| क्रम संख्या | अध्याय / अनुभाग | विवरण |
| 1. | प्राक्कथन (Foreword) | पुस्तक की भूमिका और लेखन का उद्देश्य |
| 2. | व्यक्तित्व का उद्भव | ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश |
| 3. | काव्य यात्रा का आरंभ | पहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ |
| 4. | भाव-कलश: एक परिचय | मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता |
| 5. | प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषण | चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा |
| 6. | शैली और शिल्प विधान | भाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग |
| 7. | संवेदना और सरोकार | रचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण |
| 8. | साहित्यिक योगदान | हिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार |
| 9. | सम्मान एवं उपलब्धियाँ | कवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर |
| 10. | उपसंहार | काव्य यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि |
| 11. | परिशिष्ट (Appendix) | कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश |
चप्पल
चप्पल है अति लाड़ली, पाँवन की है ढाल।
कंकड़-पत्थर से लड़े, रखे सुखी हर हाल।।
धूप तपे या कीच हो, सहे कष्ट दिन-रात।
मालिक के चरणों तले, करे समर्पण बात।।
चप्पल संग चले जग सारा, निर्धन हो या राज-दुलारा।
मंदिर बाहर धीरज धरनी, सबकी सेवा इसकी करनी।।
रंग-बिरंगी और सुहावन, धूल-धूप से रक्षित पावन।
कभी हवाई कभी है बाटा, चुभने दे न कोई कांटा।।
घिस जाती है देह, मगर ये उफ़ न कहती।
कीचड़ हो या रेत, मौन हो सब कुछ सहती।।
जोड़ी टूटे एक, दूसरी व्यर्थ कहाती।
बिना पाँव के साथ, सदा ये सूनी जाती।।
चप्पल चन-चन बोलती, द्वारे खड़ी हुजूर।
अदब सिखाती शीश को, होकर पाँव की धूल।।
होकर पाँव की धूल, मान मर्यादा रखती।
अंदर जाना मना, द्वार पर ही ये थकती।।
कह 'गिरिधर' कविराय, सदा ये साथ निभाती।
फटी-पुरानी होय, याद बचपन की लाती।।
ललित मोहन शुक्ला
गीत: जीवन की थाती
मिट्टी से हम जन्मे हैं, एक दिन मिट्टी हो जाना है
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
न जीत में घमंड हो, न हार में मलाल हो
जीवन की सबसे सुंदर सीख, मन सदा खुशहाल हो।
बहती नदिया कह गई हमसे, रुकना मौत की निशानी है
राहों के पत्थरों से भी, लिखनी एक कहानी है।
धूप मिली तो सीख लिया, छाँव की कद्र करना
दुख की कड़वी घूँट पिए बिन, सुख का मोल न जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
पेड़ हमेशा झुकते हैं, जब फलों का भार आता है
बड़ा वही है दुनिया में, जो झुकना सीख जाता है।
बाँट सको तो बाँट लो खुशियाँ, दर्द तो सबका अपना है
परायों में जो देख ले खुद को, वही सच्चा सयाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
कल की चिंता छोड़ के तू, आज का दीया जला ले
टूटे हुए जो रिश्ते हैं, उन्हें गले से लगा ले।
माफी सबसे बड़ा हुनर है, नफरत बस एक बोझ है
खाली हाथ आए थे हम, खाली हाथ ही जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
सच्चाई की राह कठिन है, पर अंत बड़ा ही सुंदर है
बाहर मत ढूँढ सुकून तू, तेरे ही अंदर समंदर है।
जीवन की इस छोटी सी सीख को, जिसने भी पहचाना है
उसने ही इस जग में रहकर, खुदा को सच में पाना है।
ललित मोहन शुक्ला
❤️ दिल: अनमोल अहसास
दिल है नाज़ुक एक शीशे का,
प्यार से भरा, भावनाओं का ख़ज़ाना।
धड़कन इसकी जीवन की कहानी,
हर पल चलती, जैसे कोई रूहानी धुन।
ये है घर ख़ुशियों और ग़मों का,
इसमें बसती हैं उम्मीदें और सपने।
कभी ये हँसता है खुल कर,
कभी चुपके से आँसू बहाता है।
हर रिश्ते की डोर इससे बंधी,
मोहब्बत की दुनिया इसी में सिमटी।
दिल ही जानता है सच्चाई क्या है,
हर अहसास को गहराई से ये महसूसता है।
इसे संभालना है इबादत से कम नहीं,
क्योंकि ज़िंदगी इसी की रफ़्तार पर चलती।
ये धड़कता रहे, तो सब कुछ क़ायम है,
दिल ही तो है, जो इंसानियत को ज़िंदा रखता है।
ललित मोहन शुक्ला
गीत: धड़कनों का इकरार
इन खुली आँखों में अब एक ख्वाब रहता है,
मेरे दिल में बस तेरा ही महताब रहता है।
हवाओं ने गुनगुनाया है नाम तेरा धीरे से,
अब मेरी हर दुआ में तेरा ही जवाब रहता है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।
कभी जो न कही थी, वो बात कहनी है,
संग तुम्हारे ही अब ये ज़िंदगी रहनी है।
जैसे धूप में ठंडी छाँव बन गए हो तुम,
मेरी सूखी ज़मीन पर घटा बन बरसे हो तुम।
तेरी मुस्कुराहटों में मेरी जीत छिपी है,
मेरी हर खुशी अब तेरी गलियों में रुकी है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है...
लिखूँ मैं जो भी, उसमें ज़िक्र तुम्हारा हो,
डूबे अगर कश्ती, तो बस तेरा किनारा हो।
न माँगूँ चाँद-तारे, न सारा ज़माना मैं,
बस उम्र भर के लिए तेरा ही सहारा हो।
नज़रें जो मिलीं, तो ये राज़ खुल गया,
तू मिला तो मानो, मुझे खुदा मिल गया।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।
गीतकार _ललित मोहन शुक्ला
मेरा दिल
मेरा दिल है एक खुली किताब,
जिसमें दबी हैं हज़ारों ख़्वाब।
कभी ये हँसे, कभी ये रोए,
न जाने कौन से रंग ये बोए।
जैसे हो कोई नटखट बच्चा,
करता कितनी बातें ये कच्चा।
कभी मचले, कभी ये बहके,
चाहत की धूप में ये दहके।
इक कोना इसका है बिलकुल सादा,
जहाँ रहती है तेरी ही याद ओ अनामिका
धड़कन इसकी तेरी ही धुन है,
तू ही इसकी पहली और अंतिम गुन है।
ये छुपाए कई गहरे राज़,
सुनाए इश्क़ की मीठी आवाज़।
नाज़ुक ये ऐसा, जैसे कोई फूल,
मगर सह लेता हर दर्द की शूल।
हर पल ये तेरा ही नाम पुकारे,
तेरे ही संग ये जिए और हारे।
मेरा दिल है तो बस तेरा ही घर,
यहाँ से तू कभी ना जाना किधर।
एक रास्ता
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
चुपचाप मुझको बुलाए जा रहा है।
न मंज़िल का कोई मुझे है ठिकाना,
मगर दिल सफ़र का गुनगुना रहा है।
अकेला हूँ पर मैं थकता नहीं हूँ,
झुक जाऊँ मैं ऐसा मुसाफ़िर नहीं हूँ।
पहाड़ आड़ आए, नदी हो या जंगल,
कदम रुक गए तो ये जीना नहीं हूँ।
यहाँ धूल भी है, कहीं छाँव भी है,
कहीं दूर से आता कोई पाँव भी है।
कभी तेज़ चलता, कभी धीरे-धीरे,
हर मोड़ पर एक नया घाँव भी है।
हैं कितने ही राही जो गुज़रे यहाँ से,
लिए ख़्वाब अपने गए हैं कहाँ से।
उनकी कहानियाँ पत्थरों पर लिखी हैं,
सीखा है मैंने, ज़माने-जहाँ से।
ये राह ही मेरी अब पहचान ठहरी,
इसी पर टिकी मेरी मुस्कान ठहरी।
ज़िंदगी है क्या? बस ये सफ़र है निरंतर,
जहाँ ख़्वाब पलते, जहाँ जान ठहरी।
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
बस चलते ही जाना सिखा रहा है।
न मंज़िल ज़रूरी, न पहुँचना ज़रूरी,
ये पल ज़िंदगी का बताए जा रहा है।
सपनों की दुनिया
रात की चादर ओढ़कर,
आती है सपनों की दुनिया।
खुल जाती है एक खिड़की,
जहाँ हर चीज़ है नई-सी।
कहीं उड़ते हैं हम पंछी बनकर,
नीले आसमान में।
कभी मिलते हैं उन सब से,
जो रहते हैं अब यादों में।
कोई अधूरा सा काम,
पूरा हो जाता है।
कोई भूला हुआ रास्ता,
मिल जाता है।
ये सपने हैं या कुछ और,
जो हकीकत से भी प्यारे हैं।
जब आँखें खुलती हैं सुबह,
तो भी कुछ पल के लिए ये हमारे हैं।
कुछ मीठे हैं, कुछ हैं अजीब,
पर हर सपने में एक कहानी है।
ये सपनों की दुनिया,
दिल को बहुत सुहानी है।
ज़िन्दगी के सफर में,
ज़िन्दगी के सफर में,
कभी धूप, कभी छांव।
सुबह की सुनहरी किरणें,
जैसे दे रही हों आहट।
दुःख के बादल छाए,
अंधेरा सा छा जाए।
फिर उम्मीद की किरण,
एक नया सवेरा लाए।
कभी पतझड़ आए,
सूखे पत्तों से जीवन भर जाए।
फिर बसंत की बहार,
नये फूल खिल जाए।
कभी तेज़ धूप में,
पसीना बन जाए।
कभी ठंडी छांव में,
सुकून मिल जाए।
इसी तरह ज़िन्दगी चलती जाए,
हँसती, गाती और मुस्कुराती जाए।
कभी धूप, कभी छांव,
यह सब जीवन का हिस्सा बन जाए।
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