मेरा दिल
मेरा दिल है एक खुली किताब,
जिसमें दबी हैं हज़ारों ख़्वाब।
कभी ये हँसे, कभी ये रोए,
न जाने कौन से रंग ये बोए।
जैसे हो कोई नटखट बच्चा,
करता कितनी बातें ये कच्चा।
कभी मचले, कभी ये बहके,
चाहत की धूप में ये दहके।
इक कोना इसका है बिलकुल सादा,
जहाँ रहती है तेरी ही याद ओ अनामिका
धड़कन इसकी तेरी ही धुन है,
तू ही इसकी पहली और अंतिम गुन है।
ये छुपाए कई गहरे राज़,
सुनाए इश्क़ की मीठी आवाज़।
नाज़ुक ये ऐसा, जैसे कोई फूल,
मगर सह लेता हर दर्द की शूल।
हर पल ये तेरा ही नाम पुकारे,
तेरे ही संग ये जिए और हारे।
मेरा दिल है तो बस तेरा ही घर,
यहाँ से तू कभी ना जाना किधर।
एक रास्ता
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
चुपचाप मुझको बुलाए जा रहा है।
न मंज़िल का कोई मुझे है ठिकाना,
मगर दिल सफ़र का गुनगुना रहा है।
अकेला हूँ पर मैं थकता नहीं हूँ,
झुक जाऊँ मैं ऐसा मुसाफ़िर नहीं हूँ।
पहाड़ आड़ आए, नदी हो या जंगल,
कदम रुक गए तो ये जीना नहीं हूँ।
यहाँ धूल भी है, कहीं छाँव भी है,
कहीं दूर से आता कोई पाँव भी है।
कभी तेज़ चलता, कभी धीरे-धीरे,
हर मोड़ पर एक नया घाँव भी है।
हैं कितने ही राही जो गुज़रे यहाँ से,
लिए ख़्वाब अपने गए हैं कहाँ से।
उनकी कहानियाँ पत्थरों पर लिखी हैं,
सीखा है मैंने, ज़माने-जहाँ से।
ये राह ही मेरी अब पहचान ठहरी,
इसी पर टिकी मेरी मुस्कान ठहरी।
ज़िंदगी है क्या? बस ये सफ़र है निरंतर,
जहाँ ख़्वाब पलते, जहाँ जान ठहरी।
यह एक रास्ता जो कहीं जा रहा है,
बस चलते ही जाना सिखा रहा है।
न मंज़िल ज़रूरी, न पहुँचना ज़रूरी,
ये पल ज़िंदगी का बताए जा रहा है।
सपनों की दुनिया
रात की चादर ओढ़कर,
आती है सपनों की दुनिया।
खुल जाती है एक खिड़की,
जहाँ हर चीज़ है नई-सी।
कहीं उड़ते हैं हम पंछी बनकर,
नीले आसमान में।
कभी मिलते हैं उन सब से,
जो रहते हैं अब यादों में।
कोई अधूरा सा काम,
पूरा हो जाता है।
कोई भूला हुआ रास्ता,
मिल जाता है।
ये सपने हैं या कुछ और,
जो हकीकत से भी प्यारे हैं।
जब आँखें खुलती हैं सुबह,
तो भी कुछ पल के लिए ये हमारे हैं।
कुछ मीठे हैं, कुछ हैं अजीब,
पर हर सपने में एक कहानी है।
ये सपनों की दुनिया,
दिल को बहुत सुहानी है।
ज़िन्दगी के सफर में,
ज़िन्दगी के सफर में,
कभी धूप, कभी छांव।
सुबह की सुनहरी किरणें,
जैसे दे रही हों आहट।
दुःख के बादल छाए,
अंधेरा सा छा जाए।
फिर उम्मीद की किरण,
एक नया सवेरा लाए।
कभी पतझड़ आए,
सूखे पत्तों से जीवन भर जाए।
फिर बसंत की बहार,
नये फूल खिल जाए।
कभी तेज़ धूप में,
पसीना बन जाए।
कभी ठंडी छांव में,
सुकून मिल जाए।
इसी तरह ज़िन्दगी चलती जाए,
हँसती, गाती और मुस्कुराती जाए।
कभी धूप, कभी छांव,
यह सब जीवन का हिस्सा बन जाए।
शीर्षक: प्रगति का पाथेय
ज्ञान दीप पुस्तक बनी, मिटा तिमिर अज्ञान।
प्रगति राह प्रशस्त हो, बढ़े मनुज की शान॥
अक्षरों के संग बह रही, उन्नति की रसधार।
पुस्तकों की ओट में, खड़ा सुखी संसार॥
पुस्तक जग की ज्योति अनूप, पाकर खिले ज्ञान का रूप।
जो भी पन्ना प्रेम से खोले, सत्य और विज्ञान ही बोले।
शून्य खोज जब जग को दीन्हा, तब भारत ने गौरव कीन्हा।
बिना ग्रंथ के प्रगति न भाती, कोरी कल्पना हाथ न आती।
ग्रंथ थाम कर हाथ, व्योम की दूरी मापी,
सागर की गहराइ, हृदय की हलचल व्यापी।
लिखी जहाँ इतिहास, वहीं से बढ़ी कहानी,
पुस्तक ही तो आज, विश्व की बनी जवानी।
हर विधा का सार, पृष्ठ पर अंकित मिलता,
जिसने पढ़ा विवेक, प्रगति पथ उस पर खिलता।
मूर्ख बने विद्वान, पुस्तक के सान्निध्य से।
मिले उच्च सम्मान, प्रगति सधे पुरुषार्थ से॥
पुस्तक को आधार कर, बदलो अपनी राह।
लक्ष्य प्राप्त तब ही सधे, मिटे हृदय की दाह॥
मिटे हृदय की दाह, ज्ञान का सूरज उगे।
प्रगति चढे सोपान, आलस्य सभी का भागे॥
कह 'कवि' सुनिये मीत, बने जो उत्तम पुस्तक।
निश्चित ही वह पाय, प्रगति की ऊँची दस्तक॥
गीत: भोर का अमृत (ब्रह्म मुहूर्त)
मिटा अंधेरा, हुआ सवेरा, जागो रे इंसान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।
प्रकृति की गोद में अमृत बरसे, शीतल मंद समीर,
यही समय है भाग्य जगाने, तज दो मोह की पीर।
तारों की झिलमिल विदा हो रही, गूंज रहा है मौन,
इस पावन घड़ी को तजकर, सोता है अब कौन?
नसों में बहती नव-स्फूर्ति, मन होता है शांत,
मिट जाते हैं सब संशय, और हृदय के भ्रांत।
पक्षी भी कलरव करते हैं, गाते प्रभु का गान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।
तन-मन को जो निरोग बनाता, बुद्धि को दे विस्तार,
ऋषि-मुनि सब इसी समय में, पाते ज्ञान का सार।
साधक का संबल है यह, विद्यार्थी का वरदान,
एकाग्रचित्त होकर पा लो, वेदों का तुम ज्ञान।
योग और प्राणायाम से, बनता जीवन महान,
ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई, कर लो प्रभु का ध्यान।
आकाश से गिरती दिव्य रश्मियाँ, सोख रहा संसार,
खुल जाते हैं इसी समय, मोक्ष के पावन द्वार।
परमात्मा से मिलन की घड़ी, सबसे है अनमोल,
अंतर्मन की खिड़की खोलो, सत्य का अमृत घोल।
अंधकार से ज्योति की ओर, बढ़ाओ अपने कदम,
इसी घड़ी में सिद्ध होते हैं, सारे शुभ संयम।
जागो-जागो आलस त्यागो, छोड़ो नींद की खान,
ब्रह्म मुहूर्त में जो जागे, पाए पद और मान।
गीत: "गीत ही तो जीवन है"
गीत हृदय की धड़कन है, गीत ही मन की प्यास है,
कभी ये बहता आँसू है, कभी मिलन की आस है।
शब्दों के धागे में पिरोई, संवेदना की माला है,
गीत ही सुरमई साया, गीत ही उजियाला है।
गीत सिखाते जीवन नदिया, बहना जिसका काम है,
हर धारा में छिपा हुआ, कोई अनकहा पैगाम है।
वक्त की बेरहम चालों का, यह मौन गवाह बनता है,
टूटे हुए उन सपनों की, यह फिर से राह चुनता है।
कभी ये विरह की रुत बनकर, आँखों से झर जाता है,
कभी चाँद सी सूरत देख, चकोर सा तर जाता है।
पास बुलाती धुन कोई, जब बनके मीठी याद आए,
गीत ही वो जादू है जो, बिछड़ों को पास ले आए।
वतन की खातिर मर मिटने की, ये पावन परिपाटी है,
ये चंदन का तिलक है और, ये बलिदान की माटी है।
थक कर बैठ न ऐ राही, मंज़िल अभी तो बाकी है,
गीत ही संबल बनता है, जब हिम्मत होने लगती फाकी है।
जीना-मरना सब यहीं है, बस यही गीत का सार है,
ये जीवन है धूप-छाँव, कभी जीत तो कभी हार है।
हम मुसाफ़िर हैं चलते जाना, बस यही अपनी कहानी है,
गीत ही अमृत की बूँदें, बाकी सब तो पानी है।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक)
गीत: नया साल, नया संकल्प
नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
बीत गया जो कल का सपना, नई भोर अब आई है।
आओ मिल कर थामें दामन, नेक नेक इरादों का,
खुद से खुद को बेहतर करने, सुंदर दृढ़ संकल्पों का।
आलस का अब त्याग करेंगे, समय न व्यर्थ गंवाएंगे,
मेहनत की स्याही से अपनी, किस्मत नई सजाएंगे।
सूरज से पहले जागेंगे, ऊर्जा का संचार हो,
अनुशासन हो जीवन में और, कर्मों का जयकार हो।
कटु वचन न बोलें कोई, सबसे मीठी वाणी हो,
मिटे द्वेष और बैर जगत से, सुख की मधुर कहानी हो।
एक वृक्ष हम रोज लगाएंगे, धरती को महकाएंगे,
स्वच्छ रहे परिवेश हमारा, यह संकल्प उठाएंगे।
सीखेंगे कुछ नया रोज हम, ज्ञान का दीप जलाएंगे,
हार मिले तो घबराएं न, फिर से कदम बढ़ाएंगे।
तन को स्वस्थ रखेंगे अपने, मन को पावन रखेंगे,
भीतर जो विश्वास छुपा है, उसको जीवित रखेंगे।
शुभ संकल्पों की शक्ति से, जीवन स्वर्ग बनाएंगे,
नव वर्ष के इस आंगन में, खुशियों के फूल खिलाएंगे।
नवल वर्ष की बेला आई, नवल किरण मुस्काई है,
नया साल है, नया जोश है, नई जीत की बारी है।
_ ललित मोहन शुक्ला गीतकार व लेखक
गीत: मैं रुकूँगा नहीं (जीत का जुनून)
माना कि राहों में बिछे हैं शूल भारी,
माना कि मुश्किल है आज मेरी ये बारी।
तुलना न कर मेरी दुनिया की ऊंचाइयों से,
मेरे हौसलों ने की है गगन की सवारी।
पंख थके हैं मगर, परवाज़ अभी बाकी है,
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।
कभी बैसाखी, कभी पहिया, मेरी पहचान नहीं,
मिट्टी का ये ढांचा ही बस, मेरा जहान नहीं।
जो देख सको तो देखो, मेरी रूह की शिद्दत को,
मुझमें छुपा है सैलाब, मैं कोई शांत तूफान नहीं।
हवाओं से कह दो, अपनी रफ़्तार बढ़ा लें,
मेरी हिम्मत की अब, आगाज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।
दुनिया जिसे कमी कहे, मैंने उसे ताक़त माना,
हर ठोकर को मैंने, मंज़िल का इशारा जाना।
छू लूँगा चाँद को मैं, अपने पसीने की धार से,
असंभव के शब्द को मैंने, कभी न पहचाना।
किस्मत की लकीरों को, खुद ही मोड़ दूँगा मैं,
मेरे संघर्षों का, साज़ अभी बाकी है।
आँखों में जीत का वो, अंदाज़ अभी बाकी है।
मैं गिरूँगा, मैं उठूँगा, पर कभी थमूंगा नहीं,
भीड़ का हिस्सा बनकर, गुमनाम रहूँगा नहीं।
मेरी जीत की गूँज, इतिहास सुनाएगा कल,
मैं वो चिराग़ हूँ जो, तूफानों में बुझेगा नहीं।
ललित मोहन शुक्ला (गीतकार व लेखक)
गीत: उन्नति की नई डगर
हर खेत में हरियाली हो, हर घर में खुशहाली हो,
मेरे गाँव की माटी अब, सोना उगलने वाली हो।
चलो हाथ से हाथ मिलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए
नन्ही आँखों में सपने हों, और हाथों में किताब रहे,
बेटे-बेटी सब पढ़ें-लिखें, ऊँचा सबका ख़्वाब रहे।
अंधियारा अज्ञान का मिटे, ज्ञान का सूरज चमकाना है,
कौशल की नई राहों से, आत्मनिर्भर बन जाना है।
चलो दीप से दीप जलाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!
गलियाँ साफ-सुथरी हों अपनी, आँगन में भी शुद्धि हो,
स्वस्थ रहे हर तन-मन अपना, तभी तो बढ़ती बुद्धि हो।
नीम की ठंडी छाया हो, और शुद्ध पवन का घेरा हो,
बीमारी का नाम न हो, खुशियों भरा सवेरा हो।
चलो कदम से कदम बढ़ाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!
हल के साथ अब जुड़ जाए, विज्ञान की नई शक्ति भी,
मेहनत और लगन के साथ, हो कर्म की सच्ची भक्ति भी।
जात-पात के भेद मिटें, बस भाईचारा साथ रहे,
तरक्की की इस दौड़ में, सबका सबके हाथ रहे।
चलो प्रेम की गंगा बहाएँ हम, इक नया इतिहास बनाएँ हम,
मेरा गाँव, मेरा देश—अब शिखर पर जाए!
गीत का शीर्षक: तुम्हारी पसंद
जो तुम्हारे लब न कह पाए, वो बात लिखूँगी/लिखूँगा
तुम्हारी आँखों में ठहरी, हर एक जज़्बात लिखूँगी।
पसंद क्या है तुम्हें, बस यही तो जानना है,
तुम्हारे मन की ज़मीं पर, अपनी कायनात लिखूँगी।
वो बारिश की बूंदें, या ठंडी हवा का झोंका
वो बचपन की यादें, या अपनों का भरोसा।
तुम्हें शामें पसंद हैं, या ढलती हुई धूप,
बताओ न क्या भाता है, तुम्हें ख़ुद का ही रूप?
जो तुम चाहो, वही ख़्वाबों की बारात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी हर मुलाकात लिखूँगी।
कभी ख़ामोश रहकर भी, जो तुम कहना चाहो
मेरे कांधे पे सर रखके, जो तुम बहना चाहो।
वो पुराने से नग़मे, या सावन का कोई गाना
मुझे अच्छा लगता है, तुम्हारा यूँ मुस्कुराना।
तुम्हारे दिल की धड़कन की, हर बिसात लिखूँगी,
तुम्हारी पसंद में ही, अपनी सारी कायनात लिखूँगी।
दुनिया की बातें छोड़ो, बस अपनी बात करेंगे,
तुम जिसे पसंद करो, हम बस वही बात करेंगे।
शीर्षक: मिलन का उत्सव
थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
आए हो तुम पास मेरे, तो महक उठा है आंगन,
आज हुआ है पूरा जैसे, कोई अधूरा बंधन।
पास बैठो तो वक्त की लहरें, जैसे ठहर सी जाती हैं,
खामोशियाँ भी कानों में, मीठी गजलें गाती हैं।
दुनिया का हर शोर सुहाना, संगीत जैसा लगता है,
तुम्हें देख लूँ एक नजर, तो रोम-रोम ये जगता है।
हृदय के सूने उपवन में, आई प्रेम-मल्हार,
छलक उठा है सागर जैसे, पाकर अपना किनारा।
हाथों में जो हाथ लिया, तो मिट गईं सब दूरियां,
अब न कोई शिकवा बाकी, न कोई मजबूरियां।
ऐसा लगता है जैसे हम, बादलों पर चलते हैं,
एक ही सांचे में ढलकर, हम दोनों अब ढलते हैं।
तुम मिल गए तो मिल गया, खुशियों का ये संसार,
अमर रहे ये पल हमारे, अमर रहे ये प्यार।
थमी-थमी सी सांसें थीं, रुकी-रुकी सी धड़कन,
आज फिजाओं में घुला है, जैसे कोई चंदन।
नैनों ने नैनों से कह दी, मन की अनकही बातें,
जैसे सदियों बाद मिली हों, सूरज से ये रातें।
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक)
सुबह की चाय और 'ठंडी' चेतावनी
कपकपाती ठंड है, और रजाई में हम दुबके हैं,
ख्वाबों में गरम समोसों के, हम कब से अटके हैं।
तभी कान में गूंजी एक आवाज़, जैसे कोई हुंकार हो,
"उठो जी! क्या इरादा है? या फिर बस मेरा इंतज़ार हो?"
मैंने कहा, "ए प्रिये! ज़रा बर्फ की नज़ाकत तो देखो,
बाहर कोहरा घना है, रजाई की इस इबादत तो देखो।"
वो बोलीं, "नज़ाकत गई तेल लेने, उठो और ज़रा हाथ बटाओ,
चाय पीनी है अगर, तो पहले अदरक कूट कर लाओ।"
कांपते हाथों से मैंने, जब अदरक को कूटा है,
लगा जैसे रजाई से मेरा, जन्मों का रिश्ता छूटा है।
किचन में वो खड़ी थीं, जैसे सेना की कोई जनरल हों,
मैं खड़ा था सामने ऐसे, जैसे फ्यूज़ हुआ कोई बल्ब हूं।
चाय की प्याली हाथ में आई, तो रूह को चैन मिला,
पर पत्नी बोलीं, "सुनो जी! शक्कर कम है, ये लो ज़िला।"
मैंने घूंट भरा और कहा, "शक्कर की ज़रूरत क्या है भला?
तुम्हारी बातों की कड़वाहट ही, मेरा असली गला जला!"
बस फिर क्या था...
चाय की चुस्की तो रह गई, पर 'गरमा-गरम' भाषण शुरू हुआ,
ठंड तो भाग गई तुरंत, पर घर में 'इतिहास' का रण शुरू हुआ।
अब रोज़ सुबह ठंड में, मैं चुपचाप चाय बनाता हूं,
बिना चीनी के भी उसे, "बड़ी मीठी है" कह कर पी जाता हूं।
ललित मोहन शुक्ला _( लेखक, कवि व गीतकार)
पत्नी और ऋतु परिवर्तन
बदला मौसम, खिली धूप, तो पत्नी ने ली अंगड़ाई,
बोली— "सुनिए, संदूक से निकालो मेरी रेशमी रजाई!"
अभी रजाई निकली ही थी कि सूरज ने तेवर दिखाए,
वो बोली— "बड़ी गर्मी है, कूलर के खस कौन बदलवाए?"
बस यही है जीवन का चक्र...
जब आती है नन्हीं सी फुहार, वो रूमानी हो जाती है,
"पकौड़े तल दो" कह-कह कर, मेरी शाम खा जाती है।
बाहर गिरती है बारिश, घर में बेसन का घोल गिरता है,
और रसोई का सारा काम, मेरे ही सिर पड़ता है!
फिर आई पतझड़, गिरे पत्ते, तो उनका मूड भी उखड़ा,
कहने लगीं— "बेजान है चेहरा, देखो मेरा मुखड़ा।"
पार्लर की ऋतु आई ऐसी कि बजट सारा डोल गया,
मेरा बटुआ बेचारा, पतझड़ के पत्तों सा छिल गया।
अब कड़ाके की ठंड आई, तो नया क्लेश शुरू हुआ,
"पिछली साल वाला स्वेटर, अब पुराना और थ्रू हुआ!"
मैडम को चाहिए वेलवेट, मफलर और पश्मीना,
हमें तो फटे कंबलों में ही, अब होगा जीना।
मौसम तो बस साल में, चार बार ही बदलते हैं,
पर पत्नी के मिजाज यहाँ, हर घंटे रंग बदलते हैं।
कुदरत के बदलाव पर तो, मौसम विभाग की नजर है,
पर पत्नी कब बदल जाए... ये तो बस 'ऊपर वाले' को खबर है!
गीत: समर्पण की लौ
तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं।
न यह प्यास है, न यह आस है, बस तेरा ही एक अहसास है,
प्रेम की इस दहलीज पर, तू भक्ति है, तू ही प्यास है।
जैसे मंदिर की मूरत में, सादगी मुस्कुराती है,
तेरी सूरत की किरणों से, मेरी सुबह जगमगाती है।
तुझे सोचना ही पूजा मेरी, तुझे माँगना इबादत है,
मेरे दिल के सूने आँगन में, बस तेरी ही हुकूमत है।
मेरी बंदगी, मेरी हर ख़ुशी, तुझसे ही है आबाद,
तू रूह की है आरज़ू, तू ही है दिल की मुराद।
कोई नाम दूँ मैं प्रीत को, या कहूँ इसे आराधना,
तू साज़ है मेरे मौन का, तू ही मेरी साधना।
न दुनिया का कोई शोर है, न ख़्वाबों का कोई जाल है,
जहाँ तू है मेरे रूबरू, वहीं ज़िंदगी बेमिसाल है।
जैसे दीप जले बिन बाती के, अधूरा है श्रृंगार,
वैसे तुझ बिन सूना है मेरा, यह छोटा सा संसार।
तेरी आँखों के दर्पण में, खुद को पा जाता हूँ मैं,
तू मिले जो राहों में, खुदा को पा जाता हूँ मैं...
भजन: मेरे साँवरे सरकार
साँवरिया तेरी वंशी की धुन, मन को बड़ा लुभाती है।
नैनों में तेरी मूरत है, हृदय में ज्योत जगाती है॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
मेरे गिरधर नागर, तेरी जय-जयकार...
मुरली अधर पर सजी हुई है, मोर मुकुट सिर सोहे।
तेरी मंद-मंद मुस्कावन ने, जग के संकट मोहे॥
तू ही तो है पालनहारा, तू ही है जग का आधार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
यमुना तट पर रास रचाया, गोपिन के मन भाये।
माखन चोरी करके कान्हा, सबको खूब हँसाये॥
जिसने भी तेरा नाम लिया, उसका बेड़ा पार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
अर्जुन के तुम सारथी बनके, गीता ज्ञान सुनाया।
भक्त सुदामा की कुटिया को, महलों सा चमकाया॥
शरण पड़े जो तेरी प्रभु, उसे मिले अपार प्यार।
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
समापन
हे नंदनंदन, हे यदुनंदन, चरणों में स्थान देना।
भूल-चूक सब माफ़ हमारी, अपनी शरण में लेना॥
मेरे साँवरे सरकार, तेरी जय-जयकार...
ललित मोहन शुक्ला _ (गीतकार व लेखक)
गीत: अंतर्मन की गूँज
ओ... ओ...
शांति का सागर हूँ मैं, शक्ति का अवतार हूँ
स्वस्थ काया, शुद्ध मन, प्रेम का विस्तार हूँ।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ
हर रिश्ते में घुली हुई, सुखद एक परमात्मा हूँ।
बाहर चाहे शोर हो, भीतर गहरा मौन है
स्वयं को जो जान ले, फिर डराता कौन है?
संकल्पों में तेज है, न डर है न कोई भ्रांति है,
मेरे हर एक श्वास में, बस सुकून और शांति है।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...
न कोई द्वेष मन में है, न कोई शिकवा-गिला
हर रूह में है अक्स मेरा, जिससे भी मैं हूँ मिला।
सम्मान और स्नेह से, महक रहा मेरा हर चमन,
मेरे रिश्ते सबसे सुंदर हैं, खिल रहा जैसे मधुबन।
मै शांत, शक्ति स्वरूप, पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ...
दिव्य किरणों से भरी, मेरी ये काया निर्मल है
चेतना की अग्नि में, जल गया हर छल है।
निरोग मेरा भाग्य है, आनंद ही मेरी राह है,
पूर्णतः स्वस्थ हूँ मैं, बस यही मेरी चाह है।
मै शांत... मै शक्ति... मै स्वास्थ्य हूँ...
मेरे हर रिश्ते में... बस प्यार ही प्यार है।
ललित मोहन शुक्ला (लेखक , कवि व गीतकार)
चाचा की 'व्हाइट हाउस' वाली चाय
ट्रम्प चाचा ने कस ली कमर, बोले— "अब तो खेल करेंगे,
मादुरो को वेनेजुएला से, हम सीधे पिकअप करेंगे।"
ट्विटर वाली उंगली चमकी, बोले— "सुन लो निकोलस भाई,
बहुत जी लिए राजमहल में, अब खाओ अपनी ही मलाई।"
चाचा ने फेंका 'सैंक्शन' का पासा, बोले— "ये है मेरा स्टाइल,
तेल तुम्हारा बंद करेंगे, चाहे तुम दो मीठी स्माइल।"
मादुरो बोले— "हम न डरेंगे, हम भी पक्के जिद्दी हैं,
अमेरिका के आगे हम तो, नहीं छोटी सी गिद्दी हैं।"
ट्रम्प चाचा ने फोन घुमाया, बोले— "पेंपियो, जरा आना,
मादुरो के लिए एक बढ़िया सा, विदाई पत्र बनाना।"
इधर से 'गुआदो' को उकसाया, उधर से फेंकी जादुई छड़ी,
मादुरो की कुर्सी के नीचे, चाचा ने लगा दी फुलझड़ी।
दुनिया बोली— "अरे चाचा, ये तो बड़ा भारी पंगा है,"
चाचा बोले— "चिंता मत करो, मेरा इरादा चंगा है।
लोकतंत्र की खातिर हमने, ये नया खेल रचाया है,
मादुरो को घर भेजने का, हमने ही प्लान बनाया है।"
चाचा की हुंकार थी तगड़ी, मादुरो थोड़े डोल गए,
पर कुर्सी को ऐसा पकड़ा, कि सारे ताले खोल गए।
उठाने की कोशिश तो खूब हुई, जैसे 'कैब' की हो सवारी,
पर मादुरो भी निकले ढीठ, चालाकी सब पर पड़ी भारी।
गीत: शिखर की ओर
अंधियारे को चीर के अब, एक नई भोर लानी है,
खुद को गढ़ना है फिर से, नई इतिहास सजानी है।
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में,
चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में।
पहला कदम है खुद को पढ़ना, मन के भीतर झाँकना,
कितनी ताकत छिपी हुई है, अपनी रूह को आँकना।
कमजोरी को ढाल बना लें, डर को पीछे छोड़ दें,
जिधर खड़ी हो मंजिल अपनी, राहों को उस ओर मोड़ दें।
मृदुल भाव से मुस्कुराकर, गम को हमें भुलाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।
राहों में काँटे बिखरे हों, या आएँ तूफ़ान खड़े,
हौसलों के तरकश में लेकिन, तीर हों सबसे बड़े।
गिरना भी एक सीख है साथी, गिरकर फिर से उठना सीख,
दुनिया झुकती है कदमों में, मत माँग किसी से भीख।
पसीने की हर एक बूँद से, अपना भाग्य सजाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, जज्बा आज जगाना है।
पहुँचें जब हम शिखर पे जाकर, अंबर को भी चूम लें,
पर जमीन से रिश्ता ना टूटे, मस्ती में हम झूम लें।
खुशहाली वो नहीं जो केवल, ऊँचे महलों में दिखे,
सच्ची बुलंदी वो है जो, औरों के आँसू पोंछना सीखे।
प्रेम भाव की खुशबू से अब, जग को हमें महकाना है,
खुद को खुशहाल व बुलंद बनाने का, लक्ष्य हमें अब पाना है।
चलो आज फिर जान फूँक दें, सोए हुए अरमान में,
खुशहाली के सुर छेड़ें हम, बुलंदियों के गान में।
गीत: सनातन का गौरव गान
आदि अनंत है, शिव सा शांत है, सत्य सनातन की धारा।
ऋषियों की तपस्या, मुनियों का चिंतन, जग में सबसे प्यारा॥
हिमगिरि जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारे।
पुण्य भूमि यह भारत माता, हम सब इसके तारे॥
वेदों की ऋचाओं में गूंजे, उपनिषदों का सार यहाँ।
कर्मयोग की गीता गाई, कृष्ण का दिव्य प्रचार यहाँ॥
अहिंसा का पथ, सत्य की शक्ति, राम का आदर्श महान।
त्याग और तप की वेदी पर, अर्पित है सबका सम्मान॥
सत्य सनातन धर्म हमारा, मानवता का है वरदान॥
गंगा की कल-कल में बहती, शुचिता और पवित्रता।
मंदिर के घंटों में बसती, अपनी सादगी, कोमलता॥
कुंभ का मेला, दीपों का उत्सव, पर्व यहाँ हर रंग में।
भक्ति भाव की गूँज सुनाई, देती है अंग-अंग में॥
सभ्यता की यह अमर कहानी, अंकित है कण-कण में॥
विविध वेष और विविध बोलियाँ, फिर भी एक ही प्राण है।
वसुधैव कुटुंबकम् ही, इस मिट्टी की पहचान है॥
उठो संतानों, जागो वीरों, फिर से जग को ज्ञान दें।
विश्व गुरु बन भारत चमके, ऐसा हम वरदान दें॥
जय सनातन, जय हो भारत, गूँजे यह जयगान है॥
ललित मोहन शुक्ला
(कवि, गीतकार व लेखक)
गीत: रिश्तों की डोर
रेशम की डोरी है, मन का ये मेल है,
रिश्तों की छाँव में, खुशियों का खेल है।
हो कोई अपना तो, मंज़िल भी पास है,
जीवन की बगिया में, ये ही तो प्यास है।
महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो।
मिट्टी के घरों को, ये महलों सा करते हैं,
खाली से जीवन में, रंगों को भरते हैं।
दुख की कड़ी धूप में, ठंडी ये फुहार हैं,
थक जाए राही जब, तो यही सहारा हैं।
सच्चे हों नाते तो, ईश्वर का रूप हैं,
इनसे ही खिलती, ये सुनहरी सी धूप है।
थोड़ा सा झुक जाना, थोड़ा सा सह लेना,
दिल में न रख कोई, खुल के ही कह लेना।
अहम (ego) की दीवारों को, मिलकर गिराना तुम,
रूठे अगर कोई, हँस कर मनाना तुम।
वक़्त की फुर्सत का, तोहफा दिया करो,
रिश्तों की क्यारी में, उम्मीदें बोया करो।
कड़वे जो बोल हों, शहद सा घोल दो,
बंद जो द्वार हों, प्यार से खोल दो।
रिश्ते वो मोती हैं, जो फिर न मिलेंगे,
सहेजोगे गर इन्हें, तो फूल ही खिलेंगे।
चलो आज फिर से, हम हाथ थाम लें,
रिश्तों की बंदगी का, मिल कर नाम लें।
महक उठेगी दुनिया, गर प्यार साथ हो,
सुंदर वही रिश्ता, जिसमें विश्वास हो।
गीत: जीत की राह
मैदानों की मिट्टी बोले, मन में भर लो विश्वास,
खेल सिखाते जीवन जीना, जगाते नई एक आस।
सफलता के इस महाकुंभ में, आओ हम सब मिल जाएँ,
हर खेल से एक गुण सीखें, अपना भाग्य बनाएँ।
फुटबॉल की सतरंगी दुनिया, हमको यह बतलाती है,
अकेले कोई जीत न पाता, 'एकता' काम आती है।
पास (Pass) बढ़ाओ, ताल बिठाओ, गोल तभी हो पाएगा,
मिलकर चलना सीख लिया तो, जग तेरे संग गाएगा।
क्रिकेट के मैदान में देखो, पिच पर टिकना पड़ता है,
बड़ी पारी खेलने को, 'धैर्य' सदा ही गढ़ता है।
कभी बाउंसर, कभी गुगली, संयम मत तुम खोना,
धैर्य रखोगे अंत तलक तो, होगा सफल सलोना।
टेनिस के उस कोर्ट में देखो, नज़रें गेंद पर टिकी रहें,
'एकाग्रता' (Focus) ही मंत्र यहाँ है, लहरें कितनी भी उठें।
पलक झपकते बाजी पलटे, मन को बस में रखना तुम,
लक्ष्य की रेखा पार करोगे, एकाग्रता से बढ़ना तुम।
दौड़ रही है दुनिया सारी, एथलीट से यह सीखो,
'अनुशासन' के सांचे में, हर दिन खुद को तुम लिखो।
समय की पाबंदी और पसीना, पदक गले लगवाएगा,
अनुशासन जो पाल लिया तो, शिखर हाथ में आएगा।
शतरंज की बिसात बिछी है, चालें अपनी सोच समझ,
'बुद्धिमानी' और दूरदृष्टि, देती है जीत की समझ।
मुश्किल में भी राह निकालना, हार न कभी मानना,
दिमाग की इस शक्ति को तुम, सफलता का आधार जानना।
हार मिले तो साहस रखना, जीत मिले तो मान रहे,
खेल ही तो वह आईना है, जिसमें अपनी पहचान रहे।
उठो चलो और खेलो ऐसे, कि दुनिया तुम्हें सलाम करे,
सफलता के हर खेल में, बस तुम्हारा ही नाम रहे।
क्रिकेट और जिंदगी: डटे रहो पिच पर!
जिंदगी की पिच पर भैया, सावधानी से बैटिंग करना,
यहाँ 'बॉलर' है वक्त तुम्हारा, गुगली से तुम मत डरना।
कभी दुखों की 'बाउंसर' आएगी, कभी सुखों का 'फुलटॉस',
पर डटे रहोगे क्रीज पर, तभी मनेगा जीत का जश्न खास।
पड़ोसी है 'थर्ड अंपायर', हर गलती पर उंगली उठाएगा,
रिश्तेदार हैं 'फील्डर' जैसे, कैच लपकने को हाथ बढ़ाएगा।
पर तुम घबराना मत दोस्त, चाहे 'स्लेजिंग' करे जमाना,
तुम्हें तो बस अपनी धुन में, 'हेलीकॉप्टर शॉट' है लगाना।
कभी किस्मत 'नो बॉल' देगी, तो 'फ्री हिट' पर चांस मारना,
अगर 'डक' पर आउट हो जाओ, तो रोकर हिम्मत मत हारना।
क्योंकि ये 'टेस्ट मैच' है लंबा, यहाँ हर दिन नया सवेरा है,
आज अगर तुम 'जीरो' हो, तो कल शतक भी तेरा है।
पेट निकला हो या बाल उड़े हों, बस 'स्ट्राइक' रोटेट करते रहो,
जिंदगी का 'रन रेट' चाहे जो हो, चेहरे पर मुस्कान भरते रहो।
क्योंकि अंत में स्कोरबोर्ड नहीं, ये देखा जाएगा मेरे भाई,
कि हारने के डर से भागे थे, या लड़कर की थी तुमने विदाई!
गीत: राही और राह
मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है।
किस ओर मुड़ें, क्या मोड चुनें, ये मन का भ्रम मिटाता चल,
दिखा दे जो सही दिशा, उस रौशनी को पाता चल।
कभी ऊबड़-खाबड़ राहें होंगी, कभी काँटों का घेरा होगा,
पर याद रख ऐ मुसाफिर, हर रात के बाद सवेरा होगा।
कदमों के नीचे धूल नहीं, ये तो अनुभव की थाती है,
दिशा वही है सच्ची, जो मंज़िल को पास बुलाती है।
मंजिल की कोई फिक्र नहीं...
हवाएँ हमसे पूछेंगी, किधर को तेरा ठिकाना है?
कह देना कि बहना ही, बस मेरा एक बहाना है।
नक्शों में जो न मिले कभी, वो रास्ता दिल से जाता है,
जो खुद पर रख ले यकीन, वही सही दिशा को पाता है।
कहीं झरने कल-कल गाते हों, कहीं पेड़ों की ठंडी छाँव मिले,
उसी डगर पर बढ़ना तुम, जहाँ प्यार भरा कोई गाँव मिले।
रास्ता ही अब हमसफर है, रास्ता ही अब मीत है,
सफर का हर एक लम्हा ही, जीवन का मधुर संगीत है।
मंजिल की कोई फिक्र नहीं, बस चल पड़ना ही काफी है,
जो रूह को रोशन कर जाए, वो रास्ता ही साथी है।
गीत: गौरव की भाषा हिन्दी
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष)
गीत: श्रम की मशाल
उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
पसीने की हर बूंद में, सृजन की एक बात है।
न थकना है, न रुकना है, ये संकल्प महान है,
श्रमिक के ही कंधों पर, टिका ये जहान है।
जय श्रम! जय श्रमिक! तुम युग के निर्माता हो।
तुमने काटीं चट्टानें, तो राहें निकल आईं,
तुमने सींचा मरुथल, तो फसलें लहलहाईं।
ये ऊँची अट्टालिकाएँ, ये कल-कारखाने सब,
तुम्हारी ही उँगलियों ने, रची है ये दुनिया अब।
लोहा तुम जब गलाते हो, तो रूप नया ढलता है,
तुम्हारे ही पसीने से, प्रगति का पहिया चलता है।
नहीं याचना हाथ में, पुरुषार्थ का संबल है,
मेहनत की रोटी में ही, छिपा असली संबल है।
धूप हो या छाँव हो, तुम अडिग हिमालय से,
रोशनी तुम लाते हो, श्रम के देवालय से।
मिट्टी से सोना उपजाना, तुम्हारा ही तो काम है,
हर ईंट जो तुमने रखी, उस पर तुम्हारा नाम है।
हाथ से जो हाथ मिले, तो शक्ति बन जाती है,
सहयोग की एक लहर, तकदीर बदल जाती है।
थक हार के बैठो मत, अभी लक्ष्य दूर है,
आने वाला कल तुम्हारा, तुम कल के नूर हो।
अंधियारे को चीर कर, नया दौर लाएंगे,
श्रम की पावन मशाल से, जग को जगमगाएंगे।
उठो कि अब प्रभात है, श्रम का हाथ साथ है,
श्रमिक के ही स्वाभिमान में, गौरव की गाथा है।
जय श्रम! जय श्रमिक!
गीत: गौरव की भाषा हिन्दी
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
पुरखों की सौगात है ये, जन-जन के जज्बात है ये।
मिठास भरे हर बोल में इसके, जैसे घुली हो मिश्री-कंदी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
संस्कृत की ये लाड़ली बेटी, संस्कारों की धारा है,
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर का, इसमें ज्ञान समाया है।
दोहों में ये जीवन दर्शन, छंदों में ये सरगम है,
साहित्य के विशाल गगन में, ये ही सूरज-चंद्रम है।
हर शब्द में एक अहसास है, प्रेम की पावन ये पयस्वनी,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, ये सबको जोड़ के रखती है,
विविधता के इस गुलशन को, धागे में पिरोती चलती है।
सरल भी है, सुगम भी है, ये अभिव्यक्ति का दर्पण है,
मातृभूमि की सेवा में, हमारा ये शब्द-अर्पण है।
गूँजे विश्व के हर कोने में, बनकर विजय-ध्वनि,
भारत माँ के भाल की बिंदी, सबसे प्यारी अपनी हिन्दी।
ललित मोहन शुक्ला ( हिंदी दिवस पर विशेष)
गीत: "मंजिल की ओर चल"
उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है,
सोए हुए इस कौम के मन में, विश्वास फिर से जगाना है।
न रुकना है, न थकना है, बस बढ़ते ही जाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।
विवेकानंद की वाणी का, तुम पावन मंत्र दोहराओ,
'उठो, जागो और लक्ष्य की' राहों पर तुम कदम बढ़ाओ।
शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम सागर से भी गहरे हो,
तुम सूर्य की उज्ज्वल किरण हो, तुम साहस के पहरे हो।
अज्ञान का अंधियारा तजकर, ज्ञान का दीप जलाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।
बाधाएं आए राहों में, तो तुम बन जाओ हिमालय,
संघर्षों की आग में तपकर, बनो स्वयं ही देवालय।
जाति-पाँति का भेद मिटाकर, प्रेम का पाठ पढ़ाएंगे,
हाथों में लेकर हाथ हम, नव-युग का दीप जलाएंगे।
आलस की जंजीरें तोड़ो, समय की मांग निभाना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।
तुम कल के कर्णधार हो, तुम ही देश की धड़कन हो,
तुम्हारी आँखों में सपने, और रगों में देशभक्ति का गुंजन हो।
आकाश को तुम छू लो पर, पाँव जमीन पर टिके रहें,
संस्कारों की इस मिट्टी के, संस्कार कभी न मिटें रहें।
युवा शक्ति का परचम अब, जग में हमें फहराना है,
तुझे अपनी मेहनत से भारत, फिर स्वर्ग बनाना है।
उठो धरा के वीर युवा, अब नया सवेरा लाना है...
मंजिल की ओर चल... तू मंजिल की ओर चल!
फूलों की मुस्कान
कांटों की गोद में पलकर भी,
जो अपनी मुस्कान नहीं खोते।
पत्थरों के बीच जगह बनाकर,
जो जीवन के बीज हैं बोते।
धूप तपन हो या झमाझम बारिश,
हर हाल में वे मुस्काते हैं।
खुद को बिखेर कर खुशबू में,
जग को महकना सिखाते हैं।
कभी न देखा फूलों को,
अपनी किस्मत पर रोते हुए।
वे तो बस खिलना जानते हैं,
सब कुछ अर्पण करते हुए।
सीख यही है जीवन की,
चाहे राहों में कितने हों शूल।
हौसला ऐसा रखो हृदय में,
कि तुम भी बन जाओ एक फूल।
ना गिरने का डर हो मन में,
ना मुरझाने का कोई शोक।
अपनी खुशबू ऐसी फैलाओ,
कि नतमस्तक हो सारा लोक।
ललित मोहन शुक्ला ( लेखक व रचनाकार)
मिजाज-ए-इश्क
"सलीका तुम ने सीखा ही नहीं शायद मोहब्बत का,
चाय ठंडी हो गई... और तुम अभी तक सोच रहे हो।"
"इक कप चाय दो प्यालों में बराबर बाँट कर,
हमने अक्सर रंजिशों की बर्फ पिघलते देखी है।"
"वो चाय की चुस्कियाँ, वो यादों का कारवाँ,
शाम ढलते ही अक्सर, महफ़िल जम जाती है।"
"रिश्तों की मिठास बढ़ानी हो तो बस इतना करना,
चीनी कम रखना और चाय साथ बैठ कर पीना।"
ललित मोहन शुक्ला (विश्व चाय दिवस पर विशेष)
🌸 आया बसन्त, मचा हुड़दंग! 🌸
लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त!
कलियों ने घुँघरू बाँध लिए,
भँवरों ने सुर का साथ दिया,
मस्ती में झूमे हर कोई यहाँ,
जैसे धरती ने कोई ख़्वाब लिया!
पीली-पीली सरसों देखो, खेतों में मुस्काती है,
कोयल रानी अमवा की डाली पर तान सुनाती है।
हवा चली ऐसी मतवाली, जैसे कोई जादू कर डाला,
फूलों ने पहना है देखो, लाल-गुलाबी चोला निराला।
शरम छोड़कर नाचे दुनिया, छोड़ो अब तुम भी ये गम,
संग हमारे थिरको प्यारे, छम-छम, छम-छम, छम-छम!
सूरज की किरणों ने आकर, ओस की बूंदें चुराई हैं,
ठंडी-ठंडी रातों ने अब, अपनी विदाई गाई है।
नदी किनारे पछुवा बोले, गूँज उठा है सारा गाँव,
आओ सखियों पींग बढ़ाएँ, झूला डालें बरगद छाँव।
मस्त कलंदर हुए हैं सारे, मौसम बड़ा चंगा है,
दिल की पतंगें उड़ रही ऊँची, उड़ान बड़ी नौरंगा है!
ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा, सब मस्त मगन इस बेले में,
आओ खो जाएँ हम सब मिलकर, कुदरत के इस मेले में।
लो आया बसन्त, लो आया बसन्त,
खुशियों का चढ़ा है आज रंग अनन्त!
गीत: आया पर्व संक्रांति का
लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।
तिल-गुड़ की मीठी बोली है, मन में छाई खुशहाली है,
सूरज की स्वर्णिम किरणों ने, हर आँगन दीवाली है।
पीली सरसों लहराती है, खेतों में सोना उग आया,
कोयल की कूक ने कानों में, वसंत का राग सुनाया।
शीत की विदा की वेला है, गुनगुनी धूप मन भाती है,
नदियों के पावन तट पर देखो, श्रद्धा शीश झुकाती है।
खिचड़ी की सोंधी खुशबू से, घर-घर महक रहा सारा,
दान-पुण्य और सेवा का, बहता पावन अमृत धारा।
'तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला', प्रेम का मंत्र सिखाया है,
आज ऊंच-नीच के भेदों को, सबने मिलकर बिसराया है।
वो काटा... वो मारा... की गूँज रही छत-छत टोली,
रंग-बिरंगी पतंगों ने, अम्बर में खेली होली।
भारत की सतरंगी संस्कृति, आज एक सुर में गाती है,
संक्रांति की ये मधुर छुअन, रिश्तों में मिठास बढ़ाती है।
लो आया पर्व संक्रांति का, नव उजियारा लाया है,
अंबर में पेंगें बढ़ाती पतंगों का मेला छाया है।
गीत: धर्म की राह, कर्म का साथ
धर्म हृदय की ज्योति है, और कर्म हाथ की शक्ति,
इन दोनों के संगम में ही, छिपी प्रभु की भक्ति।
धर्म सिखाता जीना कैसे, कर्म सिखाता बढ़ना,
सच्चे मन से इस दुनिया में, अपना दायित्व गढ़ना।
सिर्फ जपना नाम नहीं है धर्म का असली सार,
दीन-दुखी की सेवा करना, सबसे बड़ा उपकार।
धर्म अगर है नींव जगत की, कर्म है सुंदर द्वार,
बिना किए कुछ हाथ न आए, कहते सब शास्त्रार्थ।
धर्म दीप है राह दिखाने, कर्म डगर का पाँव,
इनके बिना न मिल पाएगी, सुख की शीतल छाँव।
मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे में धर्म को मत तुम ढूँढो,
अपने भीतर सोए हुए उस इंसान को तुम ढूँढो।
पसीने की हर एक बूँद में, ईश्वर का वास है होता,
वही हाथ हैं पावन सबसे, जो बीज प्रेम का बोता।
कर्म बिना सब ज्ञान अधूरा, धर्म बिना सब अंधा,
सत्य कर्म ही काट सके इस भव-सागर का फंदा।
धर्म हमारी मर्यादा है, कर्म हमारी पहचान,
दोनों मिलकर ही बनाते, मानव को इंसान।
यही सार है जीवन का, और यही है मधुर संदेश,
धर्म-कर्म को जोड़ के देखो, मिट जाएँगे क्लेश।
गीत: बहारों की मंज़िल
हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
कहाँ है वो दुनिया, जहाँ प्यार है,
जहाँ हर तरफ बस खिली ही बहार है?
हम चल पड़े हैं वहीं की डगर,
जहाँ प्यार की है सुहानी डहर...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
ये फूलों की खुशबू, ये भौरों का गाना,
जैसे सुनाए कोई पुराना अफ़साना।
नदियों के बहते हुए पानी की कल-कल,
हौले से दिल में मचाती है हलचल।
न कोई फ़िक्र हो, न कोई डगर हो,
बस तू साथ हो, और हसीं सफ़र हो।
मंजिल पे अपनी मिलेगा ये दिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
जहाँ नीले अम्बर तले शाम ठहरे,
जहाँ यादों के पहरे हों थोड़े सुनहरे।
हल्की सी ओस और मद्धम सी धूप,
निखरा हो जिसमें तेरा ही रूप।
ख्वाबों के पंखों पे उड़ते चलें,
सारे ज़माने से लड़ते चलें।
होगा मुकम्मल वहीं अपना मिल...
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
हवाओं ने छेड़ी है मदहोश धुन,
नज़र में बसी है एक प्यारी सी धुन।
ढूँढते हैं हम... बहारों की मंज़िल।
ललित मोहन शुक्ला (रचनाकार)
शीर्षक: प्रेम ही मेरी बंदगी
ओ... ओ...
प्रेम एक पावन गंगा की धारा,
प्रेम ही मन का उजियारा।
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काबा के धाम में,
मिलेगा खुदा बस प्रेम के ही नाम में।
प्रेम एक आराधना है, प्रेम ही उपासना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...
बिन बोले जो सब कुछ कह दे, वो भाषा है प्रेम,
बिना छुए जो रूह को छू ले, वो एहसास है प्रेम।
जैसे मीरा ने मोहन को पाया, बस नाम पुकार के,
जैसे राधेश्याम बसे हैं, एक दूजे को हार के।
ये मीरा की मस्ती है, ये राधा की भावना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...
धूप-दीप और फूल नहीं, बस श्रद्धा का एक तार हो,
जीवन की हर सांस का, बस प्रेम ही आधार हो।
जहाँ स्वार्थ का अंत हो, वहीं से शुरू खुदा,
प्रेम ही है वो इबादत, जो करे न कभी जुदा।
हर धड़कन की लय में है, प्रभु की ही प्रार्थना,
मेरे मन के मंदिर की, यही बस एक साधना।
प्रेम एक आराधना है...
जहाँ प्रेम है, वहां शांति है,
जहाँ प्रेम है, वहां मुक्ति है।
प्रेम ही आदि, प्रेम ही अंत,
प्रेम ही सत्य, प्रेम अनंत...
प्रेम ही मेरी बंदगी, प्रेम ही उपासना।
गीत: बहारों की नई सरगम
लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: "जीवन की डोर और उम्मीदों की पतंग"
नीले नभ के आंगन में, आज सतरंगी मेला है,
हर दिल में इक अरमान है, कोई न यहाँ अकेला है।
संकट की तीखी हवाओं से, जो लड़ना सीख जाती है,
वही पतंग मकर की धूप में, ऊँचाइयां पाती है।
बिना हवा के थपेड़ों के, पतंग कहाँ उड़ पाती है?
जीवन की मुश्किलें भी, हमें ऊपर ले जाती हैं।
ढेर सारी कन्ने कस लो, तुम अटूट विश्वास के,
थमना नहीं है डरकर तुमको, झोंकों के उपहास से।
जैसे ढील और खींच का, संगम उड़ान भरता है,
वैसे ही संयम जीवन में, हर मुश्किल को हरता है।
आसमान की होड़ में, गर पेंच कभी लड़ जाए,
कट जाए उम्मीद की डोर, या मन थोड़ा घबराए।
गिरना अंत नहीं है उसका, फिर से उसे संवरना है,
अगली सुबह नई उड़ान का, फिर संकल्प उभरना है।
कटी पतंग भी सिखाती है, कि मिट्टी से जुड़ना होगा,
आसमान को छूने के लिए, फिर शून्य से मुड़ना होगा।
तिल-गुड़ की उस मिठास सा, रिश्तों में प्यार घोलना,
ऊँची उड़ान के लालच में, अपनों को न छोड़ना।
जब तक हाथ में संयम है, और नीयत साफ तुम्हारी है,
यकीन मानो इस अंबर पर, सिर्फ जीत तुम्हारी है।
उड़ो शिखर तक तुम ऐसे, कि खुद मिसाल बन जाओ,
इस संक्रांति तुम भी अपनी, किस्मत की पतंग लहराओ।
(उपसंहार)
तो काटो गम की डोर को, और खुशियों का पेच बढ़ाओ,
आया है संक्रांति का पर्व, अपनी मंजिल को पा जाओ!
ललित मोहन शुक्ला ( शब्द शिल्पी)
शीर्षक: राह तू अपनी बनाए जा
अंधेरों की फिक्र न कर, तू खुद एक सवेरा है
ये रास्ते भी तेरे हैं, और ये आसमान तेरा है।
थक कर न बैठ ए मुसाफिर, अभी तो उड़ान बाकी है
ज़मीन खत्म हुई तो क्या, अभी पूरा आसमान बाकी है।
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो,
मंजिल की ओर कदम धरो।
तूफानों से टकराना सीखो,
खुद अपनी राह बनाना सीखो।
कांटों भरी डगर मिलेगी, पांव तेरे डगमगाएंगे
अपनों के ताने, जग की बातें, तुझको बहुत डराएंगे।
पर तू अपनी धुन का पक्का, दिल में एक विश्वास जगा
गिरी हुई हर उम्मीद को, फिर से तू आज़ाद बना।
मुश्किलों को कह दे तू, मेरा हौसला भी गहरा है
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...
सूरज की तपिश को सहकर ही, कुंदन चमक बिखेरता है
सागर की लहरों से लड़कर ही, मांझी किनारा पाता है।
बीता कल अब बीत गया, उसकी धूल को झाड़ दे
आने वाले कल के पन्नों पर, तू अपनी जीत गाड़ दे।
न रुकना है, न झुकना है, बस जीत का दम तू भरे जा
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो...
तेरी मेहनत की गूंज एक दिन, सारा जग ये गाएगा
तू आज अगर न हारा, तो कल इतिहास बनाएगा।
आगे बढ़ो!
ललित मोहन शुक्ला ( लेखक , गीतकार एवं कवि)
शीर्षक: सृष्टि का पैगाम
नीले नभ से उड़ते पंछी, लाते एक पैगाम हैं,
बहती नदियां, झूमते जंगल, सबका यही कलाम है।
धरती की इस पावन गोद में, हर जीवन मुस्काए,
शांति, प्रेम और भाईचारे का, स्वर गूंजता जाए।
पशुओं की उन मूक आँखों में, करुणा का पैगाम छुपा,
पेड़ों की शीतल छाया में, निस्वार्थ दान का नाम छुपा।
कल-कल करती जल की धारा, कहती—"चलना जीवन है",
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, महकता अपनापन है।
हर कोंपल एक संदेश सुनाती, नवजीवन की आशा का,
प्रकृति कभी न भेद बढ़ाती, ये संगम है परिभाषा का।
माथे के पसीने से जो, उपजाता है सोना,
उस श्रमिक के हाथों में है, खुशियों का कोना-कोना।
आम आदमी की सादगी में, धीरज का पैगाम बसा,
कठिन राहों में भी देखो, उसका अडिग विश्वास फंसा।
मेहनत की रोटी कहती है—"अभिमान बड़ा ही कच्चा है",
जो औरों के काम आए, वही इंसान सच्चा है।
उन महान पुरखों ने हमको, सत्य-अहिंसा सिखलाई,
त्याग, तपस्या और न्याय की, एक मशाल जलाई।
नेताओं का वही पैगाम, जो जन-जन को जोड़ सके,
नफरत की बहती आंधी का, जो रुख अपनी ओर मोड़ सके।
सबका साथ और सबका हित ही, धर्म का असली सार है,
जिसमें प्रेम समाहित हो, वही तो सच्चा संसार है।
आओ मिलकर थाम लें दामन, इस सुंदर पैगाम का,
रंग सजाएं धरती पर हम, खुशियों भरी शाम का।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा, न कोई यहाँ पराया है,
इस मिट्टी की खुशबू ने ही, सबको गले लगाया है।
ललित मोहन शुक्ला _( गीतकार)
गीत: अनमोल है ये सांसें
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना
बड़ी मुश्किल से मिलता है, ये जीवन का सुहाना।
न कल की फिक्र में खोना, न बीते कल में रोना
जो पल है हाथ में तेरे, उसी में मुस्कुराना।
कभी जो धूप तड़पाए, तो साया बनके ढल जाना
किसी के बहते अश्कों में, खुशी बनके निकल जाना।
न धन-दौलत से आँका कर, तू अपनी खुशकिस्मती को
सुकून मिलता है अपनों में, यही सच मान लेना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
बुराई को मिटाने का, बस एक ही मूलमंत्र है
जहाँ नफरत का घेरा हो, वहाँ तू प्यार बोना।
न छोटा कोई, न बड़ा कोई, खुदा की इस कचहरी में
हृदय में सबके बसता है, वो पावन दिव्य कोना।
ये सांसें हैं अमानत, इसे व्यर्थ न गंवाना...
मिले जो राह में पत्थर, तो उनसे घर बना लेना
हो मुश्किल सामने कितनी, न अपना सिर झुकाना।
जियो ऐसे कि दुनिया में, तुम्हारी याद रह जाए
महकते फूल की सूरत, चमन सारा सजाना।
ये अनमोल है जीवन, इसे जीना सिखा दो तुम
जहाँ भी पैर रक्खो तुम, गुलशन खिला दो तुम।
गीत: बहारों की नई सरगम
लो आया है बहारों का मौसम सुहाना,
फूलों की महक ने सुनाया तराना।
शाखों पे देखो नई जान आई है,
खिजां की विदाई, खुशियां छाई हैं।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
सूखी थी जो टहनी, वो फिर से हरी है,
हवाओं में खुशबू निराली भरी है।
भौरों की गुंजन में एक संदेश है,
हर ओर उम्मीद का नया परिवेश है।
जैसे धूप ने ओस को है निखारा,
तुम भी बनो अपनी मंज़िल का सितारा।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
थक कर न बैठो, ये थमने का पल नहीं,
बीता जो कल था, वो आने वाला कल नहीं।
पतझड़ तो बस एक इम्तिहान था,
मिट्टी में सोया एक नया अरमान था।
कोयल की कूक में साहस जगा लो,
हारे हुए मन को तुम फिर से मना लो।
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना,
बहारों का आया है देखो ज़माना।
रंगों की चादर ये धरती पे बिछी है,
मेहनत की कलम से तकदीर लिखी है।
खिल जाओ तुम भी कलियों की तरह,
महको जगत में खुशियों की तरह।
बहारों का गीत अब मिल के है गाना,
उठो कि अब तुम्हें भी है मुस्कुराना।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
शीर्षक: कहाँ गए वो दिन?
वो कच्ची डगर, वो मिट्टी की खुशबू,
वो यादों का झूला, वो अपनों का जादू।
कहाँ खो गए वो हसीं खेल सारे,
वो कागज़ की नैया, वो सावन की फूहारे।
मेरे हमजोली, वो संगी-सहाने,
चलो फिर से ढूँढें वही बीते ज़माने।
कभी कंचे खेलना, कभी गिल्ली-डंडा,
वो चिलचिलाती धूप में भी मन रहता चंगा।
छुपन-छुपाई में छुपना वो दीवार के पीछे,
पकड़े जाने पर हँसना, आँखें किए मीचे।
वो पिट्ठू की थपकियाँ, वो गुड़ियों की शादी,
हवाओं में घुली थी जैसे अपनी आज़ादी।
वो छोटी सी बात पर कट्टी हो जाना,
फिर उँगली फँसाकर वो 'अब्बा' मनाना।
लड़ना-झगड़ना और पल में फिर एक होना,
न दिल में कोई मैल, न खुशियों को खोना।
फटे थे वो कुर्ते, वो घुटनों की खरोंचें,
मगर दिल थे राजा, न कल की कुछ सोचें।
अब न वो आँगन है, न वो यार प्यारे,
सब सिमट गए हैं मोबाइल के द्वारे।
मशीनी हुई दुनिया, मशीनी हुए हम,
बचपन की उन यादों से आँखें हैं नम।
लौटा दो वो गलियाँ, लौटा दो वो शोर,
खींच ले जो पीछे, कहाँ गई वो डोर?
चलो आज फिर से वो यादें सजाएँ,
पुराने उन यारों को आवाज़ लगाएँ।
वही बचपन के खेल, वही हमजोली,
चलो फिर से खेलें, भरें खुशियों की झोली।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: हम तुम
धड़कनों में बसी एक सरगम हो तुम,
मेरी सूनी सी दुनिया का मरहम हो तुम।
लिखा है जो खुदा ने हथेली पे मेरी,
वही अनकहा सा हसीन गम हो तुम।
जब से मिले हैं, थम सा गया है...
ये वक्त, ये मंजर, ये आलम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।
तेरी आँखों में देखा तो खुद को पाया,
जैसे तपती धूप में ठंडी सी कोई छाया।
बिना बोले ही सब कुछ कह जाती हो,
मेरे खयालों में सुबह-शाम रहती हो।
चाहत की इस राह पर साथ चलेंगे,
बनकर वफ़ा का अटूट एक परचम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।
दुनिया की भीड़ में हाथ न छोड़ना,
दिल के इस धागे को कभी न तोड़ना।
तू है तो मुकम्मल है मेरी हर दुआ,
तुझसे ही शुरू, तुझपे ही खत्म ये कारवां।
जिंदगी के हर सुख-दुख को बाँट लेंगे,
दुआ है कि साथ न छूटे कभी जन्मों-जनम।
बस हम और तुम... बस हम और तुम।
सजदे में झुके सर ने बस यही मांगा है,
कि मुकद्दर में लिखे हों सिर्फ... हम और तुम।
गीत का शीर्षक: धड़कनों की दास्ताँ
(धीमी और रूहानी संगीत के साथ शुरू)
एक प्यार भरा ये दिल मेरा, बस तुमको पाना चाहता है,
तेरी आँखों की इन गलियों में, खो जाना जाना चाहता है।
मिले जो मुझे मेरा दिलबर, तो रब से और क्या माँगूँ मैं,
इन धड़कनों की हर आहट को, तेरे नाम सजाना चाहता हूँ।
तेरी खुशबू से महके ये रस्ते, तेरी यादों में डूबी हैं शामें,
मेरे दिल के कोरे काग़ज़ पर, लिख दी हैं मैंने तेरी वफ़ाएँ।
तू चाँद है मेरी रातों का, तू धूप है सुनहरी सुबहों की,
मेरी रूह में बस गया तू ऐसे, जैसे प्यास हो सदियों प्यासी सी।
दुनिया की भीड़ से क्या लेना, जब पास मेरा दिलबर हो,
सहरा में भी गुलशन खिल जाए, गर तेरा हाथ मेरे हाथ में हो।
न माँगूँ सोना, न चाँदी, बस एक वादा तेरा काफी है,
प्यार भरा ये दिल मेरा, तेरे प्यार का ही बस साकी है।
प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ,
बन गई मुकम्मल मेरी हर एक बात।
हाँ, प्यार भरा दिल... और दिलबर का साथ।
गीत: "जीवन का आधार है जल"
कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है,
जिसके कण-कण में है जीवन, ईश का यह उपहार है।
कहीं 'नीर' है, कहीं 'तोय' है, कहीं 'वारि' की धार,
बिन इसके सूना हो जाए, सारा यह संसार।
गगन से जो 'पय' बनकर बरसे, धरती की प्यास बुझाता है,
संस्कृत की पावन वाणी में, वह 'उदक' भी कहलाता है।
शीतल-निर्मल 'सलिल' रूप में, नभ से जो झड़ जाता है,
वही 'अंबु' बन सरिताओं में, सागर तक मिल जाता है।
तपते मरुथल की यह आशा, तरु-पल्लव का श्रृंगार है,
संस्कृति का यह 'आब' निराला, गौरव का आधार है।
इसे 'अमृत' कहो या 'जीवन', यह सब रूपों में श्रेष्ठ है,
जल संरक्षण ही अब जग में, सबसे उत्तम ध्येय है।
बूंद-बूंद को व्यर्थ न खोना, यह विनती बारम्बार है,
'वारि' बिना इस वसुंधरा का, होना नहीं उद्धार है।
कल-कल करती बहती धारा, प्राणों का संचार है...
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
शीर्षक: उत्तम भाग्य बनायेंगे
नए युग की ये पुकार है, नया संकल्प जगाएंगे,
अपने हाथों से हम अपना, उत्तम भाग्य बनायेंगे।
न हाथों की रेखाओं से, न कल के भरोसे बैठेंगे,
हम पुरुषार्थ के बल पर अब, सोई किस्मत जगायेंगे।
उत्तम भाग्य बनायेंगे...
श्रेष्ठ विचारों की भूमि पर, उन्नति का बीज बोना है,
जैसा होगा दृष्टिकोण, वैसा ही सुख-चैन पाना है।
सकारात्मक सोच बने अब, जीवन का आधार यहाँ,
सत्य, अहिंसा, प्रेम के पथ पर, अपना शीश झुकाना है।
पावन मन के दर्पण में, सुंदर चित्र सजायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...
कर्म ही है पूजा हमारी, कर्म ही सबसे महान है,
कर्तव्य पथ पर चलते रहना, यही सच्चा धर्म विधान है।
आलस्य को त्याग के अब हम, पसीने की धार बहायेंगे,
जितना गहरा श्रम होगा, उतना ऊँचा सम्मान है।
नेक नीयती की शक्ति से, जग को हम महकायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...
वर्तमान की माँग को समझें, समय के साथ जो चलना है,
नई तकनीक और कौशल से, खुद को अब निखारना है।
ज्ञान-विज्ञान के पंख लगा कर, छूना ऊँचा आसमान,
बदलती हुई इस दुनिया में, अपना नाम उभारना है।
सजग बनेंगे, कुशल बनेंगे, नया हुनर अपनायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे...
धैर्य, नियम और अनुशासन, जीवन में हम लायेंगे,
खुद को गढ़कर मिट्टी से हम, कंचन-सा चमकायेंगे।
अंधियारे को चीर के अब हम, सूरज बन छा जायेंगे,
उत्तम भाग्य बनायेंगे, हम उत्तम भाग्य बनायेंगे!
गीत: भारत भारती
हिमालय जिसका मुकुट सुशोभित, सागर चरण पखारता है,
पुण्य भूमि यह देवों की, जग जिसको नमन गुजारता है।
सत्य, सनातन, सुंदर पावन, भारत देश हमारा है,
विश्व पटल पर चमक रहा जो, वह ध्रुव तारा न्यारा है।
जहाँ गूँजती वेदों की ऋचाएं, ॐकार का नाद यहाँ,
त्याग, तपस्या, धर्म, कर्म का, होता है शंखनाद यहाँ।
अद्वैत का दर्शन दिया यहाँ, सबको गले लगाया है,
'वसुधैव कुटुम्बकम्' का पावन, मंत्र विश्व को सिखाया है।
कण-कण में शंकर बसते हैं, पत्थर भी पूजा जाता है,
यही सनातन धर्म हमारा, जग का भाग्य विधाता है।
राम का आदर्श यहाँ है, कृष्ण की गीता गाती है,
बुद्ध, महावीर की करुणा, इस माटी में मिल जाती है।
प्रताप का स्वाभिमान और, शिवा का ओज निराला है,
झांसी वाली रानी ने, स्वाधीनता को पाला है।
शून्य दिया इस दुनिया को, विज्ञान की राह दिखाई है,
सोने की चिड़िया ने अपनी, फिर से आभा पाई है।
विविध वेश, भाषाएं अनेक, पर हृदय एक ही धड़के है,
गंगा-जमुना की लहरों में, प्रेम का अमृत झलके है।
सहिष्णुता की परिभाषा, हर भारतवासी गाता है,
अतिथि देवो भवः कहकर, सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
चलो सजाएं फिर से हम, इस गौरवमयी इतिहास को,
सत्य मार्ग पर चल कर छू लें, उन्नत नील आकाश को।
जयतु-जयतु भारतम्, जयतु-जयतु सनातनम्,
वन्दे मातरम, वन्दे मातरम!
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: इस नाम को क्या नाम दूं?
ये जो ख़ामोश सा एक तार है,
ना दोस्ती है, ना सिर्फ़ प्यार है।
एक उलझन है जो सुलझती नहीं,
एक प्यास है जो बुझती नहीं।
साँसों में घुली इस शाम को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?
कभी लगे कि तुम मेरे ही हो,
जैसे धूप में ठंडी छाँव से हो।
कभी लगे कि तुम एक ख़्वाब हो,
हकीकत में ढलते हिसाब हो।
बेवजह की इस पहचान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?
कोई लफ्ज़ नहीं जो तुम्हें कह सके,
कोई दरिया नहीं जिसमें ये बह सके।
तुम दुआ भी हो, तुम दर्द भी,
तुम नर्म भी हो, तुम सर्द भी।
रूह की इस गहरी मुस्कान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?
दुनिया पूछेगी तो क्या कहेंगे हम?
खामोश रहकर कितना सहेंगे हम?
बेनाम सा ये रिश्ता रहने दो,
इसे हवाओं के संग ही बहने दो।
अनकही सी इस दास्तान को,
इस नाम को क्या नाम दूं?
इस नाम को क्या नाम दूं?
शीर्षक: हार जीत
ना हार में तू टूटकर, खुद से मुँह को मोड़ना,
ना जीत में तू झूमकर, ज़मीं से नाता तोड़ना।
यह वक्त का दरिया है बस, बहता ही जाएगा,
जो आज पीछे रह गया, वो कल शिखर पर आएगा।
अगर मिली है मात तो, वो हार नहीं एक सीख है,
कमी कहाँ पर रह गई, उसे परखना ठीक है।
गिरना बुरा होता नहीं, गिर के ना उठना हार है,
कोशिशों की धार ही, बस जीत का आधार है।
धैर्य का दामन पकड़, तू मंज़िलें तलाश कर,
हताशा की राख से, तू शौर्य का प्रकाश कर।
जो जीत का गुलाल उड़े, तो सिर को तू झुकाए रख,
है हाथ में आकाश पर, पाँव को टिकाए रख।
अहंकार की आंधी में, अक्सर महल ढह जाते हैं,
जो विनम्र रहते सदा, वही इतिहास रचाते हैं।
जीत महज एक पड़ाव है, ये आख़िरी मुकाम नहीं,
थक के बैठ जाना ही, वीरों का तो काम नहीं।
सुख और दुःख के चक्र में, तू शांत मन का दीप बन,
हर हाल में जो अडिग रहे, तू उस लहर का सीप बन।
ना हार में निराश हो, ना जीत में तू चूर हो,
कर्म की इस राह पर, तू जग में मशहूर हो।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
कलम की मशाल: विदाई संदेश
विदाई की इस वेला में, एक सीख तुम्हें सिखलाता हूँ,
अपने जीवन के अनुभवों का, मैं सार तुम्हें बतलाता हूँ।
मैंने सींचा है इन हाथों से, तुम्हारी प्रतिभा की क्यारी को,
अब समय तुम्हारा आया है, चमकाने को इस बारी को।
जाति-पाँति की संकीर्ण दीवारें, तुम मिलकर आज ढहा देना,
मानव हो तुम पहले बस, यह जग को आज बता देना।
ऊँच-नीच के भेद छोड़कर, प्रेम का दीप जलाना तुम,
सच्चे भारत की मूरत को, दुनिया में फिर से सजाना तुम।
आलस्य शत्रु है सबसे बड़ा, इसे पास कभी न आने देना,
सपनों की उड़ान को अपनी, तुम कभी न थकने देना।
रुकना नाम है मौत यहाँ, चलना ही बस जिंदगानी है,
तुम्हारे पसीने की हर बूँद में, कल की नई कहानी है।
सीखना कभी मत छोड़ना तुम, नए हुनर को अपनाना,
बदलते इस संसार में, तुम अपनी छाप बनाना।
कौशल की धार सजे हाथों में, तो जग झुकता कदमों में है,
सफलता की असली कुंजी, केवल तुम्हारे उद्यम में है।
मेरे देश का नाम रहे ऊँचा, यही है मेरी अंतिम आस,
तुम बनो राष्ट्र के नव-निर्माता, रखो स्वयं पर यह विश्वास।
मैं रिटायर हो रहा हूँ आज, पर मेरी दुआएँ साथ रहेंगी,
तुम्हारी हर एक कामयाबी, मेरा गौरव बनकर बहेंगी।
ललित मोहन शुक्ला शिक्षक
गीत: लक्ष्य हमारा, नया सवेरा
उठो युवा! अब आँखें खोलो, मंज़िल तुम्हें बुलाती है,
हाथों की इन रेखाओं से, क़िस्मत नहीं बनाई जाती है।
चाहे नौकरी की राह चुनो, या खुद का मार्ग बना लेना,
हुनर जगाओ अपने भीतर, जग को जीतकर दिखा देना।
केवल किताबी ज्ञान नहीं, अब हाथों में कमाल हो,
जो भी सीखो डूब के सीखो, तुम ख़ुद एक मिसाल हो।
तकनीक नई अपनानी है, नवाचार को पाना है,
कल के कुशल 'रचनाकार' बन, देश का मान बढ़ाना है।
माँगने वाले क्यों बनते हो? तुम देने वाले बन जाओ,
अपने छोटे से विचार को, तुम वटवृक्ष बनाओ।
धैर्य हृदय में धारण कर, अनुशासन को ढाल बना,
मेहनत की इस भट्टी में, तपकर तुम टंकसाल बना।
हार मिले तो डरो नहीं, वो अनुभव का ही हिस्सा है,
गिरकर उठने वालों का ही, बनता जग में क़िस्सा है।
ईमानदारी, दृढ़ निश्चय, और मीठी वाणी साथ रहे,
सफलता की इस ऊँचाई पर, सदा सिर पर हाथ रहे।
हम रचेंगे कल नया, हम बदलेंगे ये धरा,
आत्मनिर्भर बनेंगे हम, है संकल्प यही भरा।
रोजगार हो या स्वरोजगार, श्रेष्ठ हमें कहलाना है,
भारत की इस युवा शक्ति का, लोहा अब मनवाना है।
गीत: नई उमंग का आगाज़
नया सवेरा, नई रोशनी, नया हौसला जागे,
छोड़ के पीछे डर के साये, तू अब सबसे आगे।
मन में जो इक आग जली है, उसको और हवा दे,
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।
थक कर रुकना काम नहीं है, चलना ही जीवन है,
सपनों को जो सच कर डाले, वही तो सच्चा मन है।
राहों के इन पत्थरों को, तू सीढ़ी बना ले,
मुश्किलों की हर दीवार को, हँसकर आज गिरा दे।
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।
आँखों में विश्वास जगाकर, पंखों को फैला ले,
नीले अंबर की ऊँचाई, अपनी मुट्ठी में पा ले।
बीत गया जो कल था मुश्किल, उसका अब क्या रोना,
आज हाथ में जो अवसर है, उसे नहीं है खोना।
उमंगों के इस बहते दरिया को, मंज़िल का पता दे।
उमंग भर, तरंग भर,
तू आसमाँ के संग चल।
तू आज अपनी जीत का,
नया कोई प्रसंग लिख।
कृतज्ञता: एक संबल के लिए
जीवन की लंबी डगर पर, जब विराम का क्षण आया,
पुरानी यादों का सरमाया, आँखों के सामने लहराया।
वर्षों की संचित पूंजी का, जब सबसे अधिक आधार था,
अनिश्चय के उन पलों में, मन थोड़ा सा बेजार था।
पर जहाँ कर्तव्य का साहस हो, वहाँ बाधाएँ टिकती कहाँ,
डॉ. अलका भार्गव सा व्यक्तित्व, मिलता है भला कहाँ?
जब संचित निधि की शक्ति की, सबसे कठिन दरकार थी,
आपकी त्वरित कार्यप्रणाली ही, उस समय की पुकार थी।
न कोई विलंब की बाधा, न फाइलों का वो मौन था,
आपकी सक्रियता ने बताया, कि सच्चा सारथी कौन था।
सेवा-निवृत्ति के हर देयक का, सहज निपटान कर दिया,
अनिश्चितता के उन बादलों को, मुस्कान से भर दिया।
सिर्फ कागजों का निस्तारण नहीं, यह एक बड़ा उपकार है,
ठिठकते हुए कदमों को मिला, यह सुखद सा आधार है।
कर्तव्यनिष्ठा और अपनत्व का, जो आपने उदाहरण दिया,
उसके लिए इस हृदय ने, शत-शत नमन अर्पण किया।
सकुशल संपन्न हुए सब कार्य, मन अब पूर्णतः शांत है,
आपकी इस सहृदयता से, जीवन का यह मोड़ जीवंत है।
ऋणी रहेंगे सदा हम आपके, इस आत्मीय सहयोग के लिए,
ईश्वर आपको आशीष दे, इस निस्वार्थ उद्योग के लिए।
ललित मोहन शुक्ला ( कवि गीतकार, लेखक व सेवा निवृत शिक्षक)
गीत: भ्रम ही तो शुरुआत है
ये जो धुंध सी छाई है, ये अंत नहीं आगाज़ है,
भ्रम की इस बेचैनी में ही, छिपे सत्य के साज़ है।
भटक रही है जो ये दृष्टि, नया सवेरा ढूंढेगी,
उलझी हुई ये डोर ही अब, कोई सिरा ढूंढेगी।
डरो नहीं इस द्वंद्व से, ये तो ज्ञान की प्यास है,
भ्रम का टूटना ही समझो, स्पष्टता का आभास है।
ठहरे पानी में जब तक कोई, कंकड़ नहीं गिरता है,
दर्पण जैसा शांत धरातल, कहाँ कभी हिलता है?
जब भ्रम के पत्थर गिरते हैं, लहरें तब ही उठती हैं,
मथती हैं जब विचारधाराएँ, सत्य की बूंदें टपकती हैं।
जो स्पष्ट है वो मृत है शायद, जो संशय में वो जीवित है,
खोज की पहली सीढ़ी देखो, भ्रम से ही तो निर्मित है।
मिट्टी जब तक बिखरे न, तब तक बीज कहाँ फूटेगा?
अंधकार जब गहरा होगा, तारा तब ही टूटेगा।
निश्चितताओं के घेरे में, हम अक्सर सो जाते हैं,
भ्रम की ठोकर लगते ही, हम फिर से जग जाते हैं।
ये धुंधलापन सिखा रहा है, अपनी आँखें साफ़ करो,
जो जाना है उसे भुलाकर, नई दिशा से प्यार करो।
सत्य खड़ा है कहीं दूर, बस परदे हटते जाने हैं,
भ्रम के कोहरे के पीछे, असली दृश्य सुहाने हैं।
जब थककर तुम पूछोगे कि— 'क्या सच है और क्या माया?'
समझ लेना उस पल तुमने, मंज़िल का है पता पाया।
भ्रम तो बस एक द्वार है, स्पष्टता के मंदिर का,
यही मार्ग है बाहर आने का, अपने ही अंदर का।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: "प्रणाम और परिणाम"
जो झुकना सीख लेते हैं, वही तो खास होते हैं,
झुके जो शीश चरणों में, प्रभु के पास होते हैं।
एक छोटा सा 'प्रणाम' ही, बदलता भाग्य की रेखा,
सुंदर 'परिणाम' फिर हमने, यहाँ फलते हुए देखा।
हृदय में भक्ति भाव हो, लबों पर मीठी वाणी हो,
मिटा दे द्वेष को मन से, सरल सी ये कहानी हो।
बड़ों का मान करने से, सदा आशीष मिलते हैं,
जहाँ बोओ विनय के बीज, वहीं खुशियों के फलते हैं।
विनम्रता की ये वर्षा, करे जीवन को फिर पावन,
प्रणाम की ही शक्ति से, महक उठता है ये आँगन।
अहं को त्याग कर देखो, समर्पण में ही सिद्धि है,
मिले जो शांत मन सबको, यही तो सच्ची वृद्धि है।
किया जो कर्म निष्काम, फल की चिंता छोड़ कर,
मिले सुखद परिणाम फिर, प्रभु से नाता जोड़ कर।
चलो हम वंदना कर लें, जगत के उस विधाता की,
प्रणाम से ही जुड़ती है, कड़ी जीवन की साता की।
प्रणाम है वो सीढ़ी जो, शिखर तक हमको ले जाए,
मिले परिणाम वो सुखद, जो जग में मान दिलवाए।
सदा झुक कर मिलो सबसे, यही जीवन का गहना है,
प्रणाम और परिणाम में ही, सफल जीवन का बहना है।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: ऊँची उड़ान
नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,
लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है।
ठहर न तू, ऐ मुसाफ़िर, अभी राहें बाकी हैं,
सूरज सा चमकने की तेरी अपनी बारी है।
पर्वत जितने ऊँचे हों, कदम नहीं रुक पाएँगे,
काँटों वाली राहों पर भी, हम मुस्कुराएँगे।
ये जो काले बादल हैं, बस इक पल का साया हैं,
जिसने खुद को जीत लिया, उसने सब कुछ पाया है।
नील गगन की गहराई, तुझको आज बुलाती है,
तेरी हिम्मत ही तेरी, असली यहाँ थाती है।
पंखों में भर हौसला, तू भर ले एक परवाज़,
तेरे हाथों में छुपा है, आने वाला कल आज।
थक कर गिरना हार नहीं, गिर कर न उठना हार है,
कोशिश करने वालों की तो, सदा ही जय-जयकार है।
नील गगन गवाह बनेगा, तेरी विजय की गाथा का,
तू ही तो है भाग्य विधाता, अपनी किस्मत विधाता का।
आसमान छोटा पड़ेगा, जब तू पर फैलाएगा,
मिटा के हर इक मुश्किल को, तू मंज़िल पाएगा।
नील गगन को छूने की अब मन में ठानी है,
लहरों से टकराने की अपनी एक कहानी है...
अपनी एक कहानी है।
सुरक्षा का पहिया: यातायात नियम
चलो सड़क पर संभल के भाई,
नियमों में है सबकी भलाई।
जल्दबाजी को दूर भगाओ,
जीवन को अनमोल बनाओ।
लाल बत्ती कहती है— "थम जा",
जल्दबाजी में तू न रम जा।
पीली कहती— "हो तैयार",
बढ़ने का अब करो विचार।
हरी बत्ती जब जल जाए,
मंजिल की राह सुगम बनाए।
दुपहिया पर हेल्मेट धारो,
अपनों का तुम प्यार विचारो।
कार में सीट बेल्ट जरूरी,
दुर्घटना से रखो दूरी।
बाएं चलना सदा सुहाना,
नियमों का तुम मान बढ़ाना।
पैदल हैं तो जेब्रा क्रॉसिंग,
सड़क पार की यही है राहें।
नशा न करना वाहन चलाते,
हँसते-खेलते घर को जाते।
यातायात के नियम अपनाओ,
देश को सुरक्षित देश बनाओ।
ललित मोहन शुक्ला ( कवि व लेखक)
गीत: "जागो रे! धरा बुलाती है"
ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,
साँसें हो रही हैं कम, अब तो कर लो थोड़ा प्यार।
पेड़ लगाएँ, प्यास बुझाएँ, ये ही अपना धर्म है,
पर्यावरण को बचाना ही, सबसे बड़ा कर्म है।
जागो रे! अब जागो रे, ये धरा हमें बुलाती है।
हरी-भरी ये चादर इसकी, हमने खुद ही फाड़ी है,
धुआँ उगलती चिमनियाँ और बढ़ती भीड़-भाड़ी है।
नदियाँ कल-कल बहना छोड़ अब, मैली होती जाती हैं,
सूखी धरती, प्यासे पंछी, अपनी व्यथा सुनाते हैं।
एक बीज तुम बो दो ऐसा, जो शीतल छाया दे जाए,
आने वाली पीढ़ी को भी, सुंदर जग दिखला जाए।
प्लास्टिक का ये जाल हटाओ, थैला कपड़े का लाओ,
बूंद-बूंद है अमृत जैसी, पानी व्यर्थ न बहाओ।
पर्वत, जंगल, जीव-परिंदे, सब इस घर के हिस्से हैं,
इनसे ही तो जुड़ते आए, बचपन वाले किस्से हैं।
चलो हाथ से हाथ मिलाएँ, सुंदर स्वर्ग बनाना है,
गूँजे फिर से कोयल की कूक, ये संकल्प उठाना है।
ओ रे मनवा, ओ रे भाई, सुन ले धरा की पुकार,
पर्यावरण को मिल कर हम, दें खुशियों का उपहार।
जागो रे! अब जागो रे..
गीत: शिखर तक जाना तुम
पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम
जग में नाम कमाना तुम।
हिम्मत कभी न हारना तुम,
चाँद से आगे जाना तुम।
सपनों में विश्वास जगाओ,
आलस को तुम दूर भगाओ।
काँटों वाली राहों पर भी,
फूलों सा मुस्काना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
कलम तुम्हारी शस्त्र बनेगी,
मेहनत ही बस मंत्र रहेगी।
अंधियारे को चीर के सूरज,
बनकर के ढल जाना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
लिखनी है इतिहास की बातें,
जाग के काटें कितनी रातें।
भारत माँ के गौरव को अब,
नभ के पार ले जाना तुम।
चाँद से आगे जाना तुम।
पढ़ना तुम, पढ़ाना तुम
जग में नाम कमाना तुम।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: मेरी जीवन संगिनी
मेरे घर की रौनक तुम, मेरे दिल की धड़कन हो,
धूप में ठंडी छाँव तुम, महकता हुआ आँगन हो।
सपनों को जिसने सच किया, वो मधुर रागिनी हो तुम,
मेरे हर जन्म की साथी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
कभी राहें मुश्किल हुईं, कभी आए गहरे अँधेरे,
तुमने थामी जो उँगली मेरी, तो हुए रोशन सवेरे।
उतार-चढ़ाव जीवन के, हँसकर तुमने झेले हैं,
तुम्हारे दम से ही सजे, खुशियों के सब मेले हैं।
दर्द में जो मरहम बन जाए, वो सुकून भरी लोरी हो तुम,
मेरी अधूरी कहानी की, सबसे सुंदर डोरी हो तुम।
कभी छोटी बातों पे रूठना, कभी कजरारी आँखों का पानी,
फिर एक मुस्कान से कर देना, खत्म सब खींचातानी।
वो तुम्हारा धीरे से मनाना, वो प्यार भरी मनुहारें,
जैसे पतझड़ के बाद लौट आएं, फिर से वही बहारें।
मेरे मौन को जो पढ़ ले, वो अनकही कहानी हो तुम,
मेरी रूह की इबादत, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
दीवाली के दीयों की लौ, होली के चटख रंग हो,
हर तीज-त्योहार अधूरा, अगर तुम न मेरे संग हो।
कभी कंगन की खनक बनकर, कभी पायल की झंकार,
तुमसे ही घर तीर्थ बना, तुमसे ही है संसार।
मेरे सूनेपन की महफिल, मेरी ज़िंदगानी हो तुम,
मेरे माथे की बिंदी, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।
तुमसे ही सुबह मेरी, तुमसे ही मेरी शाम है,
मेरे होठों पे सजे जो, वो तुम्हारा ही तो नाम है।
सात जन्मों का वादा नहीं, हर पल का साथ चाहिए,
बस तुम्हारे हाथों में, मेरा ये हाथ चाहिए।
ललित मोहन शुक्ला ( गीतकार)
गीत: प्रकृति की पाठशाला
पशु-पक्षी ये बोल न पाएं, पर बहुत कुछ हैं सिखलाते,
जीवन जीने की सुंदर कला, ये चुपके से समझाते।
इंसान अगर जो गौर करे, तो इनसे पा सकता है ज्ञान,
प्रकृति की इस पाठशाला में, छुपा हुआ है समाधान।
नन्ही चींटी को देखो तुम, गिरती है पर रुकती नहीं,
मेहनत और अनुशासन से, वह कभी हार भी मानती नहीं।
हाथी से सीखो तुम धीरज, और अपनी शक्ति का मान,
शांत रहो पर जब जरूरत हो, दिखाओ अपना स्वाभिमान।
कोयल कहती मीठा बोलो, वाणी में तुम शहद भरो,
कड़वाहट को तजकर जग में, सबसे बस तुम प्रेम करो।
हंस सिखाता नीर-क्षीर विवेक, बुराई छोड़ अच्छाई चुनना,
दुनिया के इस शोर-शराबे में, मन की साफ़ आवाज़ सुनना।
कुत्ते से सीखो वफादारी, स्वामी-भक्ति और सच्चा प्यार,
रिश्तों में जो जान फूँक दे, ऐसा सुंदर ये व्यवहार।
शेर सिखाता निर्भय होकर, अपने पथ पर बढ़ते जाना,
भीड़ का हिस्सा कभी न बनना, अपना रुतबा खुद बनाना।
बगुला सा एकाग्र ध्यान हो, लक्ष्य पे अपनी दृष्टि रहे,
कबूतर सा शांति दूत बनो, मन में कभी न बैर रहे।
पक्षी सिखाते नीड़ बनाना, तिनके-तिनके को जोड़ के,
मेहनत से ही स्वर्ग बनेगा, आलस सारा छोड़ के।
आओ हम सब आज ये सीखें, पशु-पक्षियों के ये संस्कार,
प्रेम, दया और सेवा भाव से, महक उठेगा ये संसार।
ललित मोहन शुक्ला कवि
गीत: "जागरूकता की ज्योति"
जीवन के इस उपवन में, तुम बनके माली आना,
सफलता के हर शिखर पर, अपना ध्वज लहराना।
हृदय में दीप जलाओ ऐसा, जो कभी न बुझ पाए,
जागरूकता की लौ से ही, सारा जग मिल जाए।
भीतर क्या है घट रहा, पहले उसे पहचानो,
अपनी शक्ति, अपनी दुर्बलता को तुम जानो।
मन के भटकाव पर जब तुम, पहरा अपना रखोगे,
तभी लक्ष्य की राह पर, तुम अडिग कदम बढ़ाओगे।
जागरूकता ही शस्त्र है, जो मोह को काट देती है,
सफलता की हर सीढ़ी को, यह सरल बना देती है।
अवसर कब है द्वार खड़ा, यह वही देख पाता है,
जिसकी आँखों में सजगता का, सूरज खिल जाता है।
वक़्त की नब्ज पहचान कर, जो सही कदम उठाता है,
कामयाबी का हर मुकाम, बस उसी के पास आता है।
जहाँ अंधेरा भ्रम का हो, वहाँ यह रौशनी लाती है,
जागरूकता ही कर्म को, श्रेष्ठ मार्ग दिखाती है।
शब्दों के पीछे छुपे हुए, भावों को तुम पढ़ना सीखो,
रिश्तों की नाज़ुक डोर को, होश से बुनना सीखो।
सजग रहोगे तुम अगर, तो कभी न ठोकर खाओगे,
अपनों के संग प्रेम की, तुम नई जोत जलाओगे।
सिर्फ खुद का हित नहीं, जो सबका मंगल सोचेगा,
जागरूकता का वो राही, शिखर सफलता का छुएगा।
तो उठो मुसाफिर, आलस छोड़ो, चेतना को विस्तार दो,
जीवन के हर एक क्षेत्र को, तुम नया आधार दो।
जागरूकता ही सफलता की, सबसे मीठी तान है,
यही मनुष्य की शक्ति है, यही उसकी पहचान है।
गीत: ये जुबां भी क्या चीज़ है
कभी शहद सी मीठी, कभी ज़हर का प्याला है
इस छोटी सी जुबां ने, क्या खेल रचा डाला है
कभी बिन बोले कह जाए, सदियों के अफसाने
कभी बोल के भी ये, दिल का हाल न जाने।
जब लफ़्ज़ ठहर जाते हैं, तो नज़रें बोलती हैं
खामोशियाँ भी दिल की, परतें खोलती हैं
एक 'जुबां' वो है, जो शोर में खो जाती है
एक 'जुबां' वो है, जो चुप रहकर सब कह जाती है।
किसी की जुबां ही, उसकी सबसे बड़ी जागीर है
किसी की जुबां बस, रेत पर खींची लकीर है
कहने को तो मुकर जाते हैं, लोग अपनी बातों से
पर कुछ लोग बंधे होते हैं, 'जुबां' के धागों से।
तलवार का घाव तो, वक़्त के साथ भर जाता है
जुबां का तीर मगर, रूह के पार उतर जाता है
वही जुबां जो ज़ख्म दे, वही दुआ भी बनती है
किसी गिरते हुए के लिए, ये सहारा भी बनती है।
संभाल के रख इसे, ये तेरा अक्स दिखाती है
तेरी परवरिश क्या है, ये दुनिया को बताती है
हो जुबां पर ज़िक्र उसका, और दिल में सादगी रहे
बस यही दुआ है कि, इंसानों में इंसानियत रहे।
गीत: "सपनों की उड़ान: प्रबंधन से स्वतंत्रता"
कल की चिंता छोड़ दे तू, आज को अपना यार बना,
पैसों के इस खेल में, खुद को तू होशियार बना।
सिर्फ कमाना काफी नहीं, सहेजने की रीत सीख,
वित्तीय प्रबंधन के हाथों में, अपनी जीत लिख।
हाथों में होगी चाबी, खुशियों का द्वार खुलेगा,
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
लक्ष्य बना तू ऊँचा सा, मंज़िल को पहचान ले,
कहाँ खड़ा है तू आज, अपनी हकीकत जान ले।
एक योजना की नींव रख, कागज़ पर हर ख्वाब सजा,
बिना नक्शे की यात्रा में, है सिर्फ भटकाव की सज़ा।
नियोजन ही वो बीज है, जिससे फल महान मिलेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
पाई-पाई का हिसाब रख, फिजूलखर्ची पर लगाम हो,
तेरी मेहनत की कमाई का, सही जगह पर काम हो।
पहले खुद को भुगतान कर, बचत को अपनी ढाल बना,
मुसीबत के तूफानों में, बचत को ही अपनी ढाल बना।
अनुशासन की इस आग में, सोना तेरा निखरेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
सिर्फ तिजोरी में रखा धन, वक्त के साथ घट जाएगा,
समझदारी से जो बोएगा, वो सौ गुना फल पाएगा।
शेयर हो या सोना, या हो ज़मीन की माया,
चक्रवृद्धि (Compounding) के जादू ने, सबको अमीर बनाया।
पैसे से अब काम करा, तेरा कल सँवरने लगेगा...
प्रबंधन के रास्तों से ही, वित्तीय स्वतंत्रता का सवेरा मिलेगा!
बीमा की एक छतरी रख, अनहोनी से तू डरना मत,
कर्ज़ के गहरे दलदल में, भूल कर भी उतरना मत।
सुरक्षित जब होगा वर्तमान, तभी भविष्य मुस्कायेगा,
जोखिम को जो जीत ले, वही विजेता कहलायेगा।
धैर्य और विश्वास से, तेरा भाग्य संवरने लगेगा...
अब न किसी की गुलामी है, न पैसों की मंदी है,
वित्तीय प्रबंधन ही सच में, आज़ादी की संधि है!
आज़ादी की संधि है!