Poems and Songs of Lalit Mohan Shukla: A Journey Through Soulful Verses and Timeless Lyrics

*Poems and Songs of Lalit Mohan Shukla: A Journey Through Soulful Verses and Timeless Lyrics*




1. *Preface*

   * The Inspiration Behind the Collection
   * Poetry as a Voice of the Soul

2. *Introduction*

   * Lalit Mohan Shukla: Poet, Thinker, Visionary
   * The Power of Poems and Songs in Human Life

3. *Section I: Poems of Life and Living*


   * Reflections on Existence
   * Dreams, Desires, and Destiny
   * Lessons from Everyday Life

4. *Section II: Love, Relationships, and Emotions*

   * Poems of Love and Longing
   * Bonds Beyond Blood
   * Heartbreak, Healing, and Hope

5. *Section III: Spirituality and Inner Awakening*


   * Poems on Faith and Divine Connection
   * The Journey Within
   * Silence, Meditation, and Meaning

6. *Section IV: Nature, Beauty, and Creation*


   * Songs of Earth, Sky, and Seasons
   * Harmony Between Humanity and Nature
   * Celebrating Life’s Simple Wonders

7. *Section V: Motivation, Courage, and Success*


   * Poems of Strength and Perseverance
   * Rising Above Failure
   * The Spirit of Achievement

8. *Section VI: Social Awareness and Human Values*


   * Poems on Humanity and Compassion
   * Justice, Equality, and Peace
   * The Poet as a Voice of Society

9. *Section VII: Songs of Celebration and Inspiration*


   * Lyrics for Joy, Festivals, and Togetherness
   * Songs of Hope and Renewal
   * Musical Expressions of Life

10. *Section VIII: Selected Signature Poems and Songs*


    * Reader-Favorite Works
    * Award-Winning and Widely Appreciated Pieces

11. *Section IX: Writing Style, Themes, and Creative Philosophy*


    * Poetic Techniques and Literary Devices
    * Emotional Resonance and Universal Appeal
    * The Creative Mind of Lalit Mohan Shukla

12. *Section X: Behind the Verses*


    * Stories Behind Selected Poems
    * Personal Experiences and Inspirations

13. *Section XI: Poetry for Students, Educators, and Readers*


    * Using Poems for Learning and Reflection
    * Classroom and Creative Writing Applications

14. *Conclusion*


    * The Everlasting Power of Poetry and Song
    * A Message to Readers

15. *Appendices*


    * Glossary of Poetic Terms
    * Index of Poems and Songs

16. *About the Author*


    * Literary Journey of Lalit Mohan Shukla
    * Awards, Works, and Achievements 

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"भाव-कलश: ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा" ( Hindi)



क्रम संख्याअध्याय / अनुभागविवरण
1.प्राक्कथन (Foreword)पुस्तक की भूमिका और लेखन का उद्देश्य
2.व्यक्तित्व का उद्भवललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश
3.काव्य यात्रा का आरंभपहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ
4.भाव-कलश: एक परिचयमुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता
5.प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषणचुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा
6.शैली और शिल्प विधानभाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग
7.संवेदना और सरोकाररचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण
8.साहित्यिक योगदानहिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार
9.सम्मान एवं उपलब्धियाँकवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर
10.उपसंहारकाव्य यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि
11.परिशिष्ट (Appendix)कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश

## *प्राक्कथन (Foreword)*


### *पुस्तक की भूमिका*

साहित्य मात्र शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज होता है। जब हृदय के भाव शब्दों का चोला पहनकर पन्नों पर उतरते हैं, तो वह 'काव्य' बन जाते हैं। *"भाव-कलश: ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा"* कोई साधारण संकलन नहीं है, बल्कि यह एक समर्पित रचनाकार के अंतर्मन का वह दर्पण है, जिसमें समाज, प्रेम, संघर्ष और आध्यात्मिकता के विविध रंग समाहित हैं।

ललित मोहन शुक्ला जी की लेखनी में वह सहजता है जो सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचती है। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर मिट्टी की सौंधी सुगंध है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर तीखा प्रहार भी है। यह पुस्तक उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों पर उपजे अनुभवों का एक ऐसा कलश है, जिससे निकलने वाली काव्य-धारा पाठक को आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रेरित करती है।

### *लेखन का उद्देश्य*


इस पुस्तक के लेखन और संकलन के पीछे मूल रूप से तीन मुख्य उद्देश्य निहित हैं:

1. *साहित्यिक विरासत का संरक्षण:* ललित मोहन शुक्ला जी ने दशकों की अपनी काव्य यात्रा में जो अनमोल रचनाएँ रचीं, उन्हें एक सूत्र में पिरोकर आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना। यह पुस्तक उनकी लेखनी के विकास क्रम को समझने का एक माध्यम है।
2. *अनुभवों का साझाकरण:* एक कवि जिस पीड़ा, आनंद या विस्मय से गुजरता है, वह सार्वभौमिक होता है। इस 'भाव-कलश' के माध्यम से उन अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाना है, ताकि वे स्वयं को इन पंक्तियों में कहीं न कहीं खोज सकें।
3. *संवेदनाओं को स्वर देना:* आज के भागदौड़ भरे युग में मनुष्य की संवेदनाएँ कुंद होती जा रही हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों के भीतर सोई हुई मानवीय भावनाओं को पुनः जागृत करना और उन्हें शब्दों की शक्ति से परिचित कराना है।

यह कृति केवल ललित मोहन जी के प्रशंसकों के लिए ही नहीं, बल्कि कविता में रुचि रखने वाले हर उस व्यक्ति के लिए है जो सत्य, शिव और सुंदर की खोज में है। विश्वास है कि यह 'भाव-कलश' अपनी शीतलता और वैचारिक गहराई से साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाएगा। 

2 व्यक्तित्व का उद्भव: ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश



व्यक्तित्व का निर्माण किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह जीवन-पर्यावरण, संस्कारों, अनुभवों और निरंतर आत्मचिंतन का समन्वित फल होता है। ललित मोहन शुक्ला के व्यक्तित्व का उद्भव भी इसी सघन प्रक्रिया से जुड़ा है, जहाँ बचपन का परिवेश, शिक्षा-संस्कार और सतत जिज्ञासा ने उनके व्यक्तित्व को दिशा दी। प्रारंभिक जीवन में मिले अनुभवों ने न केवल उनके चिंतन को आकार दिया, बल्कि समाज, इतिहास, शिक्षा और साहित्य के प्रति उनकी संवेदनशीलता को भी गहराई प्रदान की।

ललित मोहन शुक्ला के बाल्यकाल का परिवेश सादगी, अनुशासन और मूल्यों से ओत-प्रोत रहा। पारिवारिक वातावरण में मिले नैतिक संस्कारों ने उनमें जिम्मेदारी, कर्तव्यबोध और मेहनत की भावना विकसित की। पुस्तकों, शिक्षकों और विचारशील संवादों के संपर्क ने उनके भीतर अध्ययनशीलता और चिंतनशील दृष्टिकोण को प्रखर किया। बचपन में प्रकृति, समाज और संस्कृति को निकट से देखने का अवसर उनके व्यक्तित्व के निर्माण में एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व बना।


उनके प्रारंभिक जीवन में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रही; यह अनुभवात्मक सीख का स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। सामाजिक जीवन के विविध पक्षों का अवलोकन करते हुए उनमें मानवीय मूल्य, नेतृत्व क्षमता और रचनात्मकता ने आकार लिया। यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने साहित्य, लेखन, शिक्षा, इतिहास, प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई।

ललित मोहन शुक्ला के व्यक्तित्व का उद्भव मूलतः उनके परिवेश, जिज्ञासा-प्रधान मानसिकता और स्वाध्याय की परंपरा से हुआ। प्रारंभिक जीवन के संघर्ष, अवसर और सीख ने उनमें आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति की शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया। आज उनका व्यक्तित्व अध्ययन, सृजन और प्रेरणा का प्रतीक है—जहाँ व्यक्तिगत अनुभव सामाजिक चेतना में रूपांतरित होकर दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।

इस प्रकार, ललित मोहन शुक्ला का प्रारंभिक जीवन और परिवेश केवल जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि उनके सशक्त और बहुआयामी व्यक्तित्व के उद्भव की आधारभूमि साबित हुआ।


[3]  काव्य यात्रा का आरंभ


ललित मोहन शुक्ला की काव्य यात्रा किसी अचानक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि संवेदनशील हृदय की गहन अनुभूति से जन्मी एक निरंतर साधना है। बचपन से ही शब्दों के प्रति उनके भीतर एक सहज आकर्षण रहा। प्रकृति, मानव जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक संवेदनाएँ और आसपास घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाएँ उनके मन में तरंगें उठाती रहीं। इन्हीं तरंगों ने विचारों को कविता के रूप में रूपांतरित करना प्रारंभ किया।

विद्यालय के दिनों में पाठ्य पुस्तकों की कविताएँ ही नहीं, बल्कि प्रार्थना, भजन और लोकगीत भी उन्हें भीतर तक स्पर्श करते थे। उन्होंने पाया कि कविता केवल पढ़ी नहीं जाती, उसे जिया जाता है। यही बोध उनके काव्य मार्ग की पहली सीढ़ी बना। धीरे-धीरे उन्होंने शब्दों को संवेदना का आकार देना सीखा और मन की अनुभूतियाँ पंक्तियों में ढलने लगीं।

उनकी काव्य यात्रा आत्मान्वेषण, समाज-बोध और मानवीय करुणा का संगम है। इस यात्रा में भाव ही उनका संबल बने—इसीलिए इस संकलन का नाम सार्थक रूप से *“भाव-कलश”* रखा गया है, जो उनके भीतर संचित उन गहन भावनाओं का प्रतीक है जिन्हें उन्होंने शब्द देकर अमर कर दिया।

## पहली रचना और शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाएँ

पहली रचना हमेशा विशेष होती है—वह केवल कविता नहीं, बल्कि एक नई पहचान की घोषणा होती है। ललित मोहन शुक्ला की पहली रचना भी उनके अंतर्मन के उफनते भावों का स्वाभाविक प्रस्फुटन थी। प्रारंभिक दौर में उन्होंने जीवन के सरल प्रसंगों, रिश्तों की कोमलता, प्रकृति के रंगों और मानवीय संवेदनाओं को कविताओं में पिरोना शुरू किया।

परिवार, शिक्षक और साहित्य-रसिक मित्रों का वातावरण उनके लिए प्रेरणा स्रोत बना। महान कवियों की रचनाएँ—मैथिलीशरण गुप्त, निराला, पंत, प्रसाद, दिनकर और आधुनिक कवियों की काव्यधारा—उनके लिए मार्गदर्शक बनीं। इन महान रचनाकारों को पढ़ते हुए उन्होंने सीखा कि कविता केवल तुकबंदी नहीं, बल्कि विचार, दर्शन और भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है।

पहली रचना प्रकाशित होने का क्षण उनके जीवन का अविस्मरणीय पड़ाव रहा। उस दिन उन्हें यह अनुभूति हुई कि शब्दों की शक्ति समाज के हृदय तक पहुँच सकती है। यह अनुभव उनके भीतर आत्मविश्वास भर गया और काव्य-सृजन उनका जीवन-धर्म बनता चला गया।

उनकी शुरुआती प्रेरणाएँ केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों, साधारण मनुष्यों के मुस्कराते चेहरे, दुख-दर्द और आशाओं से भी मिलीं। वही प्रेरणाएँ आगे चलकर उनकी काव्य यात्रा का प्राणतत्व बनीं। 


अध्याय 4
भाव-कलश: एक परिचय — मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता**


‘भाव-कलश’ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का वह महत्त्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ संवेदनाएँ, अनुभूतियाँ और विचार एक साथ मिलकर मनुष्य-जीवन की संपूर्णता को स्पर्श करते हैं। इस काव्य-संग्रह में कवि केवल शब्दों का विन्यास नहीं करता, बल्कि भावों का ऐसा कलश रचता है जिसमें जीवन के विविध रस—श्रृंगार, करुणा, वीरता, शांति, भक्ति और मानवीय करुणा—संतुलित रूप से संजोए हुए हैं। यही कारण है कि ‘भाव-कलश’ केवल कविता-संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित होती अनुभूतियों का आत्मीय दस्तावेज़ प्रतीत होता है।

### मुख्य काव्य संग्रह की विषय-वस्तु

‘भाव-कलश’ की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक है। इसमें मनुष्य और समाज, प्रकृति और पर्यावरण, प्रेम और अध्यात्म, जीवन-संघर्ष और आत्मोन्नति—इन सभी का सुसंतुलित समावेश मिलता है। कवि मानव जीवन को केवल बाहरी घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि भीतर उमड़ते-घुमड़ते विचारों, संवेदनाओं और अंतर्द्वंद्वों के रूप में देखता है।

1. *मानव-जीवन का बहुआयामी चित्रण*
   संग्रह की अनेक कविताओं में जीवन की जिजीविषा, संघर्षशीलता और आशा की अविचल शक्ति दिखाई देती है। निराशा के अंधेरे में भी प्रकाश की किरण ढूँढ़ने का आग्रह, कवि की जीवन-दृष्टि को सकारात्मक बनाता है।

2. *प्रकृति और मानवीय संबंध*
   प्रकृति यहाँ केवल सौंदर्य का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य का सहयात्री बनकर उपस्थित है। वर्षा, ऋतु-परिवर्तन, नदी, पर्वत और आकाश—सब मानवीय भावनाओं के प्रतीक बनकर उभरते हैं।

3. *प्रेम और संवेदना का संसार*
   ‘भाव-कलश’ में प्रेम केवल रोमानी नहीं, बल्कि मानवीय करुणा और आत्मीयता का व्यापक रूप है। यहाँ प्रेम मिलन और विरह दोनों में अपनी गहरी मानवीय व्याख्या पाता है।

4. *आध्यात्मिक चेतना*
   संग्रह की कई कविताओं में आत्मा, ईश्वर-चेतना, और मनुष्य के भीतर स्थित दिव्यता का उल्लेख मिलता है। यह अध्यात्म किसी कर्मकांड का नहीं, बल्कि अनुभव-प्रधान आंतरिक जागरण का अध्यात्म है।

### वैचारिकता और दार्शनिक दृष्टि

‘भाव-कलश’ की वैचारिकता मानवीय मूल्यों पर आधारित है। कवि की चिंतन-भूमि में सत्य, प्रेम, करुणा, नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रश्न सदैव उपस्थित रहते हैं। कवि आधुनिक जीवन की आपाधापी, भौतिकता की अंधी दौड़ और टूटते मानवीय संबंधों से चिंतित भी है, परंतु निराश नहीं होता। वह समाधान के रूप में *मानव-केन्द्रित दृष्टि, **संवेदनशीलता* और *आत्मचिंतन* की ओर संकेत करता है।

इस संग्रह में वैचारिकता का मूल आधार मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मानित करने की भावना है। जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र—इन कृत्रिम विभाजनों से ऊपर उठकर कवि मानवीय एकता, सहअस्तित्व और वैश्विक भाईचारे की बात करता है। यही मानवीय उदात्तता ‘भाव-कलश’ को विशिष्ट बनाती है।

### काव्य-भाषा और शैलीगत विशेषताएँ

‘भाव-कलश’ की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और भाव-प्रधान है। कवि अलंकारों का प्रयोग सजावट के लिए नहीं, बल्कि भावों को तीव्रता देने के लिए करता है। कल्पना और यथार्थ का सुंदर संतुलन इस संग्रह की प्रमुख शैलीगत विशेषता है। कहीं लोक-भाव, कहीं आधुनिक संवेदना, तो कहीं दार्शनिक गहराई—सब मिलकर इसे विविधता से सम्पन्न बनाती हैं।

### निष्कर्ष

‘भाव-कलश’ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का सार-संग्रह है। यह पाठक को केवल कविताएँ पढ़ने का आमंत्रण नहीं देता, बल्कि उसे *महसूस करने, सोचने और अपने भीतर झाँकने* के लिए प्रेरित करता है। इस काव्य-संग्रह की विषय-वस्तु और वैचारिकता जीवन के प्रति गहरे दायित्व-बोध, मानवता में आस्था और सकारात्मक परिवर्तन की कामना से जुड़ी हुई है। इसी कारण ‘भाव-कलश’ आधुनिक हिन्दी काव्य-संसार में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करता है। 


अध्याय 5: प्रमुख रचनाएँ और विश्लेषण – चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा में उनकी रचनाएँ संवेदना, मानवीय मूल्य, प्रकृति-प्रेम, राष्ट्रभावना, जीवन-दर्शन और सामाजिक सरोकारों के विविध आयामों को व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं में सरल भाषा, गहन भावबोध और प्रवाहमयी शैली का समन्वय दिखता है। इस अध्याय में उनकी कुछ प्रमुख कविताओं का भावार्थ, अंतर्निहित संदेश और आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत है।

## ✤ प्रमुख रचनाएँ और उनका सांकेतिक संसार

ललित मोहन शुक्ला की प्रमुख कविताएँ निम्न विषयों को स्पर्श करती हैं—

* मानव-जीवन का संघर्ष और आशा
* प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता
* राष्ट्र और मातृभूमि के प्रति समर्पण
* मानवीय मूल्यों तथा रिश्तों की गरिमा
* आत्म-चेतना, आत्म-विकास और जीवन-प्रेरणा

उनकी कविताएँ केवल भावाभिव्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि विचारों का मार्गदर्शन भी करती हैं। वे पाठकों को चिंतन के माध्यम से भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं।

## ✤ चुनिंदा कविताओं का भावार्थ और समीक्षा

### 1. *“जीवन की धूप-छाँव”*

*भावार्थ:*
यह कविता जीवन के उतार–चढ़ाव, हर्ष–विषाद और संघर्ष–सफलता के द्वंद्व को चित्रित करती है। कवि बताता है कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं, बल्कि अनुभवों की पूर्णता का सामूहिक रूप है।
*समीक्षा:*

* कविता में प्रतीकात्मक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।
* “धूप-छाँव” का बिंब जीवन की अनिश्चितताओं को सजीव बनाता है।
* काव्य में आशावाद प्रमुख स्वर के रूप में उपस्थित है।

### 2. *“माटी की महक”*

*भावार्थ:*
इस कविता में कवि ने अपनी मातृभूमि, ग्राम्यसंस्कृति और धरती से जुड़ेपन को व्यक्त किया है। माटी की खुशबू बचपन, स्मृति और पहचान का प्रतीक बन जाती है।
*समीक्षा:*

* कविता में लोक-संवेदना और ग्रामीण जीवन की सहजता झलकती है।
* भाषा सरल है, पर भाव अत्यंत मार्मिक हैं।
* यह कविता पाठक के भीतर अपनी जड़ों के प्रति गर्व का भाव जगाती है।

### 3. *“वक्त की नदी”*

*भावार्थ:*
यह कविता समय के निरंतर प्रवाह का दर्शन कराती है। कवि बताता है कि समय रुकता नहीं, वह सबको बहाकर आगे ले जाता है; इसलिए वर्तमान का सदुपयोग ही जीवन की सच्ची साधना है।
*समीक्षा:*

* रूपक का प्रभावशाली प्रयोग—“नदी” के रूप में “वक्त” का चित्रण।
* दार्शनिकता और व्यवहारिकता का संतुलन।
* पाठक को आत्ममंथन हेतु प्रेरित करने वाली रचना।

### 4. *“मानवता का दीप”*

*भावार्थ:*
इस कविता में करुणा, प्रेम, सहयोग और मानवीय संवेदना को मानवता के दीपक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अंधकारमय समय में भी प्रकाश देता है।
*समीक्षा:*

* मूल संदेश: हिंसा और स्वार्थ के बीच मानवता ही सच्चा मार्गदर्शन।
* भाषिक सरलता के साथ विचारों की गंभीरता स्पष्ट।
* कविता प्रेरक और मूल्यपरक है।

### 5. *“प्रकृति का निमंत्रण”*

*भावार्थ:*
यह कविता प्रकृति को एक जीवंत मित्र के रूप में प्रस्तुत करती है जो मनुष्य को शांति, सृजन और संतुलन का संदेश देती है। पर्वत, नदी, पेड़–पौधे सब मिलकर जीवन का गीत रचते हैं।
*समीक्षा:*

* सजीव चित्रण और कल्पनाशीलता इसकी विशेषता है।
* पर्यावरण-संरक्षण का अप्रत्यक्ष संदेश।
* कविता में प्रकृति-मानव संबंध का सूक्ष्म दार्शनिक स्वर।

## ✤ समग्र मूल्यांकन

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ:

* *भावप्रधान* भी हैं और *विचारप्रधान* भी
* पाठक के मन में संवेदना, आत्मविश्वास और आशा का संचार करती हैं
* भाषा में सरलता, शैली में प्रवाह और संदेश में गहराई रखती हैं

उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक आनंद ही नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की दिशा भी देती हैं। यही कारण है कि उनका काव्य-सृजन पाठकों के हृदय में सीधा स्थान बनाता है और उन्हें आत्मिक स्तर पर छू जाता है।

### ✔ निष्कर्ष

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ “भाव-कलश” में संचित उन अमूल्य बूँदों की तरह हैं जो जीवन के विभिन्न आयामों—दुःख, सुख, संघर्ष, प्रेम, प्रकृति और मानवता—को सार्थक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। चयनित कविताओं का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि उनका काव्य केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि अनुभवों की संपूर्ण यात्रा है—एक ऐसी यात्रा, जो पाठक को भी अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। 



अध्याय 6  शैली और शिल्प-विधान — भाषा-शैली, अलंकरण और छंदों का प्रयोग


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी *शैली और शिल्प-सजगता* है। उनका काव्य न केवल भाव-संपन्न है, बल्कि रूप-सौंदर्य, भाषा की संगीतात्मकता और अलंकारिक सौष्ठव से भी परिपूर्ण है। उनकी कविताएँ पढ़ते समय यह स्पष्ट अनुभव होता है कि कवि शब्दों का चयन अत्यंत सजगता के साथ करता है और हर पंक्ति में भाव की गरिमा के साथ शिल्प की सुदृढ़ता भी दिखाई देती है।

## ✤ भाषा-शैली की विशेषताएँ

ललित मोहन शुक्ला की भाषा शैली में निम्न प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं—

### 1. *सरलता और संप्रेषणीयता*

उनकी भाषा सहज, सरल और सामान्य पाठक के हृदय तक पहुँचने वाली है। जटिलता के स्थान पर स्पष्टता को उन्होंने महत्व दिया है।

### 2. *भावप्रधान और संवेदनशील भाषा*

शब्दों के पीछे भावों की तीव्रता और अनुभवों की गहराई स्पष्ट झलकती है। उनकी भाषा केवल विचार प्रकट नहीं करती, बल्कि अनुभूति भी जगाती है।

### 3. *लोक-भाषा और संस्कृतनिष्ठ शब्दों का संतुलन*

कवि ने स्थान-स्थान पर लोक-प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है, वहीं संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से काव्य को गरिमा भी प्रदान की है। इससे भाषा का रूप बहुरंगी हो उठा है।

### 4. *चित्रात्मक भाषा*

उनकी भाषा में चित्र उभरते हैं—प्रकृति, समय, मानव-स्थिति और भावनाओं के। शब्दों के माध्यम से दृश्यांकन उनकी शैली की उल्लेखनीय विशेषता है।

## ✤ अलंकरण का प्रयोग

अलंकार उनकी कविताओं को *सौंदर्य, प्रभाव और संगीतमयता* प्रदान करते हैं।

### 1. *रूपक अलंकार*

समय को नदी, जीवन को पथ, मानवता को दीप—इस प्रकार कवि रूपकों के माध्यम से जटिल अनुभूतियों को सरल बना देता है।

### 2. *उपमा अलंकार*

“फूल-सी मुस्कान”, “नभ-सा विस्तार”, “चाँद-सा मन” जैसी उपमाएँ भावों को कोमलता और सौंदर्य प्रदान करती हैं।

### 3. *अनुप्रास अलंकार*

व्यंजन ध्वनियों की पुनरावृत्ति से कविता में मधुर लय और संगीत का निर्माण होता है। अनेक पंक्तियों में यह ध्वन्यात्मक सौंदर्य दिखाई देता है।

### 4. *मानवीकरण*

प्रकृति, समय, रात, पवन, नदी को मानव गुणों से युक्त कर कवि ने अनुभूति को सजीव बना दिया है—यह मानवीकरण उनकी काव्य-शैली को जीवंत बनाता है।

## ✤ छंद और लय का प्रयोग

ललित मोहन शुक्ला के काव्य में छंदों का प्रयोग अत्यंत सजगता के साथ हुआ है।

### 1. *परंपरागत छंदों का प्रयोग*

दोहा, चौपाई, सोरठा जैसे छंदों में उनकी अनेक रचनाएँ दिखाई देती हैं। इससे काव्य भारतीय काव्य-परंपरा से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

### 2. *मुक्त छंद की सहजता*

समकालीन संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते समय उन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग भी किया है। यहाँ भाव की स्वतः प्रवाहिता को प्राथमिकता दी गई है।

### 3. *लयी संरचना*

छंदबद्ध और मुक्त दोनों ही रूपों में उनकी कविता में लय स्पष्ट रूप से विद्यमान रहती है, जो पाठक को निरंतर आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

## ✤ शिल्प संबंधी विशेषताएँ

* बिंब-रचना की स्पष्टता
* ध्वनि-सौंदर्य और शब्द-संगीत
* वाक्य-गठन में विविधता
* आरंभ, उत्कर्ष और समापन का संतुलन
* प्रभावोत्पादकता और भाव-संयम

कवि की शिल्प-सजगता उनकी रचनाओं में अनुशासन और सौंदर्य का अद्भुत सामंजस्य स्थापित करती है।

## ✔ निष्कर्ष

ललित मोहन शुक्ला का काव्य केवल भावों का *“भाव-कलश”* ही नहीं, बल्कि *शिल्प का भी कलश* है।
उनकी भाषा-शैली में सरलता के साथ गंभीरता, अलंकारों में सौंदर्य के साथ सार्थकता, और छंदों में लय के साथ संदेश का समन्वय दिखाई देता है।

इसी समन्वय के कारण उनकी कविताएँ पाठकों के मन में उतरती हैं और स्मृति में जीवित रहती हैं। 

*अध्याय 7 : संवेदना और सरोकार — रचनाओं में मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का चित्रण*


ललित मोहन शुक्ला की कविताओं का मूलाधार केवल सौंदर्यानुभूति नहीं, बल्कि संवेदना का व्यापक मानवीय धरातल है। उनकी काव्य-यात्रा में मनुष्य, समाज, प्रकृति, परिस्थितियाँ और समय—ये सभी एक साथ गतिशील दिखाई देते हैं। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि वे केवल भावनाओं का उद्गार नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई जिम्मेदारी, चेतना और उत्तरदायित्व को भी जगाती हैं। यही कारण है कि उनकी काव्य-रचना में संवेदना केवल भावुकता नहीं, बल्कि जीवित सरोकार का रूप धारण कर लेती है।

### 1. मानवीय संवेदना का व्यापक विस्तार

शुक्ला की कविताओं में पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रहती; वह सामुदायिक बन जाती है। वे हाशिये के जीवन को स्वर देते हैं—
* श्रमिकों का संघर्ष
* किसानों की विवशता
* महिलाओं के अधिकार
* बच्चों के सपने
* बुज़ुर्गों की एकाकीपन

इन सबके माध्यम से कवि मानो कहता है कि मनुष्य की असली पहचान उसकी संवेदना से होती है। उनकी रचनाओं में दया या करुणा दान की तरह नहीं उतरती, बल्कि सह-अनुभूति के रूप में उभरती है—जहाँ कवि स्वयं पीड़ा का सहभागी बन जाता है।

### 2. सामाजिक सरोकार और परिवर्तन की आकांक्षा

ललित मोहन शुक्ला की कविता केवल जीवन का चित्रण नहीं करती, बल्कि जीवन को बदलने की चाह भी प्रकट करती है। उनकी पंक्तियों में अन्याय, शोषण, भ्रांति और विसंगतियों के विरुद्ध एक मौन विद्रोह दिखाई देता है। वे समाज की जड़ता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं और मनुष्य को उसके भीतर छिपे विवेक से संवाद कराते हैं।

यह सामाजिक सरोकार नैतिक उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि आत्मबोध के रूप में प्रकट होता है। उनकी कविताएँ पाठक को यह अनुभूति कराती हैं कि परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है।

### 3. मानवीय मूल्य—काव्य का मूल स्वर

उनकी काव्य-यात्रा के केन्द्र में प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, सत्य, न्याय और समानता जैसे मानवीय मूल्य हैं। वे आधुनिक जीवन की आपाधापी में इन मूल्यों के क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हैं और पाठक को पुनः मनुष्यता की ओर लौटने का निमंत्रण देते हैं।

कवि के लिए मनुष्य का महान होना आवश्यक नहीं, मानवीय होना आवश्यक है। उनकी रचनाओं में बार-बार यह आग्रह उभरता है कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ संवेदनात्मक प्रगति भी अनिवार्य है—अन्यथा विकास अधूरा रह जाएगा।

### 4. सामाजिक चेतना का सशक्त स्वर

उनकी कविताओं में सामाजिक चेतना किसी नारे की तरह नहीं आती। वह धीरे-धीरे हृदय में उतरती है—
* प्रश्न बनकर
* आत्मालाप बनकर
* मौन पीड़ा बनकर
* कभी आशा की किरण बनकर

यही उनकी काव्य-चेतना की शक्ति है कि पाठक कविता पढ़कर केवल प्रभावित नहीं होता, बल्कि भीतर से सोचने को विवश होता है। कवि का उद्देश्य व्यक्ति में जागरूकता का दीप जलाना है—ताकि वह निष्क्रिय दर्शक न रहे, बल्कि सक्रिय सहभागी बने।

### 5. निष्कर्ष—संवेदना से सरोकार तक

ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा संवेदना से प्रारंभ होकर व्यापक सामाजिक सरोकार में विकसित होती है। उनकी रचनाएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं, समाज से जोड़ती हैं और अंततः स्वयं से जोड़ती हैं।

उनकी काव्य-दृष्टि हमें यह सिखाती है कि कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनके काव्य में अंकित संवेदनाएँ आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं—जहाँ मनुष्य को फिर से मनुष्यता की ओर लौटना है।


*अध्याय 8 — साहित्यिक योगदान: हिंदी साहित्य में स्थान और साथी रचनाकारों के विचार*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा केवल व्यक्तिगत भावाभिव्यक्ति का प्रवाह नहीं है, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उनकी उपस्थिति का प्रमाण भी है। उनकी कविताएँ मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक गहराई का ऐसा सम्मिलन प्रस्तुत करती हैं, जो पाठक के भीतर विचार और भावना—दोनों स्तरों पर हलचल उत्पन्न करता है। इसी कारण, आधुनिक हिंदी कविता के मानचित्र पर उनका स्थान निरंतर सुदृढ़ होता गया है।

### 🔹 हिंदी साहित्य में स्थान

ललित मोहन शुक्ला का साहित्यिक स्थान तीन आधारों पर निर्मित दिखाई देता है—विषय-गाम्भीर्य, भाषा-सरलता और संवेदनात्मक प्रामाणिकता। उनकी कविताएँ जटिल बौद्धिकता का बोझ नहीं ढोतीं, बल्कि सरल शब्दों में गहन अनुभूतियों को व्यक्त करती हैं। यही सरलता उनकी लोकप्रियता का मूल है। उनकी रचनाओं में—

* आम जनजीवन की पीड़ा
* मातृभूमि और प्रकृति के प्रति प्रेम
* मानव मूल्यों के क्षरण पर चिंता
* आत्मसंघर्ष और आशा का प्रकाश

बार-बार उभरता है।

उनकी कविताएँ न तो केवल रोमानी हैं, न केवल सामाजिक घोषणाएँ—वे दोनों के बीच ऐसी समरसता रचती हैं, जो आधुनिक पाठक के मन को सीधा स्पर्श करती है। इसलिए उन्हें समकालीन संवेदनाओं के सशक्त प्रवक्ता के रूप में देखा जाता है।

### 🔹 काव्य-भाषा और शैली

उनकी भाषा सहज, संप्रेषणीय और संगीतात्मक है। अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक है, कृत्रिम नहीं। बिंब और प्रतीक उनकी अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन हैं—

* नदी, पेड़, आकाश, मिट्टी, गाँव और स्मृतियाँ—इनके माध्यम से वे बड़े प्रश्न उठाते हैं।
  उनकी शैली में छायावादी कोमलता, प्रगतिशील चिंतन और आधुनिक प्रयोगधर्मिता—तीनों के स्वर मिलते हैं। यही मिश्रित शैली उन्हें विशिष्ट बनाती है।

### 🔹 विषय-क्षेत्र का विस्तार

उनकी कविताओं में विविधता भी एक उल्लेखनीय विशेषता है। वे केवल प्रेम या प्रकृति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि—

* राष्ट्र, भाषा, संस्कृति
* शिक्षण-व्यवस्था
* मानव संबंधों की जटिलता
* प्रौद्योगिकी और आधुनिकता के प्रभाव
  पर भी विचार करते हैं। इस प्रकार उनका साहित्य वर्तमान जीवन की सम्पूर्णता का आईना बन जाता है।

### 🔹 साथी रचनाकारों के विचार

समकालीन कवि और साहित्यकार ललित मोहन शुक्ला को ऐसे रचनाकार के रूप में देखते हैं, जिनकी कविताओं में सादगी के भीतर तीव्रता और कोमलता के भीतर संघर्ष बसता है। उनके बारे में अक्सर निम्न प्रकार के विचार व्यक्त किए जाते हैं—

* वे भावनाओं को उपदेश में नहीं, अनुभव में बदलते हैं
* उनकी कविता बोलती नहीं, सहलाती और झकझोरती है
* वे परंपरा को स्वीकार करते हुए भी आधुनिकता से संवाद करते हैं

साथी रचनाकारों का मानना है कि उनकी काव्य-यात्रा निरंतर विकसित होती हुई यात्रा है—जहाँ हर नई कविता पिछले अनुभव से आगे का मार्ग प्रशस्त करती है।

### 🔹 समकालीन पाठक पर प्रभाव

ललित मोहन शुक्ला की कविताएँ युवा पाठकों में विशेष रूप से लोकप्रिय हैं, क्योंकि वे आत्मविश्वास, संघर्ष और आशा के संदेश से भरी होती हैं। वरिष्ठ पाठकों के लिए उनकी रचनाएँ स्मृतियों का पुनर्संवाद बन जाती हैं। इस प्रकार उनकी कविता पीढ़ियों के बीच संवाद का सेतु भी निर्मित करती है।

### 🔹 निष्कर्ष

हिंदी साहित्य में ललित मोहन शुक्ला का योगदान बहुआयामी है। वे केवल कवि नहीं—

* संवेदना के शिल्पी
* सामाजिक चेतना के वाहक
* भाषा के सधे हुए कुशल कारीगर
  के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

साथी रचनाकारों के सम्मानपूर्ण मत और पाठकों के स्नेहपूर्ण स्वीकार ने उनके साहित्यिक स्थान को और मजबूत किया है। उनकी काव्य-यात्रा आज भी गतिमान है—और यही गतिशीलता उनके साहित्य को जीवंत, प्रासंगिक और कालातीत बनाती है। 


*अध्याय 9 — सम्मान एवं उपलब्धियाँ: कवि को प्राप्त पुरस्कार और महत्वपूर्ण मील के पत्थर*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा केवल सृजन की सतत साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे साहित्यिक जगत में व्यापक मान्यता, सम्मान और पुरस्कारों के रूप में भी स्वीकार मिला। उनकी कविताओं ने जिस तरह पाठकों के हृदय में स्थान बनाया, उसी प्रकार साहित्यिक संस्थाओं, मंचों और समकालीन रचनाकारों ने भी उनके योगदान को सराहा। यही कारण है कि उनकी साहित्यिक यात्रा में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ मील के पत्थर बनकर दर्ज होती चली गईं।

### 🔹 साहित्यिक सम्मान: सृजन की स्वीकृति

ललित मोहन शुक्ला को मिले सम्मान उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की व्यापकता और प्रभावशीलता के प्रमाण हैं। उनकी कृतियों को विभिन्न साहित्यिक मंचों, पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत किया गया। ये पुरस्कार केवल औपचारिक अलंकरण नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं की संवेदनात्मक गहराई, सामाजिक प्रतिबद्धता और कलात्मक ऊँचाई के मूल्यांकन के रूप में देखे जाते हैं।

इन सम्मानों ने उनके भीतर सृजन के प्रति दायित्वबोध को और मजबूत किया, और नई ऊर्जा के साथ उन्हें साहित्य-साधना में प्रवृत्त किया। प्रत्येक पुरस्कार उनके लिए अंत नहीं, बल्कि नयी सृजन-यात्रा का आरंभ रहा।




### 🔹 प्रमुख उपलब्धियाँ और मील के पत्थर

उनकी साहित्यिक यात्रा में कई ऐसे अवसर आए, जिन्होंने उन्हें न केवल कवि के रूप में, बल्कि एक सशक्त साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण मील के पत्थर इस प्रकार उल्लेखनीय हैं—

* उनकी कविताओं का विभिन्न साहित्यिक संकलनों में सम्मिलित होना
* राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर काव्य-पाठ के लिए आमंत्रण
* ई-पुस्तकों और ब्लॉगों के माध्यम से वैश्विक पाठक-समूह तक पहुँच
* युवा रचनाकारों के लिए प्रेरणा-स्रोत के रूप में उनकी स्वीकृति

इन उपलब्धियों ने उनकी काव्य-यात्रा को स्थानीय सीमाओं से निकालकर व्यापक साहित्यिक संसार से जोड़ा।

### 🔹 पाठकों और समाज की ओर से मिला सम्मान

किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान पाठकों के मन में मिला स्थान होता है। ललित मोहन शुक्ला की कविताओं को व्यापक पाठक-स्वीकार्यता मिली—

* उनके काव्य-पाठों पर मिलने वाली spontaneous प्रतिक्रिया
* पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित समीक्षाएँ
* अकादमिक वर्ग द्वारा उनकी रचनाओं पर चर्चा
  इन सभी ने उनके साहित्यिक अवदान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

साथ ही, सामाजिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया गया, जिससे उनका व्यक्तित्व केवल कवि नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत के रूप में भी उभरकर आया।

### 🔹 डिजिटल युग में उपलब्धियाँ

डिजिटल मंचों पर उनकी सक्रिय उपस्थिति भी एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में देखी जाती है। ब्लॉग, ई-बुक्स, ऑनलाइन साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से उनका साहित्य नई पीढ़ी तक पहुँचा। यह विस्तार केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि पीढ़ीगत संवाद का स्वरूप भी है।

डिजिटल माध्यमों पर उनकी रचनाओं को मिले पाठक, टिप्पणियाँ और व्यापक साझा-करण (sharing) स्वयं में साहित्यिक उपलब्धि के आधुनिक संकेतक हैं।

### 🔹 सम्मान का अर्थ: दायित्व और विनम्रता

ललित मोहन शुक्ला के लिए सम्मान और पुरस्कार केवल गौरव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी हैं। वे स्वयं मानते हैं कि पुरस्कार सृजन का लक्ष्य नहीं, बल्कि सृजन की गुणवत्ता का परिणाम हैं। यही दृष्टिकोण उन्हें विनम्र बनाता है और उनकी रचनाओं को अहंकार से दूर रखता है।

सम्मान ने उन्हें समाज, मानवता और साहित्य के प्रति और अधिक उत्तरदायी बनाया है। यही कारण है कि उनके काव्य में निरंतर परिपक्वता और व्यापक दृष्टि का विस्तार दिखाई देता है।

### 🔹 निष्कर्ष

सम्मान और उपलब्धियाँ ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा के चमकते पड़ाव हैं, पर उनकी असली सफलता उनके शब्दों द्वारा छुए गए हृदयों में निहित है। पुरस्कारों ने उनके साहित्यिक स्थान को प्रतिष्ठा दी, और उपलब्धियों ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को विस्तार।

उनकी काव्य-यात्रा अब भी गतिशील है—
नए अनुभव, नई संवेदनाएँ और नए आयाम उनकी प्रतीक्षा में हैं। यही निरंतरता उन्हें समय के साथ-साथ साहित्य के इतिहास में भी एक स्थायी स्थान प्रदान करती है। 


*अध्याय 10 — उपसंहार: काव्य-यात्रा का सारांश और भविष्य की दृष्टि*


ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा भावों की गहराइयों, संवेदनाओं की ऊष्मा और सामाजिक सरोकारों की प्रखर चेतना से निर्मित एक सतत प्रवाह है। यह यात्रा केवल कविता-लेखन का क्रम नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, अनुभवों और आत्मचिंतन का सुविस्तृत दस्तावेज है। उनकी रचनाओं में मनुष्य, समाज, प्रकृति, राष्ट्र और अंतर्मन—सभी के सुविचार, संघर्ष और आकांक्षाएँ शब्दों के माध्यम से साकार रूप लेते हैं।

इस काव्य-यात्रा का सारांश प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट रूप से अनुभव होता है कि उनकी कविता तीन प्रमुख धरातलों पर विस्तृत है—

1. *संवेदना का धरातल* – जहाँ वे मानवीय संबंधों और भावनाओं की सूक्ष्मता को छूते हैं।
2. *सामाजिक चेतना का धरातल* – जहाँ वे समय, समाज और व्यवस्था से संवाद करते हैं।
3. *आध्यात्मिक-आंतरिक धरातल* – जहाँ वे आत्मा, जीवन और अस्तित्व के प्रश्नों से रूबरू होते हैं।

इन तीनों धरातलों का संगम उनकी कृति को विशिष्ट बनाता है और यही उनकी काव्य-यात्रा की पहचान भी है।

### 🔹 बीते सफ़र की झलक

अब तक की उनकी यात्रा में—

* काव्य-चेतना का क्रमिक विकास
* विषय-वस्तु का विस्तार
* भाषा की परिपक्वता
* पाठकों से गहरा संबंध

स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शुरुआती रचनाओं की सरल भावुकता धीरे-धीरे गहरी विचार-समृद्धि में परिवर्तित होती है। यही क्रम उनकी कविता को मात्र अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि *अनुभव का परिष्कार* बनाता है।

### 🔹 रचनाकार का आत्मदायित्व

ललित मोहन शुक्ला स्वयं अपनी काव्य-यात्रा को व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ सामाजिक दायित्व भी मानते हैं। उनकी दृष्टि में कविता केवल सौंदर्य-बोध नहीं, बल्कि—

* मानवीय उत्थान
* नैतिक जागरण
* संवेदनशील समाज निर्माण
  का माध्यम है।

इसलिए उनकी काव्य-यात्रा निरंतर *जिम्मेदारी से जुड़ी हुई यात्रा* के रूप में आगे बढ़ती है।

### 🔹 भविष्य की दृष्टि

भविष्य की ओर दृष्टि डालते हुए यह स्पष्ट है कि उनकी रचनात्मकता अभी थमी नहीं, बल्कि नये आयामों की खोज में अग्रसर है। आने वाला समय उनकी कविता में—

* नए सामाजिक प्रश्न
* बदलते मानवीय संबंध
* विज्ञान और तकनीक से प्रभावित जीवन
* वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय अस्मिता

जैसे विषयों को और अधिक विस्तार देगा।

उनकी कविता का भविष्य केवल संग्रहों में सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि डिजिटल मंचों, अंतरराष्ट्रीय पाठक-समूह और नई पीढ़ी की चेतना में भी अपनी जगह बनाएगा। इस प्रकार उनकी काव्य-यात्रा समय के साथ विकसित होती हुई, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-दीपक बनकर जलती रहेगी।

### 🔹 अंतिम भाव

“भाव-कलश” की यह यात्रा अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है—
जहाँ पीछे के अनुभव संजोए गए हैं और आगे के सपनों की आहट सुनाई देती है।

ललित मोहन शुक्ला की काव्य-यात्रा का मूल मंत्र यही है—

* *संवेदना को जीवित रखना*
* *मानवता की लौ को प्रज्वलित रखना*
* *शब्दों को केवल अलंकार नहीं, परिवर्तन का माध्यम बनाना*

इन्हीं भावों के साथ उनकी काव्य-यात्रा आगे भी निरंतर चलती रहेगी—
नए शब्दों के साथ, नई संवेदनाओं के साथ, और नई दिशाओं की ओर।

11.परिशिष्ट (Appendix)कवि के दुर्लभ चित्र, पत्र या हस्तलिखित अंश
 

जीवन की धूप-छांव


कभी मखमली राहें मिलें, कभी कांटों का घेरा है,
कभी अमावस की रातें, कभी उजला सवेरा है।
ये मत पूछो कि जीवन में, मिला हमको यहाँ क्या-क्या,
बस इतना जान लो राही, ये धूप-छांव का घेरा है।

चढ़ाव है तो ढलान भी, गिरना भी एक कहानी है,
संघर्षों की भट्टी में ही, तपती ये जवानी है।
सफलता का वो स्वाद कहाँ, जो बिन पसीने मिल जाए,
हार के बाद की जीत ही, असल में ज़िंदगानी है।
पर्वत के शिखर तक जाने को, घाटी से गुज़रना पड़ता है,
पाने को कुछ बड़ा यहाँ, ख़ुद से ही लड़ना पड़ता है।

खुशियों के झोंके आएँ तो, आँखों में चमक भर जाती है,
दुखों की बदली छाए तो, सांसें भी सिमट जाती हैं।
पर सिर्फ़ ख़ुशी ही जीवन हो, तो मन ऊब सा जाएगा,
दुख की कड़वाहट के बिना, सुख भी फीका पड़ जाएगा।
हर्ष और विषाद के धागों से, ये जीवन बुना गया है,
इन्हीं विरोधाभासों में, जीने का अर्थ छुपा गया है।

जीवन केवल सुख का नाम नहीं, ये अनुभवों का सागर है,
मिट्टी और सोने से भरी, ये एक अनूठी गागर है।
हर आँसू एक सबक बना, हर मुस्कान एक शक्ति है,
इन विपरीत हवाओं में ही, छुपी जीवन की भक्ति है।
पूर्ण वही है जिसने यहाँ, हर रंग को अपनाया है,
धूप को माथे पर रख कर, छांव का लुत्फ़ उठाया है। 


"माटी की महक" 

चंदन सी ये माटी अपनी, सिर माथे पर लगाता हूँ
मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ, इसकी खुशबू साथ ले जाता हूँ।
शहरों की इस भीड़-भाड़ में, खो न जाए पहचान मेरी
यही रेत की नरम छुअन तो, लिखती है हर दास्तान मेरी।
वो सोंधी-सोंधी सी... ओ री गैया, ओ री मैया...
वो सोंधी-सोंधी माटी की महक, मुझे गाँव बुलाती है।

नीम की ठंडी छाँव और वो, गलियों का हुड़दंग याद है
कागज़ वाली कश्ती और वो, उड़ता हुआ पतंग याद है।
नंगे पाँव उस गीली पगडंडी पर, बेफ़िक्री से चलना
घुटनों पर जो धूल लगी थी, वही था असली संवरना।
आज मखमली कालीनों पर, वो सुकून कहाँ मिलता है
जो बरखा की पहली बूंद में, मिट्टी से खिलता है।
वो भीगी-भीगी सी... यादों की वो...
वो भीगी-भीगी माटी की महक, मुझे बचपन दिखाती है।

खेतों की वो हरियाली और, हल की उठती धार यहाँ
मेहनत के पसीने में भी, बसता है श्रृंगार यहाँ।
ढोलक की थाप पे थिरकते, लोकगीत और त्यौहार वही
पड़ोसी भी अपनों जैसा, भरा-पुरा संसार वही।
इसी कोख से जनमे हम सब, यहीं पे मिल जाना है
अपनी धरती, अपनी संस्कृति, यही असली ठिकाना है।
वो पावन-पावन सी... जननी जैसी...
वो पावन-पावन माटी की महक, मुझे रूबरू कराती है।

दुनिया घूमी, मंज़िल पायी, पर मन का पंछी प्यासा है
माटी की उस खुशबू में ही, सिमटी हर अभिलाषा है।
मेरी रग-रग में बहती है, ये ग्राम्य जगत की शुचिता
यही मेरी पहचान है 'राही', यही मेरी मौलिकता।
वो महकती-महकती सी... रूह में बसी...
वो माटी की महक मुझे, मेरा 'घर' याद दिलाती है। 


गीत: वक्त की नदी


वक्त की नदी बहती जाए, रुकना इसका काम नहीं,
लहरों की इस हलचल में, कल का कोई नाम नहीं।
जो बीत गया वो रेत हुआ, जो पास है वो ही अपना है,
बाकी सब तो आँखों में, बसता एक सपना है।

कभी ये शांत किनारों सी, मन को सुकून दिलाती है,
कभी धार की तेजी में, यादें संग बहा ले जाती है।
पत्थर से टकराती है, फिर भी राह बनाती है,
ठहरना मौत है इसके लिए, बहना ही जिंदगानी है।
वक्त की नदी बहती जाए...

बचपन की वो कागज की कश्ती, कहीं दूर निकल गई,
जवानी की वो धूप सुहानी, शाम ढले ढल गई।
चेहरों पर जो लकीरें हैं, वो इसी नदी के निशान हैं,
हर लहर में छिपे हुए, बीते कई इम्तिहान हैं।
वक्त की नदी बहती जाए...

ना कोई इसे बाँध सका, ना कोई रोक पाया है,
शहंशाह हो या फकीर कोई, सब पर इसका साया है।
आज की इस बहती धारा में, तुम अपना दीप जला लेना,
वक्त मिले तो अपनों के संग, दो पल खुशी मना लेना।

वक्त की नदी बहती जाए, रुकना इसका काम नहीं,
लहरों की इस हलचल में, कल का कोई नाम नहीं 

प्रकृति का निमंत्रण

सुनो! शिखर से मौन पुकार,
देता तुमको बारम्बार।
धरा बुलाती बाहें खोले,
आओ तज कर सब संसार।।
नील गगन का वह विस्तार,
कहता "मुझसा हृदय बनाओ"।
बहती सरिता की ये धार,
"गति में ही जीवन" सिखलाओ।
झूम रही हैं हरी डालियाँ,
बाँट रही हैं मधुर प्यार।।
कण-कण में है संगीत यहाँ,
पत्तों का मरमर स्वर तो सुन।
भौरों की गुंजन में खोकर,
मन के सुंदर धागे बुन।
भोर बुलाती अरुणिमा बन,
साँझ सँवारे स्वर्ण द्वार।।
छोड़ कृत्रिम वैभव की माया,
आओ तरुवर की छाँव तले।
जहाँ शांति की शीतल छाया,
दुख-संताप सभी पिघलें।
वृक्षों का संयम तुम देखो,
परोपकार ही जिनका सार।।
धरा पुकारे, नदियाँ गाएँ,
प्रकृति का यह पावन धाम।
स्वयं को इसमें विलीन कर लो,
मिलेगा मन को पूर्ण विराम।
खुली हवा का स्पर्श लो तुम,
यही सुखों का है आधार।। 
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार, कवि व लेखक) 

मानवता का दीप

जब स्वार्थ का नभ घिर आए, और तिमिर सघन हो जाए,
जब संवेदनहीनता की आंधी, मन का चैन चुराए।
तब भीतर के एक कोने में, चुपचाप एक लौ जलती है,
वही मानवता का दीपक है, जो हर मुश्किल में पलती है।
करुणा की वह कोमल बाती,
जो दुखियों का दर्द समझती है।
बिना कहे जो पीर हर ले,
वही निस्वार्थ चमकती है।
न भाषा देखे, न कोई मजहब, न सीमाओं का घेरा,
जहाँ प्रेम की लौ जलती है, वहीं होता है सवेरा।
सहयोग का तेल भरा हो जिसमें,
वह बुझने कभी न पाता है।
एक हाथ जब थामे दूजा,
संकट भी टल जाता है।
कंधे से जब कंधा मिलता, पर्वत भी झुक जाते हैं,
मानवता के उजियारे में, सब अपने मिल जाते हैं।
संवेदनाओं की वह ऊष्मा,
पथरीले मन को मोम करे।
जहाँ घृणा की शीत लहर हो,
वहाँ यह दीपक काम करे।
यह दीप नहीं बस मिट्टी का, यह अडिग विश्वास का प्रतीक है,
अंधियारे को चीर सके जो, वही सबसे सटीक है।
आओ हम सब मिलकर आज,
यह पावन दीप जलाएँ।
नफरत के इस रेगिस्तां में,
प्रेम की गंगा बहाएँ।
जब तक एक भी दीप जलेगा, मानवता नहीं हारेगी,
यही रोशनी इस दुनिया का, फिर से भाग्य सँवारेगी।

चप्पल

चप्पल है अति लाड़ली, पाँवन की है ढाल।
कंकड़-पत्थर से लड़े, रखे सुखी हर हाल।।
धूप तपे या कीच हो, सहे कष्ट दिन-रात।
मालिक के चरणों तले, करे समर्पण बात।।

चप्पल संग चले जग सारा, निर्धन हो या राज-दुलारा।
मंदिर बाहर धीरज धरनी, सबकी सेवा इसकी करनी।।
रंग-बिरंगी और सुहावन, धूल-धूप से रक्षित पावन।
कभी हवाई कभी है बाटा, चुभने दे न कोई कांटा।।

घिस जाती है देह, मगर ये उफ़ न कहती।
कीचड़ हो या रेत, मौन हो सब कुछ सहती।।
जोड़ी टूटे एक, दूसरी व्यर्थ कहाती।
बिना पाँव के साथ, सदा ये सूनी जाती।।

चप्पल चन-चन बोलती, द्वारे खड़ी हुजूर।
अदब सिखाती शीश को, होकर पाँव की धूल।।
होकर पाँव की धूल, मान मर्यादा रखती।
अंदर जाना मना, द्वार पर ही ये थकती।।
कह 'गिरिधर' कविराय, सदा ये साथ निभाती।
फटी-पुरानी होय, याद बचपन की लाती।।
ललित मोहन शुक्ला 



गीत: जीवन की थाती


मिट्टी से हम जन्मे हैं, एक दिन मिट्टी हो जाना है
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।
न जीत में घमंड हो, न हार में मलाल हो
जीवन की सबसे सुंदर सीख, मन सदा खुशहाल हो।

बहती नदिया कह गई हमसे, रुकना मौत की निशानी है
राहों के पत्थरों से भी, लिखनी एक कहानी है।
धूप मिली तो सीख लिया, छाँव की कद्र करना
दुख की कड़वी घूँट पिए बिन, सुख का मोल न जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

पेड़ हमेशा झुकते हैं, जब फलों का भार आता है
बड़ा वही है दुनिया में, जो झुकना सीख जाता है।
बाँट सको तो बाँट लो खुशियाँ, दर्द तो सबका अपना है
परायों में जो देख ले खुद को, वही सच्चा सयाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

कल की चिंता छोड़ के तू, आज का दीया जला ले
टूटे हुए जो रिश्ते हैं, उन्हें गले से लगा ले।
माफी सबसे बड़ा हुनर है, नफरत बस एक बोझ है
खाली हाथ आए थे हम, खाली हाथ ही जाना है।
मिले जो पल ये चार यहाँ, बस प्यार ही लुटाना है।

सच्चाई की राह कठिन है, पर अंत बड़ा ही सुंदर है
बाहर मत ढूँढ सुकून तू, तेरे ही अंदर समंदर है।
जीवन की इस छोटी सी सीख को, जिसने भी पहचाना है
उसने ही इस जग में रहकर, खुदा को सच में पाना है।
ललित मोहन शुक्ला 


❤️ दिल: अनमोल अहसास

दिल है नाज़ुक एक शीशे का,
प्यार से भरा, भावनाओं का ख़ज़ाना।
धड़कन इसकी जीवन की कहानी,
हर पल चलती, जैसे कोई रूहानी धुन।
ये है घर ख़ुशियों और ग़मों का,
इसमें बसती हैं उम्मीदें और सपने।
कभी ये हँसता है खुल कर,
कभी चुपके से आँसू बहाता है।
हर रिश्ते की डोर इससे बंधी,
मोहब्बत की दुनिया इसी में सिमटी।
दिल ही जानता है सच्चाई क्या है,
हर अहसास को गहराई से ये महसूसता है।
इसे संभालना है इबादत से कम नहीं,
क्योंकि ज़िंदगी इसी की रफ़्तार पर चलती।
ये धड़कता रहे, तो सब कुछ क़ायम है,
दिल ही तो है, जो इंसानियत को ज़िंदा रखता है।
ललित मोहन शुक्ला 

गीत: धड़कनों का इकरार

इन खुली आँखों में अब एक ख्वाब रहता है,
मेरे दिल में बस तेरा ही महताब रहता है।
हवाओं ने गुनगुनाया है नाम तेरा धीरे से,
अब मेरी हर दुआ में तेरा ही जवाब रहता है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।

कभी जो न कही थी, वो बात कहनी है,
संग तुम्हारे ही अब ये ज़िंदगी रहनी है।
जैसे धूप में ठंडी छाँव बन गए हो तुम,
मेरी सूखी ज़मीन पर घटा बन बरसे हो तुम।
तेरी मुस्कुराहटों में मेरी जीत छिपी है,
मेरी हर खुशी अब तेरी गलियों में रुकी है।
हाँ, मुझे तुमसे प्यार है...

लिखूँ मैं जो भी, उसमें ज़िक्र तुम्हारा हो,
डूबे अगर कश्ती, तो बस तेरा किनारा हो।
न माँगूँ चाँद-तारे, न सारा ज़माना मैं,
बस उम्र भर के लिए तेरा ही सहारा हो।
नज़रें जो मिलीं, तो ये राज़ खुल गया,
तू मिला तो मानो, मुझे खुदा मिल गया।

हाँ, मुझे तुमसे प्यार है,
यही दिल का इकरार है।
सदियों से था जिसका इंतज़ार,
वो तुम ही मेरा संसार है।
गीतकार _ललित मोहन शुक्ला 



मेरा दिल

मेरा दिल है एक खुली किताब,
जिसमें दबी हैं हज़ारों ख़्वाब।
कभी ये हँसे, कभी ये रोए,
न जाने कौन से रंग ये बोए।
जैसे हो कोई नटखट बच्चा,
करता कितनी बातें ये कच्चा।
कभी मचले, कभी ये बहके,
चाहत की धूप में ये दहके।
इक कोना इसका है बिलकुल सादा,
जहाँ रहती है तेरी ही याद ओ अनामिका 
धड़कन इसकी तेरी ही धुन है,
तू ही इसकी पहली और अंतिम गुन है।
ये छुपाए कई गहरे राज़,
सुनाए इश्क़ की मीठी आवाज़।
नाज़ुक ये ऐसा, जैसे कोई फूल,
मगर सह लेता हर दर्द की शूल।
हर पल ये तेरा ही नाम पुकारे,
तेरे ही संग ये जिए और हारे।
मेरा दिल है तो बस तेरा ही घर,
यहाँ से तू कभी ना जाना किधर।



एक रास्ता

यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
चुपचाप मुझको बुलाए जा रहा है।
न मंज़िल का कोई मुझे है ठिकाना,
मगर दिल सफ़र का गुनगुना रहा है।
अकेला हूँ पर मैं थकता नहीं हूँ,
झुक जाऊँ मैं ऐसा मुसाफ़िर नहीं हूँ।
पहाड़ आड़ आए, नदी हो या जंगल,
कदम रुक गए तो ये जीना नहीं हूँ।
यहाँ धूल भी है, कहीं छाँव भी है,
कहीं दूर से आता कोई पाँव भी है।
कभी तेज़ चलता, कभी धीरे-धीरे,
हर मोड़ पर एक नया घाँव भी है।
हैं कितने ही राही जो गुज़रे यहाँ से,
लिए ख़्वाब अपने गए हैं कहाँ से।
उनकी कहानियाँ पत्थरों पर लिखी हैं,
सीखा है मैंने, ज़माने-जहाँ से।
ये राह ही मेरी अब पहचान ठहरी,
इसी पर टिकी मेरी मुस्कान ठहरी।
ज़िंदगी है क्या? बस ये सफ़र है निरंतर,
जहाँ ख़्वाब पलते, जहाँ जान ठहरी।
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
बस चलते ही जाना सिखा रहा है।
न मंज़िल ज़रूरी, न पहुँचना ज़रूरी,
ये पल ज़िंदगी का बताए जा रहा है। 

सपनों की दुनिया

रात की चादर ओढ़कर,
आती है सपनों की दुनिया।
खुल जाती है एक खिड़की,
जहाँ हर चीज़ है नई-सी।
कहीं उड़ते हैं हम पंछी बनकर,
नीले आसमान में।
कभी मिलते हैं उन सब से,
जो रहते हैं अब यादों में।
कोई अधूरा सा काम,
पूरा हो जाता है।
कोई भूला हुआ रास्ता,
मिल जाता है।
ये सपने हैं या कुछ और,
जो हकीकत से भी प्यारे हैं।
जब आँखें खुलती हैं सुबह,
तो भी कुछ पल के लिए ये हमारे हैं।
कुछ मीठे हैं, कुछ हैं अजीब,
पर हर सपने में एक कहानी है।
ये सपनों की दुनिया,
दिल को बहुत सुहानी है। 



ज़िन्दगी के सफर में,


ज़िन्दगी के सफर में,
कभी धूप, कभी छांव।
सुबह की सुनहरी किरणें,
जैसे दे रही हों आहट।
दुःख के बादल छाए,
अंधेरा सा छा जाए।
फिर उम्मीद की किरण,
एक नया सवेरा लाए।
कभी पतझड़ आए,
सूखे पत्तों से जीवन भर जाए।
फिर बसंत की बहार,
नये फूल खिल जाए।
कभी तेज़ धूप में,
पसीना बन जाए।
कभी ठंडी छांव में,
सुकून मिल जाए।
इसी तरह ज़िन्दगी चलती जाए,
हँसती, गाती और मुस्कुराती जाए।
कभी धूप, कभी छांव,
यह सब जीवन का हिस्सा बन जाए।


शीर्षक: प्रगति का पाथेय


ज्ञान दीप पुस्तक बनी, मिटा तिमिर अज्ञान।
प्रगति राह प्रशस्त हो, बढ़े मनुज की शान॥
अक्षरों के संग बह रही, उन्नति की रसधार।
पुस्तकों की ओट में, खड़ा सुखी संसार॥

पुस्तक जग की ज्योति अनूप, पाकर खिले ज्ञान का रूप।
जो भी पन्ना प्रेम से खोले, सत्य और विज्ञान ही बोले।
शून्य खोज जब जग को दीन्हा, तब भारत ने गौरव कीन्हा।
बिना ग्रंथ के प्रगति न भाती, कोरी कल्पना हाथ न आती।

ग्रंथ थाम कर हाथ, व्योम की दूरी मापी,
सागर की गहराइ, हृदय की हलचल व्यापी।
लिखी जहाँ इतिहास, वहीं से बढ़ी कहानी,
पुस्तक ही तो आज, विश्व की बनी जवानी।
हर विधा का सार, पृष्ठ पर अंकित मिलता,
जिसने पढ़ा विवेक, प्रगति पथ उस पर खिलता।

मूर्ख बने विद्वान, पुस्तक के सान्निध्य से।
मिले उच्च सम्मान, प्रगति सधे पुरुषार्थ से॥

पुस्तक को आधार कर, बदलो अपनी राह।
लक्ष्य प्राप्त तब ही सधे, मिटे हृदय की दाह॥
मिटे हृदय की दाह, ज्ञान का सूरज उगे।
प्रगति चढे सोपान, आलस्य सभी का भागे॥
कह 'कवि' सुनिये मीत, बने जो उत्तम पुस्तक।
निश्चित ही वह पाय, प्रगति की ऊँची दस्तक॥ 


गीत: भोर का अमृत (ब्रह्म मुहूर्त)


मिटा अंधेरा, हुआ सवेरा, जागो रे इंसान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।
प्रकृति की गोद में अमृत बरसे, शीतल मंद समीर,
यही समय है भाग्य जगाने, तज दो मोह की पीर।

तारों की झिलमिल विदा हो रही, गूंज रहा है मौन,
इस पावन घड़ी को तजकर, सोता है अब कौन?
नसों में बहती नव-स्फूर्ति, मन होता है शांत,
मिट जाते हैं सब संशय, और हृदय के भ्रांत।
पक्षी भी कलरव करते हैं, गाते प्रभु का गान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।

तन-मन को जो निरोग बनाता, बुद्धि को दे विस्तार,
ऋषि-मुनि सब इसी समय में, पाते ज्ञान का सार।
साधक का संबल है यह, विद्यार्थी का वरदान,
एकाग्रचित्त होकर पा लो, वेदों का तुम ज्ञान।
योग और प्राणायाम से, बनता जीवन महान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।

आकाश से गिरती दिव्य रश्मियाँ, सोख रहा संसार,
खुल जाते हैं इसी समय, मोक्ष के पावन द्वार।
परमात्मा से मिलन की घड़ी, सबसे है अनमोल,
अंतर्मन की खिड़की खोलो, सत्य का अमृत घोल।
अंधकार से ज्योति की ओर, बढ़ाओ अपने कदम,
इसी घड़ी में सिद्ध होते हैं, सारे शुभ संयम।

जागो-जागो आलस त्यागो, छोड़ो नींद की खान,
ब्रह्म मुहूर्त में जो जागे, पाए पद और मान। 


गीत: "गीत ही तो जीवन है"

गीत हृदय की धड़कन है, गीत ही मन की प्यास है,
कभी ये बहता आँसू है, कभी मिलन की आस है।
शब्दों के धागे में पिरोई, संवेदना की माला है,
गीत ही सुरमई साया, गीत ही उजियाला है।

गीत सिखाते जीवन नदिया, बहना जिसका काम है,
हर धारा में छिपा हुआ, कोई अनकहा पैगाम है।
वक्त की बेरहम चालों का, यह मौन गवाह बनता है,
टूटे हुए उन सपनों की, यह फिर से राह चुनता है।

कभी ये विरह की रुत बनकर, आँखों से झर जाता है,
कभी चाँद सी सूरत देख, चकोर सा तर जाता है।
पास बुलाती धुन कोई, जब बनके मीठी याद आए,
गीत ही वो जादू है जो, बिछड़ों को पास ले आए।

वतन की खातिर मर मिटने की, ये पावन परिपाटी है,
ये चंदन का तिलक है और, ये बलिदान की माटी है।
थक कर बैठ न ऐ राही, मंज़िल अभी तो बाकी है,
गीत ही संबल बनता है, जब हिम्मत होने लगती फाकी है।

जीना-मरना सब यहीं है, बस यही गीत का सार है,
ये जीवन है धूप-छाँव, कभी जीत तो कभी हार है।
हम मुसाफ़िर हैं चलते जाना, बस यही अपनी कहानी है,
गीत ही अमृत की बूँदें, बाकी सब तो पानी है।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक) 


गीत: नया साल, नया संकल्प


नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
बीत गया जो कल का सपना, नई भोर अब आई है।
आओ मिल कर थामें दामन, नेक नेक इरादों का,
खुद से खुद को बेहतर करने, सुंदर दृढ़ संकल्पों का।

आलस का अब त्याग करेंगे, समय न व्यर्थ गंवाएंगे,
मेहनत की स्याही से अपनी, किस्मत नई सजाएंगे।
सूरज से पहले जागेंगे, ऊर्जा का संचार हो,
अनुशासन हो जीवन में और, कर्मों का जयकार हो।

कटु वचन न बोलें कोई, सबसे मीठी वाणी हो,
मिटे द्वेष और बैर जगत से, सुख की मधुर कहानी हो।
एक वृक्ष हम रोज लगाएंगे, धरती को महकाएंगे,
स्वच्छ रहे परिवेश हमारा, यह संकल्प उठाएंगे।

सीखेंगे कुछ नया रोज हम, ज्ञान का दीप जलाएंगे,
हार मिले तो घबराएं न, फिर से कदम बढ़ाएंगे।
तन को स्वस्थ रखेंगे अपने, मन को पावन रखेंगे,
भीतर जो विश्वास छुपा है, उसको जीवित रखेंगे।

शुभ संकल्पों की शक्ति से, जीवन स्वर्ग बनाएंगे,
नव वर्ष के इस आंगन में, खुशियों के फूल खिलाएंगे।
नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
नया साल है, नया जोश है, नई जीत की बारी है।
_ ललित मोहन शुक्ला गीतकार व लेखक 

गीत: मैं रुकूँगा नहीं (जीत का जुनून)


माना कि राहों में बिछे हैं शूल भारी,
माना कि मुश्किल है आज मेरी ये बारी।
तुलना न कर मेरी दुनिया की ऊंचाइयों से,
मेरे हौसलों ने की है गगन की सवारी।
पंख थके हैं मगर, परवाज़ अभी बाकी है,
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

कभी बैसाखी, कभी पहिया, मेरी पहचान नहीं,
मिट्टी का ये ढांचा ही बस, मेरा जहान नहीं।
जो देख सको तो देखो, मेरी रूह की शिद्दत को,
मुझमें छुपा है सैलाब, मैं कोई शांत तूफान नहीं।
हवाओं से कह दो, अपनी रफ़्तार बढ़ा लें,
मेरी हिम्मत की अब, आगाज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

दुनिया जिसे कमी कहे, मैंने उसे ताक़त माना,
हर ठोकर को मैंने, मंज़िल का इशारा जाना।
छू लूँगा चाँद को मैं, अपने पसीने की धार से,
असंभव के शब्द को मैंने, कभी न पहचाना।
किस्मत की लकीरों को, खुद ही मोड़ दूँगा मैं,
मेरे संघर्षों का, साज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।

मैं गिरूँगा, मैं उठूँगा, पर कभी थमूंगा नहीं,
भीड़ का हिस्सा बनकर, गुमनाम रहूँगा नहीं।
मेरी जीत की गूँज, इतिहास सुनाएगा कल,
मैं वो चिराग़ हूँ जो, तूफानों में बुझेगा नहीं।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक)

गीत: उन्नति की नई डगर


हर खेत में हरियाली हो, हर घर में खुशहाली हो,
मेरे गाँव की माटी अब, सोना उगलने वाली हो।
चलो हाथ से हाथ मिलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए
नन्ही आँखों में सपने हों, और हाथों में किताब रहे,
बेटे-बेटी सब पढ़ें-लिखें, ऊँचा सबका ख़्वाब रहे।
अंधियारा अज्ञान का मिटे, ज्ञान का सूरज चमकाना है,
कौशल की नई राहों से, आत्मनिर्भर बन जाना है।
चलो दीप से दीप जलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!

गलियाँ साफ-सुथरी हों अपनी, आँगन में भी शुद्धि हो,
स्वस्थ रहे हर तन-मन अपना, तभी तो बढ़ती बुद्धि हो।
नीम की ठंडी छाया हो, और शुद्ध पवन का घेरा हो,
बीमारी का नाम न हो, खुशियों भरा सवेरा हो।
चलो कदम से कदम बढ़ाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!

हल के साथ अब जुड़ जाए, विज्ञान की नई शक्ति भी,
मेहनत और लगन के साथ, हो कर्म की सच्ची भक्ति भी।
जात-पात के भेद मिटें, बस भाईचारा साथ रहे,
तरक्की की इस दौड़ में, सबका सबके हाथ रहे।
चलो प्रेम की गंगा बहाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए! 


गीत का शीर्षक: तुम्हारी पसंद


जो तुम्हारे लब न कह पाए, वो बात लिखूँगी/लिखूँगा
तुम्हारी आँखों में ठहरी, हर एक जज़्बात लिखूँगी।
पसंद क्या है तुम्हें, बस यही तो जानना है,
तुम्हारे मन की ज़मीं पर, अपनी कायनात लिखूँगी।

वो बारिश की बूंदें, या ठंडी हवा का झोंका
वो बचपन की यादें, या अपनों का भरोसा।
तुम्हें शामें पसंद हैं, या ढलती हुई धूप,
बताओ न क्या भाता है, तुम्हें ख़ुद का ही रूप?
जो तुम चाहो, वही ख़्वाबों की बारात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी हर मुलाकात लिखूँगी।
कभी ख़ामोश रहकर भी, जो तुम कहना चाहो
मेरे कांधे पे सर रखके, जो तुम बहना चाहो।
वो पुराने से नग़मे, या सावन का कोई गाना
मुझे अच्छा लगता है, तुम्हारा यूँ मुस्कुराना।
तुम्हारे दिल की धड़कन की, हर बिसात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी सारी कायनात लिखूँगी।
दुनिया की बातें छोड़ो, बस अपनी बात करेंगे,
तुम जिसे पसंद करो, हम बस वही बात करेंगे। 


शीर्षक: मिलन का उत्सव


थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
आए हो तुम पास मेरे, तो महक उठा है आंगन,
आज हुआ है पूरा जैसे, कोई अधूरा बंधन।

पास बैठो तो वक्त की लहरें, जैसे ठहर सी जाती हैं,
खामोशियाँ भी कानों में, मीठी गजलें गाती हैं।
दुनिया का हर शोर सुहाना, संगीत जैसा लगता है,
तुम्हें देख लूँ एक नजर, तो रोम-रोम ये जगता है।
हृदय के सूने उपवन में, आई प्रेम-मल्हार,
छलक उठा है सागर जैसे, पाकर अपना किनारा।

हाथों में जो हाथ लिया, तो मिट गईं सब दूरियां,
अब न कोई शिकवा बाकी, न कोई मजबूरियां।
ऐसा लगता है जैसे हम, बादलों पर चलते हैं,
एक ही सांचे में ढलकर, हम दोनों अब ढलते हैं।
तुम मिल गए तो मिल गया, खुशियों का ये संसार,
अमर रहे ये पल हमारे, अमर रहे ये प्यार।

थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक) 


सुबह की चाय और 'ठंडी' चेतावनी

कपकपाती ठंड है, और रजाई में हम दुबके हैं,
ख्वाबों में गरम समोसों के, हम कब से अटके हैं।
तभी कान में गूंजी एक आवाज़, जैसे कोई हुंकार हो,
"उठो जी! क्या इरादा है? या फिर बस मेरा इंतज़ार हो?"
मैंने कहा, "ए प्रिये! ज़रा बर्फ की नज़ाकत तो देखो,
बाहर कोहरा घना है, रजाई की इस इबादत तो देखो।"
वो बोलीं, "नज़ाकत गई तेल लेने, उठो और ज़रा हाथ बटाओ,
चाय पीनी है अगर, तो पहले अदरक कूट कर लाओ।"
कांपते हाथों से मैंने, जब अदरक को कूटा है,
लगा जैसे रजाई से मेरा, जन्मों का रिश्ता छूटा है।
किचन में वो खड़ी थीं, जैसे सेना की कोई जनरल हों,
मैं खड़ा था सामने ऐसे, जैसे फ्यूज़ हुआ कोई बल्ब हूं।
चाय की प्याली हाथ में आई, तो रूह को चैन मिला,
पर पत्नी बोलीं, "सुनो जी! शक्कर कम है, ये लो ज़िला।"
मैंने घूंट भरा और कहा, "शक्कर की ज़रूरत क्या है भला?
तुम्हारी बातों की कड़वाहट ही, मेरा असली गला जला!"
बस फिर क्या था...
चाय की चुस्की तो रह गई, पर 'गरमा-गरम' भाषण शुरू हुआ,
ठंड तो भाग गई तुरंत, पर घर में 'इतिहास' का रण शुरू हुआ।
अब रोज़ सुबह ठंड में, मैं चुपचाप चाय बनाता हूं,
बिना चीनी के भी उसे, "बड़ी मीठी है" कह कर पी जाता हूं।
ललित मोहन शुक्ला _( लेखक, कवि व गीतकार) 

पत्नी और ऋतु परिवर्तन



बदला मौसम, खिली धूप, तो पत्नी ने ली अंगड़ाई,
बोली— "सुनिए, संदूक से निकालो मेरी रेशमी रजाई!"
अभी रजाई निकली ही थी कि सूरज ने तेवर दिखाए,
वो बोली— "बड़ी गर्मी है, कूलर के खस कौन बदलवाए?"
बस यही है जीवन का चक्र...
जब आती है नन्हीं सी फुहार, वो रूमानी हो जाती है,
"पकौड़े तल दो" कह-कह कर, मेरी शाम खा जाती है।
बाहर गिरती है बारिश, घर में बेसन का घोल गिरता है,
और रसोई का सारा काम, मेरे ही सिर पड़ता है!
फिर आई पतझड़, गिरे पत्ते, तो उनका मूड भी उखड़ा,
कहने लगीं— "बेजान है चेहरा, देखो मेरा मुखड़ा।"
पार्लर की ऋतु आई ऐसी कि बजट सारा डोल गया,
मेरा बटुआ बेचारा, पतझड़ के पत्तों सा छिल गया।
अब कड़ाके की ठंड आई, तो नया क्लेश शुरू हुआ,
"पिछली साल वाला स्वेटर, अब पुराना और थ्रू हुआ!"
मैडम को चाहिए वेलवेट, मफलर और पश्मीना,
हमें तो फटे कंबलों में ही, अब होगा जीना।

मौसम तो बस साल में, चार बार ही बदलते हैं,
पर पत्नी के मिजाज यहाँ, हर घंटे रंग बदलते हैं।
कुदरत के बदलाव पर तो, मौसम विभाग की नजर है,
पर पत्नी कब बदल जाए... ये तो बस 'ऊपर वाले' को खबर है! 

गीत: समर्पण की लौ 


तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं।
न यह प्यास है, न यह आस है, बस तेरा ही एक अहसास है,
प्रेम की इस दहलीज पर, तू भक्ति है, तू ही प्यास है।

जैसे मंदिर की मूरत में, सादगी मुस्कुराती है,
तेरी सूरत की किरणों से, मेरी सुबह जगमगाती है।
तुझे सोचना ही पूजा मेरी, तुझे माँगना इबादत है,
मेरे दिल के सूने आँगन में, बस तेरी ही हुकूमत है।
मेरी बंदगी, मेरी हर ख़ुशी, तुझसे ही है आबाद,
तू रूह की है आरज़ू, तू ही है दिल की मुराद।

कोई नाम दूँ मैं प्रीत को, या कहूँ इसे आराधना,
तू साज़ है मेरे मौन का, तू ही मेरी साधना।
न दुनिया का कोई शोर है, न ख़्वाबों का कोई जाल है,
जहाँ तू है मेरे रूबरू, वहीं ज़िंदगी बेमिसाल है।
जैसे दीप जले बिन बाती के, अधूरा है श्रृंगार,
वैसे तुझ बिन सूना है मेरा, यह छोटा सा संसार।

तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं... 


भजन: मेरे साँवरे सरकार


साँवरिया तेरी वंशी की धुन, मन को बड़ा लुभाती है।
नैनों में तेरी मूरत है, हृदय में ज्योत जगाती है॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
मेरे गिरधर नागर, तेरी जय-जयकार...

मुरली अधर पर सजी हुई है, मोर मुकुट सिर सोहे।
तेरी मंद-मंद मुस्कावन ने, जग के संकट मोहे॥
तू ही तो है पालनहारा, तू ही है जग का आधार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...

यमुना तट पर रास रचाया, गोपिन के मन भाये।
माखन चोरी करके कान्हा, सबको खूब हँसाये॥
जिसने भी तेरा नाम लिया, उसका बेड़ा पार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...

अर्जुन के तुम सारथी बनके, गीता ज्ञान सुनाया।
भक्त सुदामा की कुटिया को, महलों सा चमकाया॥
शरण पड़े जो तेरी प्रभु, उसे मिले अपार प्यार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
समापन
हे नंदनंदन, हे यदुनंदन, चरणों में स्थान देना।
भूल-चूक सब माफ़ हमारी, अपनी शरण में लेना॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक) 


गीत: अंतर्मन की गूँज

ओ... ओ...
शांति का सागर हूँ मैं, शक्ति का अवतार हूँ
स्वस्थ काया, शुद्ध मन, प्रेम का विस्तार हूँ।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ
हर रिश्ते में घुली हुई, सुखद एक परमात्मा हूँ।

बाहर चाहे शोर हो, भीतर गहरा मौन है
स्वयं को जो जान ले, फिर डराता कौन है?
संकल्पों में तेज है, न डर है न कोई भ्रांति है,
मेरे हर एक श्वास में, बस सुकून और शांति है।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...

न कोई द्वेष मन में है, न कोई शिकवा-गिला
हर रूह में है अक्स मेरा, जिससे भी मैं हूँ मिला।
सम्मान और स्नेह से, महक रहा मेरा हर चमन,
मेरे रिश्ते सबसे सुंदर हैं, खिल रहा जैसे मधुबन।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...

दिव्य किरणों से भरी, मेरी ये काया निर्मल है
चेतना की अग्नि में, जल गया हर छल है।
निरोग मेरा भाग्य है, आनंद ही मेरी राह है,
पूर्णतः स्वस्थ हूँ मैं, बस यही मेरी चाह है।

मै शांत... मै शक्ति... मै स्वास्थ्य हूँ...
मेरे हर रिश्ते में... बस प्यार ही प्यार है।
ललित मोहन शुक्ला (लेखक , कवि व गीतकार) 

चाचा की 'व्हाइट हाउस' वाली चाय

ट्रम्प चाचा ने कस ली कमर, बोले— "अब तो खेल करेंगे,
मादुरो को वेनेजुएला से, हम सीधे पिकअप करेंगे।"
ट्विटर वाली उंगली चमकी, बोले— "सुन लो निकोलस भाई,
बहुत जी लिए राजमहल में, अब खाओ अपनी ही मलाई।"
चाचा ने फेंका 'सैंक्शन' का पासा, बोले— "ये है मेरा स्टाइल,
तेल तुम्हारा बंद करेंगे, चाहे तुम दो मीठी स्माइल।"
मादुरो बोले— "हम न डरेंगे, हम भी पक्के जिद्दी हैं,
अमेरिका के आगे हम तो, नहीं छोटी सी गिद्दी हैं।"
ट्रम्प चाचा ने फोन घुमाया, बोले— "पेंपियो, जरा आना,
मादुरो के लिए एक बढ़िया सा, विदाई पत्र बनाना।"
इधर से 'गुआदो' को उकसाया, उधर से फेंकी जादुई छड़ी,
मादुरो की कुर्सी के नीचे, चाचा ने लगा दी फुलझड़ी।
दुनिया बोली— "अरे चाचा, ये तो बड़ा भारी पंगा है,"
चाचा बोले— "चिंता मत करो, मेरा इरादा चंगा है।
लोकतंत्र की खातिर हमने, ये नया खेल रचाया है,
मादुरो को घर भेजने का, हमने ही प्लान बनाया है।"
चाचा की हुंकार थी तगड़ी, मादुरो थोड़े डोल गए,
पर कुर्सी को ऐसा पकड़ा, कि सारे ताले खोल गए।
उठाने की कोशिश तो खूब हुई, जैसे 'कैब' की हो सवारी,
पर मादुरो भी निकले ढीठ, चालाकी सब पर पड़ी भारी। 

गीत: शिखर की ओर


अंधियारे को चीर के अब, एक नई भोर लानी है,
खुद को गढ़ना है फिर से, नई इतिहास सजानी है।
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में,
चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में।

पहला कदम है खुद को पढ़ना, मन के भीतर झाँकना,
कितनी ताकत छिपी हुई है, अपनी रूह को आँकना।
कमजोरी को ढाल बना लें, डर को पीछे छोड़ दें,
जिधर खड़ी हो मंजिल अपनी, राहों को उस ओर मोड़ दें।
मृदुल भाव से मुस्कुराकर, गम को हमें भुलाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।

राहों में काँटे बिखरे हों, या आएँ तूफ़ान खड़े,
हौसलों के तरकश में लेकिन, तीर हों सबसे बड़े।
गिरना भी एक सीख है साथी, गिरकर फिर से उठना सीख,
दुनिया झुकती है कदमों में, मत माँग किसी से भीख।
पसीने की हर एक बूँद से, अपना भाग्य सजाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।

पहुँचें जब हम शिखर पे जाकर, अंबर को भी चूम लें,
पर जमीन से रिश्ता ना टूटे, मस्ती में हम झूम लें।
खुशहाली वो नहीं जो केवल, ऊँचे महलों में दिखे,
सच्ची बुलंदी वो है जो, औरों के आँसू पोंछना सीखे।
प्रेम भाव की खुशबू से अब, जग को हमें महकाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, लक्ष्य हमें अब पाना है।

चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में,
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में। 

गीत: सनातन का गौरव गान


आदि अनंत है, शिव सा शांत है, सत्य सनातन की धारा।
ऋषियों की तपस्या, मुनियों का चिंतन, जग में सबसे प्यारा॥
हिमगिरि जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारे।
पुण्य भूमि यह भारत माता, हम सब इसके तारे॥

वेदों की ऋचाओं में गूंजे, उपनिषदों का सार यहाँ।
कर्मयोग की गीता गाई, कृष्ण का दिव्य प्रचार यहाँ॥
अहिंसा का पथ, सत्य की शक्ति, राम का आदर्श महान।
त्याग और तप की वेदी पर, अर्पित है सबका सम्मान॥
सत्य सनातन धर्म हमारा, मानवता का है वरदान॥

गंगा की कल-कल में बहती, शुचिता और पवित्रता।
मंदिर के घंटों में बसती, अपनी सादगी, कोमलता॥
कुंभ का मेला, दीपों का उत्सव, पर्व यहाँ हर रंग में।
भक्ति भाव की गूँज सुनाई, देती है अंग-अंग में॥
सभ्यता की यह अमर कहानी, अंकित है कण-कण में॥

विविध वेष और विविध बोलियाँ, फिर भी एक ही प्राण है।
वसुधैव कुटुंबकम् ही, इस मिट्टी की पहचान है॥
उठो संतानों, जागो वीरों, फिर से जग को ज्ञान दें।
विश्व गुरु बन भारत चमके, ऐसा हम वरदान दें॥
जय सनातन, जय हो भारत, गूँजे यह जयगान है॥
ललित मोहन शुक्ला 
(कवि, गीतकार व लेखक) 

गीत: रिश्तों की डोर


रेशम की डोरी है, मन का ये मेल है,
रिश्तों की छाँव में, खुशियों का खेल है।
हो कोई अपना तो, मंज़िल भी पास है,
जीवन की बगिया में, ये ही तो प्यास है।
महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो।

मिट्टी के घरों को, ये महलों सा करते हैं,
खाली से जीवन में, रंगों को भरते हैं।
दुख की कड़ी धूप में, ठंडी ये फुहार हैं,
थक जाए राही जब, तो यही सहारा हैं।
सच्चे हों नाते तो, ईश्वर का रूप हैं,
इनसे ही खिलती, ये सुनहरी सी धूप है।

थोड़ा सा झुक जाना, थोड़ा सा सह लेना,
दिल में न रख कोई, खुल के ही कह लेना।
अहम (ego) की दीवारों को, मिलकर गिराना तुम,
रूठे अगर कोई, हँस कर मनाना तुम।
वक़्त की फुर्सत का, तोहफा दिया करो,
रिश्तों की क्यारी में, उम्मीदें बोया करो।

कड़वे जो बोल हों, शहद सा घोल दो,
बंद जो द्वार हों, प्यार से खोल दो।
रिश्ते वो मोती हैं, जो फिर न मिलेंगे,
सहेजोगे गर इन्हें, तो फूल ही खिलेंगे।
चलो आज फिर से, हम हाथ थाम लें,
रिश्तों की बंदगी का, मिल कर नाम लें।

महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो। 


गीत: जीत की राह


मैदानों की मिट्टी बोले, मन में भर लो विश्वास,
खेल सिखाते जीवन जीना, जगाते नई एक आस।
सफलता के इस महाकुंभ में, आओ हम सब मिल जाएँ,
हर खेल से एक गुण सीखें, अपना भाग्य बनाएँ।

फुटबॉल की सतरंगी दुनिया, हमको यह बतलाती है,
अकेले कोई जीत न पाता, 'एकता' काम आती है।
पास (Pass) बढ़ाओ, ताल बिठाओ, गोल तभी हो पाएगा,
मिलकर चलना सीख लिया तो, जग तेरे संग गाएगा।

क्रिकेट के मैदान में देखो, पिच पर टिकना पड़ता है,
बड़ी पारी खेलने को, 'धैर्य' सदा ही गढ़ता है।
कभी बाउंसर, कभी गुगली, संयम मत तुम खोना,
धैर्य रखोगे अंत तलक तो, होगा सफल सलोना।

टेनिस के उस कोर्ट में देखो, नज़रें गेंद पर टिकी रहें,
'एकाग्रता' (Focus) ही मंत्र यहाँ है, लहरें कितनी भी उठें।
पलक झपकते बाजी पलटे, मन को बस में रखना तुम,
लक्ष्य की रेखा पार करोगे, एकाग्रता से बढ़ना तुम।

दौड़ रही है दुनिया सारी, एथलीट से यह सीखो,
'अनुशासन' के सांचे में, हर दिन खुद को तुम लिखो।
समय की पाबंदी और पसीना, पदक गले लगवाएगा,
अनुशासन जो पाल लिया तो, शिखर हाथ में आएगा।

शतरंज की बिसात बिछी है, चालें अपनी सोच समझ,
'बुद्धिमानी' और दूरदृष्टि, देती है जीत की समझ।
मुश्किल में भी राह निकालना, हार न कभी मानना,
दिमाग की इस शक्ति को तुम, सफलता का आधार जानना।

हार मिले तो साहस रखना, जीत मिले तो मान रहे,
खेल ही तो वह आईना है, जिसमें अपनी पहचान रहे।
उठो चलो और खेलो ऐसे, कि दुनिया तुम्हें सलाम करे,
सफलता के हर खेल में, बस तुम्हारा ही नाम रहे। 


क्रिकेट और जिंदगी: डटे रहो पिच पर!

जिंदगी की पिच पर भैया, सावधानी से बैटिंग करना,
यहाँ 'बॉलर' है वक्त तुम्हारा, गुगली से तुम मत डरना।
कभी दुखों की 'बाउंसर' आएगी, कभी सुखों का 'फुलटॉस',
पर डटे रहोगे क्रीज पर, तभी मनेगा जीत का जश्न खास।
पड़ोसी है 'थर्ड अंपायर', हर गलती पर उंगली उठाएगा,
रिश्तेदार हैं 'फील्डर' जैसे, कैच लपकने को हाथ बढ़ाएगा।
पर तुम घबराना मत दोस्त, चाहे 'स्लेजिंग' करे जमाना,
तुम्हें तो बस अपनी धुन में, 'हेलीकॉप्टर शॉट' है लगाना।
कभी किस्मत 'नो बॉल' देगी, तो 'फ्री हिट' पर चांस मारना,
अगर 'डक' पर आउट हो जाओ, तो रोकर हिम्मत मत हारना।
क्योंकि ये 'टेस्ट मैच' है लंबा, यहाँ हर दिन नया सवेरा है,
आज अगर तुम 'जीरो' हो, तो कल शतक भी तेरा है।
पेट निकला हो या बाल उड़े हों, बस 'स्ट्राइक' रोटेट करते रहो,
जिंदगी का 'रन रेट' चाहे जो हो, चेहरे पर मुस्कान भरते रहो।
क्योंकि अंत में स्कोरबोर्ड नहीं, ये देखा जाएगा मेरे भाई,
कि हारने के डर से भागे थे, या लड़कर की थी तुमने विदाई! 

गीत: राही और राह


मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है।
किस ओर मुड़ें, क्या मोड चुनें, ये मन का भ्रम मिटाता चल,
दिखा दे जो सही दिशा, उस रौशनी को पाता चल।

कभी ऊबड़-खाबड़ राहें होंगी, कभी काँटों का घेरा होगा,
पर याद रख ऐ मुसाफिर, हर रात के बाद सवेरा होगा।
कदमों के नीचे धूल नहीं, ये तो अनुभव की थाती है,
दिशा वही है सच्ची, जो मंज़िल को पास बुलाती है।
मंजिल की कोई फिक्र नहीं...

हवाएँ हमसे पूछेंगी, किधर को तेरा ठिकाना है?
कह देना कि बहना ही, बस मेरा एक बहाना है।
नक्शों में जो न मिले कभी, वो रास्ता दिल से जाता है,
जो खुद पर रख ले यकीन, वही सही दिशा को पाता है।

कहीं झरने कल-कल गाते हों, कहीं पेड़ों की ठंडी छाँव मिले,
उसी डगर पर बढ़ना तुम, जहाँ प्यार भरा कोई गाँव मिले।
रास्ता ही अब हमसफर है, रास्ता ही अब मीत है,
सफर का हर एक लम्हा ही, जीवन का मधुर संगीत है।

मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है। 

गीत: गौरव की भाषा हिन्दी


भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष) 

गीत: श्रम की मशाल


उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
पसीने की हर बूंद में, सृजन की एक बात है।
न थकना है, न रुकना है, ये संकल्प महान है,
श्रमिक के ही कंधों पर, टिका ये जहान है।
जय श्रम! जय श्रमिक! तुम युग के निर्माता हो।

तुमने काटीं चट्टानें, तो राहें निकल आईं,
तुमने सींचा मरुथल, तो फसलें लहलहाईं।
ये ऊँची अट्टालिकाएँ, ये कल-कारखाने सब,
तुम्हारी ही उँगलियों ने, रची है ये दुनिया अब।
लोहा तुम जब गलाते हो, तो रूप नया ढलता है,
तुम्हारे ही पसीने से, प्रगति का पहिया चलता है।

नहीं याचना हाथ में, पुरुषार्थ का संबल है,
मेहनत की रोटी में ही, छिपा असली संबल है।
धूप हो या छाँव हो, तुम अडिग हिमालय से,
रोशनी तुम लाते हो, श्रम के देवालय से।
मिट्टी से सोना उपजाना, तुम्हारा ही तो काम है,
हर ईंट जो तुमने रखी, उस पर तुम्हारा नाम है।

हाथ से जो हाथ मिले, तो शक्ति बन जाती है,
सहयोग की एक लहर, तकदीर बदल जाती है।
थक हार के बैठो मत, अभी लक्ष्य दूर है,
आने वाला कल तुम्हारा, तुम कल के नूर हो।
अंधियारे को चीर कर, नया दौर लाएंगे,
श्रम की पावन मशाल से, जग को जगमगाएंगे।

उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
श्रमिक के ही स्वाभिमान में, गौरव की गाथा है।
जय श्रम! जय श्रमिक! 


गीत: गौरव की भाषा हिन्दी


भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष) 

गीत: "मंजिल की ओर चल"


उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है,
सोए हुए इस कौम के मन में, विश्वास फिर से जगाना है।
न रुकना है, न थकना है, बस बढ़ते ही जाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

विवेकानंद की वाणी का, तुम पावन मंत्र दोहराओ,
'उठो, जागो और लक्ष्य की' राहों पर तुम कदम बढ़ाओ।
शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम सागर से भी गहरे हो,
तुम सूर्य की उज्ज्वल किरण हो, तुम साहस के पहरे हो।
अज्ञान का अंधियारा तजकर, ज्ञान का दीप जलाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

बाधाएं आए राहों में, तो तुम बन जाओ हिमालय,
संघर्षों की आग में तपकर, बनो स्वयं ही देवालय।
जाति-पाँति का भेद मिटाकर, प्रेम का पाठ पढ़ाएंगे,
हाथों में लेकर हाथ हम, नव-युग का दीप जलाएंगे।
आलस की जंजीरें तोड़ो, समय की मांग निभाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

तुम कल के कर्णधार हो, तुम ही देश की धड़कन हो,
तुम्हारी आँखों में सपने, और रगों में देशभक्ति का गुंजन हो।
आकाश को तुम छू लो पर, पाँव जमीन पर टिके रहें,
संस्कारों की इस मिट्टी के, संस्कार कभी न मिटें रहें।
युवा शक्ति का परचम अब, जग में हमें फहराना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।

उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है...
मंजिल की ओर चल... तू मंजिल की ओर चल! 

फूलों की मुस्कान

कांटों की गोद में पलकर भी,
जो अपनी मुस्कान नहीं खोते।
पत्थरों के बीच जगह बनाकर,
जो जीवन के बीज हैं बोते।
धूप तपन हो या झमाझम बारिश,
हर हाल में वे मुस्काते हैं।
खुद को बिखेर कर खुशबू में,
जग को महकना सिखाते हैं।
कभी न देखा फूलों को,
अपनी किस्मत पर रोते हुए।
वे तो बस खिलना जानते हैं,
सब कुछ अर्पण करते हुए।
सीख यही है जीवन की,
चाहे राहों में कितने हों शूल।
हौसला ऐसा रखो हृदय में,
कि तुम भी बन जाओ एक फूल।
ना गिरने का डर हो मन में,
ना मुरझाने का कोई शोक।
अपनी खुशबू ऐसी फैलाओ,
कि नतमस्तक हो सारा लोक।

ललित मोहन शुक्ला ( लेखक व रचनाकार)

मिजाज-ए-इश्क

"सलीका तुम ने सीखा ही नहीं शायद मोहब्बत का,
चाय ठंडी हो गई... और तुम अभी तक सोच रहे हो।"

 "इक कप चाय दो प्यालों में बराबर बाँट कर,
हमने अक्सर रंजिशों की बर्फ पिघलते देखी है।"
 "वो चाय की चुस्कियाँ, वो यादों का कारवाँ,
शाम ढलते ही अक्सर, महफ़िल जम जाती है।"


 "रिश्तों की मिठास बढ़ानी हो तो बस इतना करना,
 चीनी कम रखना और चाय साथ बैठ कर पीना।"

ललित मोहन शुक्ला (विश्व चाय दिवस पर विशेष) 


🌸 आया बसन्त, मचा हुड़दंग! 🌸


लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त!
कलियों ने घुँघरू बाँध लिए,
भँवरों ने सुर का साथ दिया,
मस्ती में झूमे हर कोई यहाँ,
जैसे धरती ने कोई ख़्वाब लिया!

पीली-पीली सरसों देखो, खेतों में मुस्काती है,
कोयल रानी अमवा की डाली पर तान सुनाती है।
हवा चली ऐसी मतवाली, जैसे कोई जादू कर डाला,
फूलों ने पहना है देखो, लाल-गुलाबी चोला निराला।
शरम छोड़कर नाचे दुनिया, छोड़ो अब तुम भी ये गम,
संग हमारे थिरको प्यारे, छम-छम, छम-छम, छम-छम!

सूरज की किरणों ने आकर, ओस की बूंदें चुराई हैं,
ठंडी-ठंडी रातों ने अब, अपनी विदाई गाई है।
नदी किनारे पछुवा बोले, गूँज उठा है सारा गाँव,
आओ सखियों पींग बढ़ाएँ, झूला डालें बरगद छाँव।
मस्त कलंदर हुए हैं सारे, मौसम बड़ा चंगा है,
दिल की पतंगें उड़ रही ऊँची, उड़ान बड़ी नौरंगा है!

ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा, सब मस्त मगन इस बेले में,
आओ खो जाएँ हम सब मिलकर, कुदरत के इस मेले में।
लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त! 

गीत: आया पर्व संक्रांति का


लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।
तिल-गुड़ की मीठी बोली है, मन में छाई खुशहाली है,
सूरज की स्वर्णिम किरणों ने, हर आँगन दीवाली है।

पीली सरसों लहराती है, खेतों में सोना उग आया,
कोयल की कूक ने कानों में, वसंत का राग सुनाया।
शीत की विदा की वेला है, गुनगुनी धूप मन भाती है,
नदियों के पावन तट पर देखो, श्रद्धा शीश झुकाती है।

खिचड़ी की सोंधी खुशबू से, घर-घर महक रहा सारा,
दान-पुण्य और सेवा का, बहता पावन अमृत धारा।
'तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला', प्रेम का मंत्र सिखाया है,
आज ऊंच-नीच के भेदों को, सबने मिलकर बिसराया है।

वो काटा... वो मारा... की गूँज रही छत-छत टोली,
रंग-बिरंगी पतंगों ने, अम्बर में खेली होली।
भारत की सतरंगी संस्कृति, आज एक सुर में गाती है,
संक्रांति की ये मधुर छुअन, रिश्तों में मिठास बढ़ाती है।

लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।

गीत: धर्म की राह, कर्म का साथ

धर्म हृदय की ज्योति है, और कर्म हाथ की शक्ति,
इन दोनों के संगम में ही, छिपी प्रभु की भक्ति।
धर्म सिखाता जीना कैसे, कर्म सिखाता बढ़ना,
सच्चे मन से इस दुनिया में, अपना दायित्व गढ़ना।

सिर्फ जपना नाम नहीं है धर्म का असली सार,
दीन-दुखी की सेवा करना, सबसे बड़ा उपकार।
धर्म अगर है नींव जगत की, कर्म है सुंदर द्वार,
बिना किए कुछ हाथ न आए, कहते सब शास्त्रार्थ।
धर्म दीप है राह दिखाने, कर्म डगर का पाँव,
इनके बिना न मिल पाएगी, सुख की शीतल छाँव।

मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे में धर्म को मत तुम ढूँढो,
अपने भीतर सोए हुए उस इंसान को तुम ढूँढो।
पसीने की हर एक बूँद में, ईश्वर का वास है होता,
वही हाथ हैं पावन सबसे, जो बीज प्रेम का बोता।
कर्म बिना सब ज्ञान अधूरा, धर्म बिना सब अंधा,
सत्य कर्म ही काट सके इस भव-सागर का फंदा।

धर्म हमारी मर्यादा है, कर्म हमारी पहचान,
दोनों मिलकर ही बनाते, मानव को इंसान।
यही सार है जीवन का, और यही है मधुर संदेश,
धर्म-कर्म को जोड़ के देखो, मिट जाएँगे क्लेश।

गीत: बहारों की मंज़िल


हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
कहाँ है वो दुनिया, जहाँ प्यार है,
जहाँ हर तरफ बस खिली ही बहार है?
हम चल पड़े हैं वहीं की डगर,
जहाँ प्यार की है सुहानी डहर...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

ये फूलों की खुशबू, ये भौरों का गाना,
जैसे सुनाए कोई पुराना अफ़साना।
नदियों के बहते हुए पानी की कल-कल,
हौले से दिल में मचाती है हलचल।
न कोई फ़िक्र हो, न कोई डगर हो,
बस तू साथ हो, और हसीं सफ़र हो।
मंजिल पे अपनी मिलेगा ये दिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

जहाँ नीले अम्बर तले शाम ठहरे,
जहाँ यादों के पहरे हों थोड़े सुनहरे।
हल्की सी ओस और मद्धम सी धूप,
निखरा हो जिसमें तेरा ही रूप।
ख्वाबों के पंखों पे उड़ते चलें,
सारे ज़माने से लड़ते चलें।
होगा मुकम्मल वहीं अपना मिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।

हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
ललित मोहन शुक्ला (रचनाकार) 

शीर्षक: प्रेम ही मेरी बंदगी


ओ... ओ...
प्रेम एक पावन गंगा की धारा,
प्रेम ही मन का उजियारा।
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काबा के धाम में,
मिलेगा खुदा बस प्रेम के ही नाम में।
प्रेम एक आराधना है, प्रेम ही उपासना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

बिन बोले जो सब कुछ कह दे, वो भाषा है प्रेम,
बिना छुए जो रूह को छू ले, वो एहसास है प्रेम।
जैसे मीरा ने मोहन को पाया, बस नाम पुकार के,
जैसे राधेश्याम बसे हैं, एक दूजे को हार के।
ये मीरा की मस्ती है, ये राधा की भावना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

धूप-दीप और फूल नहीं, बस श्रद्धा का एक तार हो,
जीवन की हर सांस का, बस प्रेम ही आधार हो।
जहाँ स्वार्थ का अंत हो, वहीं से शुरू खुदा,
प्रेम ही है वो इबादत, जो करे न कभी जुदा।
हर धड़कन की लय में है, प्रभु की ही प्रार्थना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...

जहाँ प्रेम है, वहां शांति है,
जहाँ प्रेम है, वहां मुक्ति है।
प्रेम ही आदि, प्रेम ही अंत,
प्रेम ही सत्य, प्रेम अनंत...
प्रेम ही मेरी बंदगी, प्रेम ही उपासना। 

गीत: बहारों की नई सरगम


लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

गीत: "जीवन की डोर और उम्मीदों की पतंग"


नीले नभ के आंगन में, आज सतरंगी मेला है,
हर दिल में इक अरमान है, कोई न यहाँ अकेला है।
संकट की तीखी हवाओं से, जो लड़ना सीख जाती है,
वही पतंग मकर की धूप में, ऊँचाइयां पाती है।

बिना हवा के थपेड़ों के, पतंग कहाँ उड़ पाती है?
जीवन की मुश्किलें भी, हमें ऊपर ले जाती हैं।
ढेर सारी कन्ने कस लो, तुम अटूट विश्वास के,
थमना नहीं है डरकर तुमको, झोंकों के उपहास से।
जैसे ढील और खींच का, संगम उड़ान भरता है,
वैसे ही संयम जीवन में, हर मुश्किल को हरता है।

आसमान की होड़ में, गर पेंच कभी लड़ जाए,
कट जाए उम्मीद की डोर, या मन थोड़ा घबराए।
गिरना अंत नहीं है उसका, फिर से उसे संवरना है,
अगली सुबह नई उड़ान का, फिर संकल्प उभरना है।
कटी पतंग भी सिखाती है, कि मिट्टी से जुड़ना होगा,
आसमान को छूने के लिए, फिर शून्य से मुड़ना होगा।

तिल-गुड़ की उस मिठास सा, रिश्तों में प्यार घोलना,
ऊँची उड़ान के लालच में, अपनों को न छोड़ना।
जब तक हाथ में संयम है, और नीयत साफ तुम्हारी है,
यकीन मानो इस अंबर पर, सिर्फ जीत तुम्हारी है।
उड़ो शिखर तक तुम ऐसे, कि खुद मिसाल बन जाओ,
इस संक्रांति तुम भी अपनी, किस्मत की पतंग लहराओ।
(उपसंहार)
तो काटो गम की डोर को, और खुशियों का पेच बढ़ाओ,
आया है संक्रांति का पर्व, अपनी मंजिल को पा जाओ!
ललित मोहन शुक्ला ( शब्द शिल्पी) 

शीर्षक: राह तू अपनी बनाए जा

 
अंधेरों की फिक्र न कर, तू खुद एक सवेरा है
ये रास्ते भी तेरे हैं, और ये आसमान तेरा है।
थक कर न बैठ ए मुसाफिर, अभी तो उड़ान बाकी है
ज़मीन खत्म हुई तो क्या, अभी पूरा आसमान बाकी है।
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो,
मंजिल की ओर कदम धरो।
तूफानों से टकराना सीखो,
खुद अपनी राह बनाना सीखो।

कांटों भरी डगर मिलेगी, पांव तेरे डगमगाएंगे
अपनों के ताने, जग की बातें, तुझको बहुत डराएंगे।
पर तू अपनी धुन का पक्का, दिल में एक विश्वास जगा
गिरी हुई हर उम्मीद को, फिर से तू आज़ाद बना।
मुश्किलों को कह दे तू, मेरा हौसला भी गहरा है
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...

सूरज की तपिश को सहकर ही, कुंदन चमक बिखेरता है
सागर की लहरों से लड़कर ही, मांझी किनारा पाता है।
बीता कल अब बीत गया, उसकी धूल को झाड़ दे
आने वाले कल के पन्नों पर, तू अपनी जीत गाड़ दे।
न रुकना है, न झुकना है, बस जीत का दम तू भरे जा
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...

तेरी मेहनत की गूंज एक दिन, सारा जग ये गाएगा
तू आज अगर न हारा, तो कल इतिहास बनाएगा।
आगे बढ़ो!
ललित मोहन शुक्ला ( लेखक , गीतकार एवं कवि) 


शीर्षक: सृष्टि का पैगाम


नीले नभ से उड़ते पंछी, लाते एक पैगाम हैं,
बहती नदियां, झूमते जंगल, सबका यही कलाम है।
धरती की इस पावन गोद में, हर जीवन मुस्काए,
शांति, प्रेम और भाईचारे का, स्वर गूंजता जाए।

पशुओं की उन मूक आँखों में, करुणा का पैगाम छुपा,
पेड़ों की शीतल छाया में, निस्वार्थ दान का नाम छुपा।
कल-कल करती जल की धारा, कहती—"चलना जीवन है",
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, महकता अपनापन है।
हर कोंपल एक संदेश सुनाती, नवजीवन की आशा का,
प्रकृति कभी न भेद बढ़ाती, ये संगम है परिभाषा का।


माथे के पसीने से जो, उपजाता है सोना,
उस श्रमिक के हाथों में है, खुशियों का कोना-कोना।
आम आदमी की सादगी में, धीरज का पैगाम बसा,
कठिन राहों में भी देखो, उसका अडिग विश्वास फंसा।
मेहनत की रोटी कहती है—"अभिमान बड़ा ही कच्चा है",
जो औरों के काम आए, वही इंसान सच्चा है।

उन महान पुरखों ने हमको, सत्य-अहिंसा सिखलाई,
त्याग, तपस्या और न्याय की, एक मशाल जलाई।
नेताओं का वही पैगाम, जो जन-जन को जोड़ सके,
नफरत की बहती आंधी का, जो रुख अपनी ओर मोड़ सके।
सबका साथ और सबका हित ही, धर्म का असली सार है,
जिसमें प्रेम समाहित हो, वही तो सच्चा संसार है।

आओ मिलकर थाम लें दामन, इस सुंदर पैगाम का,
रंग सजाएं धरती पर हम, खुशियों भरी शाम का।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा, न कोई यहाँ पराया है,
इस मिट्टी की खुशबू ने ही, सबको गले लगाया है।
ललित मोहन शुक्ला _( गीतकार) 

गीत: अनमोल है ये सांसें


ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना
बड़ी मुश्किल से मिलता है, ये जीवन का सुहाना।
न कल की फिक्र में खोना, न बीते कल में रोना
जो पल है हाथ में तेरे, उसी में मुस्कुराना।
कभी जो धूप तड़पाए, तो साया बनके ढल जाना
किसी के बहते अश्कों में, खुशी बनके निकल जाना।
न धन-दौलत से आँका कर, तू अपनी खुशकिस्मती को
सुकून मिलता है अपनों में, यही सच मान लेना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
बुराई को मिटाने का, बस एक ही मूलमंत्र है
जहाँ नफरत का घेरा हो, वहाँ तू प्यार बोना।
न छोटा कोई, न बड़ा कोई, खुदा की इस कचहरी में
हृदय में सबके बसता है, वो पावन दिव्य कोना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
मिले जो राह में पत्थर, तो उनसे घर बना लेना
हो मुश्किल सामने कितनी, न अपना सिर झुकाना।
जियो ऐसे कि दुनिया में, तुम्हारी याद रह जाए
महकते फूल की सूरत, चमन सारा सजाना।
ये अनमोल है जीवन, इसे जीना सिखा दो तुम
जहाँ भी पैर रक्खो तुम, गुलशन खिला दो तुम।

गीत: बहारों की नई सरगम


लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।

रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

शीर्षक: कहाँ गए वो दिन?


वो कच्ची डगर, वो मिट्टी की खुशबू,
वो यादों का झूला, वो अपनों का जादू।
कहाँ खो गए वो हसीं खेल सारे,
वो कागज़ की नैया, वो सावन की फूहारे।
मेरे हमजोली, वो संगी-सहाने,
चलो फिर से ढूँढें वही बीते ज़माने।

कभी कंचे खेलना, कभी गिल्ली-डंडा,
वो चिलचिलाती धूप में भी मन रहता चंगा।
छुपन-छुपाई में छुपना वो दीवार के पीछे,
पकड़े जाने पर हँसना, आँखें किए मीचे।
वो पिट्ठू की थपकियाँ, वो गुड़ियों की शादी,
हवाओं में घुली थी जैसे अपनी आज़ादी।

वो छोटी सी बात पर कट्टी हो जाना,
फिर उँगली फँसाकर वो 'अब्बा' मनाना।
लड़ना-झगड़ना और पल में फिर एक होना,
न दिल में कोई मैल, न खुशियों को खोना।
फटे थे वो कुर्ते, वो घुटनों की खरोंचें,
मगर दिल थे राजा, न कल की कुछ सोचें।

अब न वो आँगन है, न वो यार प्यारे,
सब सिमट गए हैं मोबाइल के द्वारे।
मशीनी हुई दुनिया, मशीनी हुए हम,
बचपन की उन यादों से आँखें हैं नम।
लौटा दो वो गलियाँ, लौटा दो वो शोर,
खींच ले जो पीछे, कहाँ गई वो डोर?

चलो आज फिर से वो यादें सजाएँ,
पुराने उन यारों को आवाज़ लगाएँ।
वही बचपन के खेल, वही हमजोली,
चलो फिर से खेलें, भरें खुशियों की झोली।
ललित मोहन शुक्ला  ( गीतकार) 

गीत: हम तुम


धड़कनों में बसी एक सरगम हो तुम,
मेरी सूनी सी दुनिया का मरहम हो तुम।
लिखा है जो खुदा ने हथेली पे मेरी,
वही अनकहा सा हसीन गम हो तुम।
जब से मिले हैं, थम सा गया है...
ये वक्त, ये मंजर, ये आलम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

तेरी आँखों में देखा तो खुद को पाया,
जैसे तपती धूप में ठंडी सी कोई छाया।
बिना बोले ही सब कुछ कह जाती हो,
मेरे खयालों में सुबह-शाम रहती हो।
चाहत की इस राह पर साथ चलेंगे,
बनकर वफ़ा का अटूट एक परचम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

दुनिया की भीड़ में हाथ न छोड़ना,
दिल के इस धागे को कभी न तोड़ना।
तू है तो मुकम्मल है मेरी हर दुआ,
तुझसे ही शुरू, तुझपे ही खत्म ये कारवां।
जिंदगी के हर सुख-दुख को बाँट लेंगे,
दुआ है कि साथ न छूटे कभी जन्मों-जनम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।

सजदे में झुके सर ने बस यही मांगा है,
कि मुकद्दर में लिखे हों सिर्फ... हम और तुम। 

गीत का शीर्षक: धड़कनों की दास्ताँ


(धीमी और रूहानी संगीत के साथ शुरू)
एक प्यार भरा ये दिल मेरा, बस तुमको पाना चाहता है,
तेरी आँखों की इन गलियों में, खो जाना जाना चाहता है।
मिले जो मुझे मेरा दिलबर, तो रब से और क्या माँगूँ मैं,
इन धड़कनों की हर आहट को, तेरे नाम सजाना चाहता हूँ।

तेरी खुशबू से महके ये रस्ते, तेरी यादों में डूबी हैं शामें,
मेरे दिल के कोरे काग़ज़ पर, लिख दी हैं मैंने तेरी वफ़ाएँ।
तू चाँद है मेरी रातों का, तू धूप है सुनहरी सुबहों की,
मेरी रूह में बस गया तू ऐसे, जैसे प्यास हो सदियों प्यासी सी।

दुनिया की भीड़ से क्या लेना, जब पास मेरा दिलबर हो,
सहरा में भी गुलशन खिल जाए, गर तेरा हाथ मेरे हाथ में हो।
न माँगूँ सोना, न चाँदी, बस एक वादा तेरा काफी है,
प्यार भरा ये दिल मेरा, तेरे प्यार का ही बस साकी है।

प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ,
बन गई मुकम्मल मेरी हर एक बात।
हाँ, प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ। 

गीत: "जीवन का आधार है जल"


कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है,
जिसके कण-कण में है जीवन, ईश का यह उपहार है।
कहीं 'नीर' है, कहीं 'तोय' है, कहीं 'वारि' की धार,
बिन इसके सूना हो जाए, सारा यह संसार।

गगन से जो 'पय' बनकर बरसे, धरती की प्यास बुझाता है,
संस्कृत की पावन वाणी में, वह 'उदक' भी कहलाता है।
शीतल-निर्मल 'सलिल' रूप में, नभ से जो झड़ जाता है,
वही 'अंबु' बन सरिताओं में, सागर तक मिल जाता है।

तपते मरुथल की यह आशा, तरु-पल्लव का श्रृंगार है,
संस्कृति का यह 'आब' निराला, गौरव का आधार है।
इसे 'अमृत' कहो या 'जीवन', यह सब रूपों में श्रेष्ठ है,
जल संरक्षण ही अब जग में, सबसे उत्तम ध्येय है।

बूंद-बूंद को व्यर्थ न खोना, यह विनती बारम्बार है,
'वारि' बिना इस वसुंधरा का, होना नहीं उद्धार है।
कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है...
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)

शीर्षक: उत्तम भाग्य बनायेंगे


नए युग की ये पुकार है, नया संकल्प जगाएंगे,
अपने हाथों से हम अपना, उत्तम भाग्य बनायेंगे।
न हाथों की रेखाओं से, न कल के भरोसे बैठेंगे,
हम पुरुषार्थ के बल पर अब, सोई किस्मत जगायेंगे।
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

श्रेष्ठ विचारों की भूमि पर, उन्नति का बीज बोना है,
जैसा होगा दृष्टिकोण, वैसा ही सुख-चैन पाना है।
सकारात्मक सोच बने अब, जीवन का आधार यहाँ,
सत्य, अहिंसा, प्रेम के पथ पर, अपना शीश झुकाना है।
पावन मन के दर्पण में, सुंदर चित्र सजायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

कर्म ही है पूजा हमारी, कर्म ही सबसे महान है,
कर्तव्य पथ पर चलते रहना, यही सच्चा धर्म विधान है।
आलस्य को त्याग के अब हम, पसीने की धार बहायेंगे,
जितना गहरा श्रम होगा, उतना ऊँचा सम्मान है।
नेक नीयती की शक्ति से, जग को हम महकायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

वर्तमान की माँग को समझें, समय के साथ जो चलना है,
नई तकनीक और कौशल से, खुद को अब निखारना है।
ज्ञान-विज्ञान के पंख लगा कर, छूना ऊँचा आसमान,
बदलती हुई इस दुनिया में, अपना नाम उभारना है।
सजग बनेंगे, कुशल बनेंगे, नया हुनर अपनायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...

धैर्य, नियम और अनुशासन, जीवन में हम लायेंगे,
खुद को गढ़कर मिट्टी से हम, कंचन-सा चमकायेंगे।
अंधियारे को चीर के अब हम, सूरज बन छा जायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे, हम उत्तम भाग्य बनायेंगे! 

गीत: भारत भारती


हिमालय जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारता है,
पुण्य भूमि यह देवों की, जग जिसको नमन गुजारता है।
सत्य, सनातन, सुंदर पावन, भारत देश हमारा है,
विश्व पटल पर चमक रहा जो, वह ध्रुव तारा न्यारा है।

जहाँ गूँजती वेदों की ऋचाएं, ॐकार का नाद यहाँ,
त्याग, तपस्या, धर्म, कर्म का, होता है शंखनाद यहाँ।
अद्वैत का दर्शन दिया यहाँ, सबको गले लगाया है,
'वसुधैव कुटुम्बकम्' का पावन, मंत्र विश्व को सिखाया है।
कण-कण में शंकर बसते हैं, पत्थर भी पूजा जाता है,
यही सनातन धर्म हमारा, जग का भाग्य विधाता है।

राम का आदर्श यहाँ है, कृष्ण की गीता गाती है,
बुद्ध, महावीर की करुणा, इस माटी में मिल जाती है।
प्रताप का स्वाभिमान और, शिवा का ओज निराला है,
झांसी वाली रानी ने, स्वाधीनता को पाला है।
शून्य दिया इस दुनिया को, विज्ञान की राह दिखाई है,
सोने की चिड़िया ने अपनी, फिर से आभा पाई है।

विविध वेश, भाषाएं अनेक, पर हृदय एक ही धड़के है,
गंगा-जमुना की लहरों में, प्रेम का अमृत झलके है।
सहिष्णुता की परिभाषा, हर भारतवासी गाता है,
अतिथि देवो भवः कहकर, सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
चलो सजाएं फिर से हम, इस गौरवमयी इतिहास को,
सत्य मार्ग पर चल कर छू लें, उन्नत नील आकाश को।

जयतु-जयतु भारतम्, जयतु-जयतु सनातनम्,
वन्दे मातरम, वन्दे मातरम!
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार) 

गीत: इस नाम को क्या नाम दूं?


ये जो ख़ामोश सा एक तार है,
ना दोस्ती है, ना सिर्फ़ प्यार है।
एक उलझन है जो सुलझती नहीं,
एक प्यास है जो बुझती नहीं।
साँसों में घुली इस शाम को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

कभी लगे कि तुम मेरे ही हो,
जैसे धूप में ठंडी छाँव से हो।
कभी लगे कि तुम एक ख़्वाब हो,
हकीकत में ढलते हिसाब हो।
बेवजह की इस पहचान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

कोई लफ्ज़ नहीं जो तुम्हें कह सके,
कोई दरिया नहीं जिसमें ये बह सके।
तुम दुआ भी हो, तुम दर्द भी,
तुम नर्म भी हो, तुम सर्द भी।
रूह की इस गहरी मुस्कान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?

दुनिया पूछेगी तो क्या कहेंगे हम?
खामोश रहकर कितना सहेंगे हम?
बेनाम सा ये रिश्ता रहने दो,
इसे हवाओं के संग ही बहने दो।
अनकही सी इस दास्तान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं? 

शीर्षक: हार जीत

ना हार में तू टूटकर, खुद से मुँह को मोड़ना,
ना जीत में तू झूमकर, ज़मीं से नाता तोड़ना।
यह वक्त का दरिया है बस, बहता ही जाएगा,
जो आज पीछे रह गया, वो कल शिखर पर आएगा।

अगर मिली है मात तो, वो हार नहीं एक सीख है,
कमी कहाँ पर रह गई, उसे परखना ठीक है।
गिरना बुरा होता नहीं, गिर के ना उठना हार है,
कोशिशों की धार ही, बस जीत का आधार है।
धैर्य का दामन पकड़, तू मंज़िलें तलाश कर,
हताशा की राख से, तू शौर्य का प्रकाश कर।

जो जीत का गुलाल उड़े, तो सिर को तू झुकाए रख,
है हाथ में आकाश पर, पाँव को टिकाए रख।
अहंकार की आंधी में, अक्सर महल ढह जाते हैं,
जो विनम्र रहते सदा, वही इतिहास रचाते हैं।
जीत महज एक पड़ाव है, ये आख़िरी मुकाम नहीं,
थक के बैठ जाना ही, वीरों का तो काम नहीं।

सुख और दुःख के चक्र में, तू शांत मन का दीप बन,
हर हाल में जो अडिग रहे, तू उस लहर का सीप बन।
ना हार में निराश हो, ना जीत में तू चूर हो,
कर्म की इस राह पर, तू जग में मशहूर हो।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)

Poems and Songs of Lalit Mohan Shukla: A Journey Through Soulful Verses and Timeless Lyrics

*Poems and Songs of Lalit Mohan Shukla: A Journey Through Soulful Verses and Timeless Lyrics* 1. *Preface*    * The Inspiration Behind the C...