।

सफलता ने घर बसाया, पर विफलता ने गहराई सिखलाई,

अकेलेपन की धूप में ही, अपनों की छाँव समझ में आई।


ये दुनिया एक रणभूमि है, यहाँ कर्म ही तेरा इम्तिहान है,

हारना अंत नहीं होता, बस फिर से उठने का एक प्रमाण है।

सफल हुए तो शिखर तुम्हारा, झुक जाएगी ये सारी धरा,

असफल हुए तो याद रखना, अनुभव का सागर अभी है भरा।

इम्तिहान बदल देता है तुम्हारी आँखों के देखने का नज़रिया,

कठिनाइयां बनती हैं राह, और हिम्मत बनती है दरिया।


तो उठ खड़ा हो, कलम उठा या फिर अपना हौसला बुलंद कर,

इम्तिहानों से डरना छोड़, बस अपनी मेहनत पर तू गौर कर।

नतीजा जो भी हो, तू कल से बेहतर इंसान बनेगा,

हर परीक्षा की अग्नि में तपकर, तू ही एक दिन कीर्तिमान बनेगा। 


गीत: जीवन के दो रंग


एक ही क्यारी में हैं जन्मते, एक ही पौधा पाल रहा,

एक को मिलती कोमलता, दूजा शूल बन काल रहा।

पर जीवन का सार सिखाते, ये उपवन के वासी हैं,

फूल और कांटे हम सबके, शिक्षा के अविनाशी हैं।


फूल सिखाता मुस्कुराना, चाहे कितनी धूप खिले,

खुशबू अपनी बाँट रहा वह, जिससे भी वह गले मिले।

स्वार्थहीन हो जीना सीखो, महको और महकाओ तुम,

भीड़ भरी इस दुनिया में अपनी, अलग पहचान बनाओ तुम।


कांटा कहता धीर न खोना, रक्षा अपनी स्वयं करो,

विषम परिस्थितियों के आगे, कभी न घुटने टेक डरो।

बाधाएँ तो आएँगी ही, पथ में हरदम रोड़ा बन,

तुम मर्यादा की रक्षा करना, बनकर तीखा पैनापन।


एक लुभाता मन को अपने, दूजा उँगली छेद रहा,

कर्मों का है सारा अंतर, रूप न कोई भेद रहा।

जैसे कर्म करोगे जग में, वैसा ही सम्मान मिले,

फूल बनो तो शीश चढ़ोगे, कांटों को अपमान मिले।


जन्म नहीं, बस कर्म बड़ा है, यही सीख तुम गांठ लो,

दुख को पीकर मुस्काओ तुम, सुख को सबमें बांट लो।

फूल और कांटों से सीखो, समरस होकर जीना तुम,

जीवन के इस कड़वे सच को, अमृत मानकर पीना तुम। 


मधुर गीत: भारत की माटी की गाथा


हे पुण्य भूमि, हे वीर प्रसू, तेरी माटी को शत-शत नमन,

जहाँ गूंजा था चक्रवर्तियों का, वो न्याय-धर्म का पावन मन।

कहीं शौर्य खिला केसरिया बन, कहीं क्षमा बनी मर्यादा थी,

इस पावन भारत की गाथा, कुछ भूल, बहुत कुछ गाथा थी।


अशोक ने जब शस्त्र तजे, और धम्म की ज्योति जलाई थी,

पर सीमाएं कुछ सुस्त हुईं, जब शांति की बीन बजाई थी।

वो चन्दन जैसी शांति मिली, पर सैन्य शक्ति कुछ मौन हुई,

इतिहास सिखाता हमें यही, की नीति कहां अक्षुण्ण हुई।


चौहान का वो शब्द-भेदी, और गोरी पर वो भारी हाथ,

पर शत्रु को जो दान दिया, उसने ही बदला दिन और रात।

एक भूल ने भारत का नक़्शा, सदियों तक ही बदल दिया,

पर राजपूती उस आन ने ही, फिर मर मिटने का बल दिया।


लक्ष्मीबाई की तलवारें, जब चमकीं झाँसी की गलियों में,

स्वाधीनता का बीज बोया, सोई हुई उन कलियों में।

भले हार मिली रणभूमि में, पर जगी देश की चेतना थी,

हर गलती एक सबक बनी, और हर जीत एक प्रेरणा थी।


इतिहास नहीं बस तिथि-क्रम, ये जीवन का एक दर्पण है,

वीरों के उन पद-चिह्नों पर, भारत का हर मन अर्पण है।

हम भूलों से भी सीखें और, गौरव पर मान बढ़ाएं हम,

अपनी सुंदर इस धरती का, फिर गौरव गान सुनाएं हम।


शीर्षक: तिरंगे की शान, हिंद की जान


थल की धूल कहे गाथा, जल की लहरें गाती हैं,

नभ की ऊँची परवाजें, वीरों का मान बढ़ाती हैं।

रक्षक हैं हम भारती के, दुश्मन को धूल चटाते हैं,

थल, जल, नभ के पहरेदार, हम हिंद की शान बढ़ाते हैं।


अटल हिमालय की चोटी हो, या तपता हुआ रेगिस्तान,

पैर थमे ना वीर के कभी, सीने में है हिंदुस्तान।

'ऑपरेशन विजय' की ललकार, या सर्जिकल स्ट्राइक का वार,

दुश्मन कांपे थर-थर देख, थल सेना की ललकार।

मिट्टी का कर्ज निभाते हम, सीमा पर डट जाते हैं,

हम थल के वीर सिपाही, तिरंगा ऊँचा लहराते हैं।


नीले अंबर के नीचे, सागर की लहरों पर राज,

विक्रांत और विक्रमादित्य, भारत के सिर का ताज।

दुश्मन की हर हलचल को, सागर में ही दफना दें,

'वरुण' के हम हैं लाडले, लहरों पर विजय पताका फहरा दें।

गहराई हो पाताल की, या नीले जल का विस्तार,

हिंद महासागर का रक्षक, है नौसेना की तलवार।


बादलों को चीर कर निकले, गूंजे नभ में गर्जना,

राफेल और सुखोई का दम, जैसे सिंह की तर्जना।

आकाश के हम हैं बाज़, पलक झपकते वार करें,

दुश्मन के हर मंसूबे को, मिट्टी में ही मार गिरें।

'नभ: स्पृशं दीप्तम्' का नारा, अंबर में गूंजता है,

हिंद का हर जांबाज परिंदा, मौत से कब डरता है?


एक लक्ष्य, एक संकल्प, माँ भारती की रक्षा हो,

हर घर में अमन-चैन हो, खुशियों की ही वर्षा हो।

थल, जल, नभ के वीरों को, कोटि-कोटि प्रणाम हमारा,

अमर रहे बलिदान तुम्हारा, गूंजे 'जय हिंद' का नारा! 


गीत: हे ललित कलाधर, प्रार्थना स्वीकार करो


हे ललित लोचन, हे चारु चेतन,

हृदय में मेरे संगीत भर दो।

जो मंजुल हो, जो कान्त हो,

वही शुचि गुण मुझमें विस्तार कर दो।


संसार की जड़ता तज कर प्रभु,

मैं रम्य भाव को पा जाऊँ।

वाणी में मेरी पेशल मिठास हो,

मैं रुचिर गीत ही गा पाऊँ।

मृदुता का वरदान दो देव मुझे,

मन सुकुमाल और शांत कर दो।


तेरी सृष्टि की कमनीय छवि,

मेरी आँखों का आधार बने।

जो मनोहर हो, जो सुन्दर हो,

जीवन का वही श्रृंगार बने।

हे अभिराम! दया के सागर,

अज्ञान का सारा तिमिर हर लो।


हे ललित कलाधर, हे विश्वेश्वर,

अपनी छवि सा मुझे ललाम कर दो।

मेरे व्यक्तित्व को, मेरे अस्तित्व को,

एक सुंदर काव्य के नाम कर दो। 


🎶 गीत: "जीवन की मिठास, अब तेरे हाथ"


जाग रे राही, भोर भई है, नया संकल्प सजाना है,

चीनी की इस जंजीर को अब, जड़ से हमें मिटाना है।

तन को कंचन, मन को पावन, फिर से आज बनाना है,

मधुमेह को जीत के अपनी, हस्ती को चमकाना है।


थाली में हो रंग हरा, और अनाज हो थोड़ा मोटा,

मैदा-चीनी साथ छोड़ दें, इनसे नाता है खोटा।

थोड़ा-थोड़ा, रुक-रुक कर खा, भूख से नाता जोड़ सही,

फल-सब्जी और रेशों में ही, सेहत की है डोर छिपी।


चल तू दो पग, दौड़ ज़रा, या योग की शरण में आ,

आलस की इन चादरों को, दूर कहीं तू फेंक के आ।

रगों में दौड़ता रक्त कहेगा, 'शुक्रिया' तेरा बारंबार,

पसीने की हर बूंद लिखेगी, खुशियों का नया संसार।


तनाव की इस आग को अब, ध्यान से तू शांत कर,

नींद की गहरी मीठी लोरी, आँखों को तू दान कर।

हिम्मत मत हार ओ साथी, ये सफर थोड़ा भारी है,

पर तेरी दृढ़ इच्छाशक्ति, हर मुश्किल पर भारी है।


नाप के अपनी शुगर को तू, डगमग कदम संभलना सीख,

प्राकृतिक इस राह पे चलकर, जीवन को तू नया रूप दे।

तू ही अपना वैद्य है प्यारे, तू ही अपनी शक्ति है,

स्वस्थ शरीर ही ईश्वर की, सबसे बड़ी भक्ति है 


कीर्तन: प्रभु ये तेरी कैसी माया


प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया।

कण-कण में है रूप तुम्हारा, जग में तू ही समाया॥

प्रभु ये तेरी कैसी माया...


कहीं धूप है, कहीं छाँव है, कहीं रेत का दरिया,

कहीं खिल रहे सुंदर उपवन, कहीं सूखी है कलिया।

बिन पंखों के पंछी उड़ाए, पर्वत को झुकाया,

प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥


अज्ञानी को ज्ञान मिले, और निर्धन पाए माया,

तेरी कृपा की शीतल छाया, जिसने तुझको ध्याया।

शून्य जगत में जीवन फूँका, माटी को महकाया,

प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥


जन्म-मरण का खेल रचाया, तू ही है विधाता,

बिना हाथ के बोझ उठाए, तू ही सबका दाता।

हार गया जग ढूंढ-ढूंढ कर, अंत किसी ने न पाया,

प्रभु ये तेरी कैसी माया, कोई समझ न पाया॥ 


गीत: "नजरिया अपना-अपना"

(लड़का):

मुझे तो बस वो सादगी चाहिए,

जो बातों में घुली मिश्री-सी हो।

निखर जाए चेहरा देख कर मुझको,

वो मेरे ख्वाबों की बस एक ही हो।

पढ़े जो मेरी खामोशी को पल भर में,

हौसला बने मेरा, जो मुश्किल घड़ी हो।

(लड़की):

मुझे चाहिए वो जो सम्मान दे,

मेरे सपनों को अपनी उड़ान दे।

न हो पाबंदियां, बस साथ चले वो,

मेरी छोटी-सी दुनिया को पहचान दे।

वो जो गुज़रे वक्त में हाथ थाम ले,

ऐसा ही कोई मेरा हमसफर खास हो।


(कोरस/माता-पिता का स्वर):

पर हम तो देखते हैं जड़ें कितनी गहरी हैं,

संस्कारों की खुशबू घर में ठहरी है?

बेटी को मिले घर जो अपना सा लागे,

बेटे को मिले वो जो सबको साथ ले भागे।

(लड़का - मुस्कुराते हुए):

मम्मी कहती हैं, "लड़की सुशील और गुणी हो,"

किचन और काम में थोड़ी निपुण भी हो।

पापा को चाहिए खानदान का मान,

पर मुझे तो चाहिए बस मेरा आसमान!


मेरे घरवाले ढूंढते हैं लड़का 'सैटल्ड' हो,

स्वभाव से थोड़ा शांत और सुलझा हुआ हो।

पर मेरी शर्त है कि वो दोस्त भी बने,

वो ज़िद भी सुने और थोड़ा हंसा हुआ हो।


ये मेल है दो अलग चाहतों का,

रिश्ता है ये दो अलग राहों का।

गुण और व्यवहार जब एक हो जाएं,

तभी तो दो परिवार एक घर कहलाएं।


(लड़का): दिल मिले तो बात बने...

(लड़की): और संस्कार मिलें तो घर सजे!

(दोनों): बस इसी सामंजस्य में ही तो विवाह का असली सुख है। 


🎵 सत्य-महिमा गीतम्


सत्यं मूलं सकलधर्मस्य, सत्यं प्रकाशं जीवनस्य।

सत्यमेव जयते नित्यं, सत्यं शरणं गच्छामि॥

सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्।


असतो मा सद्गमयतु देव, तमसो मा ज्योतिर्गमयतु।

सत्यवाण्यां वसतु सरस्वती, सत्यमार्गे चलतु मे मनः॥

सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्।


न भीतिः कुत्रापि यत्र सत्यं, न शोकः कदापि यत्र सत्यं।

परमात्मा सत्यस्वरूपोऽस्ति, तस्मिन् लीनं भवतु मे विश्वम्॥

सत्यं शिवं सुन्दरम्, सत्यं शिवं सुन्दरम्। 


इतिहास: जीवन का दिग्दर्शक

बीते कल की राख नहीं है, यह मशाल जलती हुई,

हर पग पर जो राह दिखाए, वो आवाज़ थमती हुई।

महलों के गलियारों से लेकर, खेतों की हरियाली तक,

इतिहास खड़ा है साथ हमारे, बचपन से बुढ़ापे तक।

विज्ञान और ज्ञान के क्षेत्र में:

शून्य कहाँ से उपजा था, और पहिए ने कब दौड़ भरी?

इतिहास हमें बतलाता है, कैसे विज्ञान की ज्योति जली।

पुरखों के उन प्रयोगों से ही, आज हम चांद को छूते हैं,

बीते सच की बुनियाद पे ही, हम नए ख़्वाब अब बुनते हैं।

संस्कृति और संस्कार में:

त्योहारों की रौनक में और गीतों की उन तानों में,

इतिहास बसा है पीढ़ियों के, हर अनकहे अफसानों में।

मर्यादा और शौर्य की बातें, जो हमें श्रेष्ठ बनाती हैं,

इतिहास की ही वीथी से, वो संस्कार घर आती हैं।

राजनीति और राष्ट्र के पथ पर:

तख़्त गिरे और ताज उछले, खून बहा मैदानों में,

इतिहास गवाह है सत्ता के, बनते-मिटते अरमानों में।

किस भूल ने देश झुकाया था, किस वीरता ने मान दिया,

इतिहास ने ही तो लोकतंत्र को, जीने का पैगाम दिया।

व्यक्तिगत जीवन के दर्पण में:

स्वयं का भी इतिहास है होता, भूलों और सुधारों का,

अनुभव की स्याही से लिखा, जीत और हारों का।

जो सीख सके न अतीत से, वो वर्तमान गँवाता है,

इतिहास को पढ़कर ही राही, मंज़िल अपनी पाता है। 


रेत और बारूद का संवाद

तपते सहरा की फिजाओं में एक खौफ सा रहता है,

कहीं दूर समंदर की लहरों पर कोई पहरा रहता है।

एक तरफ मग़रूर (अहंकारी) ताकत का पुराना साया है,

दूजी ओर ज़मीं अपनी, और सर पर ज़िद का सरमाया है।

वो समझौते की मेजों पर लिखी गई इबारतें थीं,

जो टूट के बिखरीं तो फिर बस नफरतें ही नफरतें थीं।

कभी एटम के घेरों में, कभी तेल की धारों में,

इंसानियत सिसकती है सियासत के बाज़ारों में।

एक हाथ में पाबंदियां, दूजे में धमकियां पलती हैं,

तेहरान की गलियों में फिर उम्मीदें कहाँ जलती हैं?

वाशिंगटन के गलियारों से जब हुक्म कोई आता है,

खाड़ी के उस पानी में फिर तूफां सा उमड़ जाता है।

परचम अलग, मजहब अलग, और सोच की ये जंग है,

पर मासूमों के चेहरे पर खौफ का ही रंग है।

कहीं मिसाइल की गूंज है, कहीं पाबंदियों का घेरा,

इंतज़ार में बैठी दुनिया, कब होगा अमन का सवेरा?

ये दो किनारों की जंग है, या वर्चस्व की एक होड़ है,

इतिहास के हर पन्ने पर एक खूनी सा मरोड़ है।

बंदूकें जब तक बोलेंगी, तब तक इंसान हारेंगे,

नफरत की इस आतिश में सब अपने ही घर वारेंगे। 

🎵

गीत: "शुक्ला जी का अपडेटेड वर्ज़न"

हाथ में डंडा, मन में ज्ञान, बने शिक्षक महोदय महान,
बच्चों को सिखलाया 'अ' से 'आम', पर खुद को न मिला आराम।
चॉक की धूल उड़ी जब भारी, जाग उठी तब 'कवि' की बारी,
शुक्ला जी ने बदली राह, वाह भाई वाह, वाह भाई वाह!
गणित के सूत्रों में जब रस न आया,
तो 'अनुप्रास' और 'रूपक' का तड़का लगाया।
क्लास में जो बच्चे मचाते थे शोर,
उन्हें सुनाने लगे कविता की टोर।
कॉपी चेक करते-करते छंद लिख डाले,
स्कूल के रजिस्टर में 'बंद' लिख डाले।
प्रिंसिपल बोले— "ये क्या है गुनाह?"
शुक्ला जी बोले— "ये है मेरी आह!"
कविता लंबी हुई तो जनता सो गई,
शुक्ला जी की प्रतिभा 'म्यूजिकल' हो गई।
कवि सम्मेलन से भागे, फ़िल्मी धुन पकड़ी,
शब्दों की खेती अब 'लय' में थी जकड़ी।
"तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम"
लिख-लिख कर गीत, कमाया खूब नाम।
पर गायक ने जब सुर बेसुरा लगाया,
तब शुक्ला जी को 'डिजिटल' ख्याल आया।
अब न सुर का झंझट, न पब्लिशर की मार,
कीबोर्ड उठाया और बन गए 'ब्लॉगर' यार।
"क्लिक करो", "शेयर करो", यही अब मंत्र है,
इंटरनेट ही शुक्ला जी का नया लोकतंत्र है।
शिक्षक वाला अनुशासन, और कवि वाली टीस,
ब्लॉग पर परोसते हैं, बिना किसी फीस!
कलम से शुरू हुए, कर्सर पर अटके,
शुक्ला जी के रूप देखो, कितने हैं झटके!
कल तक जो देते थे 'होमवर्क' की सजा,
आज 'कमेंट बॉक्स' में ले रहे हैं मज़ा।
सफर है सुहाना, मंज़िल है अनजान,
ललित मोहन जी हैं— हरफनमौला इंसान!
ललित मोहन शुक्ला ( कवि, लेखक व ब्लॉगर)

🌸 तुम मेरी राधा, मैं तेरा श्याम 🌸


नयनों में कजरा, अधरों पे मुस्कान,

तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।

बाँसुरी की तान पर, थिरके तेरा नाम,

तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।


स्वर्ण वर्ण अंग-अंग, जैसे खिली धूप हो,

शरत चंद्र की चाँदनी, तेरा ही स्वरूप हो।

मृगनयनी की चितवन में, बंधा मेरा प्राण,

कुंजन की ओट में, तेरा ही ध्यान।

चुनरी की सरसराहट, प्रेम का पयाम,

तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।


यमुना के तीर पर, वो मंद-मंद वायु,

थम जाए क्षण भर को, हमारी ये आयु।

कर-कमलों में हाथ लिए, भीगे सारा अंग,

चढ़ जाए मुझ पर भी, तेरे प्रेम का रंग।

तू मेरी चांदनी, मैं तेरा आसमान,

तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम।


बिंदिया तुम्हारी जैसे, भोर का तारा,

तुझ बिन अधूरा हूँ, मैं कृष्ण सहारा।

हृदय के सिंहासन पर, विराजी तू ही वाम,

मेरे हर श्वास में, तेरा ही नाम।

भक्ति भी तू मेरी, तू ही मेरा धाम,

तुम हो मेरी राधा, मैं हूँ तेरा श्याम। 


गीत: "सफर शिखर तक"


उठ बांध कमर, अब भोर हुई,

सपनों की डगर अब ज़ोर हुई।

बस देख लिया जो देखना था,

अब वक्त है कर दिखाने का,

सफलता का आगाज कर,

हौसलों से नया इतिहास भर।


मन में जब एक बीज पले,

अंगारों पर भी पाँव चलें।

दुनिया कहेगी— "तू रुक जा अभी",

पर तू कहना— "नहीं, बस अब ही!"

पहला कदम ही सबसे भारी है,

पर जीत की यही तो तैयारी है।


रातों की नींद जब खोने लगे,

थकान भी जब साथी होने लगे।

जब पसीने से तू नहाएगा,

तभी तो खुद को निखारेगा।

न शोर कर, न बात कर,

बस खामोशी से अपनी रात भर।


कभी गिरोगे, कभी चोट लगेगी,

दुनिया तुम्हारी हार पे हँसेगी।

पर गिरकर उठना ही तो शान है,

यही तो असली इंसान की पहचान है।

हर हार से एक सबक चुरा,

फिर खड़ा हो, बनके और भी खरा।


वो देख सामने मंज़िल खड़ी,

तेरी मेहनत की है ये घड़ी।

झुक गया अम्बर, तू जीत गया,

दुखों का वो साया बीत गया।

अब तू शिखर पर खड़ा हुआ,

तेरा कद अब सबसे बड़ा हुआ।


सफलता का आगाज हुआ,

सिर पे तेरे अब ताज हुआ।

तूने कर दिखाया, तू बढ़ चला,

मुकाम पर अब तू पहुँच चला! 


प्रेरणादायक गीत: "उठो हिंद के वीर तुम"



उठो हिंद के वीर तुम, नया सवेरा आया है,

मेहनत की स्याही से देखो, भाग्य अपना बनाया है।

सपनों के इस बजट में, हमने संकल्प पिरोया है,

नया भारत बनाने का, अब बीज हमने बोया है।


डिजिटल की डगर चले, हम छू लेंगे आसमान को,

तकनीक के पंख लगाकर, देंगे गति विज्ञान को।

गाँव की मिट्टी महकेगी, शहर भी अब मुस्कुराएंगे,

आत्मनिर्भर बनकर हम, जग में परचम लहराएंगे।


चुनौतियां तो आएँगी, पर रुकना अपना काम नहीं,

थक कर बैठ जाना ही, वीरों का परिणाम नहीं।

हर हाथ को अब काम मिले, हर घर में खुशहाली हो,

भारत की इस गाथा में, न कोई जगह खाली हो।


उठो चलो और बढ़ते चलो, यह वक्त तुम्हारा अपना है,

विकसित भारत का जो देखा, सच करना वो सपना है। 


🎵 गीत: अधिकार तेरा बस कर्म पर


उठ बाँध कमर, मत देख डगर, गंतव्य अभी तो दूर है,

न हार मान, न थक अभी, तू शक्ति का ही नूर है।

ये सृष्टि नियम समझाती है, फल की तू चिंता छोड़ दे,

बस कर्म ही आधार है, तू भाग्य से मुँह मोड़ दे।

अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है,

जो बीज बोए आज तू, कल वही संसार है।



कभी धूप होगी राह में, कभी बादलों की छाँव होगी,

कभी काँटों भरी ज़मीन, कभी मखमली सी राह होगी।

पर राही वही जो चलता रहे, रुकना जिसे स्वीकार नहीं,

जिसने पसीना बहाया नहीं, उसे जीत का अधिकार नहीं।

तू बीज बन जा मिट्टी में, खिलने की अभिलाषा तज,

तू दीप बन जा अँधियारे में, जलने की परिभाषा भज।

अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है...


आसक्ति के जो मोह-पाश, तुझे रोकेंगे हर मोड़ पर,

अतीत के जो घाव गहरे, बाँधेंगे तुझे छोड़कर।

पर मन को कर तू सारथी, और बुद्धि का गांडीव उठा,

जो सत्य है, जो धर्म है, बस उस डगर पर कदम बढ़ा।

न जीत का उन्माद हो, न हार का अवसाद हो,

तेरा हर एक प्रयास ही, ईश्वर को धन्यवाद हो।

अधिकार तेरा बस कर्म पर, फल का न तू हकदार है...


ना कल तेरा, ना कल मेरा, बस 'आज' ही तो हाथ है,

पूरी धरा है सामने, और ईश्वर तेरे साथ है।

कर्म कर... बस कर्म कर...  


🎵 शीर्षक: वक्त का पहिया


धूप का दामन थाम के देखो, शाम ढली तो क्या?

बदलेगा हर मंज़र एक दिन, आँख लगी तो क्या?

ये वक्त का पहिया चलता है, ये रुकना नहीं जानता,

पर इस वक्त को अपना करने में, सारा वक्त लगा दो तुम।


कभी ये कड़वा घूँट सरीखा, कभी शहद की धार है,

कभी ये कोरी पतझड़ जैसी, कभी खिली मल्हार है।

जो बीत गया वो धूल हुआ, जो आने वाला नूर है,

मंजिल तक जाने की खातिर, सारा वक्त लगा दो तुम।


लकीरें फीकी पड़ जाएं तो, मेहनत का रंग घोल दो,

जो बंद पड़े हैं द्वार सफलता के, हिम्मत से तुम खोल दो।

किस्मत का रोना छोड़ो अब, ये वक्त बड़ी सौगात है,

खुद की तकदीर बदलने में, सारा वक्त लगा दो तुम।


वक्त की लहरों को मुट्ठी में कैद करना सीख लो,

वक्त को वक्त के सांचे में ढलने में, सारा वक्त लगा दो तुम। 


गीत: अनमोल तेरे बोल


हवाओं में घुली है जैसे कोई रागिनी,

चाँदनी में भीगी जैसे कोई यामिनी।

धड़कनों ने सीखी है चाहत की नई भाषा,

जब से तूने छेड़ी है मन में नई अभिलाषा।

मेरे सूने जीवन में...

मेरे सूने जीवन में रस घोल गए,

प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।


कहने को तो शब्द हैं लेकिन, इनमें बसी खुदाई है,

जैसे तपती धूप में कोई, ठंडी सुखद विदाई है।

जब तू धीमे से हँसकर मेरा नाम पुकारे,

ऐसा लागे अंबर से टूट गिरे हों तारे।

मिश्री सी ये कानों में...

मिश्री सी ये कानों में शहद घोल गए,

प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।


मौन खड़ा था मैं कब से, तूने सुर झंकार दिया,

कोरे कागज़ जैसे दिल पर, अपना नाम उतार दिया।

सच कहूँ तो ये बातें नहीं, जादू की कोई माया है,

भटके हुए राही को जैसे मिल गई शीतल छाया है।

बंद थे जो रस्ते...

बंद थे जो रस्ते, वो सब खोल गए,

प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल।


ना कोई दूजा गहना है, ना कोई दूजा साज,

बस तेरी इन बातों पर ही, मुझे बड़ा है नाज़।

यूँ ही मीठा बोलते रहना, ओ मेरे हमदम,

तेरी इन्हीं बातों से ही, महकेंगे हम हरदम।

प्यारे तेरे बोल, बड़े अनमोल तेरे बोल। 


🎵 गीत: जीवन का मदारी


ये दुनिया एक तमाशा है, ये जग एक भारी मेला है,

पर घबराना तू क्यूँ बंदे? तू यहाँ नहीं अकेला है।

वो ऊपर बैठा जादूगर, हर डोरी थामे रहता है,

जिसे दुनिया 'मदारी' कहती है, वो सबको अपना कहता है।


कभी नचाता खुशियों में, कभी गम की धुन बजाता है,

वो मिट्टी के इन पुतलों से, क्या खूब खेल रचाता है।

डमरू जब उसका बजता है, तब थिरकती ये कायनात है,

उसके हाथ में डोरी है, बस इतनी सी तो बात है।

तू नाच उसी की तालों पर, वो हार कभी न देगा,

जब गिर जाएगा थककर तू, वो बाहों में भर लेगा।


मदारी और खिलौने का, रिश्ता बड़ा निराला है,

उसने ही तुझे गढ़ा यहाँ, उसने ही पाला-पोसा है।

वो पत्थर को भी बोल दे, वो ज़हर को अमृत कर दे,

तू अपनी खाली झोली को, उसके विश्वास से भर दे।

मत सोच कि तू छोटा है, मत सोच कि तू हारा है,

इस खेल का हर एक तिनका, बस उस मालिक का सहारा है


तू कठपुतली बन जा उसकी, वो श्रेष्ठ कलाकार है,

तुझे शिखर पर ले जाने को, वो मदारी बेकरार है।

बस सौंप दे खुद को हाथों में, और देख तमाशा जीवन का,

मिट जाएगा डर सारा, और वहम तेरे इस मन का। 


🎵 गीत: "त्रिवेणी प्रेम की"


सुरों की धारा, साज का साथ,

जब मिल जाए प्रेम का हाथ।

गूँज उठेगा फिर वो तराना,

झूम उठेगा सारा जमाना।

इन तीन धाराओं के मेल से ही,

जीवन का असली संगीत बनता है।


सुर है अनुशासन, सुर है साधना,

मन के मंदिर की पावन आराधना।

बिना सुर के शब्द भी मौन रहते हैं,

सुर ही तो भावों को पंख देते हैं।

पर सुर भी अधूरा है, बिना अहसास के,

जैसे कोई प्यासा हो, बिना प्यास के।


साज की धड़कन जब दिल से जुड़ती है,

हवाओं में एक नई लय मुड़ती है।

तारों की थिरकन, ढोलक की वो थाप,

मिटा देती है मन का हर संताप।

साज और सुर जब गले मिलते हैं,

मुरझाए हुए फूल भी फिर खिलते हैं।


पर सबसे ऊँचा है प्रेम का स्वर,

जो आवाज को बना दे अमर।

आवाज में जब तक न हो प्रेम की मिठास,

नहीं पहुँचती वो खुदा के पास।

जब सुर, साज और रूह की पुकार मिलती है,

तब जाकर दुनिया को एक "जीत" मिलती है।


तो उठो, अपने भीतर का तार छेड़ दो,

नफरत के सुरों को आज मरोड़ दो।

प्रेम के धागे में सबको पिरोना है,

संगीत से ही जग को भिगोना है। 


कृतज्ञता की पुकार


तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु, तूने जीवन संवारा है,

अंधेरी इन राहों में, तू ही बस एक सहारा है।

जो मिला है मुझे तेरी दया से, वो मेरी हैसियत नहीं,

तूने थामी जो मेरी बाहें, तो अब कोई डर नहीं।


गिरा जब भी मैं रास्तों पर, तूने हँसकर उठाया मुझे,

भटका जब मैं इस दुनिया में, सही रास्ता दिखाया मुझे।

हर एक साँस जो चलती है, वो तेरी ही अमानत है,

मेरी छोटी सी इस दुनिया पर, बस तेरी ही हुकूमत है।

तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु...


कभी खुशियाँ दीं अपार तूने, कभी गम में भी साथ रहा,

जब कोई न था मेरे करीब, तब सिर पर तेरा हाथ रहा।

शब्द कम हैं, भाव ज्यादा हैं, कैसे गुणगान करूँ तेरा,

तूने मिट्टी से सोना बना दिया, ये जीवन अब बस तेरा।

तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु...


न कोई चाह है अब दिल में, न कोई शिकायत बाकी है,

तू मेरे साथ है हरदम, बस यही चाहत काफी है।

तेरे चरणों में बीते जीवन, यही विनती बार-बार है,

प्रभु! तेरे प्रेम और करुणा का, न कोई अंत न पार है।


तेरा शुक्रिया है मेरे प्रभु, तूने जीवन संवारा है,

अंधेरी इन राहों में, तू ही बस एक सहारा है। 

 

🎵 शीर्षक: आज का सवेरा, मेरा अपना है


टूट गए जो सपने तो क्या, फिर से उन्हें सजाना है,

गिरी हुई हर एक ईंट से, नया महल बनाना है।

बीत गई जो रात अंधेरी, उसे वहीं पर रहने दो,

एक सुनहरा, सुंदर कल अब, आंखों में बस जाने दो।

याद दिला खुद को तू राही, हार नहीं ये अंत है,

पतझड़ के इन सूखे पत्तों, के पीछे ही बसंत है।


विफलता के धुंधलके में, जो रास्ता ओझल होता है,

वही रास्ता कल की खातिर, नया हौसला बोता है।

भविष्य की वो स्वर्ण किरण, बस छूने ही वाली है,

देख ज़रा तू गौर से बंदे, धूप कितनी मतवाली है।

हार को अपनी सीढ़ी कर ले, शिखर अभी तो बाकी है,

तूने जो खुद को पहचान लिया, बस वही जीत की साकी है।


बीता कल एक राख मात्र है, आने वाला एक सपना है,

पर जो मुट्ठी में बंद है तेरे, वही 'आज' बस अपना है।

इस पल से कीमती कुछ भी नहीं, ये हीरा है, ये मोती है,

आज की मेहनत ही तो कल की, उज्ज्वल पावन ज्योति है।

अमूल्य है ये श्वास तुम्हारी, अमूल्य है ये वर्तमान,

उठो और अपनी रग-रग में, भर लो नया तुम एक उफ़ान।


खुद को रोज़ याद दिलाना, तू गिरकर उठने वाला है,

अंधियारों को चीर के तू ही, जग में नया उजाला है।

आज सबसे कीमती है...

हाँ, आज सबसे कीमती है! 


📱 नया गीत: "डाकिया ई-मेल लाया"

(तर्ज: डाकिया डाक लाया)


डाकिया ई-मेल लाया, डाकिया ई-मेल लाया

खुशियां कभी, कभी स्पैम लाया, डाकिया ई-मेल लाया...


चिट्ठी-पतरी का ज़माना गया भाई,

अब तो 'ब्लू टिक' ने शामत आई।

व्हाट्सएप पे 'गुड मॉर्निंग' का सैलाब है,

रिश्तेदारों का ग्रुप... जैसे कोई अज़ाब है!

डाकिया व्हाट्सएप लाया, डाकिया व्हाट्सएप लाया...

बिना बात के सौ मैसेज वाला, 'फॉरवर्ड' लाया!


पहले चिट्ठी का इंतज़ार रहता था,

अब 'ओटीपी' (OTP) दिल की धड़कन बढ़ाता है।

नेटवर्क न हो तो जान निकल जाती है,

बैटरी 'लो' (Low) हो तो रूह कांप जाती है!

डाकिया मैसेज लाया, डाकिया मैसेज लाया...

'योर अकाउंट इज़ डेबिटेड' वाला, गम लाया!


चेहरा जो देखा तो पहचान न पाए,

फिल्टर ने ऐसे-ऐसे रूप दिखाए।

चिट्ठी में तो आँसू भी दिख जाते थे,

यहाँ 'इमोजी' हंसते हैं, पर दिल रोते जाते हैं!

डाकिया नोटिफिकेशन लाया, डाकिया नोटिफिकेशन लाया...

'ज़ोमैटो' से कूपन वाला, लालच लाया!

मज़ेदार मोड़:

अब डाकिया धूप में नहीं चलता,

वो तो सर्वर के वायर में है पलता।

साइकिल की घंटी अब 'पिंग' (Ping) बन गई,

ज़िंदगी बस एक 'रिफ्रेश' की मोहताज बन गई!

डाकिया ई-मेल लाया... डाकिया ई-मेल लाया! 


गीत: "धड़कन की सदा"


मन गाए वो तराना, जिसके सुनते ही चले आना

मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना

मन गाए वो तराना...


इन भीगी सी राहों में, यादों की पनाहों में

छुप जाऊं मैं साजन, बस तेरी ही बाहों में

हो... चाहे बदले ये ज़माना, पर तू न भूल जाना

मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना

मन गाए वो तराना...


आँखों में जो बसती है, वो मूरत हो तुम मेरी

साँसों में जो महकी है, वो खुशबू हो तुम मेरी

हो... मुश्किल है अब छुपाना, तेरा मेरा ये अफ़साना

मेरे दिल का है ठिकाना, बस तेरा ही आशियाना

मन गाए वो तराना...

ललित मोहन शुक्ला ( कलमकार) 


शीर्षक: जड़ों की ओर लौटें


बदल रहा है परिवेश यहाँ, बदल रही है धारा,

पर भूल न जाना ओ राही, वह संस्कार हमारा।

आधुनिकता की चकाचौंध में, अपना दीप जलाना है,

हमें भारतीय संस्कृति का गौरव, फिर से विश्व को दिखाना है।


हाथों में मोबाइल तो हों, पर रिश्तों में हो सत्कार,

स्क्रीन पर दुनिया सिमटी है, पर दिल में हो विस्तार।

भाषा चाहे जो भी सीखें, पर अपनी माँ को मान दें,

सभ्यता की इस विरासत को, हम अपनी पहचान दें।

मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, हमें पार न करनी है,

अपनी गौरवशाली थाती, अब खुद ही हमें भरनी है।


ऋषियों के तप से उपजा जो, वह ज्ञान सदा ही शाश्वत है,

योग, ध्यान और संयम ही, भारत की असली ताकत है।

पश्चिम की तकनीकें लें हम, पर हृदय रहे भारतीय,

प्रगति की ऊँचाई छुएं, पर भाव रहे ममतामयी।

अतिथि देवो भव का नारा, फिर से हमें गुँजाना है,

नफरत के इस दौर में हमको, प्रेम का बीज उगाना है।


कदम-कदम पर द्वंद्व यहाँ, हर मोड़ पर है एक नई डगर,

पर अडिग रहे विश्वास हमारा, तो सुगम होगी हर एक सफ़र।

विविधता में एकता ही, हमारे देश की शान है,

यही हमारी शक्ति है, और यही हमारा मान है।

उठो युवा! अब शपथ लो तुम, नव-भारत को गढ़ने की,

अपनी जड़ों को थाम कर, अंबर की ओर बढ़ने की।


बदल रहा है परिवेश यहाँ, बदल रही है धारा,

पर भूल न जाना ओ राही, वह संस्कार हमारा। 


लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र

लोकतंत्र की महिमा देखो, सिर गिने जाते हैं यहाँ,

पर भीड़तंत्र की ताकत देखो, पैर रखने की जगह कहाँ?

वो कहते हैं "जनता ही जनार्दन है," बात तो बड़ी नेक है,

पर बस की छत पर बैठे लोगों से पूछो, वहां 'जनार्दन' एक है?

"हम दो हमारे दो" का साइड इफ़ेक्ट

जो शरीफ थे, मान गए वो, "हम दो हमारे दो" का नारा,

अब राशन की लंबी लाइन में, ढूंढ रहे हैं अपना किनारा।

एक तरफ वो सज्जन खड़े हैं, छोटा सा परिवार लेकर,

दूसरी तरफ 'भीड़तंत्र' खड़ा है, ग्यारह का अवतार लेकर!

सज्जन बोले: "मैंने देश की प्रगति में अपना योगदान दिया,"

भीड़ बोली: "हमने संख्या बढ़ाकर, लोकतंत्र को ही थाम लिया!"

अब सज्जन को स्कूल में सीट नहीं, अस्पताल में बेड नहीं,

भीड़ के पास वोट बैंक है, उनके लिए कोई 'रेड' नहीं।

कानून का खेल: प्रभावी और अप्रभावी

जनसंख्या नियंत्रण कानून, जैसे ऑफिस का कोई 'नोटिस' है,

जो मान ले वो बुद्धू, जो न माने उसका ही 'लोटस' है।

प्रभावी होता तो शायद, मेट्रो में सांस मिल जाती,

पर अप्रभावी है तभी तो, हर जगह 'धक्का-मुक्की' भाती।

कानून कहता है— "रुकिए, ज़रा सोचिए और विचारिए,"

भीड़तंत्र कहता है— "महोदय, आप अपनी लाइन सुधारिए!

जब तक कानून के कागज़ पर, स्याही की धार है,

तब तक इस भीड़ के कंधों पर ही, हमारी सरकार है।"

असली नुकसान

नुकसान तो उस 'दो' वाले का है, जो टैक्स समय पर भरता है,

पर भीड़ की रेलम-पेल देखकर, घर से निकलने में डरता है।

लोकतंत्र में सिर गिनना ठीक था, पर यहाँ तो सैलाब है,

जहाँ संख्या ही समाधान है, वहीं सबसे बड़ा अज़ाब है!

(सार: लोकतंत्र तब तक सुरक्षित है जब तक लोग शिक्षित हैं, वरना भीड़तंत्र में केवल 'शोर' की जीत होती है, 'सोच' की नहीं।)


🎶 गीत: आशा का दीप


घोर अंधेरा हो कमरे में, तो व्याकुल मन घबराता है

पर नन्हा सा दीप जले, तो अंधियारा मिट जाता है।

जैसे बाती संग रोशनी, अपना धर्म निभाती है,

मन में जगती एक किरण, सब कष्ट मिटा देती है।


निराशा के बादल जब-जब, अंबर को घेरे रहते हैं

सकारात्मक सोच के सूरज, राहें नई दिखाते हैं।

मत बैठ हार कर ऐ राही, मन के कोने को उजाल तू,

एक विचार ही काफी है, सोई किस्मत को संभाल तू।


अंधकार की शक्ति क्या, जो एक ज्योत से लड़ पाए?

निराशा की क्या हस्ती, जो आशा सम्मुख टिक पाए?

भीतर अपने जोत जगा ले, विश्वास की वह मशाल है,

तू खुद अपनी राह बनेगा, तू ही तेरा ढाल है।


जला दीप तू मन के अंदर, सारा जग महक जाएगा,

आशा के एक छोटे स्वर से, जीवन संगीत बन जाएगा। 


शब्द, सोच और साधना

लिखना एक कला है सुंदर, भावों का श्रृंगार है,

कोरे कागज़ पर उतरता, हृदय का उद्गार है।

पर चिंतन है वह बीज, जहाँ से जन्मते हैं विचार,

मौन में जो डूब जाए, वही पाता है सार।

चतुराई की चमक भली, जो राहें सुगम बनाती है,

बुद्धि की वह पैनी धार, जीत की अलख जगाती है।

पर धैर्य हिमालय सा अडिग, सबसे ऊँचा मान है,

तूफानों में जो थमा रहे, वही असली शक्तिमान है।

ललित मोहन शुक्ला 


गीत: रूह की आवाज़


जो दिल की ज़ुबां में बोल रहा, उसे तर्क का आईना मत देना

जो रूह के दर को खोल रहा, उसे शब्दों का छल मत देना।

दुनिया की भीड़ में हज़ारों हैं, जो दिमाग से हाथ मिलाते हैं

पर जो धड़कन से संवाद करे, उसे सोच की धूल मत देना।


यहाँ गणित बहुत है रिश्तों में, हर कोई लाभ को तौलता है

पर कोई बावरा ऐसा है, जो बिना शर्त ही बोलता है।

उसके मौन को पढ़ना तुम, उसकी सादगी को समझना तुम

वो प्रेम की गंगा लाया है, उसे स्वार्थ का मरुथल मत देना।

जो दिल से संवाद साधे, उससे कभी दिमाग से बात न करना।


बुद्धि के खेल तो शतरंज हैं, यहाँ चालें चली ही जाती हैं

पर निश्छल मन की बातें तो, बस रूह को ही भाती हैं।

जहाँ वफ़ा की खुशबू हो, वहां शक का ज़हर न घोलो तुम

जो समर्पण लेकर आया है, उसे तर्क का दलदल मत देना।

जो दिल से संवाद साधे, उससे कभी दिमाग से बात न करना।


दिमाग से जीती जा सकती है दुनिया, पर दिल से जीता जाता है खुदा

जहाँ गणित खत्म होता है, वहीं से शुरू होती है वफ़ा।


तो याद रहे ये रीत सदा, जब कोई अपना पास आए

वो दिल की बातें लेकर आए, तुम दिल का ही साज़ बजाना। 


🎵 शीर्षक: शिखर की राह


सूरज से पहले जो जगते हैं,

सपनों में जान वो भरते हैं।

मंज़िल की चाहत दिल में लिए,

तूफानों से भी लड़ते हैं।

सफलता कोई इत्तेफ़ाक नहीं,

ये आदतों का ही खेल है,

जो खुद को रोज़ तराशते हैं,

वही मकाम के मेल हैं।


हाथों में समय की डोर थाम,

वो व्यर्थ न करते कोई काम।

अनुशासन की उस भट्टी में,

तपकर ही पाते ऊँचा नाम।

हम कैसे अपनाएं?

छोड़ो कल की बातों को तुम,

आज का एक प्लान बनाओ,

छोटे-छोटे लक्ष्यों से ही,

बड़े ख्वाब को सच कर जाओ।


गिरते हैं पर हार नहीं मानते,

वो गिरकर उठना जानते।

हर ठोकर को एक सबक मान,

वो अपनी ताकत पहचानते।

हम कैसे अपनाएं?

डर को अपना दोस्त बना लो,

सीखने की प्यास जगाओ,

रुकना नहीं है रस्ते में,

बस चलते चले तुम जाओ।


शांत चित्त और ऊँची सोच,

सीख रहे हैं वो कुछ न कुछ रोज़।

खुद पर काबू, मन पर जीत,

यही है उनकी असली खोज।

हम कैसे अपनाएं?

थोड़ा ध्यान और थोड़ा मौन,

भीतर की आवाज़ सुनो,

सफलता की इस दुनिया में,

अपनी ही एक राह चुनो।


बदलो आदतें, बदलेगा जीवन,

चमकेगा तेरा भी कल का गगन।

मेहनत की स्याही से लिख दे,


गीत: 'मैं ही हूँ सबसे बेहतर'


मंज़िल की राहों में तू क्यों घबराता है?

दुनिया की बातों से क्यों डगमगाता है?

गर जीत का ताज पहनना है तुझे,

तो पहले ख़ुद को 'विजेता' बुलाना होगा।

हो दुनिया में तू कहीं भी खड़ा,

पर मन में तुझे सबसे बड़ा होना होगा।


संदेह के बादल जब तुझको घेरें,

जब अंधेरे तुझे अपना रास्ता न दें,

तब आँखों में वो चमक पालनी होगी,

हार को भी अपनी धमक दिखानी होगी।

शायद आज तू शिखर पर खड़ा नहीं,

पर दिखाने में कोई हर्ज तो पड़ा नहीं।

दिखा ऐसा कि तू ही सिकंदर है,

क्योंकि असली जंग तो तेरे अंदर है।


तू मान ले, तू जान ले, तू ही सबसे बेस्ट है,

ये ज़िंदगी बस एक छोटा सा टेस्ट है।

गर नहीं है यकीं ज़माने को तुझ पर, तो क्या?

तेरा खुद पर भरोसा ही तेरा असली रेस्ट है!

दिखा दे दुनिया को, कि तू ही बेस्ट है!


चैंपियन वही जो गिरकर संभल जाए,

जो खुद की नज़र में कभी न हार पाए।

दुनिया को दिखे तेरा फौलादी चेहरा,

चाहे दिल में डर का हो पहरा गहरा।

जब तू खुद को श्रेष्ठ मान लेगा,

वक्त भी तेरा लोहा मान लेगा।


तो उठ, संभल और शान से चल,

बदल जाएगा तेरा आज और कल।

तू है बेस्ट, बस ये याद रखना,

जीत की राह पर आबाद रहना। 

🎵 गीत: जीवन की राह


बिना दिशा के बहती नैया, सागर की लहरों का मेल,

बिना लक्ष्य के ये जीवन है, बस इक अनचाहा खेल।

जिधर ले जाए लहरें तुझको, उधर ही बहता जाएगा,

बिना योजना के राही तू, राहों में खो जाएगा।


न इसमें कोई सृजन छिपा है, न ही कोई अर्थ यहाँ,

निरर्थक ही कट जाती साँसें, भटकता रहता मन कहाँ?

सच्ची खुशियाँ रूठ न जाएं, इस अनजानी धूल में,

संतुष्टि का फूल न खिलता, बिना लक्ष्य के शूल में।


जाग मुसाफिर देख सामने, अपनी मंजिल तय तो कर,

साहस के तू पंख लगा ले, उड़ तू अपनी राहों पर।

सार्थक होगा जीवन तेरा, जब तू खुद पतवार थामेगा,

जब लक्ष्य खड़ा हो आँखों में, तभी जमाना मानेगा।


अपना सूरज खुद बन राही, अपना अंबर खुद सजा,

लक्ष्य बनाकर जीने में ही, जीवन का है असली मजा।


रिश्तों का उत्सव, न कि कर्ज का बोझ


शादी है दो मन का मेल, दो कुनबों की नई कहानी,

इसे तमाशा मत बनाओ, समझो अपनी ज़िम्मेदारी।

सात फेरों की मर्यादा को, सादगी का हार पहनाओ,

दिखावे की इस अंधी दौड़ में, खुद को मत उलझाओ।

वह फूलों की सजावट भारी, वह लाखों का पकवान,

गर बाप का कर्ज बढ़ा दे, तो कैसा वह सम्मान?

सिर्फ एक दिन की चमक-धमक, और बरसों की उधारी,

क्या यही है नए जीवन की, सुंदर और शुभ तैयारी?

महंगे लहंगे, भारी गहने, बस कुछ पल की बात है,

असली गहना तो वह है, जो ताउम्र तुम्हारे साथ है।

रिश्ता जुड़ता है नीयत से, न कि बैंक बैलेंस देख कर,

खुशियाँ घर में आती हैं, आपसी प्रेम और चैन पाकर।

उठो युवाओं! नई सोच की, एक मशाल तुम थामो,

फिजूलखर्ची के शोर को, सादगी से तुम लगाम दो।

बचाओ वह धन उस कल के लिए, जो तुम्हें साथ बिताना है,

दुनिया को नहीं, बस एक-दूजे को खुश कर दिखाना है।

दो परिवारों का मिलन हो, मन में उल्लास गहरा हो,

दहेज और तामझाम से मुक्त, शादी का हर पहरा हो।

सादगी में ही सुंदरता है, सादगी में ही सार है,

सच्चा विवाह वही है, जहाँ बस निस्वार्थ प्यार है। 


🎵 शीर्षक: विश्वास का सूरज


अंधियारी रातों से अब तू, डरना छोड़ दे राही,

मन के दीप जला ले खुद ही, कर ले अपनी गवाही।

विश्वास की लाली जब तेरे, अंतर्मन में छाएगी,

जीवन की यह काली रैन, पल भर में कट जाएगी।


ईश्वर का अंश है तुझमें, तू क्यों खुद को छोटा माने?

पूरी दुनिया महक उठेगी, तेरे ही नेक इरादे से।

बहुत कम हैं वो विरले जो, जग हित का स्वप्न सजाते हैं,

अपने भीतर के विश्वास को, कण-कण में फैलाते हैं।


बाधाएं तो आएंगी ही, पर्वत सा अडिग तू खड़ा रह,

लक्ष्य तेरा धुंधला न हो, अपनी जिद पर अड़ा रह।

सफलता का वो सूरज, बस चमकने ही वाला है,

तेरे सब्र की तपिश से ही, होने वाला उजाला है।


इतिहास उठाकर देख जरा, जो मुमकिन एक ने कर डाला,

वो सामर्थ्य है तुझमें भी, तू क्यों बैठा मतवाला?

जो काम किया इंसान ने, वो तू भी कर सकता है,

तू अपनी हिम्मत के बल पर, सागर भी भर सकता है।


बस विश्वास जगा ले...

खुद को पहचान ले...


विश्वास की लाली से ही, जीवन की रात कटेगी,

सफलता की नई सुबह, अब तुझसे ही बटेगी! 


गीत: प्रगति का नया सवेरा


उठो युवा! अब आँखें खोलो, नूतन विहान आया है,

हाथों में तकनीक लिए, हमने संकल्प सजाया है।

कलम वही है, सोच नई है, कौशल का आधार लिए,

हम बढ़ चलें हैं भारत को, शिक्षा का उपहार दिए।


कोडिंग और डेटा की भाषा, अब हम सब पहचानेंगे,

एल्गोरिदम के तालों में, हम अपनी कुंजियाँ डालेंगे।

AI और रोबोटिक्स से, मुश्किल राह सजाएँगे,

डिजिटल इस दुनिया में, हम अपनी धाक जमाएँगे।

बदला है युग, बदली है पद्धति, हम भी कदम मिलाएँगे,

नवाचार की इस लहर में, हम आगे बढ़ते जाएँगे।


रटंत विद्या पीछे छूटी, अब कौशल का सम्मान है,

राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती— 'हुनर ही असली ज्ञान है'।

सिर्फ डिग्री की दौड़ नहीं, अब शोध (Research) का भी मान है,

बहुमुखी प्रतिभा ही अब, भारत की पहचान है।

किताबों के पन्नों से बाहर, अब दुनिया को हम देखेंगे,

प्रायोगिक इस शिक्षा से, हम अपनी किस्मत लिखेंगे।


प्राचीन हमारी संस्कृति है, पर आधुनिक विचार हमारे,

विश्व-गुरु के सिंहासन पर, फिर चमकेंगे सितारे।

आत्मनिर्भर भारत का सपना, आँखों में अब पल रहा,

विद्यार्थी का हर एक संकल्प, प्रगति की ओर चल रहा।

हम रुकेंगे नहीं, हम थकेंगे नहीं, यह शपथ आज हम लेते हैं,

नए युग की नई टेक्नोलॉजी को, अपना कौशल देते हैं। 


गीत: अनजाना चेहरा


राहों में चलते-चलते, एक अजनबी मिल गया

खामोश था ये दिल मेरा, न जाने क्यूँ खिल गया

वो चेहरा है या नूर का कोई ढलता हुआ साया

खुदा ने बड़ी फुर्सत में, उसे है बनाया।


न नाम जानते हैं हम, न मंज़िल का पता है

मगर उस सादगी में, कुछ तो नशा है

जुल्फें जैसे बादलों की कोई गहरी घटा

उसे देख कर लगा, जैसे रुकी हो हवा।

वो अजनबी सा चेहरा, अब जान बन गया

मेरी अधूरी दास्तां का, वो उनवान बन गया।


उसकी आँखों की गहराई में, कायनात सारी है

वो सादगी भी देखो, कितनी हम पे भारी है

मुस्कुराए वो ज़रा सा, तो चाँद शर्मा जाए

उसकी खूबसूरती के आगे, हर रंग फीका पड़ जाए।

अजनबी होकर भी, वो रूह में समाने लगा

ये दिल अब बस उसी के, तराने गाने लगा। 


शीर्षक: शिक्षा का असली सार

डिग्रियां तो बस कागज के टुकड़े हैं दीवारों पर,

अगर तुम में तमीज नहीं, अपनों और बेचारों पर।

मस्तिष्क में ज्ञान का अंबार भरा हो चाहे कितना,

सब व्यर्थ है, गर झुकना न आए संस्कारों पर।

पढ़ने का क्या लाभ, अगर वाणी में कड़वाहट हो?

लिखने का क्या मोल, अगर आचरण में सजावट हो?

विद्या वह है जो विनय दे, जो मानवता को जगाए,

न कि वह, जो अहंकार की नई राह दिखाए।

पुस्तकों के हर पन्ने को तुम भले ही रट लो,

गणित, विज्ञान और भूगोल को मुट्ठी में कर लो।

पर यदि पड़ोसी का दर्द तुम्हें महसूस न हो,

तो समझो कि तुम अभी 'अनपढ़' ही रह गए हो।

सद्व्यवहार वह दीया है, जो अंधेरों को मिटाता है,

पढ़ा-लिखा वही, जो सबके काम आता है।

शिक्षण की सार्थकता बस इसी बात में है—

कि इंसान, इंसानियत का धर्म निभाता है।

ज्ञान की ज्योति: आत्म-साधना

मन के कोरे कागज़ पर, इक दीप प्रेम का जलाओ तुम,

आत्म-साधना के पथ पर, बस एक कदम बढ़ाओ तुम।

नहीं कठिन यह राह कोई, न कोई पर्वत लाँघना है,

बस हर दिन थोड़े नेक विचारों को, मन के भीतर आँकना है।

जब प्रेरणा की किरणें अंतर में वास करेंगी,

तब आत्मा की ऊँचाइयाँ, खुद तुझसे बात करेंगी।

क्योंकि शक्ति का असली स्रोत, शस्त्रों में नहीं समाया है,

इस नश्वर जग में ज्ञान ही, बस एक अमर सी माया है।

इन्हीं विचारों की कोख से, अनूठे स्वप्न जनम लेते हैं,

जो जीवन के मरुस्थल को, फिर से हरियाली देते हैं।

बहुमुखी बनेगा व्यक्तित्व तेरा, जब सोच में होगा विस्तार,

सकारात्मकता की लहरों से, महकेगा तेरा संसार।

भर ले खुद को उन भावों से, जो नई दिशा दिखलाते हों,

अंधियारों को चीर के जो, सूरज तक ले जाते हों।

ललित मोहन शुक्ला ( कवि) 


गीत: एक ही नूर के सितारे


विविध रंग की कलियाँ हैं पर, गुलशन तो एक ही है,

राहें चाहे कितनी हों, मंज़िल तो एक ही है।

इंसानियत का पाठ पढ़ाए, हर मज़हब की वाणी,

सबके भीतर बहती देखो, एक ही अमृत वाणी।


कहीं गूँजती शंख ध्वनि है, कहीं अज़ान की तान,

ईश्वर अल्लाह नाम अलग हैं, एक ही है भगवान।

मंदिर की उस मूरत में भी, वही नूर है झलका,

मस्ज़िद की उस पावन सफ में, अक्स उसी का छलका।


गुरुवाणी का त्याग और 'सेवा' का पावन जज़्बा,

ईसा मसीह की करुणा कहती, प्रेम ही सबसे सच्चा।

गुरुद्वारे की लंगर सेवा, चर्च की वो प्रार्थना,

सबका मकसद एक ही है—दुखिया की आराधना।


बुद्ध की शांति, महावीर की अहिंसा मन में धारें,

परम सत्य की खोज में हम सब, अपनी नफ़रत वारें।

रहीम, कबीर और नानक ने भी, एक ही बात कही थी,

मानव की जो सेवा कर ले, सबसे बड़ी वही थी।


सर्व धर्म समभाव की माला, भारत की है शान,

मज़हब जोड़ें, दिल न तोड़ें, यही हमारा मान।

एक ही मिट्टी, एक ही पानी, एक ही हम सबका सार,

आओ मिलकर बाँटें जग में, बस खुशियाँ और प्यार।


शिखर की राह: अटूट प्रयास

बनी-बनाई लीक तजकर, जो नया मार्ग बनाता है,

वही थकावट के मरुथल में, शीतल निर्झर पाता है।

काम वही जो प्राण फूँक दे, जड़ता की दीवारों में,

सृजन वही जो चमक छोड़ दे, वक़्त के गलियारों में।

नवाचार का दीप जलाकर, अंधियारे को मात दो,

परिवर्तन की इस आँधी में, तुम प्रगति का साथ दो।

क्या है? क्यों है? कैसे होगा?—प्रश्न हृदय में पलने दो,

शोध की पावन अग्नि में, तुम संशयों को जलने दो।

अनुसंधान की दृष्टि मिले तो, कंकड़ भी हीरा होता है,

मथता है जो ज्ञान-सिंधु को, अमृत बस वही पाता है।

रुके न जो, थके न जो, सीखने की वह प्यास बनो,

बीते कल से बेहतर होने का, तुम एक अटूट विश्वास बनो।

शिक्षा केवल पाठशाला नहीं, यह सतत एक साधना है,

हर अनुभव से नया सीखना, जीवन की आराधना है।

तुम छात्र रहो उम्र भर, तो हर दिन एक सवेरा है,

सीखना छोड़ा जिस दिन तुमने, समझो वहीं अंधेरा है।

उठो कि तुमको गढ़ना है, एक नया ही प्रतिमान यहाँ,

मेहनत और नित शोध से, छूना है आसमान यहाँ।

कर्म ही तेरी पूजा हो, और ज्ञान ही तेरा मर्म रहे,

नवाचार की इस यात्रा में, सफल तुम्हारा धर्म रहे।


सावधान! 'डंडा' उत्सव जारी है

सुनो ओ मजनू, सुनो ओ रांझा, थोड़ा होश में आओ,

लाल गुलाब थामने से पहले, अपना बीमा कराओ।

ये पेरिस की गलियां नहीं, ये अपना देसी ठाठ है,

यहाँ हर झाड़ी के पीछे, बजरंगियों का ठाठ है!

लाल शर्ट को त्याग कर, तुम भगवा चोला धारो,

   हाथ में डंडा रखो बड़ा, और 'जय-जयकार' पुकारो।

   अगर दिख जाओ पार्क में, तो प्रेमी मत कहलाना,

   "सर्वेक्षण करने आया हूँ"—ये कहकर बच निकलना।

 

   पकड़े जाओ जो हाथ पकड़े, तो घबराना बिल्कुल नहीं,

   कह देना "बहन है मेरी, गिर रही थी ये यहीं!"

   राखी की एक डोली, जेब में अपनी तुम रखना,

   कुटाई होने वाली हो, तो "भैया" कह के बचना।

 

   मॉल-सिनेमा रिस्की हैं, वहां 'गार्ड' की पैनी नजर है,

   पार्क के बेंच पर बैठना, समझो मौत का सफर है।

   सबसे सुरक्षित जगह वही, जहाँ 'माता का जगराता' हो,

   भजन गाते हुए मिलो, तो कौन तुम्हें पीट पाता हो?

 

   टेडी-वियर मत लेना भाई, दूर से ही वो दिखता है,

   कद्दू लेकर जाओ घर, वो तो सब्जी में बिकता है।

   चॉकलेट के उस डब्बे पर, 'पतंजलि' का स्टीकर लगाओ,

   शुद्ध देसी प्यार का, तुम चूर्ण सबको खिलाओ।


प्रेम करो तो छुप-छुप कर, या घर में रजाई ओढ़ो,

वरना बाहर जो निकले, तो अपनी हड्डियां जोड़ो।

वैलेंटाइन तो आएगा, और फिर चला भी जाएगा,

पर पिछवाड़े का वो नीला दाग, हफ़्तों तुम्हें सताएगा! 


शीर्षक: मुसाफिर का हौसला


धूप है अगर तो छांव भी आएगी,

रात गहरी है तो सुबह भी मुस्कुराएगी।

जीवन और मृत्यु तो बस दो किनारे हैं,

लहर जो उठी है, वो फिर किनारे लग जाएगी।

ओ मुसाफिर, तू हौसला न हार,

मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।


मिट्टी का ये चोला है, मिट्टी में मिल जाना है,

पर जाने से पहले तुझे, अपना दीप जलाना है।

सांसों की गिनती पर तेरा अधिकार नहीं,

पर कर्मों की गूंज का कोई अंत पार नहीं।

कायर डरते हैं अंत से, तू शूरवीर बन जा,

हर पल को जी ऐसे, कि तू तस्वीर बन जा।

ओ मुसाफिर, तू डर का कर संहार,

मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।


पतझड़ में जो गिरते पत्ते, वो दुख नहीं मनाते,

नए बसंत की आहट में, वो चुपचाप खो जाते।

मृत्यु कोई शत्रु नहीं, ये तो बस एक द्वार है,

पुराना वस्त्र तजकर, मिलता नया श्रृंगार है।

जब तक है ये धड़कन, तू जीत का गीत गा,

मुश्किलों की छाती पर, अपनी छाप छोड़ जा।

ओ मुसाफिर, तू मत मान अपनी हार,

मौत तो विश्राम है, तू जीवन से कर प्यार।


ना कोई यहाँ आया सदा के लिए,

ना कोई रुकेगा यहाँ वफ़ा के लिए।

बस यादें रह जाती हैं खुशबू की तरह,

तू जी ले ये लम्हा, इक खुदा के लिए। 


"समय का पारखी"

समय की रेत मुट्ठी से, फिसल जाए तो क्या होगा?

जो अवसर हाथ से निकला, निकल जाए तो क्या होगा?

न कोई मंत्र चलता है, न कोई तंत्र चलता है,

समय की चाल के आगे, न कोई यंत्र चलता है।

वही है श्रेष्ठ ज्ञानी जो, समय की नब्ज़ पढ़ लेवे,

धनुष पर बाण रख कर जो, सही क्षण लक्ष्य गढ़ लेवे।

विजेता वही जिसने व्यर्थ, एक पल भी न खोया है,

उसी ने फसल काटी है, जिसने समय पर बोया है।

सीखने की कलाओं में, यही है कला सर्वोत्तम,

समय को जान ले जो भी, वही बनता है 'पुरुषोत्तम'। 


शिखर की पुकार

नभ को छूना ही बस केवल, पुरुषार्थ नहीं कहलाता है,

धरा-धूल से उठने वाला, ही असली वीर कहाता है।

सफलता की उन ऊँचाइयों पर, जो कभी न फिसला हो,

वो क्या जाने उस हिम्मत को, जो गिरकर संभलकर आता है।

हमारी महानता इसमें नहीं, कि हम कभी न गिरें,

अपितु इसमें है कि हर बार, गिरकर फिर से उठ पड़ें।

अँधेरा घना हो पथ पर अगर, और पाँव लड़खड़ा जाए,

थक कर चूर हों राहें, जब मन भी घबरा जाए,

विजेता वो नहीं जो सदा, फूलों की राह पर चलता रहा,

अतुलनीय है वो जो काँटों से, लड़कर फिर मुसकाए।

चोट जितनी गहरी होगी, संकल्प उतना दृढ़ होगा,

टूटे हुए हर सपने से ही, नया सवेरा सिद्ध होगा।

गिरना तो बस एक विराम है, अंत नहीं है जीवन का,

मिट्टी से ही जन्म हुआ, तो धूल से कैसा डरना?

उठो कि तुम्हारी रगों में, लहू नहीं एक आग है,

हार कर रुक जाना ही, बस असली एक दाग है।

जितनी बार भी गिरो तुम, उतनी बार नए हो जाओ,

क्योंकि राख से उठने वाला ही, जग का असली भाग है।

ललित मोहन शुक्ला ( कवि, लेखक व ब्लॉगर) 


गीत: लकीरों से आगे


हथेली की इन उलझी सी लकीरों में क्या ढूंढता है?

किस्मत के बंद पन्नों में तू अपना कल क्या पूछता है?

ये रेखाएं तो बस हाथ का एक नक्शा मात्र हैं,

मंजिल उन्हें मिलती है, जिनका हौसला ही शस्त्र है।


कहते हैं लोग कि भाग्य में जो लिखा है, वही होगा,

पर बिना बोए बीज के, क्या कोई खेत कभी हरा होगा?

कर्म की छेनी उठा, और खुद अपनी मूरत गढ़,

बैठ मत किनारे पर, तू लहरों के सीने पर चढ़।

मिटा दे वो लकीरें जो तुझे पीछे खींचती हैं,

मेहनत की बूंदें ही सूखी मिट्टी को सींचती हैं।


सूरज की किस्मत में भी ढलना लिखा होता है,

पर फिर से उगने के लिए उसे जलना होता है।

सफलता कोई इत्तेफाक नहीं, एक लंबा सफर है,

हार कर न रुकना, बस यही जीत का हुनर है।

हाथ की रेखाएं थक कर शायद मिट भी जाएं,

पर कर्म के पदचिह्न इतिहास में अमर हो जाएं।


मुट्ठी को भींच, बाजुओं में जोर भर,

लकीरों का मोह छोड़, तू कर्म पर गौर कर।

भाग्य भी घुटने टेकेगा तेरे जुनून के आगे,

जब तू थामेगा अपनी तकदीर के धागे।

ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

मॉल का मायाजाल और महंगाई का कमाल

चमक-दमक का दरिया है, नाम इसका 'मॉल' है,

अंदर घुसते ही लगता, जैसे कोई तिलिस्मी हॉल है।

एसी की ठंडी हवा में, महंगाई मुस्कुराती है,

मध्यम वर्ग की जेब को, धीरे से सहलाती है।


एक के साथ एक फ्री का, बोर्ड वहां टंगा है,

सस्ता जो दिख रहा है, असल में वही महंगा है।

सब्जियां भी वहां देखो, 'मेकअप' करके बैठी हैं,

एसी में रहकर आलू भी, थोड़ी अकड़ में रहती हैं।

ढाई सौ का पॉपकॉर्न खाकर, पेट कहता—"धोखा है",

पर स्टेटस सिंबल बचाने का, यही सुनहरा मौका है।

थैले में सामान कम, और बिल लंबा आता है,

मॉल से बाहर निकलते ही, बंदा सर खुजलाता है।


क्रेडिट कार्ड की ताकत पर, हम सीना तान चलते हैं,

अगले महीने किश्तों की, आग में हम जलते हैं।

बीवी खुश है ब्रांड देख, बच्चे खुश हैं गेम में,

मध्यम वर्ग की इज्जत अटकी, बस एक 'शोरूम' के फ्रेम में। 


सादगी: सहज पर कठिन साधना

सहज दिखना, सरल होना, बड़ी तपस्या है,

भीड़ में खुद को न खोना, बड़ी तपस्या है।

कहने को तो सादगी जीवन की कुंजी है,

पर इसे ही ओढ़ पाना, बड़ी तपस्या है।

दिखावों के इस जंगल में, हर कोई शोर करता है,

कि जो जितना तड़क-भड़क, वही उतना उभरता है।

तमाम आडंबरों को तज के, मौन को अपनाना,

अहंकार की परतों को, धीरे-धीरे ढहाना।

बिना आभूषणों के भी, मन को चमकाना,

सत्य की राह पर खुद को, अडिग रख पाना।

महल बनाना तो फिर भी, शायद आसान होता है,

सादगी की कुटिया में, चैन का अरमान होता है।

जटिलता है मन के भीतर, ईर्ष्या और लोभ में,

फंसे हैं सब यहाँ, बस 'अधिक' के ही क्षोभ में।

त्याग कर सब बाहरी, जो भीतर को संवार ले,

वही असल में जीवन की, हर बाजी को मार ले।

सरल होना सरल नहीं, यह तो आग का दरिया है,

खुद से खुद को मिलाने का, यही बस एक जरिया है। 


गीत: खुशियों का कारवां


धम-धम बाजे ढोल सुहाने, महक रही है शाम,

खुशियों की इस महफ़िल में अब, लो ईश्वर का नाम।

बैंड बजा है, शोर मचा है, झूम रहा संसार,

जीवन के हर एक पल में अब, भर लो बस तुम प्यार!

हो... बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग,

जी लो हर पल ऐसे जैसे, उड़ती पतंग के संग!


बीत गया जो कल था मुश्किल, उसे भुलाकर देखो,

आने वाले सुनहरे पल की, राह सजाकर देखो।

रिश्तों की ये शहनाई अब, मधुर राग सुनाती है,

हर धड़कन में एक नई सी, आस जगाकर जाती है।

चमक उठी है राहें सारी, बिखरा है सिंदूरी रंग,

बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग!


कोई न छोटा, कोई न बड़ा, सब नाचें एक ताल पे,

हंसी के गुलाल मल लो तुम, आज अपने गाल पे।

छोटी-छोटी खुशियां ही तो, असली पूंजी होती हैं,

मुस्कुराहटें चेहरे पर ही, सबसे सुंदर सोती हैं।

झूम के गाओ, धूम मचाओ, छोड़ो सारी जंग,

बैंड, बाजा और जीवन की ये नई उमंग!


नाचो... गाओ... खुशियां मनाओ!

क्योंकि ये पल फिर न आएगा,

ये शोर ही तो सन्नाटों को, जीना सिखाएगा!

बैंड, बाजा और जीवन... सदा रहे ये संग! 

वाणी: हृदय का दर्पण

वाणी में वो शक्ति है, जो पत्थर को पिघला दे,

मुरझाए हुए चेहरों पर, मुस्कान नई खिला दे।

यह वो अनमोल रत्न है, जो बिन दाम बिकता है,

शख्सियत का असली चेहरा, शब्दों में ही दिखता है।

मीठी वाणी अगर हो, तो जग अपना बन जाता है,

कड़वाहट के काँटों में भी, फूल खिल जाता है।

कोयल की उस कूक जैसी, जो कानों में अमृत घोले,

इंसान वही महान यहाँ, जो तौल-नाप कर बोले।

बिना धार की तलवार है यह, घाव गहरा कर देती है,

कभी बुझते हुए दीपों में, विश्वास नया भर देती है।

शब्दों के बाण संभल कर छोड़ो, ये लौट कर नहीं आते,

कहे हुए अपशब्द अक्सर, उम्र भर का दर्द दे जाते।

सत्य की शक्ति हो जिसमें, और प्रेम का भाव भरा हो,

वही वाणी सार्थक है, जिसमें सबका हित हरा हो।

तोड़ने के बजाय, जो दिलों को जोड़ना सीखे,

सच्चा मानव वही, जिसकी बातों में मिश्री घुली दिखे।

स्वयं का अर्पण: समाज सेवा की राह

हाथ थामें गिरते हुओं का, यही तो सच्ची सेवा है,

बिन स्वार्थ के कर्म करें, यही फल का मेवा है।


तन से कर लो मदद किसी की, रस्ता पार करा देना,

बीमारों की सेवा करके, उनके चेहरे को चमका देना।

गंदगी हटाकर राहों से, तुम सुंदर देश बना सकते हो,

बूढ़े माता-पिता के संग, कुछ पल तुम बिता सकते हो।


पास है जो ज्ञान तुम्हारे, उसको बाँटो अज्ञानों में,

शिक्षा की एक जोत जला दो, निर्धन के भी प्राणों में।

एक कलम और एक किताब, तकदीरें बदल सकती है,

समाज के अंधेरों को, ये मशाल ही छल सकती है।


भूखे को तुम भोजन दे दो, प्यासे को तुम पानी,

जरूरत से जो ज्यादा है, वो दान करो है दानी।

रक्त दान महादान है, जीवन किसी का बचाएगा,

तेरा दिया हुआ इक तिनका, किसी का घर बसाएगा।


"छोटा सा ही सही, पर एक प्रयास जरूरी है,

मानवता को बचाने के लिए, समाज सेवा जरूरी है।" 


गीत: जीवन की डोर


धड़कनों ने सुनी है धड़कनों की सदा,

तू मिला तो मुकम्मल हुई हर दुआ।

धूप हो या ढले शाम की परछाइयाँ,

अब तेरे दम से रोशन है तन्हाइयाँ।

जीवन की डोर से बाँध लिया है तुझे,

कि अब हर मौसम में जीना है संग तेरे।

कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम,

पर जो भी मिले, बाँट लेंगे हम और तुम।


कभी जो पलकें भीग जाएँ तुम्हारी,

उनमें उतर आएगी उदासी हमारी।

हँसी की लहर बनके मैं आऊँगा,

तेरे लबों पे महक बन के छा जाऊँगा।

रिश्ता ये गहरा है, बातों से भी ज्यादा,

साथ निभाने का है रूह का वादा।

कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम...


जहाँ राहें मुड़ेंगी, वहाँ हाथ थामना,

वक्त की साजिशों से कभी न हारना।

मिले जो अंधेरे, तो दीया बन जलेंगे,

काँच के रास्तों पे भी संभल कर चलेंगे।

डोर ये अटूट है, साँसों की कसम,

मिट जाएंगे फासले, रह जाएगी वफ़ा हरदम।

कभी खुशी है यहाँ, तो कभी है गम...


हाथों में हाथ है, दिल में तेरा नाम,

तुझसे शुरू है मेरी सुबह, तुझपे ही शाम।

जीवन की डोर... बस तेरे ही नाम। 


गीत: "वादा रहा"


धड़कनों की इस ज़मीं पर, ख्वाब हम बोते रहे

खुद से वादा था न रोएंगे, मगर रोते रहे।

पर मिले जो तुम तो जैसे, मिल गई अपनी डगर

अब न खुद से, अब न तुमसे, हम जुदा होंगे मगर।

हाँ... वादा रहा, ये वादा रहा

संग चलेंगे हर सफर, ये वादा रहा।


आइने में देख खुद को, मुस्कुराना है मुझे

बिखरे हुए उन कांच के, टुकड़ों को सजाना है मुझे।

धूप हो या छाँव हो, हारूँगा न मैं ये कसम

हार कर भी जीत की, राहों को पाना है मुझे।

खुद की खुशियों का अब मैं, खुद ही सहारा बनूँगा

डूबती कश्ती का अपनी, खुद किनारा बनूँगा।


मेरी आँखों में तुम्हारा, अक्स ठहरा रहे सदा

जैसे सावन के महीने, कोई गहरा मेघ हो।

तुम जो आए तो महक उठी, मेरी वीरान सी गली

जैसे पतझड़ के बाद, कोई खिलती हुई कली।

तेरी ख़ुशी में अब मेरी, ज़िंदगी का रंग है

तुम जहाँ भी हो, ये मेरा दिल तुम्हारे संग है


वक्त की इन लहरों पर, नाम हम लिखेंगे अपना

पूरा होगा अब हमारा, हर अधूरा सा सपना।

खुद से वादा है कि खुद को, और न तड़पाएंगे

और तुमसे वादा है कि, लौट कर फिर आएंगे।

हाँ... वादा रहा, ये वादा रहा

अटूट प्रेम का ये असर, ये वादा रहा।


नामीबिया का 'सूर्या' नमस्कार 


भारत की टोली उतरी थी, जैसे करने आई हो पिकनिक,

नामीबिया के माथे पर थी, हार की गहरी शिकन इक।

सिक्का उछला, किस्मत चमकी, भारत ने चुनी बल्लेबाजी,

नामीबिया के गेंदबाजों की होने वाली थी अब ऐसी-तैसी।

छक्कों की बरसात, बेचारे नामीबियाई जज्बात

ओपनर आए ऐसे, जैसे चौके-छक्कों की भूख लगी हो,

नामीबियाई फील्डरों को लगा, जैसे पैरों में झोंक लगी हो।

कोई गेंद गई स्टैंड्स में, कोई पहुँची पार्क के बाहर,

बेचारा गेंदबाज सोच रहा— "क्या मैं ही मिला था यार?"

सूर्य ने चमकाया बल्ला, जैसे दोपहर की धूप कड़क,

गेंदबाज ढूंढ रहे थे मैदान में छिपने की सड़क।

इधर बल्ला घुमा, उधर नामीबिया का दिल धड़का,

स्कोरबोर्ड ऐसे भागा, जैसे कोई रॉकेट तड़का।

नामीबिया की पारी: 'आया राम, गया राम'

जब बारी आई नामीबिया की, तो दिखा असली तमाशा,

बल्लेबाजों के चेहरों पर थी, 'जल्द पवेलियन लौटने' की आशा।

बुमराह की यॉर्कर ने उड़ाईं उनकी गिल्लियाँ,

जैसे किसी भूखे शेर के सामने नाच रही हों बिल्लियाँ।

वरुण ने ऐसी फिरकी डाली, बल्लेबाज हो गया कन्फ्यूज,

नामीबिया का सारा जोश, मिनटों में हो गया फ्यूज।

मैच था या मज़ाक? यह समझ न पाया कोई,

नामीबिया की उम्मीदें, बाउंड्री लाइन पर जाकर सोईं।

जीत का जश्न

जीत तो पक्की थी ही, बस रस्म की थी देरी,

नामीबिया ने हाथ मिलाया, बोली— "किस्मत थी अंधेरी।"

भारत पहुँच गया अगले दौर में, लेकर बड़ी शान,

नामीबिया वाले बोले— "शुक्र है, बच गई हमारी जान!"

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